ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ उद्योतः ५६५ ध्वन्यालोकः दीनां हि प्रत्येकं विभावानुभावव्यभिचारिसमाश्रयादपरिमितत्वम् । तेषां चैकैकप्रभेदापेक्षयापि तावज्जगद्वृत्तमुपनिबध्यमानं सुकविभिस्त- दिच्छावशादन्यथा स्थितमप्यन्यथैव विवर्तते । प्रतिपादितं चैतच्चित्र- विचारावसरे । गाथा चात्र कृतैव महाकविना— अतहट्ठिए वि तहसण्ठिए व्व हिअअम्मि जा णिवेसेइ । अत्थविसेसे सा जअइ विकडकइगोअरा वाणी ॥ [ अतथास्थितानपि तथासंस्थितानिव हृदये या निवेशयति । पूर्ण रूप से आश्रय लेने के कारण आनन्त्य है । और उनके एक-एक प्रभेद की अपेक्षा से भी संसार का व्यवहार उपनिबध्यमान होकर सुकवियों द्वारा उनकी इच्छावश दूसरे प्रकार से स्थित होकर भी दूसरे प्रकार का हो जाता है ( मालूम होने लगता है ) और इसे 'चित्र' ( काव्य ) के विचार के प्रसंग में प्रतिपादन किया है । और, महाकवि ने यह गाथा भी कही है— 'महाकवि की वह वाणी सब से बढ़ कर है, जो उस प्रकार ( रमणीय रूप में ) लोचनम् तस्याङ्गानां प्रभेदा ये प्रभेदाः स्वगताश्च ये । तेषामानान्यमन्योन्यसम्बन्धपरिकल्पना ॥ इत्यत्र । प्रतिपादितं चैतदिति । चशब्दोऽपिशब्दार्थे भिन्नक्रमः । एतदपि प्रतिपादितं 'भावानचेतनानपि चेतनवच्चेतनानचेतनवद्'त्यत्र । अतथास्थि- तानपि बहिस्तथासंस्थितानिवेति । इवशब्देन एकतत्र विश्रान्तियोगाभावादेव सुतरां विचित्ररूपानित्यर्थः । हृदय इति । प्रधानतमे समस्तभावकनर्कानकष- स्थान इत्यर्थः । निवेशयति यस्य यस्य हृदयमस्ति, तस्य तस्य अचलतया तत्र स्थापयतीत्यर्थः । अतएव ते प्रसिद्धार्थेभ्योऽन्य एवेत्यर्थविशेषास्सम्पद्यन्ते । उस ( ध्वनि ) के जो प्रभेद हैं और स्वगत जो प्रभेद हैं उनका आनन्त्य परस्पर सम्बन्ध की परिकल्पना है ॥ इसमें । और... प्रतिपादित किया है—। 'और' शब्द 'भी' शब्द के अर्थ में क्रम को भिन्न ( करके पठनीय है ) । इसे भी प्रतिपादन किया है—अचेतन भावों को भी चेतन की भाँति, चेतन ( भावों को ) अचेतन की भाँति—इस स्थल में । इस प्रकार नहीं स्थित हुए भी बाहर उस प्रकार पूर्ण स्थित जैसे— । 'जैसे' शब्द से एक स्थान पर विश्राम के न मिलने के कारण ही पूर्णरूपेण विचित्र रूप वाले--यह अर्थ है । हृदय में—। प्रधानतम अर्थात् सम्पूर्ण भाव ( वर्णनीय अर्थ ) रूपी सोने की कसौटी रूप (हृदय में) । निवेश कर देती है—अर्थात् जिस जिसका हृदय है, उस उसके अचल रूप से वहां स्थापित कर देती है । अतएव वे पदार्थ ( अर्थविशेष ) प्रसिद्ध अर्थों से