भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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५५२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः दिति लक्ष्यते तदत्र स्फुटतया सम्प्रदर्शितेनान्येन रीतिलक्षणेन न किञ्चित् । शब्दतत्त्वाश्रयाः काश्चिदर्थतत्त्वयुजोऽपराः । वृत्तयोऽपि प्रकाशन्ते ज्ञातेऽस्मिन् काव्यलक्षणे ॥ ४७ ॥ अस्मिन् व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावविवेचनमये काव्यलक्षणे ज्ञाते सति याः काश्चित्प्रसिद्धा उपनागरिकाद्याः शब्दतत्त्वाश्रया वृत्तयो याश्चार्थ- तत्त्वसम्बद्धाः कैशिक्यादयस्ताः सम्यग्रीतिपदवीमवतरन्ति । अन्यथा तु तासामदृष्टार्थानामिव वृत्तीनामश्रद्धेयत्वमेव स्यान्नानुभवसिद्धत्वम् । अस्फुटरूप से स्फुरित हो चुका था ऐसा प्रतीत होता है । तो यह स्पष्टरूप से प्रदर्शित अन्य रीति के लक्षण से कुछ नहीं । इस काव्यलक्षण के ज्ञात होने पर कुछ शब्दतत्त्व के आश्रित और दूसरी अर्थतत्त्व के साथ योग वाली वृत्तियाँ प्रकाशित होती हैं ॥ ४७ ॥ इस व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव के विवेचनमय काव्यलक्षण के ज्ञात होने पर जो कुछ प्रसिद्ध उपनागरिका आदि शब्दतत्त्व के आश्रित वृत्तियां हैं और जो अर्थतत्त्व से सम्बद्ध कैशिकी आदि हैं वे सम्यक् प्रकार से रीति की स्थिति में आ जाती हैं । अन्यथा अदृष्ट अर्थों के समान ही वृत्तियां अश्रद्धेय ही हो जायंगी अनुभवसिद्ध नहीं । इस लोचनम् शक्नुवद्भिरित्यत्र हेतुः—अस्फुटं कृत्वा स्फुरितमिति । लक्ष्यत इति । रीतिर्हि गुणेष्वेव पर्यवसिता । यदाह—विशेषो गुणात्मा गुणाश्च रसपर्यवसायिन एवेति ह्युक्तं प्राग्गुणनिरूपणे 'शृङ्गार एव मधुरः' इत्यत्रेति ॥ ४५-४६ ॥ प्रकाशन्त इति । अनुभवसिद्धतां काव्यजीवितत्वे प्रयान्तीत्यर्थः । रीतिपद- वीमिति । तद्वदेव रसपर्यवसायित्वात् । प्रतीतिपदवीमिति वा पाठः । नागरिकाया असमर्थ होते हुए यहाँ हेतु है—अस्फुट करके स्फुरित । प्रतीत होता है— । रीति गुणों में ही पर्यवसित है । क्योंकि कहते हैं—विशेष गुणरूप है, और गुणरस में पर्यवसायी ही होते हैं यह पहले गुण के निरूपण में कह चुके हैं 'शृङ्गार ही मधुर होता है' यहाँ ॥ ४५-४६ ॥ प्रकाशित होते हैं— । अर्थात् काव्य के जीवित रूप में अनुभवसिद्ध हैं । रीति की स्थिति में— । क्योंकि उसी ( रीति ) के समान ही रस में पर्यवसान प्राप्त करते हैं । अथवा प्रतीति की पदवी ( स्थिति ) यह पाठ है । नागरिका से 'उपमिता' यह