ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः युक्त्याऽनयानुसर्तव्यो रसादिर्बहुविस्तरः । मिथोऽप्यनन्यतां प्राप्तः काव्यमार्गो यदाश्रयात् ॥ ३ ॥ बहुविस्तारोऽयं रसभावतदाभासतत्प्रशमनलक्षणो मार्गो यथास्वं विभावानुभावप्रभेदकलनया यथोक्तं प्राक् । स सर्व एवानया युक्त्यानु- सर्तव्यः । यस्य रसादेराश्रयादयं काव्यमार्गः पुरातनैः कविभिः सहस्त्र- संख्यैरसंख्यैर्वा बहुप्रकारं क्षुण्णत्वान्मितोऽप्यनन्यतामेति । रसभावा- इस युक्ति से बहुत विस्तार वाले रस आदि को अनुसरण करना चाहिए, जिसके आश्रय ( आधार ) से थोड़ा भी काव्य का मार्ग अनन्तता को प्राप्त है ॥ ३ ॥ जैसा कि पहले कह चुके हैं, यह रस, भाव, भावाभास, भावप्रशम रूप मार्ग, विभाव, अनुभाव के प्रभेदों की गणना से बहुत विस्तृत हो जाता है, वह सभी इस युक्ति से अनुसरण करने योग्य है । जिस रसादि के आश्रय से यह काव्य-मार्ग पुराने हजारों अथवा असंख्य कवियों द्वारा बहुत प्रकार से अभ्यस्त होने के कारण थोड़ा भी अनन्त बन जाता है । रस, भाव आदि का प्रत्येक विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी का लोचनम् परस्पराभिलाषप्रसरनिरोधपरम्परापर्यवसानासम्भवेन या रतिरुक्ता, सोभयो- रप्येकस्वरूपचित्तवृत्त्यनुप्रवेशमाचक्षाणा रतिं सुतरां पोषयति ॥ २ ॥ एवं मौलं भेदचतुष्टयमुदाहृत्यालक्ष्यक्रमभेदेष्वतिदेशमुखेन सर्वोपभेदविषय- निर्देशं करोति—युक्त्यानयेति । अनुसर्तव्य इति । उदाहर्तव्य इत्यर्थः । यथो- क्तमिति । अभिलाष-वेग के रुकने के क्रम में पर्यवसान न होने से जो रति कही गई है वह दोनों ( प्रिय और प्रिया ) की एक स्वरूप वाली चित्तवृत्ति की स्थिति ( अनुप्रवेश ) को स्पष्ट कहती हुई रति को पूर्ण रूप से पुष्ट करती है१ ॥ २ ॥ इस प्रकार मूल के ( आदि के ) चार भेदों को उदाहृत करके अलक्ष्यक्रम ध्वनि के अतिदेश के प्रकार से समस्त उपभेदों के सम्बन्ध में निर्देश करते हैं—इस युक्ति से— । अनुसरण करना चाहिए— । अर्थात् उदाहृत कर लेना चाहिए । जैसा कि कहा है— । १. प्रथम 'निद्राकैतविनः०' और द्वितीय 'शून्यं वासगृहं०' इन दोनों की परिस्थितियां प्रायः समान ही हैं, किन्तु प्रथम श्लोक में नायक और नायिका दोनों अपने अभिलाष को किसी प्रकार रोक कर परस्पर जीवित सर्वस्व होने की भावना से समान चित्त वृत्ति का अनुभव कर रहे हैं, इस प्रकार यहां रति परिपोष प्राप्त करके यहाँ शृङ्गार की अवस्था तक पहुँच जाती है । द्वितीय श्लोक में यद्यपि शृङ्गार पोषित है तथापि लज्जा के स्वशब्द से उक्त हो जाने के कारण कुछ शिथिलता अवश्य आ गई है ।