ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः भिधायिभिः पदैः सम्मिश्रता । अत एव च पदार्थाश्रयत्वे गुणीभूतव्य- ङ्ग्यस्य वाक्यार्थाश्रयत्वे च ध्वनेः सङ्कीर्णतायामपि न विरोधः स्वप्रभेदान्तरवत् । तथाहि ध्वनिप्रभेदान्तराणि परस्परं सङ्कीर्यन्ते पदार्थवाक्यार्थाश्रयत्वेन च न विरुद्धानि । किं चैकव्यङ्ग्याश्रयत्वे तु प्रधानगुणभावो विरुध्यते न तु व्यङ्ग्य- भेदापेक्षया, ततोऽप्यस्य न विरोधः । अयं च सङ्करसंसृष्टिव्यवहारो करनेवाले पदों के साथ सम्मिश्रता है । और इसीलिए गुणीभूतव्यङ्ग्य के पदार्थाश्रित होने में और ध्वनि के वाक्यार्थाश्रित होने में सङ्कीर्णता होने पर भी अपने अन्य प्रभेद की भाँति विरोध नहीं है। जैसा कि ध्वनि के अन्य प्रभेद परस्पर सङ्कीर्ण होते हैं, और पदार्थ और वाक्यार्थ के आश्रित होने से विरुद्ध नहीं हैं । और भी, एक व्यङ्ग्य में आश्रित होने से प्रधानभाव और गुणभाव विरुद्ध हो सकते हैं न कि व्यङ्ग्यभेद की अपेक्षा से । इस कारण भी इसका विरोध नहीं है । लोचनम् त्वादेकपक्षाग्रहे प्रमाणाभावः । एकव्यञ्जकानुप्रवेशस्तु तैरेव पदैः गुणीभूतस्य व्यङ्ग्यस्य प्रधानीभूतस्य च रसस्य विभावादिद्वारतयाभिव्यञ्जनात् । अत एव चेति । यतोऽत्र लक्ष्ये दृश्यते तत इत्यर्थः । ननु व्यङ्ग्यं गुणीभूतं प्रधानं चेति विरुद्धमेव तद्दृश्यमानमप्युक्तत्वान्न श्रद्धेयमित्याशङ्क्य व्यञ्जकभेदात्तावन्न विरोध इति दर्शयति—अत एवेति । स्वेति । स्वप्रभेदान्तराणि संकीर्णतया पूर्वमुदाहृतानीति तान्येव दृष्टान्तयति । तदेव व्याचष्टे—यथाहीति । तथात्रापी- त्यध्याहारोऽत्र कर्तव्यः । 'तथा हि' इति वा पाठः । ननु व्यञ्जकभेदात्प्रथमभेदयोः परिहारोऽस्तु एकव्यञ्जकानुप्रवेशे तु किं वक्तव्यमित्याशङ्क्य पारमार्थिकं परिहारमाह—किञ्चेति । ततोऽपीति । यतोऽन्य- के कारण एक पक्ष के ग्रहण में प्रमाण नहीं है। एक व्यञ्जकानुप्रवेश उन्हीं-पदों से गुणीभूत व्यङ्ग्य और प्रधानीभूत रस का विभावादि के प्रकार से अभिव्यञ्जन से होता है । और इसी लिए—। अर्थात् जिस कारण इस लक्ष्य में देखा जाता है उस कारण । गुणीभूत और प्रधान व्यङ्ग्य दोनों देखे जाने पर भी विरुद्ध ही है, केवल कह देने से श्रद्धा के योग्य नहीं, यह आशङ्का करके 'व्यञ्जक भेद से विरोध नहीं है' यह दिखाते हैं—इसी लिए—। अपने—। अपने अन्य प्रभेद सङ्कीर्ण रूप से पहले उदाहृत हो चुके ' हैं उन्हें ही दृष्टान्त करते हैं । उसे ही व्याख्यान करते हैं—'जैसा कि'—। 'उस प्रकार यहाँ भी' इसका अध्याहार यहाँ करना चाहिए । अथवा 'तथाहि' यह पाठ है । व्यञ्जक के भेद से प्रथम दो भेदों में ( विरोध का ) परिहार हो जाय, किन्तु एक व्यञ्जकानुप्रवेश में क्या कहियेगा ? यह आशङ्का करके पारमार्थिक परिहार कहते हैं—