भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 600, कुल 680 में से

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पृष्ठ 600

५४० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः वाच्यालङ्कारसङ्कीर्णत्वमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यापेक्षया रसवति सालङ्कारे काव्ये सर्वत्र सुव्यवस्थितम् । प्रभेदान्तराणामपि कदाचि- त्सङ्कीर्णत्वं भवत्येव । यथा ममैव— वाच्य अलंकारों का संकीर्णत्व अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य की अपेक्षा के साथ रसयुक्त और अलंकारयुक्त सभी काव्य में सुनिश्चित है । अन्य प्रभेदों का भी कदाचित् संकीर्णत्व ( संकर ) होता ही है । जैसे मेरा ही— लोचनम् 'जाने' इत्यनेनोत्प्रेक्ष्यमाणानन्तधर्मव्यञ्जकेनापि वाच्यमेवोत्प्रेक्षणरूपं प्रधानी- क्रियते । एवं गुणीभूतव्यङ्ग्येऽपि चत्वारो भेदा उदाहृताः । अधुनालंकारगतांस्तान्दर्शयति—वाच्यालङ्कारेति । व्यङ्ग्यत्वे त्वलंकाराणा- मुक्तभेदाष्टक एवान्तर्भाव इति वाच्यशब्दस्याशयः । काव्य इति । एवंविधमेव हि काव्यं भवति । सुव्यवस्थितमिति । 'विवक्षा तत्परत्वेन' इति द्वितीयोद्द्योतम्- लोदाहरणैभ्यः संकरत्रयं संसृष्टिश्च लभ्यत एव । 'चलापाङ्गां दृष्टिम्' इत्यत्र हि रूपकव्यतिरेकस्य प्राग्व्याख्यातस्य शृङ्गारानुग्राहकत्वं स्वभावोक्तेः शृङ्गारस्य चैकानुप्रवेशः । 'उप्पह जाया' इति गाथायां पामरस्वभावोक्तिर्वा ध्वनिर्वेति प्रकरणाद्यभावे एकतरग्राहकं प्रमाणं नास्ति । यद्यप्यलङ्कारो रसमवश्यमनुगृह्णाति, तथापि 'नातिनिर्वहणैषिता' इति यदभिप्रायेणोक्तं तत्र सङ्करासम्भवात्संसृष्टिरेवालङ्कारेण रसध्वनेः । यथा—'बाहु- लतिकापाशेन बद्ध्वा दृढम्' इत्यत्र । प्रभेदान्तराणामपीति । रसादिध्वनिव्यति- अनन्त धर्म के व्यंजक भी 'जाने' इस से उत्प्रेक्षण रूप वाच्य ही प्रधानीकृत होता है । इस प्रकार गुणीभूतव्यङ्ग्य में भी चार भेद उदाहृत हुए । अब अलंकारत उन्हें दिखाते हैं—वाच्य अलंकारों का—। व्यङ्ग्य होने पर अलङ्कारों का उक्त आठ भेदों में ही अन्तर्भाव है यह 'वाच्य' शब्द का आशय है । काव्य में—। इस प्रकार का ही काव्य होता है । सुनिश्चित—। 'विवक्षा तत्परत्वेन' इस द्वितीय उद्योत के मूल के उदाहरणों से तीनों संकर और संसृष्टि प्राप्त ही होते हैं । 'चलपाङ्गां दृष्टि' यहां पहले व्याख्यात रूपक और व्यतिरेक शृङ्गार के अनुग्राहक हैं, स्वभावोक्ति का और शृंगार का एकानुप्रवेश है । उप्पइ जाया' इस गाथा में पामर की स्वभावोक्ति है अथवा ध्वनि है, प्रकरण आदि के अभाव में दोनों में से एक का ग्राहक प्रमाण नहीं है । यद्यपि अलंकार रस को अवश्य अनुगृहीत करता है तथापि जिस अभिप्राय से 'नातिनिर्वहणैषिता' ( अर्थात् अलंकार को अत्यन्त निर्वाह करने की इच्छा न रखना ) कहा है । कहाँ संकर के सम्भव न होने से अलंकार के साथ रसध्वनि की संसृष्टि ही होती है । जैसे 'बाहुलतिकापाशेन बद्ध्वा दृढं' यहाँ ( रूपक के साथ रस की संसृष्टि ही है ) । अन्य प्रभेदों का भी—। रसादि ध्वनि से व्यतिरिक्त । व्यापारशील—। कह

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