ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ५४५ ध्वन्यालोकः प्रत्यूषेषु स्फुटितकमलामोदमैत्रीकषायः । यत्र स्त्रीणां हरति सुरतग्लानिमङ्गानुकूलः सिप्रावातः प्रियतम इव प्रार्थनाचाटुकारः ॥ खिले कमलों की गन्ध की मैत्री से कषाय, अङ्गानुकूल सिप्रा का वायु प्रियतम में प्रार्थनाचाटुकार की भांति स्त्रियों का सुरत-खेद हरण करता है । लोचनम् शब्दः सारसकूजितमपि नाभिभवति प्रत्युत तत्सब्रह्मचारी तदेव दीपयति । न च दीपनं तदीयमनुपयोगि यतस्तन्मदेन कलं मधुरमाकर्णनीयम् । प्रत्यूषे- ष्विति । प्रभातस्य तथाविधसेवावसरत्वम् । बहुवचनं सदैव तत्रैषा हृद्यतेति निरूपयति । स्फुटितान्यन्तर्वर्तमानमकरन्दभरेण । तथा स्फुटितानि विकसि- तानि नयनहारीणि यानि कमलानि तेषां य आमोदस्तेन या मैत्री अभ्यासा- द्धावियोगपरस्परानुकूल्यलाभस्तेन कषाय उपरक्तो मकरन्देन च कषायवर्णी- कृतः । स्त्रीणामिति । सर्वस्य तथाविधस्य त्रैलोक्यसारभूतस्य य एवं करोति सुरतकृतां ग्लानिं तान्तिं हरति, अथ च तद्विषयां ग्लानिं पुनः सम्भोगाभिला- षोद्दीपनेन हरति । न च प्रसह्यप्रभूततयापि त्वङ्गानुकूलो हृद्यस्पर्शः हृदयान्तर्भूतश्च । प्रियतमे तद्विषये प्रार्थनार्थं चाटूनि कारयति । प्रियतमोऽपि तत्पवनस्पर्शप्रबुद्धसम्भो- दीर्घ हो जाता है । पढ़— । उस प्रकार वह वायु सुकुमार है जिससे कि उससे उत्पन्न शब्द सारसों के कूजित को भी अभिभूत नहीं करता प्रत्युत उसका सब्रह्मचारी होकर उसे ही बढाता है । उसका बढ़ाना अनुपयोगी नहीं है, क्योंकि वह मद से कल अर्थात् मधुर आकर्णनीय है । प्रातःकालों में— । प्रभात उस प्रकार की सेवा का अवसर है । बहुवचन 'वहाँ यह हृद्यता सदैव है' यह निरूपण करता है । भीतर वर्तमान मकरन्द के भार से खिले । उस प्रकार स्फुटित अर्थात् विकसित ( खिले ) नयनहारी जो कमल हैं उनकी जो गन्ध उससे जो मैत्री अर्थात् अविच्छिन्न आलिङ्गन से परस्पर आनुकूल्य का लाभ उससे कषाय अर्थात् उपरक्त, और मकरन्द से कषाय वर्ण का बना दिया गया । स्त्रियों का— । सभी उस प्रकार के त्रैलोक्यसारभूत की जो ( वायु ) इस प्रकार सुरतकृत ग्लानि अर्थात् तान्ति ( खेद ) को हरण करता है, और तद्विषयक ग्लानि को बार-बार सम्भोग के अभिलाष के उद्दीपन द्वारा हरण करता है । न कि प्रभूत होने के कारण हठात् ( हरण करता है ) बल्कि अङ्गानुकूल अर्थात् हृद्य स्पर्शवाला और हृदय के अन्तर्भूत है । प्रियतम में अर्थात् उसके विषय में प्रार्थना ३५ ध्व०