भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 608

५४८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः दत्तानि रक्तमनसा मृगराजवध्वा जातस्पृहैर्मुनिभिरप्यवलोकितानि ॥ अत्र हि समासोक्तिसंसृष्टेन विरोधाळंकारेण संकीर्णस्यालक्ष्य- क्रमव्यङ्ग्यस्य ध्वनेः प्रकाशनम् । दयावीरस्य परमार्थतो वाक्यार्थी- भूतत्वात् । मनवाली ) मृगराजवधू ( सिंहनी, पक्ष में राजवधू ) द्वारा दिए गए दन्तक्षतों और नखों द्वारा विदारणों को उत्पन्न स्पृहा वाले मुनियों ने भी देखा । यहाँ समासोक्ति से संसृष्ट ( जो ) विरोधाालङ्कार ( उसके ) द्वारा संकीर्ण अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि का प्रकाशन है। क्योंकि परमार्थ रूप से दयावीर वाक्यार्थीभूत है । लोचनम् प्रोद्भूतः सान्द्रः पुलकः परार्थसम्पत्तिजेनानन्दभरेण यत्र । रक्ते रुधिरे मनोऽ- भिलाषो यस्याः, अनुरक्तं च मनो यस्याः । मुनयश्चोद्बोधितमदनावेषाश्चेति विरोधः । जातस्पृहैरिति च वयमपि कदाचिदेवं कारुणिकपदवीमधिरोह्याम- स्तदा सत्यतो मुनयो भविष्याम इति मनोराज्ययुक्तैः । समासोक्तिश्च नायिका- वृत्तान्तप्रतीतेः । दयावीरस्येति । दयाप्रयुक्तत्वादत्र धर्मस्य धर्मवीर एव दयावीर- शब्देनोक्तः । वीरश्चात्र रसः, उत्साहस्यैव स्थायित्वादिति भावः । दयावीरश- ब्देन वा शान्तं व्यपदिशति । सोऽत्र रसः संसृष्टालङ्कारेणानुगृह्यते । समासो- क्तिमहिम्ना ह्ययमर्थः सम्पद्यते—यथा कश्चिन्मनोरथशतप्रार्थितप्रेयसीसम्भोग- किया है । उत्पन्न सघन पुलक परार्थ सम्पत्ति से उत्पन्न आनन्दभर से है जहाँ । रक्त अर्थात् रुधिर में मन अर्थात् अभिलाष है जिसका, अनुरक्त है मन जिसका । मुनि हैं और उद्बोधित मदन के आवेश वाले हैं यह विरोध है । उत्पन्न स्पृहा वाले कि हम भी कदाचित् इस प्रकार कारुणिक की पदवी पर पहुँच जांय तब सत्यरूप से मुनि हो जायेंगे इस प्रकार के मनोराज्य से युक्त । नायिका वृत्तान्त के प्रतीत होने से समासोक्ति है । दयावीर— । धर्म का यहाँ दयाप्रयुक्त होने के कारण धर्मवीर ही दयावीर शब्द से कहा गया है । भाव यह कि यहाँ वीररस है, क्योंकि उत्साह ही स्थायी भाव है । अथवा 'दयावीर' शब्द से 'शान्त' को व्यपदेश करते हैं । वह रस यहाँ संसृष्ट अलङ्कार द्वारा अनुगृहीत होता है । समासोक्ति की महिमा से यह अर्थ सम्पन्न होता है—जैसे कोई सैकड़ों मनोरथ से प्राप्त प्रियतमा के सम्भोग के अवसर में रोमाञ्चित हो जाता है