ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अर्थविशेषान् सा जयति विकटकविगोचरा वाणी ॥ इति छाया । ] तदित्थं रसभावाद्याश्रयेण काव्यार्थानामानन्त्यं सुप्रतिपादितम् । एतदेवोपपादयितुमुच्यते— न भी स्थित पदार्थों को हृदय में उस प्रकार ( रमणीय रूप में ) स्थित जैसे निवेश कर देती है।' तो इस प्रकार रस, भाव आदि के आश्रय से काव्यार्थों का आनन्त्य सुष्ठु प्रति- पादित हुआ। इसे ही उपपादन के लिए कहते हैं— लोचनम् हृदयनिविष्टा एव च तथा भवन्ति नान्यथेत्यर्थः । सा जयति परिच्छिन्नश- क्तिभ्यः प्रजापतिभ्योऽप्युत्कर्षेण वर्तते । तत्प्रसादादेव कविगोचरो वर्णनीयोऽर्थो विकटो निस्सीमा सम्पद्यते ॥ ३ ॥ प्रतिभानं वाणीनाञ्चानन्त्यं ध्वनिकृतमिति यदनुद्भिन्नमुक्तं, तदेव कारिकया भङ्ग्या निरूप्यत इत्याह—उपपादयितुमिति । उपपत्त्या निरूपयितुमित्यर्थः । यद्यप्यर्थानन्त्यमात्रे हेतुर्वृत्तिकारेणोक्तः, तथापि कारिकाकारेण नोक्त इति भावः । यदि वा उच्यते संग्रहश्लोकोऽयमिति भावः । अत एवास्य श्लोकस्य वृत्तिग्रन्थे व्याख्यानं न कृतम् । अन्य ( भिन्न ) ही हो जाते हैं। अर्थात् हृदय में निवेश पाकर ही उस प्रकार हो जाते हैं अन्यथा नहीं। सबसे बढ़ कर है—। सीमित ( परिच्छिन्न ) शक्ति वाले प्रजापतियों से भी बढ़ कर है। उसके प्रसाद से ही कवि की दृष्टि में आया हुआ वर्णनीय अर्थ विकट अर्थात् सीमारहित हो जाता है। प्रतिभाओं का और वाणियों का आनन्त्य ध्वनि द्वारा होता है, यह जो अस्पष्ट कहा है उसे ही कारिका द्वारा ढंग ( भङ्गी ) से निरूपित करते हैं, यह कहते हैं— उपपादन करने लिए—। अर्थात् उपपत्ति द्वारा निरूपण करने के लिए। भाव यह कि यद्यपि अर्थ के आनन्त्य में हेतु को वृत्तिकार ने कहा है तथापि कारिकाकार ने ( इसे ) नहीं कहा है। अथवा यदि कहते हैं तो सङ्ग्रह-श्लोक यह है, यह भाव है। अतएव इस श्लोक का वृत्तिग्रन्थ में व्याख्यान नहीं किया है।'
१ कारिकाओं में कारिकाकार ने ध्वनि के कारण प्रतिभा और कवि की वाणी के आनन्त्य
का निर्देश किया था, किन्तु अर्थ के आनन्त्य के सम्बन्ध में कारिकाकार का निर्देश नहीं है, इसे
वृत्तिकार ने ३।३ कारिका के व्याख्यान में कहा है। ऐसी स्थिति में, आगे वाली कारिका ३।४
जब अर्थ के आनन्त्य के सम्बन्ध का निर्देश करती है तो यह बात संगत प्रतीत नहीं होती। पीछे
की कारिकाओं में, जहाँ प्रतिभा और वाणी के आनन्त्य की प्रतिज्ञा की है वहीं अर्थ के आनन्त्य की
भी प्रतिज्ञा करनी चाहिए थी। अतएव लोचनकार ने अपना अन्तिम मत यह दिया कि दृष्टपूर्वा०
( ३।४ ) यह वृत्तिकार का 'संग्रहश्लोक' है, इस बात को उपपन्न करने के लिए लोचनकार का यह