ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 602, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ें५४२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः ते द्वे अप्यवलम्ब्य विश्वमनिशं निर्वर्णयन्तो वयं श्रान्ता नैव च लब्धमब्धिशयन त्वद्भक्तितुल्यं सुखम् ॥ जिसका ऐसी जो विद्वानों की दृष्टि है उन दोनों को अवलम्बन करके निरन्तर विश्व को निर्वर्णन करते हुए हम थक गये, तुम्हारी भक्ति के तुल्य सुख नहीं पाया । लोचनम् विपश्चितामियं वैपश्चिती । ते अवलम्ब्येति । कवीनामिति वैपश्चितीति वचनेन नाहं कविर्न पण्डित इत्यात्मनोऽनौद्धत्यं ध्वन्यते । अनात्मीयमपि दरिद्रगृह इवोपकरणतयान्यत आहृतमेतन्मया दृष्टिद्वयमित्यर्थः । ते द्वे अपीति । न ह्येकया दृष्ट्या सम्यङ्निर्वर्णनं निर्वहति । विश्वमित्यशेषम् । अनिशमिति । पुनः पुनरनवरतम् । निर्वर्णयन्तो वर्ण नया, तथा निश्चितार्थं वर्णयन्तः इदमित्थमिति परामर्शानुमानादिना निर्भज्य निर्वर्णनं किमत्र सारं स्यादिति तिलशस्तिलशो विचयनम् । यच्च निर्वर्ण्यते तत्खलु मध्ये व्यापार्यमाणया मध्ये चार्थविशेषेषु निश्चितोन्मेषया निश्चलया दृष्ट्या सम्यङ्निर्वर्णितं भवति । वयमिति । मिथ्या- तत्त्वदृष्ट्याहरणव्यसनिन इत्यर्थः । श्रान्ता इति । न केवलं सारं न लब्धं यावत्प्रत्युत खेदः प्राप्त इति भावः । चशब्दस्तुशब्दस्यार्थे । अब्धिशयनेति । योगनिद्रया त्वमत एव सारस्वरूपवेदी स्वरूपावस्थित इत्यर्थः । श्रान्तस्य शयनस्थितं प्रति बहुमानो भवति । त्वद्भक्तीति । त्वमेव परमात्मस्वरूपो विश्व- की यह वैपश्चिती । उन्हें अवलम्बन करके— । 'कवियों की' 'विद्वानों की' इस कथन से 'मैं कवि नहीं हूँ, पण्डित नहीं हूँ' यह अपना अनौद्धत्य ध्वनित होता है । अर्थात् दरिद्र के घर में की भाँति अपनी न होने पर भी उपकरण के रूप में अन्य के यहाँ से मैंने दोनों दृष्टियाँ लाई हैं—उन दोनों को— । क्योंकि एक दृष्टि से सम्यक् निर्वर्णन नहीं पूर्ण हो सकता । विश्व अर्थात् अशेष । निरन्तर— । बार-बार अनवरत । निर्वर्णन करते हुए— । वर्णना द्वारा उस प्रकार निश्चितार्थ रूप में वर्णन करते हुए, 'यह इस प्रकार है' यह परामर्श आदि से विभाग करके निर्वर्णन अर्थात् यहाँ सार क्या होगा यह तिल-तिल विचयन करके । जो निर्वर्णित होता है वह मध्य में व्यापार्यमाण और मध्य में अर्थविशेषों में निश्चित उन्मेष वाली निश्चल दृष्टि से सम्यक् निर्वर्णित होता है । हम— । अर्थात् मिथ्यादृष्टि और तत्त्वदृष्टि के आहरण में शौक रखने वाले । थक गए— । भाव यह कि न केवल सार नहीं पाया, प्रत्युत खेद भी पाया । 'और' शब्द (श्लोक में 'च' शब्द ) 'तु' शब्द के अर्थ में है । समुद्र में शयन करने वाले— । अर्थात् योगनिद्रा के द्वारा तुम इसीलिए सारस्वरूप को जानने वाले स्वरूप में अवस्थित हो । थके हुए आदमी के सोये हुए के प्रति गौरव होता है । तुम्हारी भक्ति— । तुम्ही परमात्मस्वरूप विश्व का सार हो, उस (विश्वसार) की भक्ति अर्थात् श्रद्धादिपूर्वक