ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ५४७ ध्वन्यालोकः संसृष्टालंकारान्तरसंकीर्णो ध्वनिर्यथा- दन्तक्षतानि करजैश्च विपाटितानि प्रोद्भिन्नसान्द्रपुलके भवतः शरीरे । संसृष्ट अलंकारान्तर से संकीर्ण ध्वनि, जैसे- उत्पन्न सघन पुलक वाले आपके शरीर में रक्त के मन वाली (पक्ष में अनुरक्त लोचनम् सगुणीभूतव्यङ्ग्यैः सालङ्कारैः सहप्रभेदैः स्वैः । सङ्करसंसृष्टिभ्याम् । इत्येतदन्तं व्याख्यायोदाहरणानि च निरूप्य 'पुनरपि' इति यत्कारिका- भागे पदद्वयं तस्यार्थं प्रकाशयत्युदाहरणद्वारेणैव—संसृष्टेत्यादि । पुनःशब्दस्या- यमर्थः— न केवलं ध्वनेः स्वप्रभेदादिभिः संसृष्टिसङ्करौ विवक्षितौ यावत्तेषाम- न्योन्यमपि स्वप्रभेदानां स्वप्रभेदैर्गुणीभूतव्यङ्ग्येन वा सङ्कीर्णानां संसृष्टानां च ध्वनीनां सङ्कीर्णत्वं संसृष्टत्वं च दुर्लक्षमिति विस्पष्टोदाहरणं न भवतीत्यभि- प्रायेणालङ्कारस्यालङ्कारेण संसृष्टस्य संकीर्णस्य वा ध्वनौ संकरसंसर्गौ प्रदर्शनीयौ । तदस्मिन् भेदचतुष्टये प्रथमं भेदमुदाहरति-दन्तक्षतानीति । बोधिसत्त्वस्य स्वकिशोरभक्षणप्रवृत्तां सिंहीं प्रति निजशरीरं वितीर्णवतः केनचिच्चाटुकं क्रियते । (वह ध्वनि) गुणीभूतव्यङ्ग्य के साथ, अलङ्कारों के साथ और अपने प्रभेदों के साथ संकर और संसृष्टि द्वारा । यहाँ तक व्याख्यान करके और उदाहरणों को निरूपण करके 'फिर और भी' यह जो कारिकाभाग में दो पद हैं, उनका अर्थ उदाहरण के द्वारा ही प्रकाशित करते हैं— संसृष्ट इत्यादि । 'फिर' शब्द का यह अर्थ है—न केवल ध्वनि के अपने प्रभेद आदि के साथ संसृष्टि और सङ्कर विवक्षित हैं, बल्कि उनका परस्पर भी अपने प्रभेदों का अपने प्रभेदों से अथवा गुणीभूत व्यङ्ग्य से सङ्कीर्ण और संसृष्ट ध्वनियों का सङ्कीर्णत्व और संसृष्टत्व दुर्लक्ष है इस प्रकार स्पष्ट उदाहरण नहीं होता, इस अभिप्राय से अलङ्कार का अलङ्कार से संसृष्ट के अथवा सङ्कीर्ण की ध्वनि में सङ्कर और संसर्ग दिखाने चाहिए । तो इन चारो भेदों में से प्रथम भेद को उदाहृत करते हैं—उत्पन्न सघन— । अपने बच्चे को खाने में प्रवृत्त सिंही अपने शरीर देनेवाले बोधिसत्त्व का किसी ने चाटु