भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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५७४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः केनचित्तदयुक्तमिति नाभिधेयतामर्हति । यतः शब्दानां स्वरूपाश्रय- स्तावदक्लिष्टत्वे सत्यप्रयुक्तप्रयोगः । वाचकाश्रयस्तु प्रसादो व्यञ्जकत्वं चेति विशेषः । अर्थानां च स्फुटत्वेनावभासनं व्यङ्ग्यपरत्वं व्यङ्ग्यांश- विशिष्टत्वं चेति विशेषः । तौ च विशेषौ व्याख्यातुं शक्येते व्याख्यातौ च बहुप्रकारम् । तद्व्यतिरिक्तानाख्येयविशेषसम्भावना तु विवेकावसादभावमूलैव । यस्मा- दनाख्येयत्वं सर्वशब्दागोचरत्वेन न कस्यचित्सम्भवति । अन्ततोऽना- ख्येयशब्देन तस्याभिधानसम्भवात् । सामान्यसंस्पर्शिविकल्पशब्दा- गोचरत्वे सति, प्रकाशमानत्वं तु यदनाख्येयत्वमुच्यते क्वचित् तदपि काव्यविशेषाणां रत्नविशेषाणामिव न सम्भवति । तेषां लक्षणकारैर्व्याकृतस्वरूपत्वात् । रत्नविशेषाणां च सामान्यसम्भावनयैव मूल्यस्थितिपरिकल्पनादर्शनाच्च । उभयेषामपि तेषां प्रतिपत्तृविशेषसंवे- यह जो ध्वनि का लक्षण कोई कहता है वह ठीक नहीं, अतः कहा नहीं जा सकता । क्योंकि शब्दों का स्वरूप के आश्रित (विशेष) अक्लिष्ट होने पर अप्रयुक्त का प्रयोग और वाचक के आश्रित (विशेष) प्रसाद और व्यञ्जकत्व है । और अर्थों का विशेष स्फुटरूप से अवभासन, व्यङ्ग्यपरत्व और व्यङ्ग्य अंश से विशिष्टत्व है । वे दोनों विशेष व्याख्यात हो सकते हैं और बहुत प्रकार से व्याख्यात हुए हैं । उनसे व्यतिरिक्त अनाख्येय विशेष की सम्भावना का तो विवेक का अभाव ही कारण है । क्योंकि सभी शब्दों के अगोचर रूप से अनाख्येयत्व किसी का सम्भव नहीं है, अन्ततः अनाख्येय शब्द से उसका अभिधान सम्भव है । सामान्य का स्पर्श करनेवाला विकल्प शब्द का गोचर न होकर जो प्रकाशमान है वह अनाख्येय है जो कहीं पर यह कहा है वह भी रत्नविशेषों की भाँति काव्यविशेषों का सम्भव नहीं है । क्योंकि उनके रूप की लक्षणकारों ने व्याख्या की है । और रत्नविशेषों के सामान्य की सम्भावना से ही मूल्य की स्थिति की कल्पना देखी जाती है । उन दोनों का भी लोचनम् सर्वेण तन्न संवेद्यत इत्याशङ्क्याभ्युपगमेनैवोत्तरयति-उभयेषामिति । रत्नानां काव्यानां च । ननु नार्थं शब्दाः स्पृशन्त्यपीति, अनिर्देश्यस्य वेदकमित्यादौ कथमनाख्ये- अभ्युगम से ही उत्तर देते हैं-उन दोनों का- । रत्नों का और काव्यों का । 'अर्थ को शब्द स्पर्श भी नहीं करते' 'अनिर्देश्य का ज्ञापक (वेदक)' इत्यादि में