भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 603, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 603

तृतीय उद्योतः ५४३ ध्वन्यालोकः इत्यत्र विरोधासङ्कारेणार्थान्तरसंक्रमितवाच्यस्य ध्वनिप्रभेदस्य सङ्कीर्णत्वम्। यहाँ विरोध अलङ्कार से अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य (नामक) ध्वनि के प्रभेद का सङ्कर है। लोचनम् सारस्तस्य भक्तिः श्रद्धादिपूर्वकं उपासनाक्रमजस्तदावेशस्तेन तुल्यमपि न लब्धमास्तां तावत्तज्जातीयम्। एवं प्रथममेव परमेश्वरभक्तिभाजः कुतूहलमात्रावलम्बितकविप्रामाणिको- भयवृत्तेः पुनरपि परमेश्वरभक्तिविश्रान्तिरेव युक्तेति मन्वानस्येयमुक्तिः। सकल- प्रमाणपरिनिश्चितदृष्टादृष्टविषयविशेषजं यत्सुखं, यदपि वा लोकोत्तरं रसचर्वणात्मकं तत उभयतोऽपि परमेश्वरविश्रान्त्यानन्दः प्रकृष्यते तदानन्दविप्रुष्मात्रावभासो हि रसास्वाद इत्युक्तं प्रागस्माभिः। लौकिकं तु सुखं ततोऽपि निकृष्टप्रायं बहुतरदुःखानुषङ्गादिति तात्पर्यम्। तत्रैव दृष्टिशब्दापेक्षयैकपदानुप्रवेशः। दृष्टिमवलम्ब्य निर्वर्णनमिति विरोधाद्भारो वाश्रीयताम्, अन्धपदन्यासेन दृष्टिशब्दोऽत्यन्ततिरस्कृतवाच्यो वास्तु इत्येकेतरनिश्चये नास्ति प्रमाणम्, प्रकारद्वयेनापि हृद्यत्वात्। न च पूर्वत्राप्येवं वाच्यम्। नवाशब्देन शब्दशक्त्य- नुरणनतया विरोधस्य सर्वथावलम्बनात्। उपासनाक्रम से उत्पन्न तद्विषयक आवेश (प्रेमातिशय), उसके तुल्य भी (सुख) नहीं पाया उसकी जाति का (तज्जातीय सुख) तो दूर रहे। इस प्रकार परमेश्वर के प्रति भक्ति रखने वाले और यह मानने वाले कि यह उक्ति है कि कुतूहल मात्र से कवि और प्रामाणिक (विपश्चित्) दोनों के व्यवहारों को अवलम्बन करके फिर भी परमेश्वर की भक्ति में विश्रान्ति ही ठीक है। सकल प्रमाणों से परिनिश्चित् दृष्ट-अदृष्ट विषय-विशेष से उत्पन्न जो सुख है अथवा जो कि लोकोत्तर चर्वणा रूप (सुख) है उन दोनों से भी परमेश्वर में विश्रान्ति का आनन्द प्रकृष्ट है, हम पहले कह चुके हैं कि रसास्वाद उस आनन्द के बिन्दुमात्र का अवभास है। तात्पर्य यह कि बहुतर दुःखों के मिश्रण से लौकिक सुख उस (रसास्वाद) से भी निकृष्टप्राय है। वहीं ‘पर’—। 'दृष्टि' शब्द की अपेक्षा से एकपदानुप्रवेश है। अथवा 'दृष्टि' का अवलम्बन करके 'निर्वर्णन' यह विरोध अलङ्कार आश्रयण किया जाय, अथवा 'अन्ध' पद के न्यास की भाँति 'दृष्टि' शब्द अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य हो, इनमें से एक के निश्चय में प्रमाण नहीं है, क्योंकि हृद्यता दोनों प्रकार से है। पहले में भी इस प्रकार नहीं कहा जा सकता, क्योंकि 'नई' शब्द से शब्द शक्त्यनुरणन रूप से विरोध का सर्वथा अवलम्बन है।