ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ५४१ ध्वन्यालोकः या व्यापारवती रसान् रसयितुं काचित्कवीनां नवा दृष्टिर्या परिनिष्ठितार्थविषयोन्मेषा च वैपश्चिती । हे समुद्र में शयन करनेवाले भगवान्, जो रसों के आस्वाद करने के लिए व्यापारशील कवियों की नई कोई दृष्टि है और परिनिष्ठित है अर्थ के विषय में उन्मेष लोचनम् रिक्तानाम् । व्यापारवतीति । निष्पादनप्राणो हि रस इत्युक्तम् । तत्र विभावादि- योजनात्मिका वर्णना, ततः प्रभृति घटनापर्यन्ता क्रिया व्यापारः, तेन सतत- युक्ता । रसानिति । रस्यमानतासारान् स्थायिभावान् रसयितुं रस्यमानताप- त्तियोग्यान् कर्तुम् । काचिदिति लोकवार्तापतितबोधावस्थात्यागेनोन्मीलन्ती । अत एव ते कवयः वर्णनायोगात् तेषाम् । नवेति । क्षणे क्षणे नूतनैर्नूतनैर्वैचित्र्यै- र्जगन्त्यासूत्रयन्ती । दृष्टिरिति । प्रतिभारूपा, तत्र दृष्टिश्चाक्षुषं ज्ञानं पाडवादि रसयतीति । विरोधादलङ्कारोऽत एव नवा । तदनुगृहीतश्च ध्वनिः, तथाहि चाक्षुषं ज्ञानं नाविवक्षितमत्यन्तमसम्भवाभावात् । न चान्यपरम्; अपि त्वर्थान्तरे ऐन्द्रियकविज्ञानाभ्यासोल्लसिते प्रतिभानलक्षणेऽर्थे संक्रान्तम् । संक्रमणे च विरोधोऽनुग्राहक एव । तद्वक्ष्यति—'विरोधादलङ्कारेण' इत्यादिना । या चैवंविधा दृष्टिः परिनिष्ठितोऽचलः अर्थविषये निश्चेतव्ये विषये उन्मेषो यस्याः । तथा परिनिष्ठिते लोकप्रसिद्धेऽर्थे न तु कविवदपूर्वस्मिन्नर्थे उन्मेषो यस्याः सा । चुके हैं कि रस का प्राण निष्पादन है। वहाँ विभावादि की योजना रूप वर्णना होती है, उससे लेकर घटना ( तत्तत् पदों की घटना ) तक क्रिया व्यापार है। उस ( व्यापार ) से सततयुक्त। रसों के—। रस्यमानतासार स्थायिभावों के आस्वाद कराने अर्थात् रस्यमानता की प्राप्ति के योग्य करने। कोई—। लोकवार्ता में प्राप्त बोधावस्था के त्याग से उन्मीलित रोती हुई। इसी लिए वे 'कवि' हैं क्योंकि उनमें वर्णना का योग होता है। नई—। क्षण-क्षण में नये-नये वैचित्र्यों से संसार को प्रासूत्रित ( प्रकाशित ) करती हुई। दृष्टि—। प्रतिभा रूप, वहाँ दृष्टि अर्थात् चाक्षुष ज्ञान, पाउप् आदि पेय द्रव्यों को आस्वाद करती है, यह विरोध अलङ्कार है, इसी लिए नई। और उससे अनुगृहीत ध्वनि है जैसा कि चाक्षुष ज्ञान अत्यन्त अविवक्षित ( अर्थात् अत्यन्त तिरस्कृत ) नहीं है, क्योंकि अत्यन्त असम्भव नहीं है और अन्य पर ( अर्थात् विवक्षित भी ) नहीं है, बल्कि ऐन्द्रियक विज्ञान के अभ्यास से उल्लसित प्रतिमान रूप अर्थ में सङ्क्रान्त है। और सङ्क्रमण में विरोध अनुग्राहक ही है। उसे कहेंगे—'विरोध अलङ्कार से' इत्यादि द्वारा। जो इस प्रकार की दृष्टि है, परिनिष्ठित अर्थात् अचल है अर्थ के विषय में अर्थात् निश्चेतव्य विषय में उन्मेष जिसका। उस प्रकार परिनिष्ठित अर्थात् लोकप्रसिद्ध अर्थ में, न कि कवि की भांति अपूर्व अर्थ में उन्मेष है जिसका वह। विपश्चित् ( विद्वान् ) लोगों