भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 610

५५० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र ह्युपमारूपकाभ्यां शब्दशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य ध्वनेः संसृष्टत्वम् । एवं ध्वनेः प्रभेदाः प्रभेदभेदाश्च केन शक्यन्ते । संख्यातुं दिङ्मात्रं तेषामिदमुक्तमस्माभिः ॥ ४४ ॥ अनन्ता हि ध्वनेः प्रकाराः सहृदयानां व्युत्पत्तये तेषां दिङ्मात्रं कथितम् । यहाँ उपमा और रूपक के शब्दशक्त्युद्भव अनुरणन रूपव्यङ्ग्य ध्वनि की संसृष्टि है । इस प्रकार ध्वनि के प्रभेदों और प्रभेदों के भेदों की गणना कौन कर सकता है, उनका यह हमने दिङ्मात्र कहा है ॥ ४४ ॥ ध्वनि के अनन्त प्रकार हैं, सहृदयों की व्युत्पत्ति के लिये उन्हें दिङ्मात्र कहा है । लोचनम् तथाहि—व्याघ्रादेराकृतिगणत्वे पथिकसामाजिकेष्वित्युपमारूपकाभ्यां सन्दे- हास्पदत्वेन सङ्कीर्णाभ्यामभिनयप्रयोगे, अभिनवप्रयोगे च रसिकेष्विति प्रसारितगीतानामिति यः शब्दशक्त्युद्भवस्तस्य संसर्गमात्रमनुग्राह्य- त्वाभावात् । ‘पहिअसामाइएसु’ इत्यत्र तु पदे सङ्कीर्णाभ्यां ताभ्यामुप- मारूपकाभ्यां शब्दशक्तिमूलस्य ध्वनेः सङ्कीर्णत्वमेकव्यञ्जकानुप्रवेशादिति सङ्कीर्णालङ्कारसंसृष्टः । सङ्कीर्णालङ्कारसङ्कीर्णश्चेत्यपि भेदद्वयं मन्तव्यम् ॥ ४३ ॥ एतदुपसंहरति—एवमिति । स्पष्टम् ॥ ४४ ॥ अथ ‘सहृदयमनःप्रीतये’ इति यत्सूचितं तदिदानीं न शब्दमात्रमपि तु आकृतिगण होने पर ‘पथिक सामाजिक’ यहाँ सन्देहास्पद होने के कारण सङ्कीर्ण उपमा और रूपक से ‘अभिनव प्रयोगों में रसिक’ ‘प्रसारित गीतोंवाले’ इस प्रकार जो शब्द- शक्त्युद्भव है उसका संसर्ग मात्र है क्योंकि अनुग्राह्यता नहीं है । ‘पहिअसामाइएसु’ इस पद में सङ्कीर्ण उन उपमा और रूपक से शब्दशक्तिमूल ध्वनि का सङ्कर एकव्यञ्जका- नुप्रवेश से है इस प्रकार सङ्कीर्णालङ्कार संसृष्ट, और सङ्कीर्ण से सङ्कीर्ण है, इस प्रकार इन दोनों भेदों को भी मानना चाहिए ॥ ४३ ॥ इसका उपसंहार करते हैं—इस प्रकार— । स्पष्ट है ॥ ४४ ॥ ‘सहृदयों के मनं को प्रसन्न करने के लिए’ यह जो सूचित किया है वह अब