ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
तृतीय उद्योतः ५३९
ध्वन्यालोकः
बहूनामेकत्र वाच्यवाचकभाव इव व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावेऽपि निर्विरोध एव मन्तव्यः । यत्र तु पदानि कानिचिदविवक्षितवाच्यान्यनुरणनरूप- व्यङ्ग्यवाच्यानि वा तत्र ध्वनिगुणीभूतव्यङ्ग्ययोः संसृष्टत्वम् । यथा- ‘तेषां गोपवधूविलाससुहृदाम्’ इत्यादौ । अत्र हि ‘विलाससुहृदां’ ‘राधारहःसाक्षिणाम्’ इत्येते पदे ध्वनिप्रभेदरूपे ‘ते’ ‘जाने’ इत्येते च पदे गुणीभूतव्यङ्ग्यरूपे ।
और इस संसृष्टि और सङ्कर व्यवहार को एक जगह बहुतों के वाच्यवाचक भाव की भाँति व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव में भी निर्विरोध ही मानना चाहिए । परन्तु जहां कुछ पद अविवक्षितवाच्य और कुछ पद अनुरणनरूप व्यङ्ग्यपरक हों वहाँ ध्वनि गुणीभूतव्यङ्ग्य की संसृष्टि है । जैसे—‘तेषां गोपवधूविलाससुहृदां’ इत्यादि में । यहां ‘विलाससुहृदां’ ‘राधारहःसाक्षिणां’ ये दो पद ध्वनिप्रभेद रूप हैं और ‘ते’ ‘जाने’ ये पद गुणीभूतव्यङ्ग्य रूप हैं।
लोचनम्
द्व्यङ्ग्यं गुणीभूतमन्यच्च प्रधानमिति को विरोधः । ननु वाच्यालंकारविषये श्रुतोऽयं संकरादिव्यवहारो न तु व्यङ्ग्यविषय इत्याशङ्क्याह-अयं चेति । मन्तव्य इति । मननेन प्रतीत्या तथा निश्चयः उभयत्रापि प्रतीतेरेव शरणत्वा- दिति भावः । एवं गुणीभूतव्यङ्ग्यसंकरभेदांस्त्रीनुदाहृत्य संसृष्टिमुदाहरति-यत्र तु पदानीति । कानिचिदित्यनेन संक्रावकाशं निराकरोति । सुहृच्छब्देन साक्षि- शब्देन चाविवक्षितवाच्यो ध्वनिः ‘ते’ इतिपदेनासाधारणगुणगणोऽभिव्य- क्तोऽपि गुणत्वमवलम्बते, वाच्यस्यैव स्मरणस्य प्राधान्येन चारुत्वहेतुत्वात् ।
और भी—। इस कारण भी—। क्योंकि गुणीभूत व्यङ्ग्य अन्य है और प्रधान व्यङ्ग्य अन्य है, फिर विरोध कैसा ? ( शङ्का ) वाच्य अलङ्कारों के विषय में यह सङ्कर आदि का व्यवहार सुनने में आता है न कि व्यङ्ग्य के विषय में, यह आशङ्का करके कहते हैं—और इस—। मानना चाहिए—। मनन अर्थात् प्रतीति से उस प्रकार निश्चय करना चाहिए, भाव यह कि क्योंकि दोनों स्थानों में प्रतीति ही शरण है । इस प्रकार गुणीभूतव्यङ्ग्यसङ्कर के तीन भेदों को उदाहृत करके संसृष्टि को उदाहृत करते हैं— परन्तु जहां कुछ पद—। ‘कुछ’ इस ( कथन ) से संकर के अवकाश का निराकरण करते हैं । ‘सुहृत्’ शब्द और ‘साक्षी’ शब्द से अविवक्षित वाच्य ध्वनि है । ‘ते’ इस पद से असाधारण गुणसमूह अभिव्यक्त होकर भी ( वाच्य के प्रति ) गुणभाव प्राप्त कर लेता है, क्योंकि वाच्य स्मरण ही प्राधान्यतः चारुत्व का हेतु है । उत्प्रेक्ष्यमाण
५४० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः वाच्यालङ्कारसङ्कीर्णत्वमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यापेक्षया रसवति सालङ्कारे काव्ये सर्वत्र सुव्यवस्थितम् । प्रभेदान्तराणामपि कदाचि- त्सङ्कीर्णत्वं भवत्येव । यथा ममैव— वाच्य अलंकारों का संकीर्णत्व अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य की अपेक्षा के साथ रसयुक्त और अलंकारयुक्त सभी काव्य में सुनिश्चित है । अन्य प्रभेदों का भी कदाचित् संकीर्णत्व ( संकर ) होता ही है । जैसे मेरा ही— लोचनम् 'जाने' इत्यनेनोत्प्रेक्ष्यमाणानन्तधर्मव्यञ्जकेनापि वाच्यमेवोत्प्रेक्षणरूपं प्रधानी- क्रियते । एवं गुणीभूतव्यङ्ग्येऽपि चत्वारो भेदा उदाहृताः । अधुनालंकारगतांस्तान्दर्शयति—वाच्यालङ्कारेति । व्यङ्ग्यत्वे त्वलंकाराणा- मुक्तभेदाष्टक एवान्तर्भाव इति वाच्यशब्दस्याशयः । काव्य इति । एवंविधमेव हि काव्यं भवति । सुव्यवस्थितमिति । 'विवक्षा तत्परत्वेन' इति द्वितीयोद्द्योतम्- लोदाहरणैभ्यः संकरत्रयं संसृष्टिश्च लभ्यत एव । 'चलापाङ्गां दृष्टिम्' इत्यत्र हि रूपकव्यतिरेकस्य प्राग्व्याख्यातस्य शृङ्गारानुग्राहकत्वं स्वभावोक्तेः शृङ्गारस्य चैकानुप्रवेशः । 'उप्पह जाया' इति गाथायां पामरस्वभावोक्तिर्वा ध्वनिर्वेति प्रकरणाद्यभावे एकतरग्राहकं प्रमाणं नास्ति । यद्यप्यलङ्कारो रसमवश्यमनुगृह्णाति, तथापि 'नातिनिर्वहणैषिता' इति यदभिप्रायेणोक्तं तत्र सङ्करासम्भवात्संसृष्टिरेवालङ्कारेण रसध्वनेः । यथा—'बाहु- लतिकापाशेन बद्ध्वा दृढम्' इत्यत्र । प्रभेदान्तराणामपीति । रसादिध्वनिव्यति- अनन्त धर्म के व्यंजक भी 'जाने' इस से उत्प्रेक्षण रूप वाच्य ही प्रधानीकृत होता है । इस प्रकार गुणीभूतव्यङ्ग्य में भी चार भेद उदाहृत हुए । अब अलंकारत उन्हें दिखाते हैं—वाच्य अलंकारों का—। व्यङ्ग्य होने पर अलङ्कारों का उक्त आठ भेदों में ही अन्तर्भाव है यह 'वाच्य' शब्द का आशय है । काव्य में—। इस प्रकार का ही काव्य होता है । सुनिश्चित—। 'विवक्षा तत्परत्वेन' इस द्वितीय उद्योत के मूल के उदाहरणों से तीनों संकर और संसृष्टि प्राप्त ही होते हैं । 'चलपाङ्गां दृष्टि' यहां पहले व्याख्यात रूपक और व्यतिरेक शृङ्गार के अनुग्राहक हैं, स्वभावोक्ति का और शृंगार का एकानुप्रवेश है । उप्पइ जाया' इस गाथा में पामर की स्वभावोक्ति है अथवा ध्वनि है, प्रकरण आदि के अभाव में दोनों में से एक का ग्राहक प्रमाण नहीं है । यद्यपि अलंकार रस को अवश्य अनुगृहीत करता है तथापि जिस अभिप्राय से 'नातिनिर्वहणैषिता' ( अर्थात् अलंकार को अत्यन्त निर्वाह करने की इच्छा न रखना ) कहा है । कहाँ संकर के सम्भव न होने से अलंकार के साथ रसध्वनि की संसृष्टि ही होती है । जैसे 'बाहुलतिकापाशेन बद्ध्वा दृढं' यहाँ ( रूपक के साथ रस की संसृष्टि ही है ) । अन्य प्रभेदों का भी—। रसादि ध्वनि से व्यतिरिक्त । व्यापारशील—। कह
तृतीय उद्योतः ५४१ ध्वन्यालोकः या व्यापारवती रसान् रसयितुं काचित्कवीनां नवा दृष्टिर्या परिनिष्ठितार्थविषयोन्मेषा च वैपश्चिती । हे समुद्र में शयन करनेवाले भगवान्, जो रसों के आस्वाद करने के लिए व्यापारशील कवियों की नई कोई दृष्टि है और परिनिष्ठित है अर्थ के विषय में उन्मेष लोचनम् रिक्तानाम् । व्यापारवतीति । निष्पादनप्राणो हि रस इत्युक्तम् । तत्र विभावादि- योजनात्मिका वर्णना, ततः प्रभृति घटनापर्यन्ता क्रिया व्यापारः, तेन सतत- युक्ता । रसानिति । रस्यमानतासारान् स्थायिभावान् रसयितुं रस्यमानताप- त्तियोग्यान् कर्तुम् । काचिदिति लोकवार्तापतितबोधावस्थात्यागेनोन्मीलन्ती । अत एव ते कवयः वर्णनायोगात् तेषाम् । नवेति । क्षणे क्षणे नूतनैर्नूतनैर्वैचित्र्यै- र्जगन्त्यासूत्रयन्ती । दृष्टिरिति । प्रतिभारूपा, तत्र दृष्टिश्चाक्षुषं ज्ञानं पाडवादि रसयतीति । विरोधादलङ्कारोऽत एव नवा । तदनुगृहीतश्च ध्वनिः, तथाहि चाक्षुषं ज्ञानं नाविवक्षितमत्यन्तमसम्भवाभावात् । न चान्यपरम्; अपि त्वर्थान्तरे ऐन्द्रियकविज्ञानाभ्यासोल्लसिते प्रतिभानलक्षणेऽर्थे संक्रान्तम् । संक्रमणे च विरोधोऽनुग्राहक एव । तद्वक्ष्यति—'विरोधादलङ्कारेण' इत्यादिना । या चैवंविधा दृष्टिः परिनिष्ठितोऽचलः अर्थविषये निश्चेतव्ये विषये उन्मेषो यस्याः । तथा परिनिष्ठिते लोकप्रसिद्धेऽर्थे न तु कविवदपूर्वस्मिन्नर्थे उन्मेषो यस्याः सा । चुके हैं कि रस का प्राण निष्पादन है। वहाँ विभावादि की योजना रूप वर्णना होती है, उससे लेकर घटना ( तत्तत् पदों की घटना ) तक क्रिया व्यापार है। उस ( व्यापार ) से सततयुक्त। रसों के—। रस्यमानतासार स्थायिभावों के आस्वाद कराने अर्थात् रस्यमानता की प्राप्ति के योग्य करने। कोई—। लोकवार्ता में प्राप्त बोधावस्था के त्याग से उन्मीलित रोती हुई। इसी लिए वे 'कवि' हैं क्योंकि उनमें वर्णना का योग होता है। नई—। क्षण-क्षण में नये-नये वैचित्र्यों से संसार को प्रासूत्रित ( प्रकाशित ) करती हुई। दृष्टि—। प्रतिभा रूप, वहाँ दृष्टि अर्थात् चाक्षुष ज्ञान, पाउप् आदि पेय द्रव्यों को आस्वाद करती है, यह विरोध अलङ्कार है, इसी लिए नई। और उससे अनुगृहीत ध्वनि है जैसा कि चाक्षुष ज्ञान अत्यन्त अविवक्षित ( अर्थात् अत्यन्त तिरस्कृत ) नहीं है, क्योंकि अत्यन्त असम्भव नहीं है और अन्य पर ( अर्थात् विवक्षित भी ) नहीं है, बल्कि ऐन्द्रियक विज्ञान के अभ्यास से उल्लसित प्रतिमान रूप अर्थ में सङ्क्रान्त है। और सङ्क्रमण में विरोध अनुग्राहक ही है। उसे कहेंगे—'विरोध अलङ्कार से' इत्यादि द्वारा। जो इस प्रकार की दृष्टि है, परिनिष्ठित अर्थात् अचल है अर्थ के विषय में अर्थात् निश्चेतव्य विषय में उन्मेष जिसका। उस प्रकार परिनिष्ठित अर्थात् लोकप्रसिद्ध अर्थ में, न कि कवि की भांति अपूर्व अर्थ में उन्मेष है जिसका वह। विपश्चित् ( विद्वान् ) लोगों
५४२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः ते द्वे अप्यवलम्ब्य विश्वमनिशं निर्वर्णयन्तो वयं श्रान्ता नैव च लब्धमब्धिशयन त्वद्भक्तितुल्यं सुखम् ॥ जिसका ऐसी जो विद्वानों की दृष्टि है उन दोनों को अवलम्बन करके निरन्तर विश्व को निर्वर्णन करते हुए हम थक गये, तुम्हारी भक्ति के तुल्य सुख नहीं पाया । लोचनम् विपश्चितामियं वैपश्चिती । ते अवलम्ब्येति । कवीनामिति वैपश्चितीति वचनेन नाहं कविर्न पण्डित इत्यात्मनोऽनौद्धत्यं ध्वन्यते । अनात्मीयमपि दरिद्रगृह इवोपकरणतयान्यत आहृतमेतन्मया दृष्टिद्वयमित्यर्थः । ते द्वे अपीति । न ह्येकया दृष्ट्या सम्यङ्निर्वर्णनं निर्वहति । विश्वमित्यशेषम् । अनिशमिति । पुनः पुनरनवरतम् । निर्वर्णयन्तो वर्ण नया, तथा निश्चितार्थं वर्णयन्तः इदमित्थमिति परामर्शानुमानादिना निर्भज्य निर्वर्णनं किमत्र सारं स्यादिति तिलशस्तिलशो विचयनम् । यच्च निर्वर्ण्यते तत्खलु मध्ये व्यापार्यमाणया मध्ये चार्थविशेषेषु निश्चितोन्मेषया निश्चलया दृष्ट्या सम्यङ्निर्वर्णितं भवति । वयमिति । मिथ्या- तत्त्वदृष्ट्याहरणव्यसनिन इत्यर्थः । श्रान्ता इति । न केवलं सारं न लब्धं यावत्प्रत्युत खेदः प्राप्त इति भावः । चशब्दस्तुशब्दस्यार्थे । अब्धिशयनेति । योगनिद्रया त्वमत एव सारस्वरूपवेदी स्वरूपावस्थित इत्यर्थः । श्रान्तस्य शयनस्थितं प्रति बहुमानो भवति । त्वद्भक्तीति । त्वमेव परमात्मस्वरूपो विश्व- की यह वैपश्चिती । उन्हें अवलम्बन करके— । 'कवियों की' 'विद्वानों की' इस कथन से 'मैं कवि नहीं हूँ, पण्डित नहीं हूँ' यह अपना अनौद्धत्य ध्वनित होता है । अर्थात् दरिद्र के घर में की भाँति अपनी न होने पर भी उपकरण के रूप में अन्य के यहाँ से मैंने दोनों दृष्टियाँ लाई हैं—उन दोनों को— । क्योंकि एक दृष्टि से सम्यक् निर्वर्णन नहीं पूर्ण हो सकता । विश्व अर्थात् अशेष । निरन्तर— । बार-बार अनवरत । निर्वर्णन करते हुए— । वर्णना द्वारा उस प्रकार निश्चितार्थ रूप में वर्णन करते हुए, 'यह इस प्रकार है' यह परामर्श आदि से विभाग करके निर्वर्णन अर्थात् यहाँ सार क्या होगा यह तिल-तिल विचयन करके । जो निर्वर्णित होता है वह मध्य में व्यापार्यमाण और मध्य में अर्थविशेषों में निश्चित उन्मेष वाली निश्चल दृष्टि से सम्यक् निर्वर्णित होता है । हम— । अर्थात् मिथ्यादृष्टि और तत्त्वदृष्टि के आहरण में शौक रखने वाले । थक गए— । भाव यह कि न केवल सार नहीं पाया, प्रत्युत खेद भी पाया । 'और' शब्द (श्लोक में 'च' शब्द ) 'तु' शब्द के अर्थ में है । समुद्र में शयन करने वाले— । अर्थात् योगनिद्रा के द्वारा तुम इसीलिए सारस्वरूप को जानने वाले स्वरूप में अवस्थित हो । थके हुए आदमी के सोये हुए के प्रति गौरव होता है । तुम्हारी भक्ति— । तुम्ही परमात्मस्वरूप विश्व का सार हो, उस (विश्वसार) की भक्ति अर्थात् श्रद्धादिपूर्वक
तृतीय उद्योतः ५४३ ध्वन्यालोकः इत्यत्र विरोधासङ्कारेणार्थान्तरसंक्रमितवाच्यस्य ध्वनिप्रभेदस्य सङ्कीर्णत्वम्। यहाँ विरोध अलङ्कार से अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य (नामक) ध्वनि के प्रभेद का सङ्कर है। लोचनम् सारस्तस्य भक्तिः श्रद्धादिपूर्वकं उपासनाक्रमजस्तदावेशस्तेन तुल्यमपि न लब्धमास्तां तावत्तज्जातीयम्। एवं प्रथममेव परमेश्वरभक्तिभाजः कुतूहलमात्रावलम्बितकविप्रामाणिको- भयवृत्तेः पुनरपि परमेश्वरभक्तिविश्रान्तिरेव युक्तेति मन्वानस्येयमुक्तिः। सकल- प्रमाणपरिनिश्चितदृष्टादृष्टविषयविशेषजं यत्सुखं, यदपि वा लोकोत्तरं रसचर्वणात्मकं तत उभयतोऽपि परमेश्वरविश्रान्त्यानन्दः प्रकृष्यते तदानन्दविप्रुष्मात्रावभासो हि रसास्वाद इत्युक्तं प्रागस्माभिः। लौकिकं तु सुखं ततोऽपि निकृष्टप्रायं बहुतरदुःखानुषङ्गादिति तात्पर्यम्। तत्रैव दृष्टिशब्दापेक्षयैकपदानुप्रवेशः। दृष्टिमवलम्ब्य निर्वर्णनमिति विरोधाद्भारो वाश्रीयताम्, अन्धपदन्यासेन दृष्टिशब्दोऽत्यन्ततिरस्कृतवाच्यो वास्तु इत्येकेतरनिश्चये नास्ति प्रमाणम्, प्रकारद्वयेनापि हृद्यत्वात्। न च पूर्वत्राप्येवं वाच्यम्। नवाशब्देन शब्दशक्त्य- नुरणनतया विरोधस्य सर्वथावलम्बनात्। उपासनाक्रम से उत्पन्न तद्विषयक आवेश (प्रेमातिशय), उसके तुल्य भी (सुख) नहीं पाया उसकी जाति का (तज्जातीय सुख) तो दूर रहे। इस प्रकार परमेश्वर के प्रति भक्ति रखने वाले और यह मानने वाले कि यह उक्ति है कि कुतूहल मात्र से कवि और प्रामाणिक (विपश्चित्) दोनों के व्यवहारों को अवलम्बन करके फिर भी परमेश्वर की भक्ति में विश्रान्ति ही ठीक है। सकल प्रमाणों से परिनिश्चित् दृष्ट-अदृष्ट विषय-विशेष से उत्पन्न जो सुख है अथवा जो कि लोकोत्तर चर्वणा रूप (सुख) है उन दोनों से भी परमेश्वर में विश्रान्ति का आनन्द प्रकृष्ट है, हम पहले कह चुके हैं कि रसास्वाद उस आनन्द के बिन्दुमात्र का अवभास है। तात्पर्य यह कि बहुतर दुःखों के मिश्रण से लौकिक सुख उस (रसास्वाद) से भी निकृष्टप्राय है। वहीं ‘पर’—। 'दृष्टि' शब्द की अपेक्षा से एकपदानुप्रवेश है। अथवा 'दृष्टि' का अवलम्बन करके 'निर्वर्णन' यह विरोध अलङ्कार आश्रयण किया जाय, अथवा 'अन्ध' पद के न्यास की भाँति 'दृष्टि' शब्द अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य हो, इनमें से एक के निश्चय में प्रमाण नहीं है, क्योंकि हृद्यता दोनों प्रकार से है। पहले में भी इस प्रकार नहीं कहा जा सकता, क्योंकि 'नई' शब्द से शब्द शक्त्यनुरणन रूप से विरोध का सर्वथा अवलम्बन है।
५४४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः वाच्यालङ्कारसंसृष्टत्वं च पदापेक्षयैव । यत्र हि कानिचित्पदानि वाच्यालङ्कारभाञ्जि कानिचिच्च ध्वनिप्रभेदयुक्तानि । यथा— दीर्घीकुर्वन् पटु मदकलं कूजितं सारसानां और वाच्यालङ्कार की संसृष्टि पद की अपेक्षा से ही होती है । क्योंकि जहां कुछ पद वाच्यालङ्कार वाले होते हैं और कुछ ध्वनि प्रभेदयुक्त । जैसे— जहाँ सारस पक्षियों के पटु एवं मदकल कूजित को बढ़ाता हुआ, प्रातःकालों में लोचनम् एवं सङ्करं त्रिविधमुदाहृत्य संसृष्टिमुदाहरति—वाच्येति । सकलवाक्ये हि यद्यलङ्कारोऽपि व्यङ्ग्यार्थोऽपि प्रधानं तदानुग्राह्यानुग्राहकत्वसङ्करस्तदभावे त्वसङ्गतिरित्यलङ्कारेण वा ध्वनिना वा पर्यायेण द्वाभ्यामपि वा युगपत्पदविश्रा- न्ताभ्यां भाव्यमिति त्रयो भेदाः । एतद्गर्भीकृत्य सावधारणमाह—पदापेक्षयैवेति । यत्रानुग्राह्यानुग्राहकभावं प्रत्याशङ्कापि नावतरति तं तृतीयमेव प्रकारमुदाहर्तुमु- पक्रमते—यत्र हीति । यस्माद्यत्र कानिचिदलङ्कारभाञ्जि कानिचिद्द्ब्वनियुक्तानि, यथा दीर्घीकुर्वन्नित्यत्रेति । तथाविधपदापेक्षयैव वाच्यालङ्कारसंसृष्टत्वमित्यावृत्त्या पूर्वग्रन्थेन सम्बन्धः कर्तव्यः । अत्र हीति । अत्रत्यो हिशब्दो मैत्रीपदमित्यस्या- नन्तरं योज्य इति ग्रन्थसङ्गतिः । दीर्घीकुर्वन्निति । सिप्रावातेन हि दूरमप्यसौ शब्दो नीयते, तथा कुसुममारु- पवनस्पर्शाजातहर्षीः चिरं कूजन्ति, तत्कूजितं च वातान्दोलितसिप्रातरङ्गज- मधुरशब्दमिश्रं भवतीति दीर्घत्वम् । पट्विति । तथासौ सुकुमारो वायुर्येन तज्जः इस प्रकार त्रिविध सङ्कर को उदाहृत करके संसृष्टि को उदाहृत करते हैं—वाच्य- । यदि सम्पूर्ण वाक्य में अलङ्कार भी व्यङ्ग्य अर्थ भी प्रधान हो तब अनुग्राह्यानुग्राहकरूप सङ्कर होगा, उसके अभाव में असङ्गति होगी, इस प्रकार अलङ्कार को अथवा ध्वनि को अथवा क्रम से दोनों को एक ही पद में विश्रान्त होना चाहिए, इस प्रकार तीन भेद हैं । इसे भीतर रखकर अवधारणपूर्वक कहते हैं—पद की अपेक्षा से ही— । जहाँ अनुग्राह्यानुग्राहकभाव के प्रति आशङ्का भी नहीं होती उस तृतीय प्रकार को उदाहृत करने के लिए उपक्रम करते हैं—क्योंकि जहाँ कुछ अलङ्कार वाले, कुछ ध्वनियुक्त ( पद ), जैसे 'जहाँ सारस पक्षियों के' यहाँ । 'उस प्रकार के पद की अपेक्षा से ही वाच्य अलङ्कार की संसृष्टि है' यह आवृत्ति द्वारा पूर्वग्रन्थ से सम्बन्ध लगा लेना चाहिए । यहाँ— । ( वृत्तिग्रन्थ में ) यहाँ का 'हि' शब्द 'मैत्रीपद' के बाद जोड़ना चाहिए । इस प्रकार ग्रन्थ की सङ्गति है । जहाँ सारस— । सिप्रा का वायु उस शब्द को दूर ले जाता है, उस प्रकार सुकुमार पवन स्पर्श से प्रसन्न होकर ( सारस ) देर तक कूजन करते हैं, और वह कूजित वातान्दोलित सिप्रा की तरङ्गों से उत्पन्न मधुर शब्दों से मिल जाता है अतः
तृतीय उद्योतः ५४५ ध्वन्यालोकः प्रत्यूषेषु स्फुटितकमलामोदमैत्रीकषायः । यत्र स्त्रीणां हरति सुरतग्लानिमङ्गानुकूलः सिप्रावातः प्रियतम इव प्रार्थनाचाटुकारः ॥ खिले कमलों की गन्ध की मैत्री से कषाय, अङ्गानुकूल सिप्रा का वायु प्रियतम में प्रार्थनाचाटुकार की भांति स्त्रियों का सुरत-खेद हरण करता है । लोचनम् शब्दः सारसकूजितमपि नाभिभवति प्रत्युत तत्सब्रह्मचारी तदेव दीपयति । न च दीपनं तदीयमनुपयोगि यतस्तन्मदेन कलं मधुरमाकर्णनीयम् । प्रत्यूषे- ष्विति । प्रभातस्य तथाविधसेवावसरत्वम् । बहुवचनं सदैव तत्रैषा हृद्यतेति निरूपयति । स्फुटितान्यन्तर्वर्तमानमकरन्दभरेण । तथा स्फुटितानि विकसि- तानि नयनहारीणि यानि कमलानि तेषां य आमोदस्तेन या मैत्री अभ्यासा- द्धावियोगपरस्परानुकूल्यलाभस्तेन कषाय उपरक्तो मकरन्देन च कषायवर्णी- कृतः । स्त्रीणामिति । सर्वस्य तथाविधस्य त्रैलोक्यसारभूतस्य य एवं करोति सुरतकृतां ग्लानिं तान्तिं हरति, अथ च तद्विषयां ग्लानिं पुनः सम्भोगाभिला- षोद्दीपनेन हरति । न च प्रसह्यप्रभूततयापि त्वङ्गानुकूलो हृद्यस्पर्शः हृदयान्तर्भूतश्च । प्रियतमे तद्विषये प्रार्थनार्थं चाटूनि कारयति । प्रियतमोऽपि तत्पवनस्पर्शप्रबुद्धसम्भो- दीर्घ हो जाता है । पढ़— । उस प्रकार वह वायु सुकुमार है जिससे कि उससे उत्पन्न शब्द सारसों के कूजित को भी अभिभूत नहीं करता प्रत्युत उसका सब्रह्मचारी होकर उसे ही बढाता है । उसका बढ़ाना अनुपयोगी नहीं है, क्योंकि वह मद से कल अर्थात् मधुर आकर्णनीय है । प्रातःकालों में— । प्रभात उस प्रकार की सेवा का अवसर है । बहुवचन 'वहाँ यह हृद्यता सदैव है' यह निरूपण करता है । भीतर वर्तमान मकरन्द के भार से खिले । उस प्रकार स्फुटित अर्थात् विकसित ( खिले ) नयनहारी जो कमल हैं उनकी जो गन्ध उससे जो मैत्री अर्थात् अविच्छिन्न आलिङ्गन से परस्पर आनुकूल्य का लाभ उससे कषाय अर्थात् उपरक्त, और मकरन्द से कषाय वर्ण का बना दिया गया । स्त्रियों का— । सभी उस प्रकार के त्रैलोक्यसारभूत की जो ( वायु ) इस प्रकार सुरतकृत ग्लानि अर्थात् तान्ति ( खेद ) को हरण करता है, और तद्विषयक ग्लानि को बार-बार सम्भोग के अभिलाष के उद्दीपन द्वारा हरण करता है । न कि प्रभूत होने के कारण हठात् ( हरण करता है ) बल्कि अङ्गानुकूल अर्थात् हृद्य स्पर्शवाला और हृदय के अन्तर्भूत है । प्रियतम में अर्थात् उसके विषय में प्रार्थना ३५ ध्व०
.५४६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र हि मैत्रीपदमविवक्षितवाच्यो ध्वनिः । पदान्तरेष्वलंकारान्त- राणि । यहाँ 'मैत्री' पद अविवक्षितवाच्य ध्वनि है । अन्य पदों में अलङ्कारा- न्तर हैं । लोचनम् गाभिलाषः । प्रार्थनार्थं चाटूनि करोतीति तेन तथा कार्यत इति परस्परानुरा- गप्राणशृङ्गारसर्वस्वभूतोऽसौ पवनः । युक्तं चैतत्तस्य यतः सिप्रापरिचितोऽसौ वात इति नागरिको न त्वविदग्धो ग्राम्यप्राय इत्यर्थः । प्रियतमोऽपि रतान्तेऽङ्गा- नुकूलः संवाहनादिना प्रार्थनार्थं चाटुकार एवमेव सुरतग्लानिं हरति । कूजितं चानङ्गीकरणवचनादि मधुरध्वनितं दीर्घीकरोति । चाटुकरणावसरे च स्फुटितं विकसितं यत्कमलकान्तिधारिवदनं तस्य यामोदमैत्री सहजसौरभपरिचयस्तेन कषाय उपरक्तो भवति । अङ्गेषु चातुष्षष्टिकप्रयोगेष्वनुकूलः एवं शब्दरूपगन्ध- स्पर्शा यत्र हृद्या यत्र च पवनोऽपि तथा नागरिकः स तवाऽवश्यमभिगन्तव्यो देश इति मेघदूते मेघं प्रति कामिन इयमुक्तिः । उदाहरणे लक्षणं योजयति— मैत्रीपदमिति । हिशब्दोऽनन्तरं पठितव्य इत्युक्तमेव । अलङ्कारान्तराणीति । उत्प्रे- क्षास्वभावोक्तिरूपकोपमाः क्रमेणेत्यर्थः । एवमियता के लिए चाटु करवाता है । प्रियतम भी उस पवन के स्पर्श से प्रबुद्ध सम्भोग का अभिलाषावाला है । प्रार्थनार्थ चाटु करता है उसके द्वारा उस प्रकार कराया जाता है इस प्रकार परस्परानुरागप्राण शृङ्गार का सर्वस्वभूत वह पवन है । अर्थात् और उसके लिए यह ठीक है क्योंकि वह वात सिप्रा से परिचित है अतः नागरिक है, न कि अविदग्ध ग्राम्यप्राय है । प्रियतम भी रतान्त में अङ्गानुकूल होकर संवाहन आदि द्वारा प्रार्थनार्थ चाटुकार होकर इसी प्रकार सुरतग्लानि को हरण करता है । और कूजित अर्थात् अस्वीकार के वचन आदि मधुर आवाज को बढ़ा देता है । और चाटु करने के अवसर में स्फुटित अर्थात् विकसित जो कमल की कान्ति धारण करने वाला वदन उसकी जो आमोद-मैत्री अर्थात् सहज सौरभ का परिचय उससे कषाय अर्थात् उपरक्त होता है । अङ्गों में अर्थात् चातुःषष्टिक प्रयोगों में अनुकूल होता है । इस प्रकार शब्द, रूप, गन्ध, स्पर्श जहाँ हृद्य हैं और जहाँ पवन भी उस प्रकार नागरिक है वह देश तुम्हारे अवश्य जाने योग्य है, 'मेघदूत' में मेघ के प्रति कामी की यह उक्ति है । उदाहरण में लक्षण को घटाते हैं—मैत्री पद— । ( 'हि' शब्द को बाद में पढ़ना चाहिए यह कह ही चुके हैं । अलङ्कारान्तर— । अर्थात् क्रम से उत्प्रेक्षा, स्वभावोक्ति, रूपक, उपमा । इस प्रकार इतने से—
तृतीय उद्योतः ५४७ ध्वन्यालोकः संसृष्टालंकारान्तरसंकीर्णो ध्वनिर्यथा- दन्तक्षतानि करजैश्च विपाटितानि प्रोद्भिन्नसान्द्रपुलके भवतः शरीरे । संसृष्ट अलंकारान्तर से संकीर्ण ध्वनि, जैसे- उत्पन्न सघन पुलक वाले आपके शरीर में रक्त के मन वाली (पक्ष में अनुरक्त लोचनम् सगुणीभूतव्यङ्ग्यैः सालङ्कारैः सहप्रभेदैः स्वैः । सङ्करसंसृष्टिभ्याम् । इत्येतदन्तं व्याख्यायोदाहरणानि च निरूप्य 'पुनरपि' इति यत्कारिका- भागे पदद्वयं तस्यार्थं प्रकाशयत्युदाहरणद्वारेणैव—संसृष्टेत्यादि । पुनःशब्दस्या- यमर्थः— न केवलं ध्वनेः स्वप्रभेदादिभिः संसृष्टिसङ्करौ विवक्षितौ यावत्तेषाम- न्योन्यमपि स्वप्रभेदानां स्वप्रभेदैर्गुणीभूतव्यङ्ग्येन वा सङ्कीर्णानां संसृष्टानां च ध्वनीनां सङ्कीर्णत्वं संसृष्टत्वं च दुर्लक्षमिति विस्पष्टोदाहरणं न भवतीत्यभि- प्रायेणालङ्कारस्यालङ्कारेण संसृष्टस्य संकीर्णस्य वा ध्वनौ संकरसंसर्गौ प्रदर्शनीयौ । तदस्मिन् भेदचतुष्टये प्रथमं भेदमुदाहरति-दन्तक्षतानीति । बोधिसत्त्वस्य स्वकिशोरभक्षणप्रवृत्तां सिंहीं प्रति निजशरीरं वितीर्णवतः केनचिच्चाटुकं क्रियते । (वह ध्वनि) गुणीभूतव्यङ्ग्य के साथ, अलङ्कारों के साथ और अपने प्रभेदों के साथ संकर और संसृष्टि द्वारा । यहाँ तक व्याख्यान करके और उदाहरणों को निरूपण करके 'फिर और भी' यह जो कारिकाभाग में दो पद हैं, उनका अर्थ उदाहरण के द्वारा ही प्रकाशित करते हैं— संसृष्ट इत्यादि । 'फिर' शब्द का यह अर्थ है—न केवल ध्वनि के अपने प्रभेद आदि के साथ संसृष्टि और सङ्कर विवक्षित हैं, बल्कि उनका परस्पर भी अपने प्रभेदों का अपने प्रभेदों से अथवा गुणीभूत व्यङ्ग्य से सङ्कीर्ण और संसृष्ट ध्वनियों का सङ्कीर्णत्व और संसृष्टत्व दुर्लक्ष है इस प्रकार स्पष्ट उदाहरण नहीं होता, इस अभिप्राय से अलङ्कार का अलङ्कार से संसृष्ट के अथवा सङ्कीर्ण की ध्वनि में सङ्कर और संसर्ग दिखाने चाहिए । तो इन चारो भेदों में से प्रथम भेद को उदाहृत करते हैं—उत्पन्न सघन— । अपने बच्चे को खाने में प्रवृत्त सिंही अपने शरीर देनेवाले बोधिसत्त्व का किसी ने चाटु
५४८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः दत्तानि रक्तमनसा मृगराजवध्वा जातस्पृहैर्मुनिभिरप्यवलोकितानि ॥ अत्र हि समासोक्तिसंसृष्टेन विरोधाळंकारेण संकीर्णस्यालक्ष्य- क्रमव्यङ्ग्यस्य ध्वनेः प्रकाशनम् । दयावीरस्य परमार्थतो वाक्यार्थी- भूतत्वात् । मनवाली ) मृगराजवधू ( सिंहनी, पक्ष में राजवधू ) द्वारा दिए गए दन्तक्षतों और नखों द्वारा विदारणों को उत्पन्न स्पृहा वाले मुनियों ने भी देखा । यहाँ समासोक्ति से संसृष्ट ( जो ) विरोधाालङ्कार ( उसके ) द्वारा संकीर्ण अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि का प्रकाशन है। क्योंकि परमार्थ रूप से दयावीर वाक्यार्थीभूत है । लोचनम् प्रोद्भूतः सान्द्रः पुलकः परार्थसम्पत्तिजेनानन्दभरेण यत्र । रक्ते रुधिरे मनोऽ- भिलाषो यस्याः, अनुरक्तं च मनो यस्याः । मुनयश्चोद्बोधितमदनावेषाश्चेति विरोधः । जातस्पृहैरिति च वयमपि कदाचिदेवं कारुणिकपदवीमधिरोह्याम- स्तदा सत्यतो मुनयो भविष्याम इति मनोराज्ययुक्तैः । समासोक्तिश्च नायिका- वृत्तान्तप्रतीतेः । दयावीरस्येति । दयाप्रयुक्तत्वादत्र धर्मस्य धर्मवीर एव दयावीर- शब्देनोक्तः । वीरश्चात्र रसः, उत्साहस्यैव स्थायित्वादिति भावः । दयावीरश- ब्देन वा शान्तं व्यपदिशति । सोऽत्र रसः संसृष्टालङ्कारेणानुगृह्यते । समासो- क्तिमहिम्ना ह्ययमर्थः सम्पद्यते—यथा कश्चिन्मनोरथशतप्रार्थितप्रेयसीसम्भोग- किया है । उत्पन्न सघन पुलक परार्थ सम्पत्ति से उत्पन्न आनन्दभर से है जहाँ । रक्त अर्थात् रुधिर में मन अर्थात् अभिलाष है जिसका, अनुरक्त है मन जिसका । मुनि हैं और उद्बोधित मदन के आवेश वाले हैं यह विरोध है । उत्पन्न स्पृहा वाले कि हम भी कदाचित् इस प्रकार कारुणिक की पदवी पर पहुँच जांय तब सत्यरूप से मुनि हो जायेंगे इस प्रकार के मनोराज्य से युक्त । नायिका वृत्तान्त के प्रतीत होने से समासोक्ति है । दयावीर— । धर्म का यहाँ दयाप्रयुक्त होने के कारण धर्मवीर ही दयावीर शब्द से कहा गया है । भाव यह कि यहाँ वीररस है, क्योंकि उत्साह ही स्थायी भाव है । अथवा 'दयावीर' शब्द से 'शान्त' को व्यपदेश करते हैं । वह रस यहाँ संसृष्ट अलङ्कार द्वारा अनुगृहीत होता है । समासोक्ति की महिमा से यह अर्थ सम्पन्न होता है—जैसे कोई सैकड़ों मनोरथ से प्राप्त प्रियतमा के सम्भोग के अवसर में रोमाञ्चित हो जाता है
तृतीय उद्योतः ५४९ ध्वन्यालोकः संसृष्टालङ्कारसंसृष्टत्वं च ध्वनेर्यथा— अहिणवपओअरसिएसु पहिअसामाइएसु दिअहेसु । सोहइ पसारिअगिआणं णच्चिअं मोरवृन्दाणम् ॥ संसृष्ट अलङ्कारों से ध्वनि का संसृष्टत्व, जैसे— नये बादलों के गर्जन से भरे तथा पथिकों के प्रति श्यामायित दिनों में गर्दन पसारे हुए मोरों का नाच अच्छा लगता है । लोचनम् वसरे जातपुलकस्तथा त्वं परार्थसम्पादनाय स्वशरीरदान इति करुणातिशयोऽ- नुभावसम्पदोद्दीपितः । द्वितीयं भेदमुदाहरति—संसृष्टेति । अभिनवं हृद्यं पयोदानां मेघानां रसितं येषु दिवसेषु । तथा पथिकान् प्रति श्यामायितेषु मोहजनकत्वाद् रात्रिरूपतामा- चरितवत्सु । यदि वा पथिकानां श्यामायितं दुःखवशेन श्यामिका येभ्यः । शोभते प्रसारितग्रीवाणां मयूरवृन्दानां नृत्तम् । अभिनयप्रयोगरसिकेषु पथिक- सामाजिकेषु सत्सु मयूरवृन्दानां प्रसारितगीतानां प्रकृष्टसारणानुसारिगीतानां तथा ग्रीवारेचकाय प्रसारितग्रीवाणां नृत्तं शोभते । पथिकान् प्रति श्यामा इवा- चरन्तीति क्यङ् । प्रत्ययेन लुप्तोपमा निर्दिष्टा । पथिकसामाजिकेष्विति कर्म- धारयस्य स्पष्टत्वाद्रूपकम् । ताभ्यां ध्वनेः संसर्ग इति ग्रन्थकारस्याशयः । अत्रैवोदाहरणेऽन्यद् भेदद्वयमुदाहर्तुं शक्यमित्याशयेनोदाहरणान्तरं न दत्तम् । वैसे ही तू परार्थसम्पादन के लिए अपने शरीर के दान में, इस प्रकार अतिशय करुणा को अनुभाव और विभाव की सम्पदा से उद्दीप्त किया है । द्वितीय भेद को उदाहृत करते हैं—संसृष्ट—। अभिनव अर्थात् हृद्य पयोद अर्थात् मेघों का रसित है जिन दिनों में, तथा पथिकों के प्रति श्यामायित अर्थात् मोहजनक होने के कारण रात्रिरूपता को आचरण करते हुए, अथवा पथिक जनों की दुःख के कारण श्यामिका पड़ गई है जिनके कारण ( ऐसे दिनों में ) गर्दन पसारे हुए मोरों का नाच शोभा देता है । अभिनय के प्रयोगों में रसिक पथिक रूप सामाजिकों के होने पर प्रसारितगीत अर्थात् प्रकृष्ट सारण के अनुसारि गीत वाले तथा ग्रीवारेचक के लिए फैला दी हुई ग्रीवा वाले मोरों का नृत्त शोभा देता है । पथिकों के प्रति श्यामा की भाँति आचरण करने वाले यहाँ क्यङ् प्रत्यय है । ( क्यङ् ) प्रत्यय से लुप्तोपमा निर्देश की गई है । 'पथिक सामाजिक' यहाँ कर्मधारय के स्पष्ट होने से रूपक है । उनसे ध्वनि का संसर्ग है यह ग्रन्थकार का आशय है । इसी उदाहरण में अन्य दो भेद उदाहृत हो सकते हैं, इस आशय से अन्य उदाहरण नहीं दिया है । जैसा कि—व्याघ्रादि से
५५० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र ह्युपमारूपकाभ्यां शब्दशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य ध्वनेः संसृष्टत्वम् । एवं ध्वनेः प्रभेदाः प्रभेदभेदाश्च केन शक्यन्ते । संख्यातुं दिङ्मात्रं तेषामिदमुक्तमस्माभिः ॥ ४४ ॥ अनन्ता हि ध्वनेः प्रकाराः सहृदयानां व्युत्पत्तये तेषां दिङ्मात्रं कथितम् । यहाँ उपमा और रूपक के शब्दशक्त्युद्भव अनुरणन रूपव्यङ्ग्य ध्वनि की संसृष्टि है । इस प्रकार ध्वनि के प्रभेदों और प्रभेदों के भेदों की गणना कौन कर सकता है, उनका यह हमने दिङ्मात्र कहा है ॥ ४४ ॥ ध्वनि के अनन्त प्रकार हैं, सहृदयों की व्युत्पत्ति के लिये उन्हें दिङ्मात्र कहा है । लोचनम् तथाहि—व्याघ्रादेराकृतिगणत्वे पथिकसामाजिकेष्वित्युपमारूपकाभ्यां सन्दे- हास्पदत्वेन सङ्कीर्णाभ्यामभिनयप्रयोगे, अभिनवप्रयोगे च रसिकेष्विति प्रसारितगीतानामिति यः शब्दशक्त्युद्भवस्तस्य संसर्गमात्रमनुग्राह्य- त्वाभावात् । ‘पहिअसामाइएसु’ इत्यत्र तु पदे सङ्कीर्णाभ्यां ताभ्यामुप- मारूपकाभ्यां शब्दशक्तिमूलस्य ध्वनेः सङ्कीर्णत्वमेकव्यञ्जकानुप्रवेशादिति सङ्कीर्णालङ्कारसंसृष्टः । सङ्कीर्णालङ्कारसङ्कीर्णश्चेत्यपि भेदद्वयं मन्तव्यम् ॥ ४३ ॥ एतदुपसंहरति—एवमिति । स्पष्टम् ॥ ४४ ॥ अथ ‘सहृदयमनःप्रीतये’ इति यत्सूचितं तदिदानीं न शब्दमात्रमपि तु आकृतिगण होने पर ‘पथिक सामाजिक’ यहाँ सन्देहास्पद होने के कारण सङ्कीर्ण उपमा और रूपक से ‘अभिनव प्रयोगों में रसिक’ ‘प्रसारित गीतोंवाले’ इस प्रकार जो शब्द- शक्त्युद्भव है उसका संसर्ग मात्र है क्योंकि अनुग्राह्यता नहीं है । ‘पहिअसामाइएसु’ इस पद में सङ्कीर्ण उन उपमा और रूपक से शब्दशक्तिमूल ध्वनि का सङ्कर एकव्यञ्जका- नुप्रवेश से है इस प्रकार सङ्कीर्णालङ्कार संसृष्ट, और सङ्कीर्ण से सङ्कीर्ण है, इस प्रकार इन दोनों भेदों को भी मानना चाहिए ॥ ४३ ॥ इसका उपसंहार करते हैं—इस प्रकार— । स्पष्ट है ॥ ४४ ॥ ‘सहृदयों के मनं को प्रसन्न करने के लिए’ यह जो सूचित किया है वह अब
तृतीय उद्योतः ५५१ ध्वन्यालोकः इत्युक्तलक्षणो यो ध्वनिर्विवेच्यः प्रयत्नतः सद्भिः । सत्काव्यं कर्तुं वा ज्ञातुं वा सम्यगभियुक्तैः ॥ ४५ ॥ उक्तस्वरूपध्वनिनिरूपणनिपुणा हि सत्कवयः सहृदयाश्च नियतमेव काव्यविषये परां प्रकर्षपदवीमासादयन्ति । अस्फुटस्फुरितं काव्यतत्त्वमेतद्यथोदितम् । अशक्नुवद्भिर्व्याकर्तुं रीतयः सम्प्रवर्तिताः ॥ ४६ ॥ एतद्ध्वनिप्रवर्तनेन निर्णीतं काव्यतत्त्वमस्फुटस्फुरितं सदशक्नु- वद्भिः प्रतिपादयितुं वैदर्भी गौडी पाञ्चाली चेति रीतयः प्रवर्तिताः । रीतिलक्षणविधायिनां हि काव्यतत्त्वमेतदस्फुटतया मनाक्स्फुरितमासी- सत्काव्य को करने अथवा समझने के लिए अभियुक्त सज्जनों को इस प्रकार उक्त लक्षण वाली जो ध्वनि है उसे प्रयत्न करके विवेचन करना चाहिए ॥ ४५ ॥ उक्त स्वरूप ध्वनि के निरूपण में निपुण सत्कवि और सहृदय निश्चय ही काव्य के विषय में अत्यन्त प्रकर्ष पदवी को प्राप्त कर जाते हैं । यह अस्फुटस्फुरित काव्यतत्त्व जैसे कहा गया है उसे व्याकृत करने में असमर्थ हुए लोगों ने रीतियाँ प्रवर्तित की हैं ॥ ४६ ॥ इस ध्वनिप्रवर्तन से निर्णीत काव्यतत्त्व को अस्फुटस्फुरित की स्थिति में प्रतिपादन करने में असमर्थ होते हुए ( लोगों ने ) वैदर्भी, गौणी और पाञ्चाली इन रीतियों को प्रवर्तित किया है । रीति का लक्षण विधान करने वालों के यह काव्यतत्त्व लोचनम् निर्व्यूढमित्याशयेनाह — इत्युक्तेति । यः प्रयत्नतो विवेच्यः अस्माभिश्चोक्तलक्षणो ध्वनिरेतदेव काव्यतत्त्वं यथोदितेन प्रपञ्चनिरूपणादिना व्याकर्तुमशक्नुवद्भिर- लङ्कारैः रीतयः प्रवर्तिता इत्युत्तरकारिकया सम्बन्धः । अन्ये तु यच्छब्दस्थाने 'अयं' इति पठन्ति । प्रकर्षपदवीमिति । निर्माणे बोधे चेति भावः । व्याकर्तुम- शब्दमात्र नहीं, अपितु निर्वाह किया गया है इस आशय से कहते हैं—सत्काव्य— । जो प्रयत्न से विवेचनीय और हमारे द्वारा उक्तस्वरूप ध्वनि है इसी काव्यतत्त्व को यथोदित प्रपञ्च निरूपण आदि द्वारा व्याख्या करने में असमर्थ अलङ्कारों ने ( ? ) ( आलङ्कारिकों ने ) रीतियों को चलाया है । अन्य लोग 'जो' के स्थान पर 'यह' पाठ करते हैं । प्रकर्षपदवी— । भाव यह कि निर्माण और बोध में । व्याख्या करने में
५५२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः दिति लक्ष्यते तदत्र स्फुटतया सम्प्रदर्शितेनान्येन रीतिलक्षणेन न किञ्चित् । शब्दतत्त्वाश्रयाः काश्चिदर्थतत्त्वयुजोऽपराः । वृत्तयोऽपि प्रकाशन्ते ज्ञातेऽस्मिन् काव्यलक्षणे ॥ ४७ ॥ अस्मिन् व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावविवेचनमये काव्यलक्षणे ज्ञाते सति याः काश्चित्प्रसिद्धा उपनागरिकाद्याः शब्दतत्त्वाश्रया वृत्तयो याश्चार्थ- तत्त्वसम्बद्धाः कैशिक्यादयस्ताः सम्यग्रीतिपदवीमवतरन्ति । अन्यथा तु तासामदृष्टार्थानामिव वृत्तीनामश्रद्धेयत्वमेव स्यान्नानुभवसिद्धत्वम् । अस्फुटरूप से स्फुरित हो चुका था ऐसा प्रतीत होता है । तो यह स्पष्टरूप से प्रदर्शित अन्य रीति के लक्षण से कुछ नहीं । इस काव्यलक्षण के ज्ञात होने पर कुछ शब्दतत्त्व के आश्रित और दूसरी अर्थतत्त्व के साथ योग वाली वृत्तियाँ प्रकाशित होती हैं ॥ ४७ ॥ इस व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव के विवेचनमय काव्यलक्षण के ज्ञात होने पर जो कुछ प्रसिद्ध उपनागरिका आदि शब्दतत्त्व के आश्रित वृत्तियां हैं और जो अर्थतत्त्व से सम्बद्ध कैशिकी आदि हैं वे सम्यक् प्रकार से रीति की स्थिति में आ जाती हैं । अन्यथा अदृष्ट अर्थों के समान ही वृत्तियां अश्रद्धेय ही हो जायंगी अनुभवसिद्ध नहीं । इस लोचनम् शक्नुवद्भिरित्यत्र हेतुः—अस्फुटं कृत्वा स्फुरितमिति । लक्ष्यत इति । रीतिर्हि गुणेष्वेव पर्यवसिता । यदाह—विशेषो गुणात्मा गुणाश्च रसपर्यवसायिन एवेति ह्युक्तं प्राग्गुणनिरूपणे 'शृङ्गार एव मधुरः' इत्यत्रेति ॥ ४५-४६ ॥ प्रकाशन्त इति । अनुभवसिद्धतां काव्यजीवितत्वे प्रयान्तीत्यर्थः । रीतिपद- वीमिति । तद्वदेव रसपर्यवसायित्वात् । प्रतीतिपदवीमिति वा पाठः । नागरिकाया असमर्थ होते हुए यहाँ हेतु है—अस्फुट करके स्फुरित । प्रतीत होता है— । रीति गुणों में ही पर्यवसित है । क्योंकि कहते हैं—विशेष गुणरूप है, और गुणरस में पर्यवसायी ही होते हैं यह पहले गुण के निरूपण में कह चुके हैं 'शृङ्गार ही मधुर होता है' यहाँ ॥ ४५-४६ ॥ प्रकाशित होते हैं— । अर्थात् काव्य के जीवित रूप में अनुभवसिद्ध हैं । रीति की स्थिति में— । क्योंकि उसी ( रीति ) के समान ही रस में पर्यवसान प्राप्त करते हैं । अथवा प्रतीति की पदवी ( स्थिति ) यह पाठ है । नागरिका से 'उपमिता' यह
: तृतीय उद्योतः ५५३ ध्वन्यालोकः एवं स्फुटतयैव लक्षणीयं स्वरूपमस्य ध्वनेः । यत्र शब्दानामर्थानां च केषाञ्चित्प्रतिपत्तृविशेषसंवेद्यं जात्यत्वमिव रत्नविशेषाणां चारुत्वमना- ख्येयमवभासते काव्ये तत्र ध्वनिव्यवहार इति यल्लक्षणं ध्वनेरुच्यते प्रकार स्फुटरूप से ही इस ध्वनि का स्वरूप समझ लेना चाहिये । जिसमें कुछ शब्दों और अर्थों का रत्नविशेषों के जात्यत्व की भांति विशेष प्रतिपत्ता (जानकार) द्वारा संवेद्य चारुत्व अनाख्येयरूप से प्रतीत होता है उस काव्य में ध्वनि का व्यवहार है' लोचनम् ह्युपमितेत्यनुप्रासवृत्तिः शृङ्गारादौ विश्राम्यति । परुषेति दीप्तेषु रौद्रादिषु । कोम- लेति हास्यादौ । तथा- 'वृत्तयः काव्यमातृकाः' इति यदुक्तं मुनिना तत्र रसो- चित एव चेष्टाविशेषो वृत्तिः । यदाह- 'कैशिकी श्लक्ष्णनेपथ्या शृंगाररससम्भवा' इत्यादि । इयता 'तस्याभावं जगदुरपरे' इत्यादावभावविकल्पेषु 'वृत्तयो रीतयश्च गताः श्रवणगोचरं, तदतिरिक्तः कोऽयं ध्वनिरि'ति । तत्र कथञ्चिदभ्युपगमः कृतः कथञ्चिच दूषणं दत्तमस्फुटस्फुरितमिति वचनेन । इदानीं 'वाचां स्थितमविषये' इति यदूचे तत्तु प्रथमोद्द्योते दूषितमपि दूषयति सर्वप्रपञ्चकथने हि असम्भा- व्यमेवानाख्येयत्वमित्यभिप्रायेण । अक्लिष्टत्व इति । श्रुतिकष्टाद्यभाव इत्यर्थः । अप्रयुक्तस्य प्रयोग इत्यपौनरुक्त्यम् । ताविति शब्दगतोऽर्थगतश्च । विवेकस्या- वसादो यत्र तस्य भावो निर्विवेकत्वम् । सामान्यस्पर्शी यो विकल्पस्ततो यः शब्दः दृष्टान्तेऽपि अनाख्येयत्वं नास्तीति दर्शयति - रत्नविशेषाणां चेति । ननु अनुप्रासवृत्ति शृङ्गार आदि में विश्रान्त होती है । 'परुषा' दीप्त रौद्र आदि में । कोमला हास्य आदि में । तथा - 'वृत्तियाँ काव्य की माताएं हैं' यह जो कि मुनि ने कहा है उसमें रसोचित ही चेष्टा विशेष वृत्ति है । क्योंकि कहते हैं- 'श्लक्ष्णनेपथ्यवाली कैशिकी शृङ्गाररस में सम्भव होती है' इत्यादि । 'कुछ लोगों ने उसका अभाव कहा है' इत्यादि अभावविकल्पों में 'वृत्तियाँ और रीतियाँ श्रवणगोचर हुई हैं उससे अतिरिक्त यह ध्वनि कौन है ?' वहाँ कुछ स्वीकार किया है और 'अस्फुट करके स्फुरित' इस वचन से किसी प्रकार दोष दिया है । अब 'वाणी के अविषय में स्थित' जो कहा है वह प्रथम उद्योत में दूषित है तब भी दूषित करते हैं, सारे प्रपञ्च के कहे जाने पर अनाख्येयत्व असम्भाव्य ही है इस अभिप्राय से । अक्लिष्ट- । अर्थात् श्रुतिकष्ट आदि का अभाव होने पर । 'अप्रयुक्त का प्रयोग' यह पौनरुक्त्य नहीं है । वे दोनों- । शब्दगत और अर्थगत । विवेक का अभाव (अवसाद) है जहाँ उसका भाव निर्विवेकत्व । सामान्य का स्पर्श करने वाला जो विकल्प उससे जो शब्द । दृष्टान्त में भी अनाख्येयत्व नहीं है यह दिखाते हैं-और रत्नविशेषों का- । सब उसे नहीं जानेंगे यह आशङ्का करके
५७४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः केनचित्तदयुक्तमिति नाभिधेयतामर्हति । यतः शब्दानां स्वरूपाश्रय- स्तावदक्लिष्टत्वे सत्यप्रयुक्तप्रयोगः । वाचकाश्रयस्तु प्रसादो व्यञ्जकत्वं चेति विशेषः । अर्थानां च स्फुटत्वेनावभासनं व्यङ्ग्यपरत्वं व्यङ्ग्यांश- विशिष्टत्वं चेति विशेषः । तौ च विशेषौ व्याख्यातुं शक्येते व्याख्यातौ च बहुप्रकारम् । तद्व्यतिरिक्तानाख्येयविशेषसम्भावना तु विवेकावसादभावमूलैव । यस्मा- दनाख्येयत्वं सर्वशब्दागोचरत्वेन न कस्यचित्सम्भवति । अन्ततोऽना- ख्येयशब्देन तस्याभिधानसम्भवात् । सामान्यसंस्पर्शिविकल्पशब्दा- गोचरत्वे सति, प्रकाशमानत्वं तु यदनाख्येयत्वमुच्यते क्वचित् तदपि काव्यविशेषाणां रत्नविशेषाणामिव न सम्भवति । तेषां लक्षणकारैर्व्याकृतस्वरूपत्वात् । रत्नविशेषाणां च सामान्यसम्भावनयैव मूल्यस्थितिपरिकल्पनादर्शनाच्च । उभयेषामपि तेषां प्रतिपत्तृविशेषसंवे- यह जो ध्वनि का लक्षण कोई कहता है वह ठीक नहीं, अतः कहा नहीं जा सकता । क्योंकि शब्दों का स्वरूप के आश्रित (विशेष) अक्लिष्ट होने पर अप्रयुक्त का प्रयोग और वाचक के आश्रित (विशेष) प्रसाद और व्यञ्जकत्व है । और अर्थों का विशेष स्फुटरूप से अवभासन, व्यङ्ग्यपरत्व और व्यङ्ग्य अंश से विशिष्टत्व है । वे दोनों विशेष व्याख्यात हो सकते हैं और बहुत प्रकार से व्याख्यात हुए हैं । उनसे व्यतिरिक्त अनाख्येय विशेष की सम्भावना का तो विवेक का अभाव ही कारण है । क्योंकि सभी शब्दों के अगोचर रूप से अनाख्येयत्व किसी का सम्भव नहीं है, अन्ततः अनाख्येय शब्द से उसका अभिधान सम्भव है । सामान्य का स्पर्श करनेवाला विकल्प शब्द का गोचर न होकर जो प्रकाशमान है वह अनाख्येय है जो कहीं पर यह कहा है वह भी रत्नविशेषों की भाँति काव्यविशेषों का सम्भव नहीं है । क्योंकि उनके रूप की लक्षणकारों ने व्याख्या की है । और रत्नविशेषों के सामान्य की सम्भावना से ही मूल्य की स्थिति की कल्पना देखी जाती है । उन दोनों का भी लोचनम् सर्वेण तन्न संवेद्यत इत्याशङ्क्याभ्युपगमेनैवोत्तरयति-उभयेषामिति । रत्नानां काव्यानां च । ननु नार्थं शब्दाः स्पृशन्त्यपीति, अनिर्देश्यस्य वेदकमित्यादौ कथमनाख्ये- अभ्युगम से ही उत्तर देते हैं-उन दोनों का- । रत्नों का और काव्यों का । 'अर्थ को शब्द स्पर्श भी नहीं करते' 'अनिर्देश्य का ज्ञापक (वेदक)' इत्यादि में
तृतीय उद्योतः ५५५ ध्वन्यालोकः द्यत्वमस्त्येव । वैकटिका एव हि रत्नतत्त्वविदः, सहृदया एव हि काव्यानां रसज्ञा इति कस्यात्र विप्रतिपत्तिः । यच्चानिर्देश्यत्वं सर्वलक्षणविषयं बौद्धानां प्रसिद्धं तत्तन्मतपरीक्षायां ग्रन्थान्तरे निरूपयिष्यामः । इह तु ग्रन्थान्तरश्रवणलवप्रकाशनं सहृदय- वैमनस्यप्रदायीति न प्रक्रियते । बौद्धमतेन वा यथा प्रत्यक्षादिलक्षणं तथास्माकं ध्वनिलक्षणं भविष्यति । तस्माल्लक्षणान्तरस्याघटनादशब्दा- र्थत्वाच्च तस्योक्तमेव ध्वनिलक्षणं साधीयः । तदिदमुक्तम्— प्रतिपत्ता विशेष द्वारा संवेद्यत्व है ही । वैकटिक लोग ही रत्न के तत्त्व के जानकार होते हैं और सहृदय लोग ही काव्यों के रसज्ञ होते हैं । यहाँ कौन सन्देह करता है ? जो कि बौद्धों का सभी लक्षणों के सम्बन्ध में 'अनिर्देश्यत्व' अलक्षणीयत्व प्रसिद्ध है उसे उनके मत की परीक्षा के अवसर में ग्रन्थान्तर में निरूपण करेंगे । यहाँ ग्रन्थान्तर के सुनने का लवमात्र भी प्रकाशन सहृदयों के वैमनस्य प्रदान करनेवाला होगा, इसलिए नहीं करते हैं । अथवा बौद्ध मत से जैसे प्रत्यक्ष आदि का लक्षण है उस प्रकार हमारा ध्वनि का लक्षण होगा । इसलिए दूसरे लक्षण के न घटने से और अशब्दार्थ ( ध्वनिशब्द का अर्थ न ) होने से पूर्वोक्त लक्षण ही ठीक है । तो यह कहा है— लोचनम् यत्वं वस्तूनामुक्तमिति चेदत्राह—यच्चिति । एवं हि सर्वभाववृत्तान्ततुल्य एव ध्वनिरिति ध्वनिस्वरूपमनाख्येयमित्यतिव्यापकं लक्षणं स्यादिति भावः । ग्रन्थान्तर इति । विनिश्चयटीकायां धर्मोत्तरीयां या विवृतिरमुना ग्रन्थकृता कृता तत्रैव तद्व्याख्यातम् । उक्तमिति । संग्रहार्थं मयैवेत्यर्थः । अनाख्येयांशस्या- भासो विद्यते यस्मिन् काव्ये तस्य भावस्तन्न लक्षणं ध्वनेरिति सम्बन्धः । अत्र वस्तुओं का अनाख्येयत्व कैसे कहा है ? ( 'यहाँ निर्णयसागरीय लोचन' में पाठ भ्रष्ट है, किन्तु बालप्रिया में इसका सम्भावित संशोधन किया गया है ) इस पर कहते हैं— जो कि— । भाव यह कि सभी भाव पदार्थ के वृत्तान्त के तुल्य ही ध्वनि है, इस लिए ध्वनि स्वरूप अनाख्येय है, इस प्रकार लक्षण अतिव्यापक होगा । ग्रन्थान्तर 'धर्मोत्तरी' नाम की 'विनिश्चय' ग्रन्थ की टीका में इस ग्रन्थकार ने जो विवृति की है वहीं पर उसे व्याख्यान किया है । कहा है— । अर्थात् मैं ने ही । अनाख्येय अंश का आभास है जिस काव्य में उसभाव, वह ध्वनि का लक्षण नहीं है यह सम्बन्ध है ।
५५६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अनाख्येयांशभासित्वं निर्वाच्यार्थतया ध्वनेः । न लक्षणं, लक्षणं तु साधीयोऽस्य यथोदितम् ॥ इति श्रीराजानकानन्दवर्धनाचार्यविरचिते ध्वन्यालोके तृतीय उद्योतः ॥ ध्वनि के निर्वाच्यार्थ होने के कारण अनाख्येय अंश का भासित होना लक्षण नहीं है, जैसा कि लक्षण कहा है ( वह ) ठीक है । श्रीराजानक आनन्दवर्धनाचार्य विरचित ध्वन्यालोक में तीसरा उद्योत समाप्त । लोचनम् हेतुः—निर्वाच्यार्थतयेति । निर्विभज्य वक्तुं शक्यत्वादित्यर्थः । अन्यस्तु ‘निर्वा- च्यार्थतया’ इत्यत्र निसोनञर्थत्वं परिकल्प्यानाख्येयांशभासित्वेऽयं हेतुरिति व्याचष्टे, तत्त क्लिष्टम् । हेतुश्च साध्याविशिष्ट इत्युक्तव्याख्यानमेवेति शिवम् । काव्यालोके प्रथां नीतान् ध्वनिभेदान् परामृशत् । इदानीं लोचनं लोकान् कृतार्थान्संविधास्यति ॥ आसूत्रितानां भेदानां स्फुटतापत्तिदायिनीम् । त्रिलोचनप्रियां वन्दे मध्यमां परमेश्वरीम् ॥ इति श्रीमहामाहेश्वराचार्यवर्याभिनवगुप्तोन्मीलिते सहृदयालोक- लोचने ध्वनिसङ्केते तृतीय उद्योतः ॥ यहाँ हेतु है—निर्वाच्यार्थ होने के कारण— । अर्थात् विभाग करके कहे जा सकने के कारण । किन्तु अन्य ने 'निर्वाच्यार्थतया' में 'निर्' को नञर्थ समझकर अनाख्येयांशभासी होने में यह हेतु है' यह व्याख्यान किया है, किन्तु वह क्लिष्ट है । और हेतु साध्य से विशिष्ट है यह व्याख्यान उक्त है । शिवम् । काव्यालोक में फैले हुए ध्वनिभेदों का परामर्श करता हुआ यह लोचन लोगों को कृतार्थ करेगा । आसूचित भेदों को स्फुटता प्राप्त कराने वाली त्रिलोचन (शिव) की प्रिया परमेश्वरी मध्यमा की वन्दना करता हूँ । श्री महामाहेश्वराचार्यवर्य अभिनवगुप्त द्वारा उन्मीलित ध्वनिसङ्केत सहृदयालोकलोचन में तृतीय उद्योत समाप्त हुआ ।
चतुर्थ उद्योतः ध्वन्यालोकः एवं ध्वनिं सप्रपञ्चं विप्रतिपत्तिनिरासार्थं व्युत्पाद्य तद्व्युत्पादने प्रयोजनान्तरमुच्यते— ध्वनेर्यः सगुणीभूतव्यङ्ग्यस्याध्वा प्रदर्शितः । अनेनानन्त्यमायाति कवीनां प्रतिभागुणः ॥ १ ॥ य एष ध्वनेर्गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य च मार्गः प्रकाशितस्तस्य फला- न्तरं कविप्रतिभानन्त्यम् । इस प्रकार ध्वनि का प्रपञ्च विस्तार के साथ विरुद्ध शङ्का के निवारण के लिए व्युत्पादन करके उस ( ध्वनि ) के व्युत्पादन में दूसरा प्रयोजन कहते हैं— गुणीभूतव्यङ्ग्य के सहित ध्वनि का जो मार्ग दिखाया जा चुका है, इससे कवियों का प्रतिभागुण अनन्त ( अनेकानेक ) हो जाता है ॥ १ ॥ जो यह ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य का मार्ग ( पूर्व उद्योतों में ) प्रकाशित किया है उसका दूसरा फल ( प्रयोजन ) कवि की प्रतिभा का आनन्त्य है । लोचनम् कृत्यपञ्चकनिर्वाह्ययोगेऽपि परमेश्वरः । नान्योकरणापेक्षो यया तां नौमि शाङ्करीम् ॥ उद्योतान्तरसङ्गतिं विरचयितुं वृत्तिकार आह—एवमिति । प्रयोजनान्तरमिति । यद्यपि 'सहृदयमनःप्रीतये' इत्यनेन प्रयोजनं प्रागेवोक्तं, तृतीयोद्योतावधौ च सत्काव्यं कर्तुं वा ज्ञातुं वेति तदेवेषत्स्फुटीकृतं, तथापि स्फुटतरीकर्तुमिदानीं यत्नः । यतस्सुस्पष्टरूपत्वेन विज्ञायते, अतोऽस्पष्टनिरूपितात्स्पष्टनिरूपणमन्यथैव प्रतिभातीति प्रयोजनान्तरमित्युक्तम् । अथवा पूर्वोक्तयोः प्रयोजनयोरन्तरं विशे- मैं उस शाङ्करी ( शङ्कर की माया शक्ति ) को नमन करता हूँ जिसके कारण परमेश्वर ( सृष्टि आदि ) पाँच प्रकार के कार्यों को पूरा करने में भी दूसरे उपकरण की अपेक्षा नहीं रखते । अन्य उद्योत की सङ्गति बैठाने के लिए वृत्तिकार कहते हैं—इस प्रकार—। दूसरा प्रयोजन—। यद्यपि 'सहृदयमनःप्रीतये' इसके द्वारा प्रयोजन पहले ही कहा जा चुका है, और तृतीय उद्योत के अन्त में 'सत्काव्यं कर्तुं ज्ञातुं वा' से उसे ही कुछ स्फुट किया है तथापि और अधिक स्फुट ( स्फुटतर ) करने के लिए अब यत्न है । जिससे सुस्पष्ट रूप से जाना जाता है, अतः अस्पष्ट रूप से निरूपण किए गए (प्रयोजन से) स्पष्ट निरूपण अन्यथा ही मालूम पड़ता है, सो दूसरा प्रयोजन यह कहा । अथवा,
५५८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कथमिति चेत् — अतो ह्यन्यतमेनापि प्रकारेण विभूषिता । वाणी नवत्वमायाति पूर्वार्थान्वयवत्यपि ॥ २ ॥ अतो ध्वनेरुक्तप्रभेदमध्यादन्यतमेनापि प्रकारेण विभूषिता सती वह कैसे ? तो— इसमें से एक भी प्रकार से विभूषित वाणी प्राचीन अर्थ के साथ सम्बन्ध रखती हुई भी नवत्व प्राप्त कर लेती है ॥ २ ॥ इस ध्वनि के कहे गए प्रभेदों के बीच से एक भी प्रकार से विभूषित होती हुई लोचनम् षोऽभिधीयते; केन विशेषेण सत्काव्यकरणमस्य प्रयोजनं, केन च सत्काव्य- बोध इति विशेषो निरूप्यते । तत्र सत्काव्यकरणे कथमस्य व्यापार इति पूर्वं वक्तव्यं निष्पादितस्य ज्ञेयत्वादिति तदुच्यते—ध्वनेर्य इति ॥ १ ॥ ननु ध्वनिभेदात् प्रतिभानामानन्त्यमिति व्यधिकरणमेतदित्यभिप्रायेणा- शङ्कते—कथमितीति । अत्रोत्तरम्—अतो हीति । आसन्तातावद् बहवः प्रकाराः, एकेनाप्येवं भव- पहले कहे गए दोनों प्रयोजनों का अन्तर अर्थात् विशेष कहते हैं—किस विशेष से सत्काव्य का निर्माण इसका प्रयोजन है और किससे सत्काव्य बोध ( इसका प्रयोजन है ! ) इस प्रकार विशेष का निरूपण करते हैं। वहाँ सत्काव्य के निर्माण में कैसे इसका ( व्युत्पादन का ) व्यापार है ? यह पहले वक्तव्य है क्योंकि जो निष्पादित ( व्युत्पादित ) होता है वही ज्ञेय या ज्ञान का विषय होता है, अतः उसे कहते हैं—जो यह— । ध्वनि के भेद से प्रतिभा का आनन्त्य, यह व्यधिकरण¹ है, इस अभिप्राय से आशङ्का करते हैं—कैसे— । यहाँ उत्तर है—इसमें से— । हों बहुत से प्रकार ( प्रभेद ), एक ( प्रकार या १. प्रस्तुत शङ्का का तात्पर्य है कि ध्वनि का भेद काव्यनिष्ठ है और प्रतिभा का आनन्त्य कविनिष्ठ है, और जैसा कि कार्यकारणभाव का नियम है कि वह समानाधिकरण में होता है, यहाँ दोनों का अधिकरण समान नहीं है, ऐसी स्थिति में ध्वनि के भेद और प्रतिभा के आनन्त्य का कार्य-करण-भाव कैसे बन सकता ? इसका समाधान यह है कि ध्वनि के भेद का ज्ञान प्रतिभा के आनन्त्य का कारण है, यह आचार्य का वक्तव्य है। इसी बात को दूसरे प्रकार से द्वितीय कारिका में कहा गया है। कवि ध्वनि के भेदों का ज्ञान करके अनन्त प्राचीन कवियों के वर्णित भी विषय के वर्णन में प्रतिभान प्राप्त करके अपनी वाणी में नवत्व उत्पन्न कर लेता है। ध्वनि के ज्ञान का फल प्रतिभा का आनन्त्य है तो प्रतिभा के आनन्त्य का फल वाणी का नवत्व है।