भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 623, कुल 680 में से

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पृष्ठ 623

चतुर्थ उद्योतः ५६३ ध्वन्यालोकः इत्यादेः श्लोकस्य, शून्यं वासगृहं विलोक्य शयनादुत्थाय किञ्चिच्छनै- र्निद्राव्याजमुपागतस्य सुचिरं निर्वर्ण्य पत्युर्मुखम् । विश्रब्धं परिचुम्ब्य जातपुलकामालोक्य गण्डस्थलीं लज्जानम्रामुखी प्रियेण हसता बाला चिरं चुम्बिता ॥ इत्यादिषु श्लोकेषु सत्स्वपि नवत्वम् । यथा वा—'तरङ्गभ्रूभङ्गा' इत्यादिश्लोकस्य 'नानाभङ्गिभ्रमद्भूः' इत्यादिश्लोकापेक्षयान्यत्वम् ॥२॥ इत्यादि श्लोक का, सूने शयनकक्ष को देख, कुछ धीरे पलंग से उठ कर, नींद की ढोंग किए हुए पति के मुख को देर तक निहार कर, विश्वास के साथ जोर से चुम्बन कर, (तत्पश्चात्) उत्पन्न रोमाञ्च वाली ( पति की ) गण्डस्थली को देख कर लज्जा से झुके मुख वाली बाला हंसते हुए प्रिय द्वारा देर तक चुम्बित हुई । इत्यादि श्लोकों के होते हुए भी नवत्व है । अथवा, जैसे—'तरङ्गभ्रूभङ्गा०'— इत्यादि श्लोक का 'नानाभङ्गिभ्रमद्भू०'—इत्यादि श्लोक की अपेक्षा अन्यत्व ( नवत्व ) है । लोचनम् र्तितुं शक्नोतीत्यर्थः । एवंभूतैषा यदि मया परिचुम्ब्यते, तद्विलक्षा विमुखीभवे- दिति तस्यापि प्रियस्य परिचुम्बनविषये निरारम्भस्य । हृदयं साकांक्षप्रतिपत्ति नामेति । साकांक्षा साभिलाषा प्रतिपत्तिः स्थितिर्यस्य तादृशं रुहुरुहिकाकद- र्थितं न तु मनोरथसम्पत्तिचरितार्थं, किन्तु रतेः परस्परजीवितसर्वस्वाभिमान- रूपायाः परिनिर्वृतेः केन चिदप्यनुभवेनालब्धावगाहनायाः पारङ्गतमिति परि- पूर्णीभूत एव शृङ्गारः । द्वितीयश्लोके तु परिचुम्बनं सम्पन्नं लज्जा स्वशब्देनोक्ता । तेनापि सा परिचुम्बितेति यद्यपि पोषित एव शृङ्गारः, तथापि प्रथमश्लोके हुई यह यदि मेरे द्वारा चूमी जाती है लज्जा कर ( मुझसे ) विमुख हो जायगी, इस प्रकार वह प्रिय भी परिचुम्बन के विषय में आरम्भशून्य है । हृदय साकांक्ष की स्थिति वाला— । आकांक्षा, अभिलाष से सहित है प्रतिपत्ति अर्थात् स्थिति जिसकी, उस प्रकार का ( हृदय ) उत्सुकता से पीड़ित, न कि मनोरथ की सम्पत्ति से चरितार्थ; किन्तु रति के अर्थात् परस्पर जीवन के सर्वस्व होने के अभिमान रूप परम निर्वृत्ति ( आनन्द ) के, जिसका किसी के द्वारा भी, अनुभव से अवगाहन न हुआ, पार पहुँच गया, इस प्रकार शृङ्गार परिपूर्ण ही हो गया । परन्तु दूसरे श्लोक में परिचुम्बन कर लिया गया, लज्जा अपने ( लज्जा ) शब्द से कह दी गई है । 'उसके द्वारा वह परिचुम्बित हुई, इससे यद्यपि शृङ्गार पोषित ही हुआ तथापि पहले श्लोक में एक-दूसरे के