ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ५४९ ध्वन्यालोकः संसृष्टालङ्कारसंसृष्टत्वं च ध्वनेर्यथा— अहिणवपओअरसिएसु पहिअसामाइएसु दिअहेसु । सोहइ पसारिअगिआणं णच्चिअं मोरवृन्दाणम् ॥ संसृष्ट अलङ्कारों से ध्वनि का संसृष्टत्व, जैसे— नये बादलों के गर्जन से भरे तथा पथिकों के प्रति श्यामायित दिनों में गर्दन पसारे हुए मोरों का नाच अच्छा लगता है । लोचनम् वसरे जातपुलकस्तथा त्वं परार्थसम्पादनाय स्वशरीरदान इति करुणातिशयोऽ- नुभावसम्पदोद्दीपितः । द्वितीयं भेदमुदाहरति—संसृष्टेति । अभिनवं हृद्यं पयोदानां मेघानां रसितं येषु दिवसेषु । तथा पथिकान् प्रति श्यामायितेषु मोहजनकत्वाद् रात्रिरूपतामा- चरितवत्सु । यदि वा पथिकानां श्यामायितं दुःखवशेन श्यामिका येभ्यः । शोभते प्रसारितग्रीवाणां मयूरवृन्दानां नृत्तम् । अभिनयप्रयोगरसिकेषु पथिक- सामाजिकेषु सत्सु मयूरवृन्दानां प्रसारितगीतानां प्रकृष्टसारणानुसारिगीतानां तथा ग्रीवारेचकाय प्रसारितग्रीवाणां नृत्तं शोभते । पथिकान् प्रति श्यामा इवा- चरन्तीति क्यङ् । प्रत्ययेन लुप्तोपमा निर्दिष्टा । पथिकसामाजिकेष्विति कर्म- धारयस्य स्पष्टत्वाद्रूपकम् । ताभ्यां ध्वनेः संसर्ग इति ग्रन्थकारस्याशयः । अत्रैवोदाहरणेऽन्यद् भेदद्वयमुदाहर्तुं शक्यमित्याशयेनोदाहरणान्तरं न दत्तम् । वैसे ही तू परार्थसम्पादन के लिए अपने शरीर के दान में, इस प्रकार अतिशय करुणा को अनुभाव और विभाव की सम्पदा से उद्दीप्त किया है । द्वितीय भेद को उदाहृत करते हैं—संसृष्ट—। अभिनव अर्थात् हृद्य पयोद अर्थात् मेघों का रसित है जिन दिनों में, तथा पथिकों के प्रति श्यामायित अर्थात् मोहजनक होने के कारण रात्रिरूपता को आचरण करते हुए, अथवा पथिक जनों की दुःख के कारण श्यामिका पड़ गई है जिनके कारण ( ऐसे दिनों में ) गर्दन पसारे हुए मोरों का नाच शोभा देता है । अभिनय के प्रयोगों में रसिक पथिक रूप सामाजिकों के होने पर प्रसारितगीत अर्थात् प्रकृष्ट सारण के अनुसारि गीत वाले तथा ग्रीवारेचक के लिए फैला दी हुई ग्रीवा वाले मोरों का नृत्त शोभा देता है । पथिकों के प्रति श्यामा की भाँति आचरण करने वाले यहाँ क्यङ् प्रत्यय है । ( क्यङ् ) प्रत्यय से लुप्तोपमा निर्देश की गई है । 'पथिक सामाजिक' यहाँ कर्मधारय के स्पष्ट होने से रूपक है । उनसे ध्वनि का संसर्ग है यह ग्रन्थकार का आशय है । इसी उदाहरण में अन्य दो भेद उदाहृत हो सकते हैं, इस आशय से अन्य उदाहरण नहीं दिया है । जैसा कि—व्याघ्रादि से