ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें: तृतीय उद्योतः ५५३ ध्वन्यालोकः एवं स्फुटतयैव लक्षणीयं स्वरूपमस्य ध्वनेः । यत्र शब्दानामर्थानां च केषाञ्चित्प्रतिपत्तृविशेषसंवेद्यं जात्यत्वमिव रत्नविशेषाणां चारुत्वमना- ख्येयमवभासते काव्ये तत्र ध्वनिव्यवहार इति यल्लक्षणं ध्वनेरुच्यते प्रकार स्फुटरूप से ही इस ध्वनि का स्वरूप समझ लेना चाहिये । जिसमें कुछ शब्दों और अर्थों का रत्नविशेषों के जात्यत्व की भांति विशेष प्रतिपत्ता (जानकार) द्वारा संवेद्य चारुत्व अनाख्येयरूप से प्रतीत होता है उस काव्य में ध्वनि का व्यवहार है' लोचनम् ह्युपमितेत्यनुप्रासवृत्तिः शृङ्गारादौ विश्राम्यति । परुषेति दीप्तेषु रौद्रादिषु । कोम- लेति हास्यादौ । तथा- 'वृत्तयः काव्यमातृकाः' इति यदुक्तं मुनिना तत्र रसो- चित एव चेष्टाविशेषो वृत्तिः । यदाह- 'कैशिकी श्लक्ष्णनेपथ्या शृंगाररससम्भवा' इत्यादि । इयता 'तस्याभावं जगदुरपरे' इत्यादावभावविकल्पेषु 'वृत्तयो रीतयश्च गताः श्रवणगोचरं, तदतिरिक्तः कोऽयं ध्वनिरि'ति । तत्र कथञ्चिदभ्युपगमः कृतः कथञ्चिच दूषणं दत्तमस्फुटस्फुरितमिति वचनेन । इदानीं 'वाचां स्थितमविषये' इति यदूचे तत्तु प्रथमोद्द्योते दूषितमपि दूषयति सर्वप्रपञ्चकथने हि असम्भा- व्यमेवानाख्येयत्वमित्यभिप्रायेण । अक्लिष्टत्व इति । श्रुतिकष्टाद्यभाव इत्यर्थः । अप्रयुक्तस्य प्रयोग इत्यपौनरुक्त्यम् । ताविति शब्दगतोऽर्थगतश्च । विवेकस्या- वसादो यत्र तस्य भावो निर्विवेकत्वम् । सामान्यस्पर्शी यो विकल्पस्ततो यः शब्दः दृष्टान्तेऽपि अनाख्येयत्वं नास्तीति दर्शयति - रत्नविशेषाणां चेति । ननु अनुप्रासवृत्ति शृङ्गार आदि में विश्रान्त होती है । 'परुषा' दीप्त रौद्र आदि में । कोमला हास्य आदि में । तथा - 'वृत्तियाँ काव्य की माताएं हैं' यह जो कि मुनि ने कहा है उसमें रसोचित ही चेष्टा विशेष वृत्ति है । क्योंकि कहते हैं- 'श्लक्ष्णनेपथ्यवाली कैशिकी शृङ्गाररस में सम्भव होती है' इत्यादि । 'कुछ लोगों ने उसका अभाव कहा है' इत्यादि अभावविकल्पों में 'वृत्तियाँ और रीतियाँ श्रवणगोचर हुई हैं उससे अतिरिक्त यह ध्वनि कौन है ?' वहाँ कुछ स्वीकार किया है और 'अस्फुट करके स्फुरित' इस वचन से किसी प्रकार दोष दिया है । अब 'वाणी के अविषय में स्थित' जो कहा है वह प्रथम उद्योत में दूषित है तब भी दूषित करते हैं, सारे प्रपञ्च के कहे जाने पर अनाख्येयत्व असम्भाव्य ही है इस अभिप्राय से । अक्लिष्ट- । अर्थात् श्रुतिकष्ट आदि का अभाव होने पर । 'अप्रयुक्त का प्रयोग' यह पौनरुक्त्य नहीं है । वे दोनों- । शब्दगत और अर्थगत । विवेक का अभाव (अवसाद) है जहाँ उसका भाव निर्विवेकत्व । सामान्य का स्पर्श करने वाला जो विकल्प उससे जो शब्द । दृष्टान्त में भी अनाख्येयत्व नहीं है यह दिखाते हैं-और रत्नविशेषों का- । सब उसे नहीं जानेंगे यह आशङ्का करके