ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
तृतीय उद्योतः ४९९ ध्वन्यालोकः सती काव्ये नोत्कर्षमावहेत् । भामहेनाप्यतिशयोक्तिलक्षणे यदुक्तम्— सैषा सर्वैव वक्रोक्तिरनयार्थो विभाव्यते । यत्नोऽस्यां कविना कार्यः कोऽलङ्कारोऽनया विना ॥ इति । अतिशय योगिता अपने विषय के औचित्य से की जाने पर कैसे नहीं काव्य में उत्कर्ष लायेगी ? भामहने भी अतिशयोक्ति के लक्षण में जो यह कहा है— यह सभी ही ( अतिशयोक्ति ) वक्रोक्ति है, इससे अर्थ शोभित हो जाता है । इसमें कवि को यत्न करना चाहिए । इसके बिना कौन अलङ्कार है ! लोचनम् इति तत्काव्ये लोकोत्तरैव शोभोल्लसति । अनौचित्येन तु शोभा लीयेत एव । यथा— अल्पं निर्मितमाकाशमनालोच्यैव वेधसा । इदमेवंविधं भावि भवत्याः स्तनजृम्भणम् ॥ इति । नन्वतिशयोक्तिः सर्वालङ्कारेषु व्यङ्ग्यतयान्तर्लीनैवास्त इति यदुक्तं तत्क- थम् ? यतो भामहोऽतिशयोक्तिं सर्वालङ्कारसामान्यरूपामवादीत् । न च सामान्यं शब्दाद्विशेषप्रतीतेः पृथग्भूततया पश्चात्तनत्वेन चकास्तीति कथमस्य व्यङ्ग्यत्वमित्याशङ्कयाह—भामहेनेति । भामहेनापि यदुक्तं तत्रायमेवार्थोऽवग- न्तव्य इति दूरेण सम्बन्धः । किं तदुक्तम्—सैषेति । यातिशयोक्तिर्लक्षिता सैव सर्वा वक्रोक्तिरलङ्कारप्रकारः सर्वः । वक्राभिधेयशब्दोक्तिरिष्टा वाचामलङ्कृतिः । इति वचनात् । शब्दस्य हि वक्रता अभिधेयस्य च वक्रता लोकोत्तीर्णेन वित ही हो रहा है, इसलिए काव्य में लोकोत्तर ही शोभा उल्लसित होती है । परन्तु अनौचित्य से शोभा समाप्त ही हो जाती है । जैसे— इस प्रकार के होने वाले तेरे स्तन के उठान को ध्यान में न रख कर ही विधाता ने आकाश को छोटा बना दिया । अतिशयोक्ति सभी अलंकारों में व्यङ्ग्यरूप से अन्तर्लीन ही है यह जो कहा है वह कैसे ? क्योंकि भामह ने अतिशयोक्ति को सभी अलङ्कारों का सामान्यरूप कहा है । सामान्य शब्द से विशेष की प्रतीति होने से पृथग्भूत होकर पश्चाद्भावी रूप से नहीं प्रतीति होता है, तो फिर कैसे इसका व्यङ्ग्यत्व है ? यह आशङ्का करके कहते हैं— भामह ने—। भामह ने भी जो कहा है वहाँ यही अर्थ समझना चाहिए यह दूर से अन्वय है । वह क्या कथन है—वह सभी—। जो अतिशयोक्ति लक्षित की गई है वही सब वक्रोक्ति अलङ्कार का सब प्रकार है । वक्र अर्थ और शब्द की उक्ति वाणी की अलंकृति मानी जाती है । स वचन से । शब्द की वक्रता और अभिधेय की वक्रता अर्थात् लोकोत्तीर्णरूप से
५०० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्रातिशयोक्तिर्यमलङ्कारमधितिष्ठति कविप्रतिभावशात्तस्य चारुत्वातिशययोगोऽन्यस्य त्वलङ्कारमात्रतैवेति सर्वालङ्कारशरीरस्वी- करणयोग्यत्वेनाभेदोपचारात्सैव सर्वालङ्काररूपेत्ययमेवार्थोऽवग- वहाँ, अतिशयोक्ति जिस अलङ्कार कवि की प्रतिभा के वश से जिस अलङ्कार पर अधिष्ठित होती है, उसमें अतिशय चारुत्व का योग्य हो जाता है और अन्य अल- ङ्कारमात्र होते हैं, इस प्रकार सभी अलङ्कारों के शरीर को अङ्गीकार की योग्यता लोचनम् रूपेणावस्थानमित्ययमेवासावलङ्कारभावः ; लोकोत्तरतैव चातिशयः, तेनातिश- योक्तिः सर्वालङ्कारसामान्यम् । तथा हि—अनया अतिशयोक्त्या, अर्थः सकल- जनोपभोगपुराणीकृतोऽपि विचित्रतया भाव्यते । तथा प्रमदोद्यानादिः विभा- वतां नीयते । विशेषेण च भाव्यते रसमयीक्रियते, इति तावत्तेनोक्तं, तत्र कोऽसावर्थ इत्याह—अभेदोपचारात्सैव सर्वालङ्काररूपेति । उपचारे निमित्त- माह—सर्वालङ्कारेति । उपचारे प्रयोजनमाह—अतिशयोक्तिरित्यादिना अलङ्कार- मात्रतैवेत्यन्तेन । मुख्यार्थबाधोऽप्यत्रैव दर्शितः कविप्रतिभावशादित्यादिना । अयं भावः—यदि तावदतिशयोक्तेः सर्वालङ्कारेषु सामान्यरूपता सा तर्हि तादात्म्यपर्यवसायिनीति तद्व्यतिरिक्तो नैवालङ्कारो दृश्यत इति कविप्रतिभानं न तत्रापेक्षणीयं स्यात् । अलङ्कारमात्रं च न किञ्चिद्दृश्येत । अथ सा काव्य- जीवितत्वेनेत्थं विवक्षिता, तथाप्यनौचित्येनापि निबध्यमाना तथा स्यात् । अवस्थान, यही वह अलङ्कार का अलङ्कारत्व है । और लोकोत्तरता ही अतिशय है, इस कारण अतिशयोक्ति सब अलङ्कार का सामान्य है । जैसा कि—इस अतिशयोक्ति से, बहुत लोगों के द्वारा उपयोग करने से पुराना हुआ भी अर्थ विचित्र रूप से मालूम पड़ता है । उस प्रकार प्रमदा, उद्यान आदि को विभाव बनाते हैं । विशेषरूप से भावित किया जाता है, अर्थात् रसमय किया जाता है, यह जो उसने कहा है उसका अर्थ क्या है, इस प्रसंग में कहते हैं—अभेदोपचार से वही सर्वालङ्काररूप है । उपचार में निमित्त कहते हैं—सर्वालङ्कार—। उपचार में प्रयोजन कहते हैं—अतिशयोक्ति से लेकर अलङ्कारमात्र होते हैं तक । कवि की प्रतिभा के वश से—इत्यादि से मुख्यार्थ- बाध भी यहीं दिखा दिया गया । भाव यह है—यदि अतिशयोक्ति सभी अलङ्कारों में सामान्यरूप है और वह ( उसकी सामान्यरूपता ) तादात्म्य में पर्यवसित होती है । ( अर्थात् सभी अलङ्कार अतिशयोक्तिरूप हैं ) तो उस ( अतिशयोक्ति ) से व्यतिरिक्त अलङ्कार नहीं है, ऐसी स्थिति में कवि की प्रतिभा की अपेक्षा नहीं रह जायगी, और कोई ( अतिशयोक्ति से अतिरिक्त ) अलंकारमात्र नहीं दिखेगा । यदि वह ( अतिशयोक्ति ) काव्य का जीवितरूप से विवक्षित है, ऐसी स्थिति में भी औचित्य से भी निबन्ध्यमान होकर
तृतीय उद्योतः ५०१
ध्वन्यालोकः न्तव्यः । तस्याश्चालङ्कारान्तरसंकीर्णत्वं कदाचिद्वाच्यत्वेन कदाचिद्व्य- ङ्ग्यत्वेन । व्यङ्ग्यत्वमपि कदाचित्प्राधान्येन कदाचिद्गुणभावेन । तत्राद्ये पक्षे वाच्यालङ्कारमार्गः । द्वितीये तु ध्वनावन्तर्भावः । तृतीये तु गुणीभूतव्यङ्ग्यरूपता । हो जाने से अभेदोपचार से वही सर्वालङ्कार स्वरूप है, यही अर्थ समझना चाहिए । और वह अलङ्कारान्तर से सङ्कीर्ण कभी वाच्यरूप से कभी व्यङ्ग्य रूप से होती है । व्यङ्ग्यत्व भी कभी प्राधान्य से कभी गुणभाव से होता है । उनमें पहले पक्ष में वाच्य अलङ्कार का मार्ग है, दूसरे में ध्वनि में अन्तर्भाव है और तीसरे में गुणीभूत- व्यङ्ग्यरूपता है ।
लोचनम् औचित्यवती जीवितमिति चेत्—औचित्यनिबन्धनं रसभावादि मुक्त्वा नान्यत्किञ्चिदस्तीति तदेवान्तर्यामि मुख्यं जीवितमित्यभ्युपगन्तव्यं न तु सा । एतेन यदाहुः केचित्—औचित्यघटितसुन्दरशब्दार्थमये काव्ये किमन्येन- ध्वनिनात्मभूतेनेति ते स्ववचनमेव ध्वनिसद्भावाभ्युपगमसाक्षिभूतं मन्यमानाः प्रत्युक्ताः । तस्मान्मुख्यार्थबाधादुपचारे च निमित्तप्रयोजनसद्भावादभेदोपचार एवायम् । ततश्चोपपन्नमतिशयोक्तेर्व्यङ्ग्यत्वमिति । यदुक्तमलङ्कारान्तरस्वीकरणं तदेव त्रिधा विभजते—तस्याश्चेति । वाच्यत्वेनेति । सापि वाच्या भवति । यथा- ‘अपरैव हि केयमत्र’ इति । अत्र रूपकेऽप्यतिशयः शब्दस्पृगेव । अस्य त्रैवि- ध्यस्य विषयविभागमाह—तत्रेति । तेषु प्रकारेषु मध्ये य आद्यः प्रकारस्तस्मिन् । वह उस प्रकार ( काव्य का जीवित ) हो सकती है । औचित्य वाली अतिशयोक्ति ( काव्य का ) जीवित है यदि कहो तो औचित्य के निबन्धन रस, भाव आदि को छोड़ कर कोई दूसरा नहीं है, इसलिए वही अन्तर्यामी होने से मुख्य जीवित है यह मानना चाहिए न कि वह ( औचित्ययुक्त अतिशयोक्ति ) । इसलिए जो कि कुछ लोग कहते हैं कि औचित्यघटितसुन्दरशब्दार्थमय काव्य में अन्य किसी आत्मभूत ध्वनि से क्या होगा ? वे अपने वचन को ही ध्वनि के सद्भाव के स्वीकार का साक्षिभूत मानते हुए जवाब दिये जा चुके । इसलिए मुख्यार्थ के बाध से और निमित्तरूप प्रयोजन के सद्भाव से यह अभेदोपचार ही है । इसलिए अतिशयोक्ति के व्यङ्ग्य होने की बात बन गई । जो कि अलङ्कारान्त का स्वीकरण कहा है उसे ही तीन प्रकार से विभाग करते हैं—और वह अलङ्कारान्तर से—। वाच्यरूप से—। वह (अतिशयोक्ति) भी वाच्य होती है ( जैसे—‘अपरैव हि केयमत्र’ । यहाँ रूपक में भी अतिशय शब्द का स्पर्श कर ही रहा है ( अर्थात् वाच्य ही है ) इस त्रैविध्य का विषयविभाग कहते हैं—उनमें—। उन प्रकारों के बीच जो पहला प्रकार है उसमें ।
५०२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अयं च प्रकारोऽन्येषामप्यलङ्काराणामस्ति, तेषां तु न सर्वविषयः । अतिशयोक्तेस्तु सर्वालङ्कारविषयोऽपि सम्भवतीत्ययं विशेषः । येषु चालङ्कारेषु सादृश्यमुखेन तत्त्वप्रतिलम्भः यथा रूपकोपमातुल्ययोगिता- निदर्शनादिषु तेषु गम्यमानधर्ममुखेनैव यत्सादृश्यं तदेव शोभातिशय- शालि भवतीति ते सर्वेऽपि चारुत्वातिशययोगिनः सन्तो गुणीभूतव्य- ङ्ग्यस्यैव विषयाः । समासोक्त्याक्षेपपर्यायोक्तादिषु तु गम्यमानांशावि- नाभावेनैव तत्त्वव्यवस्थानाद्गुणीभूतव्यङ्ग्यता निर्विवादैव । तत्र च यह प्रकार अन्य अलङ्कारों का भी है, परन्तु उनका ( प्रकार ) सब विषय वाला नहीं है, परन्तु अतिशयोक्ति का ( प्रकार ) सब अलङ्कार के विषय वाला भी सम्भव होता है इस प्रकार यह विशेष है। जिन अलङ्कारों में सादृश्य के द्वारा तत्त्व ( अल- ङ्कारत्व ) का लाभ होता है, जैसे रूपक, उपमा, तुल्ययोगिता, निदर्शना आदि, उनमें गम्यमान धर्म के प्रकार से ही जो सादृश्य है वही अतिशय शोभा वाला होता है, इस प्रकार वे सभी अतिशय चारुत्व से युक्त होते हुए गुणीभूत व्यङ्ग्य के ही विषय होते हैं । किन्तु समासोक्ति, आक्षेप, पर्यायोक्त आदि में गम्यमान अंश के अविनाभाव से ही तत्त्व ( अलङ्कारत्व ) की व्यवस्था होने से गुणीभूतव्यङ्ग्यता निर्विवाद ही लोचनम् नन्वतिशयोक्तिरेव चेदेवम्भूता तत्किमपेक्षया प्रथमं तावदिति क्रमः सूचित इत्याशङ्क्याह—अयं चेति । योऽतिशयोक्तौ निरूपितोऽलङ्कारान्तरेऽप्यनुप्रवे- शात्मकः । नन्वेवमपि प्रथममिति केनाशयेनोक्तमित्याशङ्क्याह—तेषामिति । एवमलङ्कारेषु तावद्व्यङ्ग्यस्पर्शोऽस्तीत्युक्त्या तत्र किं व्यङ्ग्यत्वेन भातीति विभागं व्युत्पादयति—येषु चेति । रूपकादीनां पूर्वमेवोक्तं स्वरूपम् । निदर्शना- यास्तु 'क्रिययैव तदर्थस्य विशिष्टस्योपदर्शनम् । इष्टा निदर्शने'ति । उदाहरणम्- जब अतिशयोक्ति इस प्रकार की है तो किस अपेक्षा से 'पहले' यह क्रम सूचित किया है ? यह आशङ्का करके कहते हैं—यह प्रकार—। अतिशयोक्ति में अलङ्कारान्तर में अनुप्रवेशरूप जो निरूपण किया गया है। फिर भी 'पहले' यह किस आशय से कहा है ? यह आशङ्का करके कहते हैं—उनका—। इस प्रकार 'अलङ्कारों में व्यङ्ग्य का स्पर्श है' यह कह कर व्यङ्ग्यत्व से क्या होता है यह व्युत्पादन करते हैं—और जिन अलङ्कारों में—। रूपक आदि का स्वरूप पहले ही कह चुके हैं। किन्तु निदर्शना का ( लक्षण है )—'क्रिया के द्वारा ही उसके विशिष्ट अर्थ का उपदर्शन निदर्शना मानी जाती है' उदाहरण—
तृतीय उद्योतः ५०३ ध्वन्यालोकः गुणीभूतव्यङ्ग्यतायामलङ्काराणां केषाञ्चिदलङ्कारविशेषगर्भतायां नियमः। यथा व्याजस्तुतेः प्रेयोऽलङ्कारगर्भत्वे। केषाञ्चिदलङ्कारमात्रगर्भतायां नियमः। यथा सन्देहादीनामुपमागर्भत्वे। केषाञ्चिदलङ्काराणां परस्प- रगर्भतापि सम्भवति। यथा दीपकोपमयोः। तत्र दीपकमुपमागर्भत्वेन प्रसिद्धम्। उपमापि कदाचिद्दीपकच्छायानुयायिनी। यथा मालोपमा। तथा हि 'प्रभामहत्या शिखयेव दीपः' इत्यादौ स्फुटैव दीपकच्छाया लक्ष्यते। तदेवं व्यङ्ग्यांशसंस्पर्शे सति चारुत्वातिशययोगिनो रूपकादयोऽ- लङ्काराः सर्व एव गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य मार्गः। गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं च है। और उस गुणीभूतव्यङ्ग्यता में कुछ अलङ्कार नियमतः—अलङ्कार विशेषगर्भ होते हैं, जैसे व्याजस्तुति प्रेयोऽलङ्कारगर्भ होती है; कुछ (अलङ्कार) नियमतः अल- ङ्कारमात्रगर्भ होते हैं, जैसे सन्देह आदि उपमागर्भ होते हैं; कुछ अलङ्कार परस्पर गर्भ भी सम्भव होते हैं, जैसे दीपक और उपमा में वहाँ दीपक उपमागर्भ रूप से प्रसिद्ध है। उपमा भी कभी दीपक की छायानुयायिनी हो जाती है, जैसे मालोपमा। जैसा कि 'प्रभा महत्या शिखयेव दीपः' इत्यादि में स्पष्ट ही दीपक की छाया लक्षित होती है। तो इस प्रकार व्यङ्ग्यांश का संस्पर्श होने पर रूपक आदि अलङ्कार अतिशय चारुत्व से युक्त होते हैं, यह सभी गुणीभूतव्यङ्ग्य का मार्ग है। उस प्रकार की जाति लोचनम् अयं मन्दद्युतिर्भास्वानस्तं प्रति यियासति। उदयः पतनायेति श्रीमतो बोधयन्नरान् ॥ प्रेयोऽलङ्कारेति। चाटुपर्यवसायित्वात्तस्याः। सा चोदाहृतैव द्वितीयोद्द्योतेऽ- स्माभिः। उपमागर्भत्व इत्युपमाशब्देन सर्व एव तद्विशेषा रूपकादयः, अथवौ- पम्यं सर्वसामान्यमिति तेन सर्वमाक्षिप्तमेव। स्फुटैवेति। 'तया स पूतश्च विभू- षितश्च' इत्येतेन दीपस्थानीयेन दीपनाद्दीपकमात्रानुप्रविष्टं प्रतीयमानतया, यह मन्द प्रकाश वाला सूर्य 'उदय पतन के लिए होता है' यह वैभवशाली लोगों को बोध कराता हुआ अस्त जाना चाहता है। प्रेयोऽलङ्कार—। क्योंकि वह (व्याजस्तुति) चाटु में पर्यवसान प्राप्त करती है। और उसे हमने दूसरे उद्योत में उदाहृत किया ही है। 'उपमागर्भ' यहां 'उपमा' शब्द से उसके सभी विशेष रूपक आदि, अथवा 'औपम्य सब में सामान्य है' इसलिए सब आक्षिप्त ही हैं। स्पष्ट हो—। 'तया स पूतश्च विभूषितश्च' इस दीपस्थानीय से दीपन होने के कारण प्रतीयमान रूप से यहां दीपक अनुप्रविष्ट है। इस उपमा में साधारण-
५०४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः तेषां तथाजातीयानां सर्वेषामेवोक्तानुक्तानां सामान्यम् । तल्लक्षणे सर्व वाले उन उक्त और अनुक्त सभी का गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व सामान्य है। उसके लक्षण में सभी ये सुष्ठु प्रकार से लक्षित हो जाते हैं । सामान्य लक्षण से रहित प्रत्येक का लोचनम् साधारणधर्माभिधानं ह्येतदुपमायां स्पष्टेनाभिधाप्रकारेणैव । तथाजातीयाना- मिति । चारुत्वातिशयवतामित्यर्थः । सुलक्षिता इति यत्किलैषां तद्विनिर्मुक्तं रूपं न तत्काव्येऽभ्यर्थनीयम् । उपमा हि ‘यथा गौस्तथा गवयः’ इति । रूपकं ‘खलेवाली यूप’ इति । श्लेषः ‘द्विर्वचनेऽची’ति तन्त्रात्मकः । यथासंख्यं ‘तुदी- शालातुरै’ति । दीपकं ‘गामश्वम्’ इति । ससन्देहः ‘स्थाणुर्वा स्यात्’ इति । अपह्नुतिः ‘नेदं रजतम्’ इति । पर्यायोक्तं ‘पीनो दिवा नात्ति’ इति । तुल्ययो- गिता ‘स्थाध्वोरिच्च’ इति । अप्रस्तुतप्रशंसा सर्वाणि ज्ञापकानि, यथा पदसंज्ञा- यामन्तवचनम्— ‘अन्यत्र संज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्तविधिर्न’ इति । आक्षे- पश्चोभयत्र विभाषासु विकल्पात्मकविशेषाभिधित्सया इष्टस्यापि विधेः पूर्व निषेधनात्प्रतिषेधेन समीकृत इति न्यायात् । अतिशयोक्तिः ‘समुद्रः कुण्डिका’ ‘विन्ध्योवर्धितवानर्कवर्त्मगृण्हात्’ इति । एवमन्यत् । न चैवमादि काव्योपगीति, गुणीभूतव्यङ्ग्यतैवात्रालङ्कारतायां मर्मभूता लक्षिताः तान् सुष्ठु लक्ष्यति । यया सुपूर्णं कृत्वा लक्षिताः सङ्गृहीता धर्म का अभिधान स्पष्ट अभिधा प्रकार से ही है । उस प्रकार की जाति वाले—। अर्थात् अतिशय चारुत्व वाले । सुष्ठु प्रकार से लक्षित—। जो कि इन (उपमा आदि अलङ्कारों) का उस (गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व) से रहित रूप है वह काव्य में अभीष्ट नहीं है । क्योंकि उपमा—‘जैसा गौ वैसा गवय’ । रूपक—‘खलेवाली यूप है’ । श्लेष— ‘द्विर्वचनेऽचि’ तन्त्रात्मक है। यथासङ्ख्य—‘तुदीशालातुर०’। दीपक—‘गौ अश्व’। ससन्देह—‘अथवा स्थाणु होगा’ अपह्नुति—‘यह रजत नहीं है’। पर्यायोक्त—‘पीन दिन में भोजन नहीं करता है’। तुल्ययोगिता—स्थध्वोरिच्च’। अप्रस्तुतप्रशंसा—सब ज्ञापक, जैसे पदसंज्ञा में अन्तवचन—‘अन्यत्र संज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्तविधिर्न’। आक्षेप—विभाषाओं में दोनों जगह विकल्परूप विशेष के अभिधान की इच्छा से इष्ट भी विधि के निषेध से प्रतिषेध के समान बना हुआ’ इस न्याय से । अतिशयोक्ति— ‘कुण्डिका समुद्र है’; ‘विन्ध्य ने बढ़ कर सूर्य के मार्ग को छेक लिया’ । इस प्रकार दूसरा । इत्यादि को काव्य नहीं कहते । अलङ्कारता में मर्मभूत गुणीभूतव्यङ्ग्यता ही यहाँ लक्षित होकर उन्हें सुष्ठु प्रकार से लक्षित करती है । जिस (गुणीभूतव्यङ्ग्यता से) सुपूर्ण करके लक्षित अर्थात् संगृहीत होते हैं, अन्यथा अवश्य अव्याप्ति हो जाती । उसे ।
तृतीय उद्योतः ५०५ ध्वन्यालोकः एवैते सुलक्षिता भवन्ति। एकैकस्य स्वरूपविशेषकथनेन तु सामान्य- लक्षणरहितेन प्रतिपादपाठेनेव शब्दा न शक्यन्ते तत्त्वतो निर्ज्ञातुम्, आनन्त्यात् । अनन्ता हि वाग्विकल्पास्तत्प्रकारा एव चालङ्काराः। गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य च प्रकारान्तरेणापि व्यङ्ग्यार्थानुगमलक्षणेन स्वरूपविशेष कहने से तो प्रत्येक पद के पाठ से शब्दों की भांति अनन्त होने के कारण तत्त्वतःज्ञान नहीं किया जा सकता । क्योंकि वाग्विकल्प अनन्त हैं और अलङ्कार उनके प्रकार ही हैं।—गुणीभूतव्यङ्ग्य का विषय व्यङ्ग्य अर्थ के अनुगम से प्रकारान्तर लोचनम् भवन्ति, अन्यथा त्ववश्यमव्याप्तिर्भवेत् । तदाह—एकैकस्येति । न चातिशयो- क्तिवक्रोक्त्युपमादीनां सामान्यरूपत्वं चारुताहीनानामुपपद्यते, चारुता चैतदा- यत्तेत्येतदेव गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं सामान्यलक्षणम् । व्यङ्ग्यस्य च चारुत्वं रसाभिव्यक्तियोग्यतात्मकम् , रसस्य स्वात्मनैव विश्रान्तिधाम्न आनन्दात्म- कत्वमिति नानवस्था काचिदिति तात्पर्यम् । अनन्ता हीति । प्रथमोद्द्योत एव व्याख्यातमेतत् ‘वाग्विकल्पानामानन्त्यात्’ इत्यत्रान्तरे । ननु सर्वेष्वलङ्कारेषु नालङ्कारान्तरं व्यङ्ग्यं चकास्ति ; तत्कथं गुणीभूत- व्यङ्ग्येन लक्षितेन सर्वेषां संग्रहः । मैवम्; वस्तुमात्रं वा रसो वा व्यङ्ग्यं सद्गुणीभूतं भविष्यति तदेवाह—गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य चेति । प्रकारान्तरेण वस्तु रसात्मनोपलक्षितस्य । यदि वेत्थमवतरणिका—ननु गुणीभूतव्यङ्ग्येनालङ्कारा यदि लक्षितास्तर्हि कहते हैं—प्रत्येक का—। चारुताहीन अतिशयोक्ति, वक्रोक्ति, उपमा आदि का सामान्य- रूपत्व बन सकता है, और चारुता इसके अधीन है, यही गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व सामान्य लक्षण है और व्यङ्ग्य का चारुत्व रसाभिव्यक्ति योग्यतारूप है, इस स्वस्वरूप से ही विश्रान्तिधाम है, अतएव आनन्दात्मक है, इस प्रकार कोई अनवस्था नहीं है यह तात्पर्य है । क्योंकि अनन्त—। प्रथम उद्योत में ही 'वाग्विकल्पानामानन्त्यात्' इस प्रसंग में यह व्याख्यान किया जा चुका है । ( प्रश्न ) सब अलङ्कारों में अलङ्कारान्तर व्यङ्ग्य नहीं होता, तो गुणीभूतव्यङ्ग्य के लक्षित होने पर कैसे सभी का संग्रह होगा ? ( उत्तर ) ऐसा नहीं, वस्तुमात्र अथवा रस व्यङ्ग होता हुआ गुणीभूत होगा, उसे ही कहते हैं—गुणीभूतव्यङ्ग्य का—। वस्तु और रसरूप प्रकारान्तर से—। उपलक्षित । अथवा अवतरणिका इस प्रकार है—गुणीभूतव्यङ्ग्य से यदि अलङ्कार लक्षित हो गये तो लक्षण कहना चाहिए, फिर क्यों नहीं कहा, यह आशङ्का करके कहते हैं—
५०६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः विषयत्वमस्त्येव । तदयं ध्वनिनिष्यन्दरूपो द्वितीयोऽपि महाकविविष- योऽतिरमणीयो लक्षणीयः सहृदयैः । सर्वथा नास्त्येव सहृदयहृदयहा- रिणः काव्यस्य स प्रकारो यत्र न प्रतीयमानार्थसंस्पर्शेन सौभाग्यम् । तदिदं काव्यरहस्यं परमिति सूरिभिर्भावनीयम् । मुख्या महाकविगिरामलङ्कृतिभृतामपि । प्रतीयमानच्छायैषा भूषा लज्जेव योषिताम् ॥ ३७ ॥ से भी होता ही है । इसलिए ध्वनिनिष्यन्द रूप, महाकवियों का विषय, अतिरम- णीय दूसरा भी सहृदयों को लक्षित करना चाहिए । सहृदय हृदयहारी काव्य का वह सर्वथा प्रकार नहीं ही है जिसमें प्रतीयमान अर्थ के संस्पर्श से सौभाग्य नहीं है । तो यह उत्कृष्ट काव्यरहस्य है यह विद्वानों को समझना चाहिए । महाकवियों को अलङ्कार युक्त भी वाणी की यह प्रतीयमानकृत छाया स्त्रियों की लज्जा की भाँति मुख्य भूषा है । लोचनम् लक्षणं वक्तव्यं किमिति नोक्तमित्याशङ्क्याह—गुणीभूतेति । विषयत्वमिति लक्षणीयत्वमिति यावत् । केन लक्षणीयत्वं ध्वनिव्यतिरिक्तो यः प्रकारो व्यङ्ग्य- त्वेनार्थानुगमो नाम तदेव लक्षणं तेनेत्यर्थः । व्यङ्ग्ये लक्षिते तद्गुणीभावे च निरूपिते किमन्यदस्य लक्षणं क्रियतामिति तात्पर्यम् । एवं 'काव्यस्यात्मा ध्वनिः' इति निर्वाह्योपसंहरति—तदयमित्यादिना सौभाग्यमित्यन्तेन । यत्प्रागुक्तं सकलसत्कविकाव्योपनिषद्भूतमिति तन्न प्रतारणमात्रमर्थवादरूपं मन्तव्यमिति दर्शयितुम्-तदिदमिति ॥ ३६ ॥ मुख्या भूषेति । अलङ्कृतिभृतामपिशब्दादलङ्कारशून्यानामपीत्यर्थः । प्रतीयमानकृता छाया शोभा सा च लज्जासदृशी गोपनासारसौन्दर्यप्राणत्वात् । अलङ्कारधारिणीनामपि नायिकानां लज्जा मुख्यं भूषणम् । प्रतीयमाना च्छाया गुणीभूतव्यङ्ग्य का—। विषय अर्थात् लक्षणीय । अर्थात् किससे लक्षणीय होगा, व्यङ्ग्य- रूप से अर्थानुगम नाम का ध्वनिव्यतिरिक्त जो प्रकार है वही लक्षण है उससे । व्यङ्ग्य के लक्षित होने पर और उसके गुणीभाव के निरूपण किये जाने पर दूसरा लक्षण क्या किया जाय, यह तात्पर्य है । इस प्रकार 'काव्य का आत्मा ध्वनि है' यह निर्वाह करके उपसंहार करते हैं—इसलिए—। इत्यादि से लेकर सौभाग्य तक । जो पहले कहा है कि समस्त सत्कवियों के काव्य का उपनिषदभूत है वह प्रतारणमात्र नहीं है, बल्कि अर्थवाद- रूप मानना चाहिए यह दिखाने के लिए—तो यह—॥ ३६ ॥ मुख्य भूषा—। 'अलङ्कारयुक्त भी' शब्द से 'अलङ्कारशून्य भी' यह अर्थ है । प्रतीयमानकृत छाया अर्थात् शोभा, वह लज्जा के समान है, क्योंकि गोपना के सार
तृतीय उद्योतः ५०७ ध्वन्यालोकः अनया सुप्रसिद्धोऽप्यर्थः किमपि कामनीयकमानीयते । तद्यथा— विश्रम्भोत्था मन्मथाज्ञाविधाने ये मुग्धाक्ष्याः केऽपि लीलाविशेषाः । अक्षुण्णास्ते चेतसा केवलेन स्थित्वैकान्ते सन्ततं भावनीयाः ॥ इससे सुप्रसिद्ध भी अर्थ कुछ कमनीय बन जाता है । वह जैसे— मन्मथ की आज्ञा के विधान में जो मुग्धाक्षी के विश्रम्भ से उत्पन्न कुछ अपूर्व लीला-विशेष हैं, अक्षुण्ण उन्हें एकान्त में स्थित होकर केवल (एकाग्र) चित्त से भावना के योग्य हैं। लोचनम् अन्तर्मदनोद्भेदजहृदयसौन्दर्यरूपा यया, लज्जा ह्यन्तरुद्भिन्नमान्मथविकार- जुगोपयिषारूपा मदनविजृम्भैव। वीतरागाणां यतीनां कौपीनापसारणेऽपि त्रपाकलङ्कादर्शनात् । तथा हि कस्यापि कवेः—'कुरङ्गीवाङ्गानि' इत्यादिश्लोकः । तथा प्रतीयमानस्य प्रियतमाभिलाषानुनाथनमानप्रभृतेः छाया कान्तिः यया । शृङ्गाररसतरङ्गिणी हि लज्जावरुद्धा निर्भरतया तांस्तान् विलासान्नेत्रगात्र- विकारपरम्परारूपान् प्रसूत इति गोपनासारसौन्दर्यलज्जाविजृम्भितमेत- दिति भावः । विश्रम्भेति । मन्मथाचार्येण त्रिभुवनवन्द्यमानशासनेन अत एव लज्जासाध्व- सध्वंसिना दत्ता येयमलङ्घनीयाज्ञा तदनुष्ठानेऽवश्यकर्तव्ये सति साध्वसलज्जा- त्यागेन विश्रम्भसम्भोगकालोपनताः, मुग्धाक्ष्या इति अकृतकसम्भोगपरिभाव- सौन्दर्य का प्राण है। अलङ्कार धारण करने वाली भी नायिकाओं की लज्जा मुख्य भूषण है। अन्तर्मदन के उद्भेद से उत्पन्न सौन्दर्यरूप छाया प्रतीयमान हो जिससे, क्योंकि लज्जा भीतर उद्भिन्न मान्मथविकार की गोपनेच्छारूप मदनजृम्भा ही है। क्योंकि वीतराग यतियों के कौपीन हटा देने पर भी त्रपा का कलङ्क नहीं दिखता। जैसा कि किसी कवि का—'कुरङ्गीवाङ्गानि०' इत्यादि श्लोक। उस प्रकार प्रतीयमान प्रियतम के अभिलाप, अनुनाथन प्रभृति की छाया अर्थात् कान्ति है जिससे। भाव यह कि शृङ्गार रस की तरङ्गिणी लज्जा से अवरुद्ध होकर नेत्र और गात्र के विकार परम्परा- रूप उन-उन विलासों को उत्पन्न करती है, इस प्रकार यह गोपनारूप द्वार वाले सौन्दर्यवाली लज्जा का विजृम्भित है । मन्मथ की—। त्रिभुवन द्वारा वन्द्यमान शासन वाले, अतएव लज्जा और साध्वस के ध्वंस कर देने वाले मन्मथाचार्य की दी हुई जो यह अलङ्घनीय आज्ञा है उसके अनुष्ठान अर्थात् अवश्यकर्तव्य की अवस्था में साध्वस और लज्जा के त्याग से विश्रम्भ- सम्भोग के अवसर में प्राप्त, मुग्धाक्षी के—अकृत्रिम सम्भोग के परिभावन से उचित
५०८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इत्यत्र केऽपीत्यनेन पदेन वाच्यमस्पष्टमभिदधता प्रतीयमानं वस्त्वक्लिष्टमनन्तमर्पयता का छाया नोपपादिता । अर्थान्तरगतिः काक्वा या चैषा परिदृश्यते । सा व्यङ्ग्यस्य गुणीभावे प्रकारमिममाश्रिता ॥ ३८ ॥ यहाँ वाच्य का अस्पष्ट अभिधान करते हुए 'कुछ' इस पद ने अक्लिष्ट और अनन्त प्रतीयमान को अर्पित करते हुए कौन शोभा उत्पन्न नहीं की है ? और काकु से जो यह अर्थान्तर की गति देखी जाती है वह व्यङ्ग्य के गुणीभाव होने पर इस प्रकार को आश्रयण करती है ॥ ३८ ॥ लोचनम् नोचितदृष्टिप्रसरपवित्रिता येऽन्ये विलासा गात्रनेत्रविकाराः, अत एवाक्षुण्णाः नवनवरूपतया प्रतिक्षणमुन्मिषन्तस्ते, केवलेनान्यत्राव्यग्रेणैकान्तावस्थानपूर्वं सर्वेन्द्रियोपसंहारेण भावयितुं शक्या अर्हा उचिताः । यतः केऽपि नान्येनो- पायेन शक्यनिरूपणाः ॥ ३७ ॥ गुणीभूतव्यङ्ग्यस्योदाहरणान्तरमाह—अर्थान्तरेति । 'कक लौल्ये' इत्यस्य धातोः काकुशब्दः । तत्र हि साकाङ्क्षनिराकाङ्क्षादिक्रमेण पठ्यमानोऽसौ शब्दः प्रकृतार्थातिरिक्तमपि वाञ्छतीति लौल्यमस्याभिधीयते । यदि वा ईषदर्थे कुशब्दस्तस्य कादेशः । तेन हृदयस्थवस्तुप्रतीतेरीषद्भूमिः काकुः तया याऽर्थान्तरगतिः स काव्यविशेष इमं गुणीभूतव्यङ्ग्यप्रकारमाश्रितः । अत्र हेतुर्व्यङ्ग्यस्य तत्र गुणीभाव एव भवति । अर्थान्तरगतिशब्देनात्र काव्यमेवो- दृष्टिप्रसार द्वारा पवित्रित जो अन्य गात्र और नेत्र के विकाररूप विलास हैं, अतएव अक्षुण्ण अर्थात् नवनवरूप से प्रतिक्षण उन्मिषित हो रहे हैं, उन्हें केवल अर्थात् अन्यत्र व्यग्रतारहित, एकान्त में अवस्थानपूर्वक समस्त इन्द्रियों का उपसंहार करके भावना के योग्य, उचित हैं । क्योंकि 'कुछ अपूर्व' है अर्थात् अन्य उपाय से निरूपण नहीं किए जा सकते ॥ ३७ ॥ गुणीभूतव्यङ्ग्य का अन्य उदाहरण कहते हैं—और काकु—। कक लौल्ये' इस धातु का 'काकु' शब्द है । वहां साकांक्ष और निराकांक्ष आदि क्रम से पढ़ा गया वह शब्द प्रकृत अर्थ से अतिरिक्त की भी इच्छा करता है यह इसका 'लौल्य' प्रकट करता है । अथवा 'ईषत्' अर्थ में 'कु' शब्द है, उसका 'का' आदेश है । इसलिए हृदयस्थ वस्तु की प्रतीति की ईषद् भूमि काकु है, उससे जो अर्थान्तर की प्रतीति है वह काव्यविशेष इस गुणीभूतव्यङ्ग्य के प्रकार का आश्रयण करता है। यहां हेतु वहां व्यङ्ग्य का गुणीभाव ही होता है । 'अर्थान्तरगति' शब्द से यहां काव्य ही कहा गया है । यहां
तृतीय उद्योतः ५०९ ध्वन्यालोकः या चैषा काक्का क्वचिदर्थान्तरप्रतीतिर्दृश्यते सा व्यङ्ग्यस्यार्थस्य गुणीभावे सति गुणीभूतव्यङ्ग्यलक्षणं काव्यप्रभेदमाश्रयते । यथा— ‘स्वस्था भवन्ति मयि जीवति धार्तराष्ट्राः’ । यथा वा—आम असइओ̆ ओरम पडिव्वए ण तुएँ मलिणिअं सीलम् । और जो यह काकु से कहीं पर अर्थान्तर की प्रतीति देखी जाती है वह व्यङ्ग्य अर्थ के गुणीभाव होने पर गुणीभूतव्यङ्ग्य रूप काव्य प्रभेद का आश्रयण करती है । जैसे—'मेरे जीते जी धृतराष्ट्र के पुत्र स्वस्थ हो जांए !' अथवा जैसे— हाँ, हम तो बदचलन हैं, रुक जा, री पतिव्रता, तूने आबरू को मैला नहीं लोचनम् च्यते । न तु प्रतीतेरत्र गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं वक्तव्यं, प्रतीतिद्वारेण वा काव्यस्य निरूपितम् । अन्ये त्वाहुः—व्यङ्ग्यस्य गुणीभावेऽयं प्रकारः अन्यथा तु तत्रापि ध्वनि- त्वमेवेति । तच्चासत्; काकुप्रयोगे सर्वत्र शब्दस्पृष्टत्वेन व्यङ्ग्यस्योन्मीलित- स्यापि गुणीभावात्, काकुर्हि शब्दस्यैव कश्चिद्धर्मस्तेन स्पृष्टं ‘गोप्यैवं गदितः सलेशम्’ इति, ‘हसन्नेत्रार्पिताकूतम्’ इतिवच्छब्देनैवानुगृहीतम् । अत एव ‘भम धम्मिअ’ इत्यादौ काकुयोजने गुणीभूतव्यङ्ग्यतैव व्यक्तोक्तत्वेन तदाभि- मानाल्लोकस्य । स्वस्था इति, भवन्ति इति, मयि जीवति इति, धातैराष्ट्रा इति च साकाङ्क्षदीप्तगद्गदतारप्रशमनोद्दीपनचित्रिता काकुरसम्भाव्योऽयमर्थोऽत्यर्थ- मनुचितश्चेत्यमुं व्यङ्ग्यमर्थं स्पृशन्ती तेनैवोपकृता सती क्रोधानुभावरूपतां व्यङ्ग्योपस्कृतस्य वाच्यस्यैवाधत्ते । आमेति । प्रतीति का गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व नहीं कहना चाहिए, अथवा प्रतीति के द्वारा काव्य का ( गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व ) निरूपण किया है । किन्तु अन्य लोग कहते हैं—‘व्यङ्ग्य का गुणीभाव होने पर यह प्रकार है, अन्यथा वहां भी ध्वनित्व ही है’ । वह ठीक नहीं ; क्योंकि काकु के प्रयोग में सभी जगह शब्दस्पृष्ट होने के कारण उन्मीलित भी व्यङ्ग्य का गुणीभाव हो जाता है । काकु शब्द का ही कोई धर्म है, उससे स्पृष्ट ‘गोप्यैवं गदितः सलेशं’ और ‘हसन्नेत्रार्पिताकूतं’ की भांति शब्द से ही अनुगृहीत होता है । इसीलिए ‘भम धम्मिअ’ इत्यादि में काकु की योजना करने पर गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व ही व्यक्त होगा, तब उक्त रूप से लोग समझेंगे । ‘स्वस्थ’ ‘हो जांए’ ‘मेरे जीते जी’ ‘धार्तराष्ट्र’ इस साकांक्ष, दीप्त, गद्गद, तार, प्रशमन, और उद्दीपन से चित्रित काकु ‘यह अर्थ असम्भाव्य है और अत्यन्त अनुचित है’ इस व्यङ्ग्य अर्थ का स्पर्श करती हुई उसी के द्वारा उपकृत होती हुई व्यङ्ग्य से उपस्कृत
५१० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः किं उण जणस्स जाअ व्व चन्दिलं तं ण कामेमो ॥ शब्दशक्तिरेव हि स्वाभिधेयसामर्थ्याक्षिप्तकाकुसहाया सत्यर्थ- विशेषप्रतिपत्तिहेतुर्न काकुमात्रम् । विषयान्तरे स्वेच्छाकृतात्काकुमात्रा त्तथाविधार्थप्रतिपत्त्यसम्भवात् । स चार्थः काकुविशेषसहायशब्दव्यापा- रोपारूढोऽप्यर्थसामर्थ्यलभ्य इति व्यङ्ग्ग्यरूप एव । वाचकत्वानुगमनेनैव किया, और फिर हम तो ( किसी ) आदमी की पत्नी की तरह उस नाई को नहीं चाहतीं । शब्द शक्ति ही अपने अभिधेय की सामर्थ्य से आक्षिप्त काकु की सहायता से अर्थ- विशेष की प्रतिपत्ति का हेतु है न कि काकुमात्र । क्योंकि विषयान्तर में स्वेच्छा से प्रयुक्त काकुमात्र से उस प्रकार के अर्थ की प्रतिपत्ति सम्भव नहीं । और वह अर्थ काकुविशेष की सहायता वाले शब्द के व्यापार से उपारूढ होकर भी अर्थ की सामर्थ्य लोचनम् आम् असत्यः उपरम पतिव्रते न त्वया मलिनितं शीलम् । किं पुनर्जनस्य जायेव नापितं तं न कामयामहे ॥ इति च्छाया। आम् असत्यो भवामः इत्यभ्युपगमकाकुः साकाङ्क्षोपहासा । उपरमेति निराकाङ्क्षतया सूचनागर्भा। पतिव्रते इति दीप्तस्मितयोगिनी। न त्वया मलिनितं शीलमिति सगद्गदाकाङ्क्षा। किं पुनर्जनस्य जायेव मन्मथा- न्धीकृता, चन्दिलं नापितमिति पामरप्रकृतिं न कामयामहे इति निराकाङ्क्षग- द्गदोपहासगर्भा। एषा हि कयाचिन्नापितानुरक्तया कुलवध्वा दृष्टाविनयाया उपहास्यमानायाः प्रत्युपहासावेशगर्भोक्तिः काकुप्रधानैवेति। गुणीभावं दर्शयितुं शब्दस्पृष्टतां तावत्साधयति—शब्दशक्तिरेवेत्यादिना। नन्वेवं व्यङ्ग्यत्वं कथमित्याशङ्क्याह—स चेति। अधुना गुणीभावं दर्शयति—वाचकत्वेति। वाच्य की ही क्रोध के अनुभावरूपता का आधान करती है। हां हम तो—। 'हां हम बदमाश औरतें हैं' अभ्युपगम काकु आकांक्षा और उपहास के सहित है। 'रुक जा' यह निराकांक्ष होने के कारण सूचनगर्भ ( काकु ) है । 'री पतिबरता' यह दीप्त स्मित से युक्त है, 'तूने आबरू को मैला नहीं किया' यह गद्गद भाव और आकांक्षा से युक्त है, 'और फिर किसी आदमी की पत्नी की तरह चन्दिल अर्थात् नाई को हम नहीं चाहतीं' यह निराकांक्ष गद्गदभाव एवं उपहास से युक्त है। यह किसी नाई से फंसी कुलवधू द्वारा अविनय देखकर खिल्ली उड़ाई गई किसी ( नायिका ) की प्रत्युपहास के आवेश से युक्त उक्ति है, काकुपूर्ण ही है। गुणीभाव को दिखाने के लिए शब्द के स्पर्श को सिद्ध कर रहे हैं—शब्दशक्ति ही इत्यादि से। तो इस प्रकार व्यङ्ग्यत्व कैसे होगा ? यह आशङ्का करके कहते हैं—और वह अर्थ—। अब गुणीभाव को दिखाते
तृतीय उद्योतः ५११
ध्वन्यालोकः
तु यदा तद्विशिष्टवाच्यप्रतीतिस्तदा गुणीभूतव्यङ्ग्यतया तथाविधार्थ-
द्योतिनः काव्यस्य व्यपदेशः । व्यङ्ग्यविशिष्टवाच्याभिधायिनो हि
गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वम् ।
प्रभेदस्यास्य विषयो यश्च युक्त्या प्रतीयते ।
विधातव्या सहृदयैर्न तत्र ध्वनियोजना ॥ ३९ ॥
से प्राप्त है, इसलिए व्यङ्ग्यरूप ही है। परन्तु जब उस (व्यङ्ग्य) विशिष्ट वाच्य की
प्रतीति वाचकत्व के अनुगम से ही होती है तब उस प्रकार का अर्थ द्योतन करनेवाले
काव्य का गुणीभूत व्यङ्ग्यरूप से व्यपदेश होता है। क्योंकि उस (व्यङ्ग्य) से विशिष्ट
वाच्य का अभिधान करनेवाला गुणीभूतव्यङ्ग्य है।
और जो विषय इस प्रभेद का युक्ति से प्रतीत होता है वहां सहृदयों को ध्वनि
की योजना नहीं करनी चाहिए ॥ ३९ ॥
लोचनम्
वाचकत्वेऽनुगमो गुणत्वं व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावस्य व्यङ्ग्यविशिष्टवाच्यप्रतीत्या
तत्रैव काव्यस्य प्रकाशकत्वं कल्प्यते; तेन च तथा व्यपदेश इति काकुयोजनायां
सर्वत्र गुणीभूतव्यङ्ग्यतैव । अत एव 'मथ्नामि कौरवशतं समरे न कोपात्'
इत्यादौ विपरीतलक्षणां य आहुस्ते न सम्यक्परामृशुः । यतोऽत्रोच्चारणकाल
एव 'न कोपात्' इति दीप्ततारगद्गदसाकाङ्क्षकाकुबलान्निषेधस्य निषिध्यमानतयैव
युधिष्ठिराभिमतसन्धिमार्गाक्षमारूपत्वाभिप्रायेण प्रतिपत्तिरिति मुख्यार्थबाधा-
द्यनुसरणविघ्नाभावात्को लक्षणाया अवकाशः । 'दर्श यजेत' इत्यत्र तु तथाविध-
काक्वायुपायान्तराभावाद्भवतु विपरीतलक्षणा इत्यलमवान्तरेण बहुना ॥ ३८ ॥
अधुना संकीर्णं विषयं विभजते-प्रभेदस्येति । युक्त्येति । चारुत्वप्रतीति-
हैं—परन्तु जब—। वाचकत्व में अनुगम अर्थात् व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव का गुणत्व है,
व्यङ्ग्यविशिष्ट वाच्य की प्रतीति से वहीं पर काव्य का प्रकाशकत्व माना जाता है, और
इसलिए उस प्रकार व्यपदेश होता है, इस प्रकार काकु की योजना में सर्वत्र गुणीभूत-
व्यङ्ग्यता ही है । अतएव 'मथ्नामि कौरवशतं समरे न कोपात्' इत्यादि में जिन्होंने
विपरीत लक्षणा कही है, उन्होंने सम्यक् परामर्श नहीं किया है। क्योंकि यहां उच्चारण-
काल में ही 'न कोपात्' इस दीप्त, तार, गद्गद और साकांक्ष काकु के बल से निषेध
का निषिध्यमानरूप से ही युधिष्ठिर के अभिमत सन्धि के मार्ग के अक्षम्यत्व के
अभिप्राय से प्रतीति हो जाती है, इस प्रकार मुख्यार्थबाध आदि के अनुसरण का विघ्न
न होने के कारण लक्षणा का अवकाश कहां ? परन्तु दर्श यजेत' (दर्श अर्थात् अमा-
वास्या में याग करे ) इस स्थल में उस प्रकार के काकु आदि उपायान्तर के न होने से
विपरीतलक्षणा हो सकती है। बहुत अवान्तर चर्चा व्यर्थ है ॥ ३८ ॥
अब सङ्कीर्ण विषय का विभाग करते हैं—और जो विषय—। युक्ति से—। यहां
५१२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सङ्कीर्णो हि कश्चिद्ध्वनेर्गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य च लक्ष्ये दृश्यते मार्गः। तत्र यस्य युक्तिसहायता तत्र तेन व्यपदेशः कर्तव्यः। न सर्वत्र ध्वनिरागिणा भवितव्यम्। यथा— पत्युः शिरश्चन्द्रकलामेनने स्पृशेति सख्या परिहासपूर्वम्। सा रञ्जयित्वा चरणौ कृताशीर्माल्येन तां निर्वचनं जघान॥ यथा च— प्रयच्छतोच्चैः कुसुमानि मानिनी विपक्षगोत्रं दयितेन लम्भिता। लक्ष्य में कुछ मार्ग ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य का सङ्कीर्ण देखा जाता है। वहां जिसके साथ युक्ति हो वहां उससे व्यपदेश करना चाहिए। सर्वत्र ध्वनि का पक्षपाती नहीं होना चाहिए। जैसे— 'पति के सिर की चन्द्रकला को इससे स्पर्श करना' (यह कह कर) सखी द्वारा परिहासपूर्वक चरणों को रंग कर असीसी गई उस (पार्वती) ने बिना कुछ कहे माल्य से उस (सखी) को मारा। और जैसे— ऊँचे से फूल देते हुए प्रियतम से विपक्ष (सौत) का नाम लिए जाने पर मानिनी लोचनम् रेवात्र युक्तिः। पत्युरिति। अनेनेति। अलक्तकोपरक्तस्य हि चन्द्रमसः परभाग- लाभोऽनवरतपादपतनप्रसादनैर्विना न पत्युर्झटिति यथेष्टानुवर्तिन्या भाव्य- मिति चोपदेशः। शिरोधृता या चन्द्रकला तामपि परिभवेति सपत्नीलोकाप- जय उक्तः। निर्वचनमिति। अनेन लज्जावहित्थहर्षेर्ष्यासाध्वससौभाग्याभिमानप्रभृति य- द्यपि ध्वन्यते, तथापि तन्निर्वचनशब्दार्थस्य कुमारीजनोचितस्याप्रतिपत्तिलक्षण- स्यार्थस्योपकारकत्वं केवलमाचरति। उपस्कृतस्त्वर्थः शृङ्गाराङ्गतामेतीति। प्रयच्छतेति। उच्चैरिति। उच्चैर्यानि कुसुमानि कान्तया स्वयं ग्रहीतुमश- चारुत्वप्रतीति ही युक्ति है। पति के—। इससे—। आलते से रंगे हुए चन्द्रमा को दूसरे (चरण) के भाग (अंश) का लाभ करना अर्थात् निरन्तर पैरों पर गिर कर प्रसादन के बिना झट से पति की इच्छा के अनुकूल मत चलना, यह उपदेश है। सिर पर रखी हुई जो चन्द्रकला है उसे भी परिभूत करो, इस प्रकार सपत्नी जन का पराजय कहा है। बिना कुछ कहें—। इससे यद्यपि लज्जा, अवहित्य, हर्ष, ईर्ष्या, साध्वस, सौभाग्याभिमान ध्वनित होते हैं तथापि वे कुमारी जन के उचित 'बिना कुछ कहे' शब्द के अर्थ अप्रतिपत्तिरूप अर्थ के उपकारक हो जाते हैं। और उपस्कृत अर्थ शृङ्गार का अङ्ग बन जाता है। ऊँचे से—। अर्थात् जो फूल ऊंची डाल पर थे प्रियतमा ने स्वयं ग्रहण करने में
तृतीय उद्योतः ५१३ ध्वन्यालोकः न किञ्चिदूचे चरणेन केवलं लिलेख बाष्पाकुललोचना भुवम् ॥ इत्यत्र ‘निर्वचनं जघान’ ‘न किञ्चिदूचे’ इति प्रतिषेधमुखेन व्य- ङ्ग्यस्यार्थस्योक्त्या किञ्चिद्विषयीकृतत्वाद् गुणीभाव एव शोभते । यदा वक्रोक्तिं विना व्यङ्ग्योऽर्थस्तात्पर्येण प्रतीयते तदा तस्य प्राधान्यम् । यथा ‘एवं वादिनि देवर्षौ’ इत्यादौ । इह पुनरुक्तिर्भङ्ग्यास्तीति वाच्य- स्यापि प्राधान्यम् । तस्मान्नात्रानुरणनरूपव्यङ्ग्यध्वनिव्यपदेशो विधेयः । ने कुछ नहीं कहा, केवल वाष्प से आकुल आँखों वाली चरण से जमीन कुरेदने लगी । यहां ‘बिना कुछ कहे मारा’ ‘कुछ नहीं बोली’ इस प्रतिषेध के द्वारा व्यङ्ग्य अर्थ का उक्ति द्वारा कुछ विषय कर दिए जाने के कारण गुणीभाव ही शोभता है । जब वक्रोक्ति के बिना व्यङ्ग्य अर्थ तात्पर्य से प्रतीत होता है तब उसका प्राधान्य है । जैसे ‘एवं वादिनि देवर्षों’ इत्यादि में । यहां भङ्गी से उक्ति है इसलिए वाच्य का भी प्राधान्य है । इसलिए यहाँ अनुरणनरूप व्यङ्ग्य ध्वनि का व्यपदेश नहीं करना चाहिए । लोचनम् क्यत्वाद्याचिनानीत्यर्थः । अस्मदुपाध्यायास्तु हृद्यतमानि पुष्पाणि अमुके, गृहाण गृहाणेत्युच्चैस्तारस्वरेणादरातिशयार्थं प्रयच्छता । अत एव लम्भितेति । न किंचिदिति । एवं विधेषु शृङ्गारावसरेषु तामेवायं स्मरतीति मानप्रदर्शनमेवात्र न युक्तमिति सातिशयमन्युसंभारो व्यङ्ग्यो वचननिषेधस्यैव वाच्यस्य संस्कारः । तद्वक्ष्यति-उक्तिर्भङ्ग्यास्तीति । तस्येति व्यङ्ग्यस्य । इहेति पत्युरि- त्यादौ । वाच्यस्यापीति । अपिशब्दो भिन्नक्रमः । प्राधान्यमपि भवति वाच्यस्य, रसाद्यपेक्षया तु गुणतापीत्यर्थः । अत एवोपसंहारे ध्वनिशब्दस्य विशेषण- मुक्तम् ॥ ३६ ॥ असमर्थ होकर याचना की । परन्तु हमारे उपाध्याय ( कहते हैं कि ) अरी अमुके ! इन अच्छे फूलों को ले, ले’ इस प्रकार ऊंचे तारस्वर से अतिशय आदर के लिए देते हुए । अतएव ‘लम्भिता’ । ‘कुछ नहीं’ । इस प्रकार के शृङ्गार के अवसरों में उसे ही यह स्मरण करता है, इसलिए यहां मानप्रदर्शन ही ठीक नहीं, इस व्यङ्ग्य सातिशय मन्युभार वचननिषेधरूप वाच्य का ही संस्कार ( क ) है । उसे कहेंगे—उक्ति भङ्गी से है— । उसका अर्थात् व्यङ्ग्य का । यहां ‘पत्युः’ इत्यादि में । वाच्य का भी—। ‘भी’ शब्द भिन्नक्रम है । अर्थात् वाच्य का प्राधान्य भी होता है, किन्तु रसादि की अपेक्षा से गुणता भी होती है । अतएव उपसंहार में ध्वनि शब्द का विशेषण (अनुरणनरूपव्यङ्ग्य) कहा है ॥ ३९ ॥ ३३ ध्व०
५१४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः प्रकारोऽयं गुणीभूतव्यङ्ग्योऽपि ध्वनिरूपताम् । धत्ते रसादितात्पर्यपर्यालोचनया पुनः ॥ ४० ॥ गुणीभूतव्यङ्ग्योऽपि काव्यप्रकारो रसभावादितात्पर्यालोचने पुनर्ध्वनिरेव सम्पद्यते । यथात्रैवानन्तरोदाहृते श्लोकद्वये । यथा च— दुराराधा राधा सुभग यदनेनापि मृजत- यह गुणीभूतव्यङ्ग्य भी प्रकार रसादि के तात्पर्य के पर्यालोचन से पुनः ध्वनि- रूप हो जाता है ॥ ४० ॥ गुणीभूतव्यङ्ग्य भी काव्य का प्रकार रसभावादि के तात्पर्य के पर्यालोचन करने पर पुनः ध्वनि ही बन जाता है । जैसे यहीं अभी उदाहृत दोनों श्लोकों में । और जैसे— 'हे सुभग, जो कि प्राणेश्वरी के इस जघन ( सुरतकालीन ) वस्त्र से भी गिरे लोचनम् एतदेव निर्वाहयन् काव्यात्मत्वं ध्वनेरेव परिदीपयति-प्रकार इति । श्लोकद्वय इति तुल्यच्छायं यदुदाहृतं पत्युरित्यादि तत्रेति द्वयशब्दादेवंवादिनोत्यस्यानव- काशः । दुराराधेति । अकारणकुपिता पादपतिते मयि न प्रसीदसि अहो दुराराधासि मा रोदीरित्युक्तिपूर्वं प्रियतमेऽश्रूणि मार्जयति इयमस्या अभ्युपग- मगर्भोक्तिः । सुभगेति । प्रियया यः स्वसंभोगभूषणविहीनः क्षणमपि मोक्तुं न पार्यसे । अनेनापीति । पश्येदं प्रत्यक्षेणेत्यर्थः । तदेव च यदेवमादृतं यत् लज्जा- दित्यागेनाप्येवं धार्यते । मृजत इत्यनेन हि प्रत्युत स्रोतस्सहस्रवाही बाष्पो भवति । इयञ्च त्वं हतचेतनो यन्मां विस्मृत्य तामेव कुपितां मन्यसे । अन्यथा इसे ही निर्वाह करते हुए ( कारिकाकार ) ध्वनि को ही काव्य का आत्मा प्रकाशित करते हैं—यह गुणीभूत—। दोनों श्लोकों में—। समान छायावाला जो उदाहृत है 'पत्युः'० इत्यादि, तहां, । 'दो' शब्द 'एवं वादिनि' इस श्लोक का अवसर नहीं । हे सुभग—। बिना कारण के कुपित तू पैरों पर गिरने पर भी मुझ पर प्रसन्न नहीं होती, हन्त दुराराधा अर्थात् प्रसन्न होने वाली नहीं है, मत रो' यह कह कर प्रियतम जब आंसू पोछने लगे तब उसकी यह अभ्युपगमगर्भ उक्ति है । सुभग—। अपने सम्भोग के भूषणों से विहीन जो तुम प्रियतमा द्वारा क्षणभर भी छोड़े नहीं जाते । इस··· से भी—। अर्थात् इसे प्रत्यक्ष देख लो । जो कि उसे जिसे आदरपूर्वक लज्जा आदि का त्याग करके भी धारण कर रहे हो। पोंछने से—। इससे बल्कि बाष्प हजारों स्रोतों में बहता है । इतना भी तुम्हें होश नहीं कि जो मुझे छोड़ कर उस
तृतीय उद्योतः ५१५ ध्वन्यालोकः स्तवैतत्प्राणेशाजघनवसनेनाश्रु पतितम् । कठोरं स्त्रीचेतस्तदलमुपचारैर्विरम हे क्रियात्कल्याणं वो हरिरनुनयष्वेवमुदितः ॥ हुए आँसू को तुम्हारे पोंछने से राधा प्रसन्न होने वाली नहीं है । स्त्री का चित्त कठोर होता है, उपचार व्यर्थ हैं, बस करो' इस प्रकार अनुनय के ( अवसरों में राधा द्वारा ) कहे गये कृष्ण आप लोगों का कल्याण करें । लोचनम् कथमेवं कुर्याः । पतितमिति । गत इदानीं रोदनावकाशोऽपीत्यर्थः । यदि तूच्यते इयताप्यादरेण किमिति कोपं न मुञ्चसि, तत्किं क्रियते कठोरस्वभावं स्त्रीचेतः । स्त्रीति हि प्रेमाप्रयोगाद्वस्तुविशेषमात्रमेतत्; तस्य चैष स्वभावः, आत्मनि चैतत्सुकुमारहृदया योषित इति न किञ्चिद्वज्रसाराधिकमासां हृदयं यदेवंविध- वृत्तान्तसाक्षात्कारेऽपि सहस्रधा न दलति । उपचारैरिति । दाक्षिण्यप्रयुक्तैः । अनुनयेष्विति बहुवचनेन वारं वारमस्य बहुवल्लभस्येयमेव स्थितिरिति सौभाग्यातिशय उक्तः । एवमेष व्यङ्ग्यार्थसारो वाच्यं भूषयति । तत्त वाच्यं भूषितं सद्दीर्ष्याविप्रलम्भाङ्गत्वमेतीति । यस्तु त्रिष्वपि श्लोकेषु प्रतीयमानस्यैव रसाङ्गत्वं व्याचष्टे स्म । स देवं विक्रीय तद्यात्रोत्सवमकार्षीत् । एवं हि व्यङ्ग्य- स्य या गुणीभूतता प्रकृता सैव समूलं त्रुट्येत् । रसाद्यतिरिक्तस्य हि व्यङ्ग्य- स्य रसाङ्गभावयोगित्वमेव प्राधान्यं नान्यत्किञ्चिदित्यलं पूर्ववंश्यैः सह विवादेन । कुपिता को ही मानते हो, अन्यथा ऐसा तुम क्यों करते ! गिरे हुए—। अर्थात् अब तो रोने का समय भी नहीं रहा । यदि कहते हो कि इतने आदर से भी कोप का त्याग क्यों नहीं करती तो क्या करूं स्त्री का चित्त कठोर स्वभाव का होता है । स्त्री यह प्रेम का योग न होने से वस्तुमात्र है, और उस ( वस्तुमात्र ) का यह स्वभाव । अपने में ( यह सोचना ) कुछ नहीं कि स्त्रियां सुकुमार हृदय की होती हैं, इनका हृदय वज्रसार से भी अधिक ( कठोर ) होता है क्योंकि इस प्रकार के वृत्तान्त का साक्षात्कार होने पर भी हजार टुकड़े नहीं हो जाता । उपचार दाक्षिण्यप्रयुक्त । अनुनय के अवसरों में इस बहुवचन से इस बहुवल्लभ की वार-बार की यही स्थिति है, यह अतिशय सौभाग्य कहा है । इस प्रकार यह व्यङ्ग्यार्थ का सार वाच्य को अलङ्कृत करता है । वह वाच्य भूषित होकर ईर्ष्याविप्रलम्भ का अङ्ग हो जाता है । जिसने कि 'तीनों श्लोकों में प्रतीयमान ही रस का अङ्ग है' यह व्याख्यान किया है उसने देवता को बेच कर उनकी यात्रा का उत्सव मनाया है । क्योंकि इस प्रकार ( व्याख्यान करने पर ) जो व्यङ्ग्य की गुणीभूतता प्रकृत है वही समूल टूट जायगी । रसादि से व्यतिरिक्त व्यङ्ग्य का रस का अङ्गभाव प्राप्त करना ही प्राधान्य है, दूसरा कुछ नहीं । पूर्वजों के साथ विवाद व्यर्थ है !
५१६ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
एवं स्थिते च 'न्यक्कारो ह्ययमेव' इत्यादिश्लोकनिर्दिष्टानां पदानां व्यङ्ग्यविशिष्टवाच्यप्रतिपादनेऽप्येतद्वाक्यार्थीभूतरसापेक्षया व्यञ्जकत्वमुक्तम् । न तेषां पदानामर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनिभ्रमो विधातव्यः, विवक्षितवाच्यत्वात्तेषाम् । तेषु हि व्यङ्ग्यविशिष्टत्वं वाच्यस्य प्रतीयते न तु व्यङ्ग्यरूपपरिणतत्वम् । तस्माद्वाक्यं तत्र ध्वनिः, पदानि तु गुणीभूतव्यङ्ग्यानि । न च केवलं गुणीभूतव्यङ्ग्या- न्येव पदान्यलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यध्वनेर्व्यञ्जकानि यावदर्थान्तरसंक्रमित- वाच्यानि ध्वनिप्रभेदरूपाण्यपि । यथात्रैव श्लोके रावण इत्यस्य प्रभेदा- न्तररूपव्यञ्जकत्वम् । यत्र तु वाक्ये रसादितात्पर्यं नास्ति गुणीभूत- व्यङ्ग्यैः पदैरूल्लासितेऽपि तत्र गुणीभूतव्यङ्ग्यतैव समुदायधर्मः ।
इस प्रकार स्थित होने पर 'न्यक्कारो ह्ययमेव' इत्यादि श्लोकों में निर्दिष्ट पदों का व्यङ्ग्यविशिष्ट वाच्य के प्रतिपादन में इसके वाक्यार्थीभूत रस की अपेक्षा से व्यञ्ज- कत्व कहा है। उन पदों में अर्थान्तरसङ्क्रमित वाच्यध्वनि का भ्रम नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे विवक्षितवाच्य होते हैं। उनमें वाच्य का व्यङ्ग्यविशिष्टत्व प्रतीत होता है न कि व्यङ्ग्यरूप में परिणतत्व (प्रतीत होता है)। इसलिए वाक्य वहां ध्वनिरूप है और पद गुणीभूतव्यङ्ग्य हैं। केवल गुणीभूतव्यङ्ग्य ही पद अलक्ष्यक्रम- व्यङ्ग्य ध्वनि के व्यञ्जक नहीं होते, बल्कि ध्वनि के भेदरूप अर्थान्तरसङ्क्रमित- वाच्य भी। जैसे इसी श्लोक में 'रावण' इस पद का प्रभेदान्तररूप का व्यञ्जकत्व है। परन्तु जिस वाक्य में रसादि में तात्पर्य नहीं है, गुणीभूतव्यङ्ग्य पदों से उल्लसित भी उसमें गुणीभूतव्यङ्ग्यता ही समुदाय का धर्म है।
लोचनम्
एवं स्थित इति। अनन्तरोक्तेन प्रकारेण ध्वनिगुणीभूतव्यङ्ग्ययोर्विभागे स्थिते सतीत्यर्थः। कारिकागतमपिशब्दं व्याख्यातुमाह-न चेति। एष च श्लोकः पूर्वमेव व्याख्यात इति न पुनर्लिख्यते। यत्र त्विति। यद्यपि चात्र विषयनिर्वेदात्मकशान्तरसप्रतीतिरस्ति, तथापि चमत्कारोऽयं वाच्यनिष्ठ एव।
इस प्रकार स्थित—। अर्थात् अनन्तरोक्त प्रकार से ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य का विभाग स्थित होने पर। कारिकागत 'भी' शब्द का व्याख्यान करने के लिए कहते हैं— केवल—। यह श्लोक पहले ही व्याख्यात हो चुका है, इसलिए फिर नहीं लिखते हैं। जिस वाक्य में—। यद्यपि यहां विषय के प्रति निर्वेदरूप शान्तरस की प्रतीति होती है तथापि यह चमत्कार वाक्य में ही है। असम्भाव्यत्व, विपरीतकारित्वादि व्यङ्ग्य
तृतीय उद्योतः ५१७ ध्वन्यालोकः यथा— राजानमपि सेवन्ते विषममप्युपयुञ्जते । रमन्ते च सह स्त्रीभिः कुशलाः खलु मानवाः ॥ इत्यादौ । वाच्यव्यङ्ग्ययोः प्राधान्याप्राधान्यविवेके परः प्रयत्नो विधातव्यः, येन ध्वनिगुणीभूतव्यङ्ग्ययोरलङ्काराणां चासङ्कीर्णो विषयः सुज्ञातो भवति । अन्यथा तु प्रसिद्धालङ्कारविषय एव व्यामोहः प्रव- र्त्तते । यथा— जैसे—राजाओं की भी सेवा करते हैं, विष का भी भक्षण करते हैं और स्त्रियों के साथ भी रमण करते हैं, मानव बड़े कुशल होते हैं। इत्यादि में । वाच्य और व्यङ्ग्य के प्राधान्य और अप्राधान्य के विवेक में अधिक प्रयत्न करना चाहिए, जिससे ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य का तथा अलङ्कारों का असङ्कीर्ण विषय सुविदित होता है । अन्यथा अलङ्कार के प्रसिद्ध विषय में ही व्यामोह हो जाता है। जैसे— लोचनम् व्यङ्ग्यं त्वसम्भाव्यत्वविपरीतकारित्वादि तस्यैवानुयायि, तच्चापिशब्दाभ्यामु- भयतो योजिताभ्यां चशब्देन स्थानत्रययोजितेन खलुशब्देन चोभयतो योजि- तेन मानवशब्देन स्पष्टमेवेति गुणीभूतम् । विवेकदर्शना चेयं न निरुपयोगिनीति दर्शयति—वाच्यव्यङ्ग्ययोरिति । अलङ्काराणां चेति । यत्र व्यङ्ग्यं नास्त्येव तत्र तेषां शुद्धानां प्राधान्यम् । अन्यथा त्विति । यदि प्रयत्नवता न भूयत इत्यर्थः । व्यङ्ग्यप्रकारस्तु यो मया पूर्वमुत्प्रेक्षितस्तस्यासंदिग्धमेव व्यामोहस्थानत्व- मित्येवकाराभिप्रायः। द्रविणशब्देन सर्वस्वप्रायत्वमनेकस्वकृत्योपयोगित्वमुक्तम् । उसी का अनुगमन करते हैं । और वह ( व्यङ्ग्य ) दो 'भी' शब्दों के दो जगहों ( कर्म और क्रिया ) में लगाये जाने से, 'और' शब्द के तीनों स्थानों पर लगाये जाने से, ( श्लोक में ) 'खलु' शब्द के दोनों जगहों ( 'कुशल' शब्द और 'मानव' शब्द के साथ ) लगाये जाने से और 'मानव' शब्द से स्पष्ट होने ही के कारण गुणीभूत है । विवेक की यह दृष्टि निरुपयोगिनी नहीं है यह दिखाते हैं—वाच्य और व्यङ्ग्य के—। तथा अलङ्कारों का—। जहां व्यङ्ग्य नहीं ही है वहां शुद्ध ( अलङ्कारों ) का प्राधान्य है । अन्यथा—। अर्थात् यदि प्रयत्न नहीं करते हैं । 'ही' का अभिप्राय यह है कि जो मैंने व्यङ्ग्य के प्रकार की पहले उत्प्रेक्षा की है उसमें व्यामोह होना असन्दिग्ध ही है । ( लावण्य में ) 'द्रविण' शब्द से सर्वस्वप्रायत्व तथा अपने अनेक कार्यों का उपयोगी होना कहा है । परवाह—।
५१८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः लावण्यद्रविणव्ययो न गणितः क्लेशो महान् स्वीकृतः स्वच्छन्दस्य सुखं जनस्य वसतश्चिन्तानलो दीपितः । एषापि स्वयमेव तुल्यरमणाभावाद्वराकी हता कोऽर्थश्चेतसि वेधसा विनिहितस्तन्व्यास्तनुं तन्वता ॥ इत्यत्र व्याजस्तुतिरलङ्कार इति व्याख्यायि केनचित्तन्न चतुरस्रम्; यतोऽस्याभिधेयस्यैतदलङ्कारस्वरूपमात्रपर्यवसायित्वे न सुश्लिष्टता । यतो न तावदयं रागिणः कस्यचिद्विकल्पः । तस्य 'एषापि स्वयमेव तुल्यरमणाभावाद्वराकी हता' इत्येवंविधोक्त्यनुपपत्तेः । नापि नीरागस्य; विधाता ने लावण्य के धन के व्यय की परवाह न की, महान क्लेश उठाया, स्वच्छन्द भाव से सुखपूर्वक निवास करते हुए लोगों के ( मन में ) चिन्ता की आग लगाई, और इस बेचारी को भी समान प्रिय के न प्राप्त होने से स्वयं ही मार डाला ( कुछ समझ में नहीं आता ) विधाता ने उसकी शरीर-रचना करते हुए, मन में क्या लाभ सोच रखा था ? यहां व्याजस्तुति अलङ्कार है यह किसी ने व्याख्यान किया है सो ठीक नहीं है, क्योंकि यह अभिधेय इस अलङ्कार के स्वरूप में पर्यवसित होने में सुसङ्गत नहीं है । क्योंकि यह किसी रागी पुरुष का विकल्प नहीं है, क्योंकि 'इस बेचारी को समान प्रिय न प्राप्त होने से स्वयं ही मार डाला' यह उसकी उक्ति उपपन्न नहीं होती । रागरहित लोचनम् गणित इति । चिरेण हि यो व्ययः सम्पद्यते न तु विद्युदिव झटिति तत्रावश्यं गणनया भवितव्यम् । अनन्तकालनिर्माणकारिणोऽपि तु विधेर्न विवेकलेशो- ऽप्युदभूदिति परमस्योपेक्षावत्त्वम् । अत एवाह— क्लेशो महानिति । स्वच्छन्द- स्येति । विशृङ्खलस्येत्यर्थः । एषापीति । यत्स्वयं निर्मीयते तदेव च निहन्यत इति महद्वैशसमपिशब्देन एवकारेण चोक्तम् । कोऽर्थ इति । न स्वात्मनो न जो व्यय देर तक होता रहता है, न कि बिजली की तरह झट से हो जाता है, उसमें परवाह अवश्य होती है । अनन्त काल से निर्माण करने वाले भी विधाता को विवेक का लेश भी न हुआ यह उसकी परम उपेक्षाकारिता है । इसीलिए कहते हैं—महान् क्लेश—। स्वच्छन्द—। अर्थात् शृङ्खलारहित है । इस बेचारी—। जिसे स्वयं बनाता है उसे ही मार डालता है यह बड़ी क्रूरता है यह 'भी' और 'ही' से कहा है । क्या लाभ सोच—। अर्थात् न अपना न संसार का, न निर्मित का