ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
५५० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र ह्युपमारूपकाभ्यां शब्दशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य ध्वनेः संसृष्टत्वम् । एवं ध्वनेः प्रभेदाः प्रभेदभेदाश्च केन शक्यन्ते । संख्यातुं दिङ्मात्रं तेषामिदमुक्तमस्माभिः ॥ ४४ ॥ अनन्ता हि ध्वनेः प्रकाराः सहृदयानां व्युत्पत्तये तेषां दिङ्मात्रं कथितम् । यहाँ उपमा और रूपक के शब्दशक्त्युद्भव अनुरणन रूपव्यङ्ग्य ध्वनि की संसृष्टि है । इस प्रकार ध्वनि के प्रभेदों और प्रभेदों के भेदों की गणना कौन कर सकता है, उनका यह हमने दिङ्मात्र कहा है ॥ ४४ ॥ ध्वनि के अनन्त प्रकार हैं, सहृदयों की व्युत्पत्ति के लिये उन्हें दिङ्मात्र कहा है । लोचनम् तथाहि—व्याघ्रादेराकृतिगणत्वे पथिकसामाजिकेष्वित्युपमारूपकाभ्यां सन्दे- हास्पदत्वेन सङ्कीर्णाभ्यामभिनयप्रयोगे, अभिनवप्रयोगे च रसिकेष्विति प्रसारितगीतानामिति यः शब्दशक्त्युद्भवस्तस्य संसर्गमात्रमनुग्राह्य- त्वाभावात् । ‘पहिअसामाइएसु’ इत्यत्र तु पदे सङ्कीर्णाभ्यां ताभ्यामुप- मारूपकाभ्यां शब्दशक्तिमूलस्य ध्वनेः सङ्कीर्णत्वमेकव्यञ्जकानुप्रवेशादिति सङ्कीर्णालङ्कारसंसृष्टः । सङ्कीर्णालङ्कारसङ्कीर्णश्चेत्यपि भेदद्वयं मन्तव्यम् ॥ ४३ ॥ एतदुपसंहरति—एवमिति । स्पष्टम् ॥ ४४ ॥ अथ ‘सहृदयमनःप्रीतये’ इति यत्सूचितं तदिदानीं न शब्दमात्रमपि तु आकृतिगण होने पर ‘पथिक सामाजिक’ यहाँ सन्देहास्पद होने के कारण सङ्कीर्ण उपमा और रूपक से ‘अभिनव प्रयोगों में रसिक’ ‘प्रसारित गीतोंवाले’ इस प्रकार जो शब्द- शक्त्युद्भव है उसका संसर्ग मात्र है क्योंकि अनुग्राह्यता नहीं है । ‘पहिअसामाइएसु’ इस पद में सङ्कीर्ण उन उपमा और रूपक से शब्दशक्तिमूल ध्वनि का सङ्कर एकव्यञ्जका- नुप्रवेश से है इस प्रकार सङ्कीर्णालङ्कार संसृष्ट, और सङ्कीर्ण से सङ्कीर्ण है, इस प्रकार इन दोनों भेदों को भी मानना चाहिए ॥ ४३ ॥ इसका उपसंहार करते हैं—इस प्रकार— । स्पष्ट है ॥ ४४ ॥ ‘सहृदयों के मनं को प्रसन्न करने के लिए’ यह जो सूचित किया है वह अब
तृतीय उद्योतः ५५१ ध्वन्यालोकः इत्युक्तलक्षणो यो ध्वनिर्विवेच्यः प्रयत्नतः सद्भिः । सत्काव्यं कर्तुं वा ज्ञातुं वा सम्यगभियुक्तैः ॥ ४५ ॥ उक्तस्वरूपध्वनिनिरूपणनिपुणा हि सत्कवयः सहृदयाश्च नियतमेव काव्यविषये परां प्रकर्षपदवीमासादयन्ति । अस्फुटस्फुरितं काव्यतत्त्वमेतद्यथोदितम् । अशक्नुवद्भिर्व्याकर्तुं रीतयः सम्प्रवर्तिताः ॥ ४६ ॥ एतद्ध्वनिप्रवर्तनेन निर्णीतं काव्यतत्त्वमस्फुटस्फुरितं सदशक्नु- वद्भिः प्रतिपादयितुं वैदर्भी गौडी पाञ्चाली चेति रीतयः प्रवर्तिताः । रीतिलक्षणविधायिनां हि काव्यतत्त्वमेतदस्फुटतया मनाक्स्फुरितमासी- सत्काव्य को करने अथवा समझने के लिए अभियुक्त सज्जनों को इस प्रकार उक्त लक्षण वाली जो ध्वनि है उसे प्रयत्न करके विवेचन करना चाहिए ॥ ४५ ॥ उक्त स्वरूप ध्वनि के निरूपण में निपुण सत्कवि और सहृदय निश्चय ही काव्य के विषय में अत्यन्त प्रकर्ष पदवी को प्राप्त कर जाते हैं । यह अस्फुटस्फुरित काव्यतत्त्व जैसे कहा गया है उसे व्याकृत करने में असमर्थ हुए लोगों ने रीतियाँ प्रवर्तित की हैं ॥ ४६ ॥ इस ध्वनिप्रवर्तन से निर्णीत काव्यतत्त्व को अस्फुटस्फुरित की स्थिति में प्रतिपादन करने में असमर्थ होते हुए ( लोगों ने ) वैदर्भी, गौणी और पाञ्चाली इन रीतियों को प्रवर्तित किया है । रीति का लक्षण विधान करने वालों के यह काव्यतत्त्व लोचनम् निर्व्यूढमित्याशयेनाह — इत्युक्तेति । यः प्रयत्नतो विवेच्यः अस्माभिश्चोक्तलक्षणो ध्वनिरेतदेव काव्यतत्त्वं यथोदितेन प्रपञ्चनिरूपणादिना व्याकर्तुमशक्नुवद्भिर- लङ्कारैः रीतयः प्रवर्तिता इत्युत्तरकारिकया सम्बन्धः । अन्ये तु यच्छब्दस्थाने 'अयं' इति पठन्ति । प्रकर्षपदवीमिति । निर्माणे बोधे चेति भावः । व्याकर्तुम- शब्दमात्र नहीं, अपितु निर्वाह किया गया है इस आशय से कहते हैं—सत्काव्य— । जो प्रयत्न से विवेचनीय और हमारे द्वारा उक्तस्वरूप ध्वनि है इसी काव्यतत्त्व को यथोदित प्रपञ्च निरूपण आदि द्वारा व्याख्या करने में असमर्थ अलङ्कारों ने ( ? ) ( आलङ्कारिकों ने ) रीतियों को चलाया है । अन्य लोग 'जो' के स्थान पर 'यह' पाठ करते हैं । प्रकर्षपदवी— । भाव यह कि निर्माण और बोध में । व्याख्या करने में
५५२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः दिति लक्ष्यते तदत्र स्फुटतया सम्प्रदर्शितेनान्येन रीतिलक्षणेन न किञ्चित् । शब्दतत्त्वाश्रयाः काश्चिदर्थतत्त्वयुजोऽपराः । वृत्तयोऽपि प्रकाशन्ते ज्ञातेऽस्मिन् काव्यलक्षणे ॥ ४७ ॥ अस्मिन् व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावविवेचनमये काव्यलक्षणे ज्ञाते सति याः काश्चित्प्रसिद्धा उपनागरिकाद्याः शब्दतत्त्वाश्रया वृत्तयो याश्चार्थ- तत्त्वसम्बद्धाः कैशिक्यादयस्ताः सम्यग्रीतिपदवीमवतरन्ति । अन्यथा तु तासामदृष्टार्थानामिव वृत्तीनामश्रद्धेयत्वमेव स्यान्नानुभवसिद्धत्वम् । अस्फुटरूप से स्फुरित हो चुका था ऐसा प्रतीत होता है । तो यह स्पष्टरूप से प्रदर्शित अन्य रीति के लक्षण से कुछ नहीं । इस काव्यलक्षण के ज्ञात होने पर कुछ शब्दतत्त्व के आश्रित और दूसरी अर्थतत्त्व के साथ योग वाली वृत्तियाँ प्रकाशित होती हैं ॥ ४७ ॥ इस व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव के विवेचनमय काव्यलक्षण के ज्ञात होने पर जो कुछ प्रसिद्ध उपनागरिका आदि शब्दतत्त्व के आश्रित वृत्तियां हैं और जो अर्थतत्त्व से सम्बद्ध कैशिकी आदि हैं वे सम्यक् प्रकार से रीति की स्थिति में आ जाती हैं । अन्यथा अदृष्ट अर्थों के समान ही वृत्तियां अश्रद्धेय ही हो जायंगी अनुभवसिद्ध नहीं । इस लोचनम् शक्नुवद्भिरित्यत्र हेतुः—अस्फुटं कृत्वा स्फुरितमिति । लक्ष्यत इति । रीतिर्हि गुणेष्वेव पर्यवसिता । यदाह—विशेषो गुणात्मा गुणाश्च रसपर्यवसायिन एवेति ह्युक्तं प्राग्गुणनिरूपणे 'शृङ्गार एव मधुरः' इत्यत्रेति ॥ ४५-४६ ॥ प्रकाशन्त इति । अनुभवसिद्धतां काव्यजीवितत्वे प्रयान्तीत्यर्थः । रीतिपद- वीमिति । तद्वदेव रसपर्यवसायित्वात् । प्रतीतिपदवीमिति वा पाठः । नागरिकाया असमर्थ होते हुए यहाँ हेतु है—अस्फुट करके स्फुरित । प्रतीत होता है— । रीति गुणों में ही पर्यवसित है । क्योंकि कहते हैं—विशेष गुणरूप है, और गुणरस में पर्यवसायी ही होते हैं यह पहले गुण के निरूपण में कह चुके हैं 'शृङ्गार ही मधुर होता है' यहाँ ॥ ४५-४६ ॥ प्रकाशित होते हैं— । अर्थात् काव्य के जीवित रूप में अनुभवसिद्ध हैं । रीति की स्थिति में— । क्योंकि उसी ( रीति ) के समान ही रस में पर्यवसान प्राप्त करते हैं । अथवा प्रतीति की पदवी ( स्थिति ) यह पाठ है । नागरिका से 'उपमिता' यह
: तृतीय उद्योतः ५५३ ध्वन्यालोकः एवं स्फुटतयैव लक्षणीयं स्वरूपमस्य ध्वनेः । यत्र शब्दानामर्थानां च केषाञ्चित्प्रतिपत्तृविशेषसंवेद्यं जात्यत्वमिव रत्नविशेषाणां चारुत्वमना- ख्येयमवभासते काव्ये तत्र ध्वनिव्यवहार इति यल्लक्षणं ध्वनेरुच्यते प्रकार स्फुटरूप से ही इस ध्वनि का स्वरूप समझ लेना चाहिये । जिसमें कुछ शब्दों और अर्थों का रत्नविशेषों के जात्यत्व की भांति विशेष प्रतिपत्ता (जानकार) द्वारा संवेद्य चारुत्व अनाख्येयरूप से प्रतीत होता है उस काव्य में ध्वनि का व्यवहार है' लोचनम् ह्युपमितेत्यनुप्रासवृत्तिः शृङ्गारादौ विश्राम्यति । परुषेति दीप्तेषु रौद्रादिषु । कोम- लेति हास्यादौ । तथा- 'वृत्तयः काव्यमातृकाः' इति यदुक्तं मुनिना तत्र रसो- चित एव चेष्टाविशेषो वृत्तिः । यदाह- 'कैशिकी श्लक्ष्णनेपथ्या शृंगाररससम्भवा' इत्यादि । इयता 'तस्याभावं जगदुरपरे' इत्यादावभावविकल्पेषु 'वृत्तयो रीतयश्च गताः श्रवणगोचरं, तदतिरिक्तः कोऽयं ध्वनिरि'ति । तत्र कथञ्चिदभ्युपगमः कृतः कथञ्चिच दूषणं दत्तमस्फुटस्फुरितमिति वचनेन । इदानीं 'वाचां स्थितमविषये' इति यदूचे तत्तु प्रथमोद्द्योते दूषितमपि दूषयति सर्वप्रपञ्चकथने हि असम्भा- व्यमेवानाख्येयत्वमित्यभिप्रायेण । अक्लिष्टत्व इति । श्रुतिकष्टाद्यभाव इत्यर्थः । अप्रयुक्तस्य प्रयोग इत्यपौनरुक्त्यम् । ताविति शब्दगतोऽर्थगतश्च । विवेकस्या- वसादो यत्र तस्य भावो निर्विवेकत्वम् । सामान्यस्पर्शी यो विकल्पस्ततो यः शब्दः दृष्टान्तेऽपि अनाख्येयत्वं नास्तीति दर्शयति - रत्नविशेषाणां चेति । ननु अनुप्रासवृत्ति शृङ्गार आदि में विश्रान्त होती है । 'परुषा' दीप्त रौद्र आदि में । कोमला हास्य आदि में । तथा - 'वृत्तियाँ काव्य की माताएं हैं' यह जो कि मुनि ने कहा है उसमें रसोचित ही चेष्टा विशेष वृत्ति है । क्योंकि कहते हैं- 'श्लक्ष्णनेपथ्यवाली कैशिकी शृङ्गाररस में सम्भव होती है' इत्यादि । 'कुछ लोगों ने उसका अभाव कहा है' इत्यादि अभावविकल्पों में 'वृत्तियाँ और रीतियाँ श्रवणगोचर हुई हैं उससे अतिरिक्त यह ध्वनि कौन है ?' वहाँ कुछ स्वीकार किया है और 'अस्फुट करके स्फुरित' इस वचन से किसी प्रकार दोष दिया है । अब 'वाणी के अविषय में स्थित' जो कहा है वह प्रथम उद्योत में दूषित है तब भी दूषित करते हैं, सारे प्रपञ्च के कहे जाने पर अनाख्येयत्व असम्भाव्य ही है इस अभिप्राय से । अक्लिष्ट- । अर्थात् श्रुतिकष्ट आदि का अभाव होने पर । 'अप्रयुक्त का प्रयोग' यह पौनरुक्त्य नहीं है । वे दोनों- । शब्दगत और अर्थगत । विवेक का अभाव (अवसाद) है जहाँ उसका भाव निर्विवेकत्व । सामान्य का स्पर्श करने वाला जो विकल्प उससे जो शब्द । दृष्टान्त में भी अनाख्येयत्व नहीं है यह दिखाते हैं-और रत्नविशेषों का- । सब उसे नहीं जानेंगे यह आशङ्का करके
५७४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः केनचित्तदयुक्तमिति नाभिधेयतामर्हति । यतः शब्दानां स्वरूपाश्रय- स्तावदक्लिष्टत्वे सत्यप्रयुक्तप्रयोगः । वाचकाश्रयस्तु प्रसादो व्यञ्जकत्वं चेति विशेषः । अर्थानां च स्फुटत्वेनावभासनं व्यङ्ग्यपरत्वं व्यङ्ग्यांश- विशिष्टत्वं चेति विशेषः । तौ च विशेषौ व्याख्यातुं शक्येते व्याख्यातौ च बहुप्रकारम् । तद्व्यतिरिक्तानाख्येयविशेषसम्भावना तु विवेकावसादभावमूलैव । यस्मा- दनाख्येयत्वं सर्वशब्दागोचरत्वेन न कस्यचित्सम्भवति । अन्ततोऽना- ख्येयशब्देन तस्याभिधानसम्भवात् । सामान्यसंस्पर्शिविकल्पशब्दा- गोचरत्वे सति, प्रकाशमानत्वं तु यदनाख्येयत्वमुच्यते क्वचित् तदपि काव्यविशेषाणां रत्नविशेषाणामिव न सम्भवति । तेषां लक्षणकारैर्व्याकृतस्वरूपत्वात् । रत्नविशेषाणां च सामान्यसम्भावनयैव मूल्यस्थितिपरिकल्पनादर्शनाच्च । उभयेषामपि तेषां प्रतिपत्तृविशेषसंवे- यह जो ध्वनि का लक्षण कोई कहता है वह ठीक नहीं, अतः कहा नहीं जा सकता । क्योंकि शब्दों का स्वरूप के आश्रित (विशेष) अक्लिष्ट होने पर अप्रयुक्त का प्रयोग और वाचक के आश्रित (विशेष) प्रसाद और व्यञ्जकत्व है । और अर्थों का विशेष स्फुटरूप से अवभासन, व्यङ्ग्यपरत्व और व्यङ्ग्य अंश से विशिष्टत्व है । वे दोनों विशेष व्याख्यात हो सकते हैं और बहुत प्रकार से व्याख्यात हुए हैं । उनसे व्यतिरिक्त अनाख्येय विशेष की सम्भावना का तो विवेक का अभाव ही कारण है । क्योंकि सभी शब्दों के अगोचर रूप से अनाख्येयत्व किसी का सम्भव नहीं है, अन्ततः अनाख्येय शब्द से उसका अभिधान सम्भव है । सामान्य का स्पर्श करनेवाला विकल्प शब्द का गोचर न होकर जो प्रकाशमान है वह अनाख्येय है जो कहीं पर यह कहा है वह भी रत्नविशेषों की भाँति काव्यविशेषों का सम्भव नहीं है । क्योंकि उनके रूप की लक्षणकारों ने व्याख्या की है । और रत्नविशेषों के सामान्य की सम्भावना से ही मूल्य की स्थिति की कल्पना देखी जाती है । उन दोनों का भी लोचनम् सर्वेण तन्न संवेद्यत इत्याशङ्क्याभ्युपगमेनैवोत्तरयति-उभयेषामिति । रत्नानां काव्यानां च । ननु नार्थं शब्दाः स्पृशन्त्यपीति, अनिर्देश्यस्य वेदकमित्यादौ कथमनाख्ये- अभ्युगम से ही उत्तर देते हैं-उन दोनों का- । रत्नों का और काव्यों का । 'अर्थ को शब्द स्पर्श भी नहीं करते' 'अनिर्देश्य का ज्ञापक (वेदक)' इत्यादि में
तृतीय उद्योतः ५५५ ध्वन्यालोकः द्यत्वमस्त्येव । वैकटिका एव हि रत्नतत्त्वविदः, सहृदया एव हि काव्यानां रसज्ञा इति कस्यात्र विप्रतिपत्तिः । यच्चानिर्देश्यत्वं सर्वलक्षणविषयं बौद्धानां प्रसिद्धं तत्तन्मतपरीक्षायां ग्रन्थान्तरे निरूपयिष्यामः । इह तु ग्रन्थान्तरश्रवणलवप्रकाशनं सहृदय- वैमनस्यप्रदायीति न प्रक्रियते । बौद्धमतेन वा यथा प्रत्यक्षादिलक्षणं तथास्माकं ध्वनिलक्षणं भविष्यति । तस्माल्लक्षणान्तरस्याघटनादशब्दा- र्थत्वाच्च तस्योक्तमेव ध्वनिलक्षणं साधीयः । तदिदमुक्तम्— प्रतिपत्ता विशेष द्वारा संवेद्यत्व है ही । वैकटिक लोग ही रत्न के तत्त्व के जानकार होते हैं और सहृदय लोग ही काव्यों के रसज्ञ होते हैं । यहाँ कौन सन्देह करता है ? जो कि बौद्धों का सभी लक्षणों के सम्बन्ध में 'अनिर्देश्यत्व' अलक्षणीयत्व प्रसिद्ध है उसे उनके मत की परीक्षा के अवसर में ग्रन्थान्तर में निरूपण करेंगे । यहाँ ग्रन्थान्तर के सुनने का लवमात्र भी प्रकाशन सहृदयों के वैमनस्य प्रदान करनेवाला होगा, इसलिए नहीं करते हैं । अथवा बौद्ध मत से जैसे प्रत्यक्ष आदि का लक्षण है उस प्रकार हमारा ध्वनि का लक्षण होगा । इसलिए दूसरे लक्षण के न घटने से और अशब्दार्थ ( ध्वनिशब्द का अर्थ न ) होने से पूर्वोक्त लक्षण ही ठीक है । तो यह कहा है— लोचनम् यत्वं वस्तूनामुक्तमिति चेदत्राह—यच्चिति । एवं हि सर्वभाववृत्तान्ततुल्य एव ध्वनिरिति ध्वनिस्वरूपमनाख्येयमित्यतिव्यापकं लक्षणं स्यादिति भावः । ग्रन्थान्तर इति । विनिश्चयटीकायां धर्मोत्तरीयां या विवृतिरमुना ग्रन्थकृता कृता तत्रैव तद्व्याख्यातम् । उक्तमिति । संग्रहार्थं मयैवेत्यर्थः । अनाख्येयांशस्या- भासो विद्यते यस्मिन् काव्ये तस्य भावस्तन्न लक्षणं ध्वनेरिति सम्बन्धः । अत्र वस्तुओं का अनाख्येयत्व कैसे कहा है ? ( 'यहाँ निर्णयसागरीय लोचन' में पाठ भ्रष्ट है, किन्तु बालप्रिया में इसका सम्भावित संशोधन किया गया है ) इस पर कहते हैं— जो कि— । भाव यह कि सभी भाव पदार्थ के वृत्तान्त के तुल्य ही ध्वनि है, इस लिए ध्वनि स्वरूप अनाख्येय है, इस प्रकार लक्षण अतिव्यापक होगा । ग्रन्थान्तर 'धर्मोत्तरी' नाम की 'विनिश्चय' ग्रन्थ की टीका में इस ग्रन्थकार ने जो विवृति की है वहीं पर उसे व्याख्यान किया है । कहा है— । अर्थात् मैं ने ही । अनाख्येय अंश का आभास है जिस काव्य में उसभाव, वह ध्वनि का लक्षण नहीं है यह सम्बन्ध है ।
५५६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अनाख्येयांशभासित्वं निर्वाच्यार्थतया ध्वनेः । न लक्षणं, लक्षणं तु साधीयोऽस्य यथोदितम् ॥ इति श्रीराजानकानन्दवर्धनाचार्यविरचिते ध्वन्यालोके तृतीय उद्योतः ॥ ध्वनि के निर्वाच्यार्थ होने के कारण अनाख्येय अंश का भासित होना लक्षण नहीं है, जैसा कि लक्षण कहा है ( वह ) ठीक है । श्रीराजानक आनन्दवर्धनाचार्य विरचित ध्वन्यालोक में तीसरा उद्योत समाप्त । लोचनम् हेतुः—निर्वाच्यार्थतयेति । निर्विभज्य वक्तुं शक्यत्वादित्यर्थः । अन्यस्तु ‘निर्वा- च्यार्थतया’ इत्यत्र निसोनञर्थत्वं परिकल्प्यानाख्येयांशभासित्वेऽयं हेतुरिति व्याचष्टे, तत्त क्लिष्टम् । हेतुश्च साध्याविशिष्ट इत्युक्तव्याख्यानमेवेति शिवम् । काव्यालोके प्रथां नीतान् ध्वनिभेदान् परामृशत् । इदानीं लोचनं लोकान् कृतार्थान्संविधास्यति ॥ आसूत्रितानां भेदानां स्फुटतापत्तिदायिनीम् । त्रिलोचनप्रियां वन्दे मध्यमां परमेश्वरीम् ॥ इति श्रीमहामाहेश्वराचार्यवर्याभिनवगुप्तोन्मीलिते सहृदयालोक- लोचने ध्वनिसङ्केते तृतीय उद्योतः ॥ यहाँ हेतु है—निर्वाच्यार्थ होने के कारण— । अर्थात् विभाग करके कहे जा सकने के कारण । किन्तु अन्य ने 'निर्वाच्यार्थतया' में 'निर्' को नञर्थ समझकर अनाख्येयांशभासी होने में यह हेतु है' यह व्याख्यान किया है, किन्तु वह क्लिष्ट है । और हेतु साध्य से विशिष्ट है यह व्याख्यान उक्त है । शिवम् । काव्यालोक में फैले हुए ध्वनिभेदों का परामर्श करता हुआ यह लोचन लोगों को कृतार्थ करेगा । आसूचित भेदों को स्फुटता प्राप्त कराने वाली त्रिलोचन (शिव) की प्रिया परमेश्वरी मध्यमा की वन्दना करता हूँ । श्री महामाहेश्वराचार्यवर्य अभिनवगुप्त द्वारा उन्मीलित ध्वनिसङ्केत सहृदयालोकलोचन में तृतीय उद्योत समाप्त हुआ ।
चतुर्थ उद्योतः ध्वन्यालोकः एवं ध्वनिं सप्रपञ्चं विप्रतिपत्तिनिरासार्थं व्युत्पाद्य तद्व्युत्पादने प्रयोजनान्तरमुच्यते— ध्वनेर्यः सगुणीभूतव्यङ्ग्यस्याध्वा प्रदर्शितः । अनेनानन्त्यमायाति कवीनां प्रतिभागुणः ॥ १ ॥ य एष ध्वनेर्गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य च मार्गः प्रकाशितस्तस्य फला- न्तरं कविप्रतिभानन्त्यम् । इस प्रकार ध्वनि का प्रपञ्च विस्तार के साथ विरुद्ध शङ्का के निवारण के लिए व्युत्पादन करके उस ( ध्वनि ) के व्युत्पादन में दूसरा प्रयोजन कहते हैं— गुणीभूतव्यङ्ग्य के सहित ध्वनि का जो मार्ग दिखाया जा चुका है, इससे कवियों का प्रतिभागुण अनन्त ( अनेकानेक ) हो जाता है ॥ १ ॥ जो यह ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य का मार्ग ( पूर्व उद्योतों में ) प्रकाशित किया है उसका दूसरा फल ( प्रयोजन ) कवि की प्रतिभा का आनन्त्य है । लोचनम् कृत्यपञ्चकनिर्वाह्ययोगेऽपि परमेश्वरः । नान्योकरणापेक्षो यया तां नौमि शाङ्करीम् ॥ उद्योतान्तरसङ्गतिं विरचयितुं वृत्तिकार आह—एवमिति । प्रयोजनान्तरमिति । यद्यपि 'सहृदयमनःप्रीतये' इत्यनेन प्रयोजनं प्रागेवोक्तं, तृतीयोद्योतावधौ च सत्काव्यं कर्तुं वा ज्ञातुं वेति तदेवेषत्स्फुटीकृतं, तथापि स्फुटतरीकर्तुमिदानीं यत्नः । यतस्सुस्पष्टरूपत्वेन विज्ञायते, अतोऽस्पष्टनिरूपितात्स्पष्टनिरूपणमन्यथैव प्रतिभातीति प्रयोजनान्तरमित्युक्तम् । अथवा पूर्वोक्तयोः प्रयोजनयोरन्तरं विशे- मैं उस शाङ्करी ( शङ्कर की माया शक्ति ) को नमन करता हूँ जिसके कारण परमेश्वर ( सृष्टि आदि ) पाँच प्रकार के कार्यों को पूरा करने में भी दूसरे उपकरण की अपेक्षा नहीं रखते । अन्य उद्योत की सङ्गति बैठाने के लिए वृत्तिकार कहते हैं—इस प्रकार—। दूसरा प्रयोजन—। यद्यपि 'सहृदयमनःप्रीतये' इसके द्वारा प्रयोजन पहले ही कहा जा चुका है, और तृतीय उद्योत के अन्त में 'सत्काव्यं कर्तुं ज्ञातुं वा' से उसे ही कुछ स्फुट किया है तथापि और अधिक स्फुट ( स्फुटतर ) करने के लिए अब यत्न है । जिससे सुस्पष्ट रूप से जाना जाता है, अतः अस्पष्ट रूप से निरूपण किए गए (प्रयोजन से) स्पष्ट निरूपण अन्यथा ही मालूम पड़ता है, सो दूसरा प्रयोजन यह कहा । अथवा,
५५८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कथमिति चेत् — अतो ह्यन्यतमेनापि प्रकारेण विभूषिता । वाणी नवत्वमायाति पूर्वार्थान्वयवत्यपि ॥ २ ॥ अतो ध्वनेरुक्तप्रभेदमध्यादन्यतमेनापि प्रकारेण विभूषिता सती वह कैसे ? तो— इसमें से एक भी प्रकार से विभूषित वाणी प्राचीन अर्थ के साथ सम्बन्ध रखती हुई भी नवत्व प्राप्त कर लेती है ॥ २ ॥ इस ध्वनि के कहे गए प्रभेदों के बीच से एक भी प्रकार से विभूषित होती हुई लोचनम् षोऽभिधीयते; केन विशेषेण सत्काव्यकरणमस्य प्रयोजनं, केन च सत्काव्य- बोध इति विशेषो निरूप्यते । तत्र सत्काव्यकरणे कथमस्य व्यापार इति पूर्वं वक्तव्यं निष्पादितस्य ज्ञेयत्वादिति तदुच्यते—ध्वनेर्य इति ॥ १ ॥ ननु ध्वनिभेदात् प्रतिभानामानन्त्यमिति व्यधिकरणमेतदित्यभिप्रायेणा- शङ्कते—कथमितीति । अत्रोत्तरम्—अतो हीति । आसन्तातावद् बहवः प्रकाराः, एकेनाप्येवं भव- पहले कहे गए दोनों प्रयोजनों का अन्तर अर्थात् विशेष कहते हैं—किस विशेष से सत्काव्य का निर्माण इसका प्रयोजन है और किससे सत्काव्य बोध ( इसका प्रयोजन है ! ) इस प्रकार विशेष का निरूपण करते हैं। वहाँ सत्काव्य के निर्माण में कैसे इसका ( व्युत्पादन का ) व्यापार है ? यह पहले वक्तव्य है क्योंकि जो निष्पादित ( व्युत्पादित ) होता है वही ज्ञेय या ज्ञान का विषय होता है, अतः उसे कहते हैं—जो यह— । ध्वनि के भेद से प्रतिभा का आनन्त्य, यह व्यधिकरण¹ है, इस अभिप्राय से आशङ्का करते हैं—कैसे— । यहाँ उत्तर है—इसमें से— । हों बहुत से प्रकार ( प्रभेद ), एक ( प्रकार या १. प्रस्तुत शङ्का का तात्पर्य है कि ध्वनि का भेद काव्यनिष्ठ है और प्रतिभा का आनन्त्य कविनिष्ठ है, और जैसा कि कार्यकारणभाव का नियम है कि वह समानाधिकरण में होता है, यहाँ दोनों का अधिकरण समान नहीं है, ऐसी स्थिति में ध्वनि के भेद और प्रतिभा के आनन्त्य का कार्य-करण-भाव कैसे बन सकता ? इसका समाधान यह है कि ध्वनि के भेद का ज्ञान प्रतिभा के आनन्त्य का कारण है, यह आचार्य का वक्तव्य है। इसी बात को दूसरे प्रकार से द्वितीय कारिका में कहा गया है। कवि ध्वनि के भेदों का ज्ञान करके अनन्त प्राचीन कवियों के वर्णित भी विषय के वर्णन में प्रतिभान प्राप्त करके अपनी वाणी में नवत्व उत्पन्न कर लेता है। ध्वनि के ज्ञान का फल प्रतिभा का आनन्त्य है तो प्रतिभा के आनन्त्य का फल वाणी का नवत्व है।
चतुर्थ उद्योतः ५५९ ध्वन्यालोकः वाणी पुरातनकविनिबद्धार्थसंस्पर्शवत्यपि नवत्वमायाति । तथाह्यविव- क्षितवाच्यस्य ध्वनेः प्रकारद्वयसमाश्रयणेन नवत्वं पूर्वार्थानुगमेऽपि यथा— स्मितं किञ्चिन्मुग्धं तरलमधुरो दृष्टिविभवः वाणी पुराने जमाने के कवि द्वारा बांधे गए अर्थ का संस्पर्श रखती हुई भी नवत्व प्राप्त कर लेती है ( नई बन जाती है ) । जैसा कि अविवक्षित वाच्यध्वनि के दो प्रकारों के समाश्रयण से प्राचीन अर्थ का अनुगम ( सम्बन्ध ) होने पर भी नवत्व है, जैसे— 'कुछ स्मित मुग्ध ( बन जाता है ), आँखों का विभव ( ऐश्वर्य ) तरल एवं लोचनम् तीत्यपिशब्दार्थः । एतदुक्तं भवति—वर्णनीयवस्तुनिष्ठः प्रज्ञाविशेषः प्रतिभानं, तत्र वर्णनीयस्य पारिमित्यादाद्यकविनैव स्पृष्टत्वात् सर्वस्य तद्विषयं प्रतिभानं तज्जातीयमेव स्यात् । ततश्च काव्यमपि तज्जातीयमेवेति भ्रष्ट इदानीं कविप्र- योगः, उक्तवैचित्र्येण तु त एवार्था निरवधयो भवन्तीति तद्विषयाणां प्रतिभा- नामानानन्त्यमुपपन्नमिति । ननु प्रतिभानन्त्यस्य किं फलमिति निर्णेतुं वाणी नवत्वमायातीत्युक्तं, तेन वाणीनां काव्यवाक्यानां तावन्नवत्वमायाति । तच्च प्रतिभानन्त्ये सत्युपपद्यते, तच्चार्थानन्त्ये, तच्च ध्वनिप्रभेदादिति । तत्र प्रथममत्यन्ततिरस्कृतवाच्यान्वयमाह—स्मितमिति । मुग्धमधुरविभ- प्रभेद ) से भी इस प्रकार ( प्रतिभा का आनन्त्य ) हो जाता है, यह 'भी' ( 'अपि' ) शब्द का अर्थ है । बात यह हुई--वर्णनीय वस्तु में रहने वाला ( कवि का ) प्रज्ञा- विशेष प्रतिभान ( कहलाता है ), वहाँ वर्णनीय ( वस्तु ) के परिमित होने से पूर्व के कवि द्वारा ही स्पर्श कर लिए जाने के कारण सबका उस ( वर्णनीय वस्तु ) को विषय ( करने वाला ) प्रतिभान उसी जाति का ही होगा । और तब काव्य भी उसी जाति का ही ( हो जायगा, ऐसी स्थिति में ) इस समय कवि का प्रयोग बेकार ( भ्रष्ट ) है, किन्तु उक्त ( ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य के ) वैचित्र्य से वे ही वर्णनीय अर्थ अवधिरहित ( अनन्त ) हो जाते हैं, इस प्रकार तद्विषयक ( वर्णनीय अर्थविषयक ) प्रतिभानों का आनन्त्य बन जाता है । शङ्का - प्रतिभा के आनन्त्य का क्या फल है ? इसका निर्णय करने के लिए 'वाणी नवत्व को प्राप्त करती है' यह कहा । उससे वाणियों अर्थात् काव्य वाक्यों का नवत्व आ जाता है । वह ( वाणी का नवत्व ) प्रतिभा के आनन्त्य होने पर ही बनता है, और वह ( प्रतिभा का आनन्त्य ) अर्थ ( वर्णनीय वस्तु ) के आनन्त्य होने पर ( बनता है ) और वह ( अर्थ का आनन्त्य ) ध्वनि के प्रभेद से ( बनता है ) । वहाँ, पहले अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ( ध्वनि ) का अन्वय कहते हैं-कुछ
५६० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः परिस्पन्दो वाचामभिनवविलासोर्भिसरसः । गतानामारम्भः किसलयितलीलापरिमलः स्पृशन्त्यास्तारुण्यं किमिव हि न रम्यं मृगदृशः ॥ इत्यस्य, सविभ्रमस्मितोद्भेदा लोलाक्ष्यः प्रस्खलद्गिरः । मधुर (हो जाता है), बातों का लगातार (चल पड़ना) नये हाव-भाव की तरंगों से रसीला (बन जाता है), चालों शुरुआत किसलय वाली (किसलयित) लीला का पराग (बन जाता है), इस प्रकार तरुणाई को छूती (स्पर्श करती) हुई हिरन जैसी आँखों वाली का क्या नहीं चौचक (लगता है !) ।' इसका, विलास-सहित मुस्कानों के उद्भेद वाली, चंचल आँखों वाली, लड़खड़ाती लोचनम् वसरसकिसलयितपरिमलस्पर्शनान्यत्यन्ततिरस्कृतानि । तैरनाहृतसौन्दर्यस- र्वजनवल्लभ्याक्षीणप्रसरत्वसन्तापप्रशमनतर्पकत्वसौकुमार्यसार्वकालिकतत्संस्का- रानुवृत्तित्वयत्नाभिलषणीयसङ्गतत्वानि ध्वन्यमानानि यानि, तैः स्मितादेः प्रसिद्धस्यार्थस्य स्थविरवेधीविहितधर्मव्यतिरेकेण धर्मान्तरपात्रता यावत् क्रियते, तावत्तदपूर्वमेव सम्पद्यत इति सर्वत्रेति मन्तव्यम् । अस्येति अपूर्वत्व- मुस्कुराना— । मुग्ध, मधुर, विभव (ऐश्वर्य), रसीला (सरस), किसलयित, परिमल और स्पर्शन, ये अत्यन्ततिरस्कृत (पूर्ण रूप से छोड़ दिए गए) हैं । उनसे, (क्रमशः) अनाहृत (न-आहृत अर्थात् अकृत्रिम, स्वाभाविक) सौन्दर्य, सब लोगों का प्रिय होना प्रसार या प्रभाव का क्षीण न होना, मन की आग ठंडी करना, तृप्त करना, मुलायमी, (लीला) के संस्कार को सब काल में (हमेशा) अनुवर्तन, यत्नपूर्वक अभिलषणीय (कमनीय-चाहने लायक) के साथ सङ्गत होना, जो ध्वनित हो रहे हैं, उन (ध्वन्यमान अर्थों) से स्मित आदि प्रसिद्ध अर्थ का बूढ़े ब्रह्मा (द्वारा) विहित धर्म के व्यतिरेक (त्याग) से (अकृत्रिम सौन्दर्य आदि) दूसरे धर्मों की पात्रता जब कर देते हैं तब वह (स्मित आदि) अपूर्व (नया) ही बन जाता १ है, यह सर्वत्र मानना चाहिए । इसका—'अपूर्वत्व १. प्रस्तुत पद्य में कवि ने स्थित आदि के प्रसिद्ध अर्थ को उनके प्राकृतिक धर्मों के स्थान पर अपनी ओर से धर्मांतर का आधान जो किया है उससे उनसे वे अपूर्व जैसे हो गए हैं । जैसा कि स्मित को मुग्ध कह कर स्वाभाविक सौन्दर्य को, 'मधुर' शब्द से दृष्टि की सर्वजनप्रियता एवं अक्षोणप्रभावत्व आदि को व्यञ्जित किया है। इस प्रकार व्यञ्जनाओं के कारण प्रत्येक वस्तु में अपूर्वता या नवीनता का अनुभव होता है।
चतुर्थ उद्योतः ५६१ ध्वन्यालोकः नितम्बालसगामिन्यः कामिन्यः कस्य न प्रियाः ॥ इत्येवमादिषु श्लोकेषु सत्स्वपि तिरस्कृतवाच्यध्वनिसमाश्रयेणा- पूर्वत्वमेव प्रतिभासते । तथा— यः प्रथमः प्रथमः स तु तथाहि हतहस्तिबहुलपललाशी । श्वापदगणेषु सिंहः सिंहः केनाधरीक्रियते ॥ इत्यस्य, स्वतेजःक्रीतमहिमा केनान्येनातिशय्यते । महद्भिरपि मातङ्गैः सिंहः किमभिभूयते ॥ आवाज वाली, नितम्ब ( के भार से ) अलसा कर चलने वाली कामिनियां किसे प्रिय नहीं हैं ? इत्यादि श्लोकों के ( पहले से ) होने पर भी तिरस्कृत वाच्यध्वनि के समाश्रयण से अपूर्वत्व ( नवत्व ) ही प्रतिभासित होता है । इसी प्रकार— जो पहला है वह तो पहला है, जैसा कि मारे गए हाथी के पर्याप्त मांस को खाने वाला, जंगली जानवरों में सिंह किससे नीचा किया जाता है ? इसका, अपने पराक्रम से खरीदा हुआ बड़प्पन किस दूसरे द्वारा दबाया जाता है ? बड़े भी हाथियों से सिंह क्या अभिभूत होता है ? लोचनम् मेव भासत इति दूरेण सम्बन्धः । सर्वत्रैवास्य नवत्वमिति सङ्गतिः । द्वितीयः प्रथमशब्दोऽर्थान्तरेऽनपाकरणीयप्रधानत्वासाधारणत्वादिव्यङ्ग्यधर्मा- न्तरे संक्रान्तं स्वार्थं व्यनक्ति । एवं सिंहशब्दोऽपि वीरत्वानपेक्षत्वविस्मयनी- यत्वादौ व्यंग्यधर्मान्तरे सङ्क्रान्तं स्वार्थं ध्वनति । ( नवत्व ) ही भासित होता है' यह दूसरे से सम्बन्ध ( अन्वय ) है । सब जगह ही इसका नवत्व ( अपूर्वत्व ) है, यह सङ्गति है । दूसरा 'पहला' शब्द ( अन्वित न होने के कारण ) दूसरे अर्थ में 'जिसकी प्रधानता निराकरण के योग्य नहीं है ( अनपाकर- णीय प्रधानत्व )' ( और ) असाधारणत्व आदि रूप व्यङ्ग्य धर्मान्तर में सङ्क्रान्त अपने अर्थ ( स्वार्थ ) को व्यंजित करता है । इसी प्रकार—'सिंह' शब्द भी वीरत्व, अनपेक्षत्व ( दूसरे की अपेक्षा न करना ), विस्मयनीयत्व आदि व्यङ्ग्य धर्मान्तर में सङ्क्रान्त अपने अर्थ ( स्वार्थ ) को ध्वनित करता है । ३६ ध्व०
५६२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इत्येवमादिषु श्लोकेषु सत्स्वप्यर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यध्वनिसमाश्र- येण नवत्वम्। विवक्षितान्यपरवाच्यस्याप्युक्तप्रकारसमाश्रयेण नवत्वं यथा— निद्राकैतविनः प्रियस्य वदने विन्यस्य वक्त्रं वधू- र्बोधत्रासनिरुद्धचुम्बनरसाप्याभोगलोलं स्थिता । वैलक्ष्याद्विमुखीभवेदिति पुनस्तस्याप्यनारम्भिणः साकाङ्क्षप्रतिपत्ति नाम हृदयं यातं तु पारं रतेः ॥ इत्यादि श्लोकों के होने पर भी ( पूर्वोक्त श्लोक में ) अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य ध्वनि के समाश्रयण से नवत्व है। जैसे— नींद की ढोंग करने वाले प्रिय के मुख पर ( अपना ) मुख रखकर नई-नौहर वधू ( उसके ) जग जाने के डर से चुम्बन की इच्छा रोक कर भी पूरी तरह देखने के कारण चंचल हो बैठी । लजा जाने से विमुख हो जायगी इससे फिर ( अपनी ओर से ) आरम्भ न करने वाले उस प्रिय का भी हृदय साकांक्ष की स्थिति में पहुँच कर परम आनन्द ( रति ) की सीमा तक चला गया । लोचनम् एवं प्रथमस्य द्वौ भेदावुदाहृत्य द्वितीयस्याप्युदाहर्तुमासूत्रयति—विवक्षि- तेति । निद्रायां कैतवी कृतकसुप्त इत्यर्थः । वदने विन्यस्य वक्त्रमिति । वदनस्पर्श- जमेव तावद्दिव्यं सुखं त्यक्तुन्न पारयतीति । अतएव प्रियस्येति । वधूः नवोढा । बोधत्रासेन प्रियतमप्रबोधभयेन निरुद्धो हठात् प्रवर्तमानः प्रवर्त्तमानोऽपि कथ- ञ्चित्कथञ्चित् क्षणमात्रन्धृतश्चुम्बनाभिलाषो यया । अतएव आभोगेन पुनः पुनर्निद्राविचारनिर्वर्णनया विलोलं कृत्वा स्थिता, न तु सर्वथैव चुम्बनान्निव- इस प्रकार प्रथम ( अविवक्षितवाच्य ध्वनि ) के दोनों भेदों को उदाहृत करके द्वितीय ( विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि ) के ( भेदों को ) भी उदाहृत करने के लिए निर्देश करते हैं—विवक्षितान्यपरवाच्य—। नींद में ढोंगी अर्थात् बनावटी सोया हुआ । मुख पर मुख को रख कर— । मुख का स्पर्श करने से उत्पन्न दिव्य सुख को ही छोड़ नहीं पाता । अतएव प्रिय का । नई-नौहर ( वधू ) तुरन्त की व्याही हुई । जग जाने के डर से, प्रियतम के जग जाने के डर से निरुद्ध, हठपूर्वक प्रवर्त्तमान—प्रवर्तमान भी किसी-किसी प्रकार क्षण भर रोक रखा है चुम्बन के अभिलाष को जिसने । अतएव पूरी तरह देखने के कारण ( आभोग से ) बार-बार नींद को विचार करके देखने से, चंचल हो गई, न कि सब प्रकार से चुम्बन से निवृत्त हो सकती है, यह अर्थ है। ऐसी
चतुर्थ उद्योतः ५६३ ध्वन्यालोकः इत्यादेः श्लोकस्य, शून्यं वासगृहं विलोक्य शयनादुत्थाय किञ्चिच्छनै- र्निद्राव्याजमुपागतस्य सुचिरं निर्वर्ण्य पत्युर्मुखम् । विश्रब्धं परिचुम्ब्य जातपुलकामालोक्य गण्डस्थलीं लज्जानम्रामुखी प्रियेण हसता बाला चिरं चुम्बिता ॥ इत्यादिषु श्लोकेषु सत्स्वपि नवत्वम् । यथा वा—'तरङ्गभ्रूभङ्गा' इत्यादिश्लोकस्य 'नानाभङ्गिभ्रमद्भूः' इत्यादिश्लोकापेक्षयान्यत्वम् ॥२॥ इत्यादि श्लोक का, सूने शयनकक्ष को देख, कुछ धीरे पलंग से उठ कर, नींद की ढोंग किए हुए पति के मुख को देर तक निहार कर, विश्वास के साथ जोर से चुम्बन कर, (तत्पश्चात्) उत्पन्न रोमाञ्च वाली ( पति की ) गण्डस्थली को देख कर लज्जा से झुके मुख वाली बाला हंसते हुए प्रिय द्वारा देर तक चुम्बित हुई । इत्यादि श्लोकों के होते हुए भी नवत्व है । अथवा, जैसे—'तरङ्गभ्रूभङ्गा०'— इत्यादि श्लोक का 'नानाभङ्गिभ्रमद्भू०'—इत्यादि श्लोक की अपेक्षा अन्यत्व ( नवत्व ) है । लोचनम् र्तितुं शक्नोतीत्यर्थः । एवंभूतैषा यदि मया परिचुम्ब्यते, तद्विलक्षा विमुखीभवे- दिति तस्यापि प्रियस्य परिचुम्बनविषये निरारम्भस्य । हृदयं साकांक्षप्रतिपत्ति नामेति । साकांक्षा साभिलाषा प्रतिपत्तिः स्थितिर्यस्य तादृशं रुहुरुहिकाकद- र्थितं न तु मनोरथसम्पत्तिचरितार्थं, किन्तु रतेः परस्परजीवितसर्वस्वाभिमान- रूपायाः परिनिर्वृतेः केन चिदप्यनुभवेनालब्धावगाहनायाः पारङ्गतमिति परि- पूर्णीभूत एव शृङ्गारः । द्वितीयश्लोके तु परिचुम्बनं सम्पन्नं लज्जा स्वशब्देनोक्ता । तेनापि सा परिचुम्बितेति यद्यपि पोषित एव शृङ्गारः, तथापि प्रथमश्लोके हुई यह यदि मेरे द्वारा चूमी जाती है लज्जा कर ( मुझसे ) विमुख हो जायगी, इस प्रकार वह प्रिय भी परिचुम्बन के विषय में आरम्भशून्य है । हृदय साकांक्ष की स्थिति वाला— । आकांक्षा, अभिलाष से सहित है प्रतिपत्ति अर्थात् स्थिति जिसकी, उस प्रकार का ( हृदय ) उत्सुकता से पीड़ित, न कि मनोरथ की सम्पत्ति से चरितार्थ; किन्तु रति के अर्थात् परस्पर जीवन के सर्वस्व होने के अभिमान रूप परम निर्वृत्ति ( आनन्द ) के, जिसका किसी के द्वारा भी, अनुभव से अवगाहन न हुआ, पार पहुँच गया, इस प्रकार शृङ्गार परिपूर्ण ही हो गया । परन्तु दूसरे श्लोक में परिचुम्बन कर लिया गया, लज्जा अपने ( लज्जा ) शब्द से कह दी गई है । 'उसके द्वारा वह परिचुम्बित हुई, इससे यद्यपि शृङ्गार पोषित ही हुआ तथापि पहले श्लोक में एक-दूसरे के
५६४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः युक्त्याऽनयानुसर्तव्यो रसादिर्बहुविस्तरः । मिथोऽप्यनन्यतां प्राप्तः काव्यमार्गो यदाश्रयात् ॥ ३ ॥ बहुविस्तारोऽयं रसभावतदाभासतत्प्रशमनलक्षणो मार्गो यथास्वं विभावानुभावप्रभेदकलनया यथोक्तं प्राक् । स सर्व एवानया युक्त्यानु- सर्तव्यः । यस्य रसादेराश्रयादयं काव्यमार्गः पुरातनैः कविभिः सहस्त्र- संख्यैरसंख्यैर्वा बहुप्रकारं क्षुण्णत्वान्मितोऽप्यनन्यतामेति । रसभावा- इस युक्ति से बहुत विस्तार वाले रस आदि को अनुसरण करना चाहिए, जिसके आश्रय ( आधार ) से थोड़ा भी काव्य का मार्ग अनन्तता को प्राप्त है ॥ ३ ॥ जैसा कि पहले कह चुके हैं, यह रस, भाव, भावाभास, भावप्रशम रूप मार्ग, विभाव, अनुभाव के प्रभेदों की गणना से बहुत विस्तृत हो जाता है, वह सभी इस युक्ति से अनुसरण करने योग्य है । जिस रसादि के आश्रय से यह काव्य-मार्ग पुराने हजारों अथवा असंख्य कवियों द्वारा बहुत प्रकार से अभ्यस्त होने के कारण थोड़ा भी अनन्त बन जाता है । रस, भाव आदि का प्रत्येक विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी का लोचनम् परस्पराभिलाषप्रसरनिरोधपरम्परापर्यवसानासम्भवेन या रतिरुक्ता, सोभयो- रप्येकस्वरूपचित्तवृत्त्यनुप्रवेशमाचक्षाणा रतिं सुतरां पोषयति ॥ २ ॥ एवं मौलं भेदचतुष्टयमुदाहृत्यालक्ष्यक्रमभेदेष्वतिदेशमुखेन सर्वोपभेदविषय- निर्देशं करोति—युक्त्यानयेति । अनुसर्तव्य इति । उदाहर्तव्य इत्यर्थः । यथो- क्तमिति । अभिलाष-वेग के रुकने के क्रम में पर्यवसान न होने से जो रति कही गई है वह दोनों ( प्रिय और प्रिया ) की एक स्वरूप वाली चित्तवृत्ति की स्थिति ( अनुप्रवेश ) को स्पष्ट कहती हुई रति को पूर्ण रूप से पुष्ट करती है१ ॥ २ ॥ इस प्रकार मूल के ( आदि के ) चार भेदों को उदाहृत करके अलक्ष्यक्रम ध्वनि के अतिदेश के प्रकार से समस्त उपभेदों के सम्बन्ध में निर्देश करते हैं—इस युक्ति से— । अनुसरण करना चाहिए— । अर्थात् उदाहृत कर लेना चाहिए । जैसा कि कहा है— । १. प्रथम 'निद्राकैतविनः०' और द्वितीय 'शून्यं वासगृहं०' इन दोनों की परिस्थितियां प्रायः समान ही हैं, किन्तु प्रथम श्लोक में नायक और नायिका दोनों अपने अभिलाष को किसी प्रकार रोक कर परस्पर जीवित सर्वस्व होने की भावना से समान चित्त वृत्ति का अनुभव कर रहे हैं, इस प्रकार यहां रति परिपोष प्राप्त करके यहाँ शृङ्गार की अवस्था तक पहुँच जाती है । द्वितीय श्लोक में यद्यपि शृङ्गार पोषित है तथापि लज्जा के स्वशब्द से उक्त हो जाने के कारण कुछ शिथिलता अवश्य आ गई है ।
चतुर्थ उद्योतः ५६५ ध्वन्यालोकः दीनां हि प्रत्येकं विभावानुभावव्यभिचारिसमाश्रयादपरिमितत्वम् । तेषां चैकैकप्रभेदापेक्षयापि तावज्जगद्वृत्तमुपनिबध्यमानं सुकविभिस्त- दिच्छावशादन्यथा स्थितमप्यन्यथैव विवर्तते । प्रतिपादितं चैतच्चित्र- विचारावसरे । गाथा चात्र कृतैव महाकविना— अतहट्ठिए वि तहसण्ठिए व्व हिअअम्मि जा णिवेसेइ । अत्थविसेसे सा जअइ विकडकइगोअरा वाणी ॥ [ अतथास्थितानपि तथासंस्थितानिव हृदये या निवेशयति । पूर्ण रूप से आश्रय लेने के कारण आनन्त्य है । और उनके एक-एक प्रभेद की अपेक्षा से भी संसार का व्यवहार उपनिबध्यमान होकर सुकवियों द्वारा उनकी इच्छावश दूसरे प्रकार से स्थित होकर भी दूसरे प्रकार का हो जाता है ( मालूम होने लगता है ) और इसे 'चित्र' ( काव्य ) के विचार के प्रसंग में प्रतिपादन किया है । और, महाकवि ने यह गाथा भी कही है— 'महाकवि की वह वाणी सब से बढ़ कर है, जो उस प्रकार ( रमणीय रूप में ) लोचनम् तस्याङ्गानां प्रभेदा ये प्रभेदाः स्वगताश्च ये । तेषामानान्यमन्योन्यसम्बन्धपरिकल्पना ॥ इत्यत्र । प्रतिपादितं चैतदिति । चशब्दोऽपिशब्दार्थे भिन्नक्रमः । एतदपि प्रतिपादितं 'भावानचेतनानपि चेतनवच्चेतनानचेतनवद्'त्यत्र । अतथास्थि- तानपि बहिस्तथासंस्थितानिवेति । इवशब्देन एकतत्र विश्रान्तियोगाभावादेव सुतरां विचित्ररूपानित्यर्थः । हृदय इति । प्रधानतमे समस्तभावकनर्कानकष- स्थान इत्यर्थः । निवेशयति यस्य यस्य हृदयमस्ति, तस्य तस्य अचलतया तत्र स्थापयतीत्यर्थः । अतएव ते प्रसिद्धार्थेभ्योऽन्य एवेत्यर्थविशेषास्सम्पद्यन्ते । उस ( ध्वनि ) के जो प्रभेद हैं और स्वगत जो प्रभेद हैं उनका आनन्त्य परस्पर सम्बन्ध की परिकल्पना है ॥ इसमें । और... प्रतिपादित किया है—। 'और' शब्द 'भी' शब्द के अर्थ में क्रम को भिन्न ( करके पठनीय है ) । इसे भी प्रतिपादन किया है—अचेतन भावों को भी चेतन की भाँति, चेतन ( भावों को ) अचेतन की भाँति—इस स्थल में । इस प्रकार नहीं स्थित हुए भी बाहर उस प्रकार पूर्ण स्थित जैसे— । 'जैसे' शब्द से एक स्थान पर विश्राम के न मिलने के कारण ही पूर्णरूपेण विचित्र रूप वाले--यह अर्थ है । हृदय में—। प्रधानतम अर्थात् सम्पूर्ण भाव ( वर्णनीय अर्थ ) रूपी सोने की कसौटी रूप (हृदय में) । निवेश कर देती है—अर्थात् जिस जिसका हृदय है, उस उसके अचल रूप से वहां स्थापित कर देती है । अतएव वे पदार्थ ( अर्थविशेष ) प्रसिद्ध अर्थों से
५६६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अर्थविशेषान् सा जयति विकटकविगोचरा वाणी ॥ इति छाया । ] तदित्थं रसभावाद्याश्रयेण काव्यार्थानामानन्त्यं सुप्रतिपादितम् । एतदेवोपपादयितुमुच्यते— न भी स्थित पदार्थों को हृदय में उस प्रकार ( रमणीय रूप में ) स्थित जैसे निवेश कर देती है।' तो इस प्रकार रस, भाव आदि के आश्रय से काव्यार्थों का आनन्त्य सुष्ठु प्रति- पादित हुआ। इसे ही उपपादन के लिए कहते हैं— लोचनम् हृदयनिविष्टा एव च तथा भवन्ति नान्यथेत्यर्थः । सा जयति परिच्छिन्नश- क्तिभ्यः प्रजापतिभ्योऽप्युत्कर्षेण वर्तते । तत्प्रसादादेव कविगोचरो वर्णनीयोऽर्थो विकटो निस्सीमा सम्पद्यते ॥ ३ ॥ प्रतिभानं वाणीनाञ्चानन्त्यं ध्वनिकृतमिति यदनुद्भिन्नमुक्तं, तदेव कारिकया भङ्ग्या निरूप्यत इत्याह—उपपादयितुमिति । उपपत्त्या निरूपयितुमित्यर्थः । यद्यप्यर्थानन्त्यमात्रे हेतुर्वृत्तिकारेणोक्तः, तथापि कारिकाकारेण नोक्त इति भावः । यदि वा उच्यते संग्रहश्लोकोऽयमिति भावः । अत एवास्य श्लोकस्य वृत्तिग्रन्थे व्याख्यानं न कृतम् । अन्य ( भिन्न ) ही हो जाते हैं। अर्थात् हृदय में निवेश पाकर ही उस प्रकार हो जाते हैं अन्यथा नहीं। सबसे बढ़ कर है—। सीमित ( परिच्छिन्न ) शक्ति वाले प्रजापतियों से भी बढ़ कर है। उसके प्रसाद से ही कवि की दृष्टि में आया हुआ वर्णनीय अर्थ विकट अर्थात् सीमारहित हो जाता है। प्रतिभाओं का और वाणियों का आनन्त्य ध्वनि द्वारा होता है, यह जो अस्पष्ट कहा है उसे ही कारिका द्वारा ढंग ( भङ्गी ) से निरूपित करते हैं, यह कहते हैं— उपपादन करने लिए—। अर्थात् उपपत्ति द्वारा निरूपण करने के लिए। भाव यह कि यद्यपि अर्थ के आनन्त्य में हेतु को वृत्तिकार ने कहा है तथापि कारिकाकार ने ( इसे ) नहीं कहा है। अथवा यदि कहते हैं तो सङ्ग्रह-श्लोक यह है, यह भाव है। अतएव इस श्लोक का वृत्तिग्रन्थ में व्याख्यान नहीं किया है।'
१ कारिकाओं में कारिकाकार ने ध्वनि के कारण प्रतिभा और कवि की वाणी के आनन्त्य
का निर्देश किया था, किन्तु अर्थ के आनन्त्य के सम्बन्ध में कारिकाकार का निर्देश नहीं है, इसे
वृत्तिकार ने ३।३ कारिका के व्याख्यान में कहा है। ऐसी स्थिति में, आगे वाली कारिका ३।४
जब अर्थ के आनन्त्य के सम्बन्ध का निर्देश करती है तो यह बात संगत प्रतीत नहीं होती। पीछे
की कारिकाओं में, जहाँ प्रतिभा और वाणी के आनन्त्य की प्रतिज्ञा की है वहीं अर्थ के आनन्त्य की
भी प्रतिज्ञा करनी चाहिए थी। अतएव लोचनकार ने अपना अन्तिम मत यह दिया कि दृष्टपूर्वा०
( ३।४ ) यह वृत्तिकार का 'संग्रहश्लोक' है, इस बात को उपपन्न करने के लिए लोचनकार का यह
चतुर्थ उद्योतः ५६७ ध्वन्यालोकः दृष्टपूर्वा अपि ह्यर्थाः काव्ये रसपरिग्रहात् । सर्वे नवा इवाभान्ति मधुमास इव द्रुमाः ॥ ४ ॥ तथा हि विवक्षितान्यपरवाच्यस्यैव शब्दशक्त्युद्भवानुरणन- रूपव्यङ्ग्यप्रकारसमाश्रयेण नवत्वम् । यथा—'धरणीधारणायाधुना त्वं शेषः' इत्यादेः । शेषो हिमगिरिस्त्वं च महान्तो गुरवः स्थिराः । यदलङ्घितमर्यादाश्चलन्तीं बिभ्रते भुवम् ॥ इत्यादिषु सत्स्वपि । तस्यैवार्थशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यसमाश्र- येण नवत्वम् । यथा—'एवम्वादिनि देवर्षौ' इत्यादि श्लोकस्य । पहले देखे हुए भी अर्थ काव्य में रस के परिग्रह से सब नवीन जैसे लगते हैं, वसन्त-मास में जैसे वृक्ष ॥ ४ ॥ जैसा कि विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का, शब्द की शक्ति से उत्पन्न हुए अनुर- णन रूप व्यङ्ग्य के समाश्रयण से नवत्व है, जैसे—'पृथ्वी के धारण के लिए इस समय तुम शेष हो' इत्यादि का, । 'शेष ( शेष नाग ), हिमालय और तुम ( तीनों ) महान् , भारी और स्थिर हो, जो कि नहीं लंघित है मर्यादा जिनकी ( ऐसे तीनों ) चलती हुई पृथ्वी को धारण करते हैं ।' इत्यादि ( श्लोकों के ) होने पर भी । उस ( विवक्षितान्यपरवाच्य ) का ही अर्थ-शक्ति से उत्पन्न अनुरणन रूप व्यङ्ग्य के समाश्रयण से नवत्व है, जैसे— 'देवर्षि के इस प्रकार कहने पर ।' इत्यादि का । लोचनम् दृष्टपूर्वा इति । बहिः प्रत्यक्षादिभिः प्रमाणैः प्राक्तनैश्च कविभिरित्युभयथा पहले से देखे गए—। बाहर प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से और प्राचीन कवियों द्वारा इस उभय प्रकार से ( अर्थ को ) ले जाना चाहिए । काव्य मधुमास के स्थान पर है, तर्क भी है कि इस श्लोक का वृत्तिग्रन्थ में व्याख्यान नहीं है। इस श्लोक को कारिका माना जाय या संग्रह श्लोक, इसका निर्णय जब प्रमाणभूत आचार्य लोचनकार अभिनवगुप्त 'संग्रह श्लोक' के पक्ष में दे रहे हैं तब भी ध्वन्यालोक के पूर्व के अनेक संस्करणों में इस श्लोक को कारिका के रूप में ही सम्पादनकर्ताओं ने छापा है ! ऐसा करने का तात्पर्य यही हो सकता है कि कारिका के रूप में यह श्लोक बहुत प्राचीन काल से. अभिनवगुप्त के युग से ही जब माना जाता है, तभी तो इसे 'संग्रह श्लोक' माना जाय यह अभिनवगुप्त का युक्तिसंगत पक्ष विचारणीय होगा, अन्यथा इसे 'संग्रहश्लोक' स्वीकार कर लेने पर 'लोचन' के वक्तव्य के निर्मूल हो जाने की स्थिति उत्पन्न होगी,
५६८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कृते वरकथालापे कुमार्यः पुलकोद्गमैः । सूचयन्ति स्पृहामन्तर्लज्जयावनताननाः ॥ इत्यादिषु सत्सु अर्थशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य कविप्रौढो- क्तिनिर्मितशरीरत्वेन नवत्वम् । यथा—'सज्जेइ सुरहिमासो' इत्यादेः । सुरभिसमये प्रवृत्ते सहसा प्रादुर्भवन्ति रमणीयाः । रागवतामुत्कलिकाः सहैव सहकारकलिकाभिः ॥ इत्यादिषु सत्स्वप्यपूर्वत्वमेव । 'वरके सम्बन्ध में बातचीत की जाने पर रोमाञ्च के उद्गमों द्वारा भीतर की लज्जा से झुके हुए मुखों वाली क्वारियां अभिलाष को सूचित करती हैं।' इत्यादि श्लोकों के होने पर (भी)। अर्थ शक्ति से उत्पन्न अनुरणन रूप व्यङ्ग्य का, कवि की प्रौढोक्ति से निष्पन्नशरीर होने के कारण नवत्व है, जैसे— 'वसन्तमास सजाता है।' इत्यादि का। वसन्तमास के प्रवृत्त होने पर रागियों (प्रणयिजनों) की उत्कलिकाएं उत्कण्ठाएं) आमों की कलिकाओं के साथ ही प्रादुर्भूत हो जाती हैं। इत्यादि श्लोकों के होने पर भी अपूर्वत्व ही है। लोचनम् नेयम् । काव्यं मधुमांसस्थानीयम्, स्पृहां लज्जामिति, रागवतामुत्कलिका इति च । शब्दस्पृष्टेऽर्थे का हृद्यता । एतानि चोदाहरणानि वितत्य पूर्वमेव व्याख्यातानीति किं पुनरुक्त्या सत्यपि प्राक्तनकविस्पृष्टत्वे नूतनत्वं भवत्येवैतत्प्रकारानुग्रहादित्येतावति तात्पर्यं हि ग्रन्थस्याधिकन्नान्यत् । करिणीवैधव्यकरो मम पुत्रः एकेन काण्डेन विनि- 'स्पृहा', 'लज्जा' और 'राग वालों की उत्कलिका (उत्कण्ठा)' इस प्रकार शब्द द्वारा स्पष्ट अर्थ में क्या हृद्यता (मनोहरता) होगी ? इन उदाहरणों की विस्तार करके पहले ही व्याख्या हो चुकी है, पुन: कथन से क्या (लाभ) ? प्राचीन कवि द्वारा स्पृष्ट होने पर भी इस प्रकार के अनुग्रह से नूतनता होती ही है, इतने में ही ग्रन्थ का तात्पर्य है, दूसरा नहीं। 'हथिनी को विधवा बना देने वाला मेरा पुत्र एक बाण से गिरा देने में समर्थ है, मुई पतोहू ने ऐसा कर डाला जो किसी प्रकार ठीक नहीं। अतएव प्रस्तुत संस्करण में मैने इस श्लोक को कारिकाओं के क्रम में मोटे टाइप से छाप करके भी संख्या नहीं दी है, जिससे इसके सम्बन्ध में अध्ययन करने वालों की जिज्ञासा पढ़ते ही उत्पन्न हो।
चतुर्थ उद्योतः ५६९ ध्वन्यालोकः अर्थशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिमात्र- निष्पन्नशरीरत्वेन नवत्वम् । यथा—'वाणिअअ हत्थिदन्ता' इत्यादिगा- थार्थस्य । करिणीवेहव्वअरो मह पुत्तो एक्ककाण्डविणिवाइ । हअसोण्हाएँ तह कहो जह कण्डकरण्डअं वहइ ॥ [ करिणीवैधव्यकरो मम पुत्र एककाण्डविनिपाती । हतस्नुषया तथा कृतो यथा काण्डकरण्डकं वहति ॥ इतिच्छाया ] एवमादिष्वर्थेषु सत्स्वप्यनालीढतैव । यथा व्यङ्ग्यभेदसमाश्रयेण ध्वनेः काव्यार्थानां नवत्वमुत्पद्यते, तथा व्यञ्जकभेदसमाश्रयेणापि । तत्तु ग्रन्थविस्तरभयान्न लिख्यते, स्वयमेव सहृदयैरभ्यूह्यम् । अत्र च पुनःपुनरुक्तमपि सारतयेदमुच्यते— व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावेऽस्मिन्विविधे सम्भवत्यपि । रसादिमय एकस्मिन् कविः स्यादवधानवान् ॥ ५ ॥ अस्मिन्नर्थानन्त्यहेतौ व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावे विचित्रे शब्दानां सम्भव- अर्थशक्ति से उत्पन्न अनुरणन रूप व्यङ्ग्य का, कविनिबद्ध वक्ता की प्रौढोक्ति मात्र से निष्पन्नशरीर होने के कारण नवत्व है जैसे—'ओ व्यापारी, हाथी के दांत' इत्यादि गाथा के अर्थ का । इत्यादि अर्थों के होने पर भी अस्पृष्टत्व ( अनालीढत्व ) है ॥ ४ ॥ जैसे ध्वनि के व्यङ्ग्य भेद के समाश्रयण से काव्यार्थों का नवत्व उत्पन्न होता है, उसी प्रकार व्यञ्जक भेद के समाश्रयण से भी । किन्तु उसे ग्रन्थ के विस्तृत हो जाने के भय से नहीं लिखते हैं, स्वयं ही सहृदय लोग ऊह कर लेंगे । और यहाँ, बार-बार भी उक्त इसे सार रूप से यह कहते हैं— इस व्यङ्ग्य-व्यञ्जक भाव के बहुत प्रकार के सम्भव होने पर भी कवि रसादि रूप अर्थ में सावधान हो । अर्थ के आनन्त्य के हेतु, व्यङ्ग्य-व्यञ्जकभाव के विचित्र होने पर भी अपूर्व अर्थ के लोचनम् पातनसमर्थः हतस्नुषया तथा कृतो यथा काण्डकरण्डकं वहतीत्युत्तान एवाय- मर्थः, गाथार्थस्यानालीढतैवेति सम्बन्धः ॥ ४ ॥ है कि बाणों का करण्ड ( तरकस ) लिए रहता है । यह सीधा ही अर्थ है । सम्बन्ध यह कि गाथा के अर्थ का अस्पृष्टत्व ( अनालीढत्व है ) ॥ ४ ॥