ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः वाच्यालङ्कारसंसृष्टत्वं च पदापेक्षयैव । यत्र हि कानिचित्पदानि वाच्यालङ्कारभाञ्जि कानिचिच्च ध्वनिप्रभेदयुक्तानि । यथा— दीर्घीकुर्वन् पटु मदकलं कूजितं सारसानां और वाच्यालङ्कार की संसृष्टि पद की अपेक्षा से ही होती है । क्योंकि जहां कुछ पद वाच्यालङ्कार वाले होते हैं और कुछ ध्वनि प्रभेदयुक्त । जैसे— जहाँ सारस पक्षियों के पटु एवं मदकल कूजित को बढ़ाता हुआ, प्रातःकालों में लोचनम् एवं सङ्करं त्रिविधमुदाहृत्य संसृष्टिमुदाहरति—वाच्येति । सकलवाक्ये हि यद्यलङ्कारोऽपि व्यङ्ग्यार्थोऽपि प्रधानं तदानुग्राह्यानुग्राहकत्वसङ्करस्तदभावे त्वसङ्गतिरित्यलङ्कारेण वा ध्वनिना वा पर्यायेण द्वाभ्यामपि वा युगपत्पदविश्रा- न्ताभ्यां भाव्यमिति त्रयो भेदाः । एतद्गर्भीकृत्य सावधारणमाह—पदापेक्षयैवेति । यत्रानुग्राह्यानुग्राहकभावं प्रत्याशङ्कापि नावतरति तं तृतीयमेव प्रकारमुदाहर्तुमु- पक्रमते—यत्र हीति । यस्माद्यत्र कानिचिदलङ्कारभाञ्जि कानिचिद्द्ब्वनियुक्तानि, यथा दीर्घीकुर्वन्नित्यत्रेति । तथाविधपदापेक्षयैव वाच्यालङ्कारसंसृष्टत्वमित्यावृत्त्या पूर्वग्रन्थेन सम्बन्धः कर्तव्यः । अत्र हीति । अत्रत्यो हिशब्दो मैत्रीपदमित्यस्या- नन्तरं योज्य इति ग्रन्थसङ्गतिः । दीर्घीकुर्वन्निति । सिप्रावातेन हि दूरमप्यसौ शब्दो नीयते, तथा कुसुममारु- पवनस्पर्शाजातहर्षीः चिरं कूजन्ति, तत्कूजितं च वातान्दोलितसिप्रातरङ्गज- मधुरशब्दमिश्रं भवतीति दीर्घत्वम् । पट्विति । तथासौ सुकुमारो वायुर्येन तज्जः इस प्रकार त्रिविध सङ्कर को उदाहृत करके संसृष्टि को उदाहृत करते हैं—वाच्य- । यदि सम्पूर्ण वाक्य में अलङ्कार भी व्यङ्ग्य अर्थ भी प्रधान हो तब अनुग्राह्यानुग्राहकरूप सङ्कर होगा, उसके अभाव में असङ्गति होगी, इस प्रकार अलङ्कार को अथवा ध्वनि को अथवा क्रम से दोनों को एक ही पद में विश्रान्त होना चाहिए, इस प्रकार तीन भेद हैं । इसे भीतर रखकर अवधारणपूर्वक कहते हैं—पद की अपेक्षा से ही— । जहाँ अनुग्राह्यानुग्राहकभाव के प्रति आशङ्का भी नहीं होती उस तृतीय प्रकार को उदाहृत करने के लिए उपक्रम करते हैं—क्योंकि जहाँ कुछ अलङ्कार वाले, कुछ ध्वनियुक्त ( पद ), जैसे 'जहाँ सारस पक्षियों के' यहाँ । 'उस प्रकार के पद की अपेक्षा से ही वाच्य अलङ्कार की संसृष्टि है' यह आवृत्ति द्वारा पूर्वग्रन्थ से सम्बन्ध लगा लेना चाहिए । यहाँ— । ( वृत्तिग्रन्थ में ) यहाँ का 'हि' शब्द 'मैत्रीपद' के बाद जोड़ना चाहिए । इस प्रकार ग्रन्थ की सङ्गति है । जहाँ सारस— । सिप्रा का वायु उस शब्द को दूर ले जाता है, उस प्रकार सुकुमार पवन स्पर्श से प्रसन्न होकर ( सारस ) देर तक कूजन करते हैं, और वह कूजित वातान्दोलित सिप्रा की तरङ्गों से उत्पन्न मधुर शब्दों से मिल जाता है अतः