ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें.५४६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र हि मैत्रीपदमविवक्षितवाच्यो ध्वनिः । पदान्तरेष्वलंकारान्त- राणि । यहाँ 'मैत्री' पद अविवक्षितवाच्य ध्वनि है । अन्य पदों में अलङ्कारा- न्तर हैं । लोचनम् गाभिलाषः । प्रार्थनार्थं चाटूनि करोतीति तेन तथा कार्यत इति परस्परानुरा- गप्राणशृङ्गारसर्वस्वभूतोऽसौ पवनः । युक्तं चैतत्तस्य यतः सिप्रापरिचितोऽसौ वात इति नागरिको न त्वविदग्धो ग्राम्यप्राय इत्यर्थः । प्रियतमोऽपि रतान्तेऽङ्गा- नुकूलः संवाहनादिना प्रार्थनार्थं चाटुकार एवमेव सुरतग्लानिं हरति । कूजितं चानङ्गीकरणवचनादि मधुरध्वनितं दीर्घीकरोति । चाटुकरणावसरे च स्फुटितं विकसितं यत्कमलकान्तिधारिवदनं तस्य यामोदमैत्री सहजसौरभपरिचयस्तेन कषाय उपरक्तो भवति । अङ्गेषु चातुष्षष्टिकप्रयोगेष्वनुकूलः एवं शब्दरूपगन्ध- स्पर्शा यत्र हृद्या यत्र च पवनोऽपि तथा नागरिकः स तवाऽवश्यमभिगन्तव्यो देश इति मेघदूते मेघं प्रति कामिन इयमुक्तिः । उदाहरणे लक्षणं योजयति— मैत्रीपदमिति । हिशब्दोऽनन्तरं पठितव्य इत्युक्तमेव । अलङ्कारान्तराणीति । उत्प्रे- क्षास्वभावोक्तिरूपकोपमाः क्रमेणेत्यर्थः । एवमियता के लिए चाटु करवाता है । प्रियतम भी उस पवन के स्पर्श से प्रबुद्ध सम्भोग का अभिलाषावाला है । प्रार्थनार्थ चाटु करता है उसके द्वारा उस प्रकार कराया जाता है इस प्रकार परस्परानुरागप्राण शृङ्गार का सर्वस्वभूत वह पवन है । अर्थात् और उसके लिए यह ठीक है क्योंकि वह वात सिप्रा से परिचित है अतः नागरिक है, न कि अविदग्ध ग्राम्यप्राय है । प्रियतम भी रतान्त में अङ्गानुकूल होकर संवाहन आदि द्वारा प्रार्थनार्थ चाटुकार होकर इसी प्रकार सुरतग्लानि को हरण करता है । और कूजित अर्थात् अस्वीकार के वचन आदि मधुर आवाज को बढ़ा देता है । और चाटु करने के अवसर में स्फुटित अर्थात् विकसित जो कमल की कान्ति धारण करने वाला वदन उसकी जो आमोद-मैत्री अर्थात् सहज सौरभ का परिचय उससे कषाय अर्थात् उपरक्त होता है । अङ्गों में अर्थात् चातुःषष्टिक प्रयोगों में अनुकूल होता है । इस प्रकार शब्द, रूप, गन्ध, स्पर्श जहाँ हृद्य हैं और जहाँ पवन भी उस प्रकार नागरिक है वह देश तुम्हारे अवश्य जाने योग्य है, 'मेघदूत' में मेघ के प्रति कामी की यह उक्ति है । उदाहरण में लक्षण को घटाते हैं—मैत्री पद— । ( 'हि' शब्द को बाद में पढ़ना चाहिए यह कह ही चुके हैं । अलङ्कारान्तर— । अर्थात् क्रम से उत्प्रेक्षा, स्वभावोक्ति, रूपक, उपमा । इस प्रकार इतने से—