भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 627, कुल 680 में से

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पृष्ठ 627

चतुर्थ उद्योतः ५६७ ध्वन्यालोकः दृष्टपूर्वा अपि ह्यर्थाः काव्ये रसपरिग्रहात् । सर्वे नवा इवाभान्ति मधुमास इव द्रुमाः ॥ ४ ॥ तथा हि विवक्षितान्यपरवाच्यस्यैव शब्दशक्त्युद्भवानुरणन- रूपव्यङ्ग्यप्रकारसमाश्रयेण नवत्वम् । यथा—'धरणीधारणायाधुना त्वं शेषः' इत्यादेः । शेषो हिमगिरिस्त्वं च महान्तो गुरवः स्थिराः । यदलङ्घितमर्यादाश्चलन्तीं बिभ्रते भुवम् ॥ इत्यादिषु सत्स्वपि । तस्यैवार्थशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यसमाश्र- येण नवत्वम् । यथा—'एवम्वादिनि देवर्षौ' इत्यादि श्लोकस्य । पहले देखे हुए भी अर्थ काव्य में रस के परिग्रह से सब नवीन जैसे लगते हैं, वसन्त-मास में जैसे वृक्ष ॥ ४ ॥ जैसा कि विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का, शब्द की शक्ति से उत्पन्न हुए अनुर- णन रूप व्यङ्ग्य के समाश्रयण से नवत्व है, जैसे—'पृथ्वी के धारण के लिए इस समय तुम शेष हो' इत्यादि का, । 'शेष ( शेष नाग ), हिमालय और तुम ( तीनों ) महान् , भारी और स्थिर हो, जो कि नहीं लंघित है मर्यादा जिनकी ( ऐसे तीनों ) चलती हुई पृथ्वी को धारण करते हैं ।' इत्यादि ( श्लोकों के ) होने पर भी । उस ( विवक्षितान्यपरवाच्य ) का ही अर्थ-शक्ति से उत्पन्न अनुरणन रूप व्यङ्ग्य के समाश्रयण से नवत्व है, जैसे— 'देवर्षि के इस प्रकार कहने पर ।' इत्यादि का । लोचनम् दृष्टपूर्वा इति । बहिः प्रत्यक्षादिभिः प्रमाणैः प्राक्तनैश्च कविभिरित्युभयथा पहले से देखे गए—। बाहर प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से और प्राचीन कवियों द्वारा इस उभय प्रकार से ( अर्थ को ) ले जाना चाहिए । काव्य मधुमास के स्थान पर है, तर्क भी है कि इस श्लोक का वृत्तिग्रन्थ में व्याख्यान नहीं है। इस श्लोक को कारिका माना जाय या संग्रह श्लोक, इसका निर्णय जब प्रमाणभूत आचार्य लोचनकार अभिनवगुप्त 'संग्रह श्लोक' के पक्ष में दे रहे हैं तब भी ध्वन्यालोक के पूर्व के अनेक संस्करणों में इस श्लोक को कारिका के रूप में ही सम्पादनकर्ताओं ने छापा है ! ऐसा करने का तात्पर्य यही हो सकता है कि कारिका के रूप में यह श्लोक बहुत प्राचीन काल से. अभिनवगुप्त के युग से ही जब माना जाता है, तभी तो इसे 'संग्रह श्लोक' माना जाय यह अभिनवगुप्त का युक्तिसंगत पक्ष विचारणीय होगा, अन्यथा इसे 'संग्रहश्लोक' स्वीकार कर लेने पर 'लोचन' के वक्तव्य के निर्मूल हो जाने की स्थिति उत्पन्न होगी,

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