भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 599

तृतीय उद्योतः ५३९

ध्वन्यालोकः

बहूनामेकत्र वाच्यवाचकभाव इव व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावेऽपि निर्विरोध एव मन्तव्यः । यत्र तु पदानि कानिचिदविवक्षितवाच्यान्यनुरणनरूप- व्यङ्ग्यवाच्यानि वा तत्र ध्वनिगुणीभूतव्यङ्ग्ययोः संसृष्टत्वम् । यथा- ‘तेषां गोपवधूविलाससुहृदाम्’ इत्यादौ । अत्र हि ‘विलाससुहृदां’ ‘राधारहःसाक्षिणाम्’ इत्येते पदे ध्वनिप्रभेदरूपे ‘ते’ ‘जाने’ इत्येते च पदे गुणीभूतव्यङ्ग्यरूपे ।

और इस संसृष्टि और सङ्कर व्यवहार को एक जगह बहुतों के वाच्यवाचक भाव की भाँति व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव में भी निर्विरोध ही मानना चाहिए । परन्तु जहां कुछ पद अविवक्षितवाच्य और कुछ पद अनुरणनरूप व्यङ्ग्यपरक हों वहाँ ध्वनि गुणीभूतव्यङ्ग्य की संसृष्टि है । जैसे—‘तेषां गोपवधूविलाससुहृदां’ इत्यादि में । यहां ‘विलाससुहृदां’ ‘राधारहःसाक्षिणां’ ये दो पद ध्वनिप्रभेद रूप हैं और ‘ते’ ‘जाने’ ये पद गुणीभूतव्यङ्ग्य रूप हैं।

लोचनम्

द्व्यङ्ग्यं गुणीभूतमन्यच्च प्रधानमिति को विरोधः । ननु वाच्यालंकारविषये श्रुतोऽयं संकरादिव्यवहारो न तु व्यङ्ग्यविषय इत्याशङ्क्याह-अयं चेति । मन्तव्य इति । मननेन प्रतीत्या तथा निश्चयः उभयत्रापि प्रतीतेरेव शरणत्वा- दिति भावः । एवं गुणीभूतव्यङ्ग्यसंकरभेदांस्त्रीनुदाहृत्य संसृष्टिमुदाहरति-यत्र तु पदानीति । कानिचिदित्यनेन संक्रावकाशं निराकरोति । सुहृच्छब्देन साक्षि- शब्देन चाविवक्षितवाच्यो ध्वनिः ‘ते’ इतिपदेनासाधारणगुणगणोऽभिव्य- क्तोऽपि गुणत्वमवलम्बते, वाच्यस्यैव स्मरणस्य प्राधान्येन चारुत्वहेतुत्वात् ।

और भी—। इस कारण भी—। क्योंकि गुणीभूत व्यङ्ग्य अन्य है और प्रधान व्यङ्ग्य अन्य है, फिर विरोध कैसा ? ( शङ्का ) वाच्य अलङ्कारों के विषय में यह सङ्कर आदि का व्यवहार सुनने में आता है न कि व्यङ्ग्य के विषय में, यह आशङ्का करके कहते हैं—और इस—। मानना चाहिए—। मनन अर्थात् प्रतीति से उस प्रकार निश्चय करना चाहिए, भाव यह कि क्योंकि दोनों स्थानों में प्रतीति ही शरण है । इस प्रकार गुणीभूतव्यङ्ग्यसङ्कर के तीन भेदों को उदाहृत करके संसृष्टि को उदाहृत करते हैं— परन्तु जहां कुछ पद—। ‘कुछ’ इस ( कथन ) से संकर के अवकाश का निराकरण करते हैं । ‘सुहृत्’ शब्द और ‘साक्षी’ शब्द से अविवक्षित वाच्य ध्वनि है । ‘ते’ इस पद से असाधारण गुणसमूह अभिव्यक्त होकर भी ( वाच्य के प्रति ) गुणभाव प्राप्त कर लेता है, क्योंकि वाच्य स्मरण ही प्राधान्यतः चारुत्व का हेतु है । उत्प्रेक्ष्यमाण