भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 611

तृतीय उद्योतः ५५१ ध्वन्यालोकः इत्युक्तलक्षणो यो ध्वनिर्विवेच्यः प्रयत्नतः सद्भिः । सत्काव्यं कर्तुं वा ज्ञातुं वा सम्यगभियुक्तैः ॥ ४५ ॥ उक्तस्वरूपध्वनिनिरूपणनिपुणा हि सत्कवयः सहृदयाश्च नियतमेव काव्यविषये परां प्रकर्षपदवीमासादयन्ति । अस्फुटस्फुरितं काव्यतत्त्वमेतद्यथोदितम् । अशक्नुवद्भिर्व्याकर्तुं रीतयः सम्प्रवर्तिताः ॥ ४६ ॥ एतद्ध्वनिप्रवर्तनेन निर्णीतं काव्यतत्त्वमस्फुटस्फुरितं सदशक्नु- वद्भिः प्रतिपादयितुं वैदर्भी गौडी पाञ्चाली चेति रीतयः प्रवर्तिताः । रीतिलक्षणविधायिनां हि काव्यतत्त्वमेतदस्फुटतया मनाक्स्फुरितमासी- सत्काव्य को करने अथवा समझने के लिए अभियुक्त सज्जनों को इस प्रकार उक्त लक्षण वाली जो ध्वनि है उसे प्रयत्न करके विवेचन करना चाहिए ॥ ४५ ॥ उक्त स्वरूप ध्वनि के निरूपण में निपुण सत्कवि और सहृदय निश्चय ही काव्य के विषय में अत्यन्त प्रकर्ष पदवी को प्राप्त कर जाते हैं । यह अस्फुटस्फुरित काव्यतत्त्व जैसे कहा गया है उसे व्याकृत करने में असमर्थ हुए लोगों ने रीतियाँ प्रवर्तित की हैं ॥ ४६ ॥ इस ध्वनिप्रवर्तन से निर्णीत काव्यतत्त्व को अस्फुटस्फुरित की स्थिति में प्रतिपादन करने में असमर्थ होते हुए ( लोगों ने ) वैदर्भी, गौणी और पाञ्चाली इन रीतियों को प्रवर्तित किया है । रीति का लक्षण विधान करने वालों के यह काव्यतत्त्व लोचनम् निर्व्यूढमित्याशयेनाह — इत्युक्तेति । यः प्रयत्नतो विवेच्यः अस्माभिश्चोक्तलक्षणो ध्वनिरेतदेव काव्यतत्त्वं यथोदितेन प्रपञ्चनिरूपणादिना व्याकर्तुमशक्नुवद्भिर- लङ्कारैः रीतयः प्रवर्तिता इत्युत्तरकारिकया सम्बन्धः । अन्ये तु यच्छब्दस्थाने 'अयं' इति पठन्ति । प्रकर्षपदवीमिति । निर्माणे बोधे चेति भावः । व्याकर्तुम- शब्दमात्र नहीं, अपितु निर्वाह किया गया है इस आशय से कहते हैं—सत्काव्य— । जो प्रयत्न से विवेचनीय और हमारे द्वारा उक्तस्वरूप ध्वनि है इसी काव्यतत्त्व को यथोदित प्रपञ्च निरूपण आदि द्वारा व्याख्या करने में असमर्थ अलङ्कारों ने ( ? ) ( आलङ्कारिकों ने ) रीतियों को चलाया है । अन्य लोग 'जो' के स्थान पर 'यह' पाठ करते हैं । प्रकर्षपदवी— । भाव यह कि निर्माण और बोध में । व्याख्या करने में