भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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५६२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इत्येवमादिषु श्लोकेषु सत्स्वप्यर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यध्वनिसमाश्र- येण नवत्वम्। विवक्षितान्यपरवाच्यस्याप्युक्तप्रकारसमाश्रयेण नवत्वं यथा— निद्राकैतविनः प्रियस्य वदने विन्यस्य वक्त्रं वधू- र्बोधत्रासनिरुद्धचुम्बनरसाप्याभोगलोलं स्थिता । वैलक्ष्याद्विमुखीभवेदिति पुनस्तस्याप्यनारम्भिणः साकाङ्क्षप्रतिपत्ति नाम हृदयं यातं तु पारं रतेः ॥ इत्यादि श्लोकों के होने पर भी ( पूर्वोक्त श्लोक में ) अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य ध्वनि के समाश्रयण से नवत्व है। जैसे— नींद की ढोंग करने वाले प्रिय के मुख पर ( अपना ) मुख रखकर नई-नौहर वधू ( उसके ) जग जाने के डर से चुम्बन की इच्छा रोक कर भी पूरी तरह देखने के कारण चंचल हो बैठी । लजा जाने से विमुख हो जायगी इससे फिर ( अपनी ओर से ) आरम्भ न करने वाले उस प्रिय का भी हृदय साकांक्ष की स्थिति में पहुँच कर परम आनन्द ( रति ) की सीमा तक चला गया । लोचनम् एवं प्रथमस्य द्वौ भेदावुदाहृत्य द्वितीयस्याप्युदाहर्तुमासूत्रयति—विवक्षि- तेति । निद्रायां कैतवी कृतकसुप्त इत्यर्थः । वदने विन्यस्य वक्त्रमिति । वदनस्पर्श- जमेव तावद्दिव्यं सुखं त्यक्तुन्न पारयतीति । अतएव प्रियस्येति । वधूः नवोढा । बोधत्रासेन प्रियतमप्रबोधभयेन निरुद्धो हठात् प्रवर्तमानः प्रवर्त्तमानोऽपि कथ- ञ्चित्कथञ्चित् क्षणमात्रन्धृतश्चुम्बनाभिलाषो यया । अतएव आभोगेन पुनः पुनर्निद्राविचारनिर्वर्णनया विलोलं कृत्वा स्थिता, न तु सर्वथैव चुम्बनान्निव- इस प्रकार प्रथम ( अविवक्षितवाच्य ध्वनि ) के दोनों भेदों को उदाहृत करके द्वितीय ( विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि ) के ( भेदों को ) भी उदाहृत करने के लिए निर्देश करते हैं—विवक्षितान्यपरवाच्य—। नींद में ढोंगी अर्थात् बनावटी सोया हुआ । मुख पर मुख को रख कर— । मुख का स्पर्श करने से उत्पन्न दिव्य सुख को ही छोड़ नहीं पाता । अतएव प्रिय का । नई-नौहर ( वधू ) तुरन्त की व्याही हुई । जग जाने के डर से, प्रियतम के जग जाने के डर से निरुद्ध, हठपूर्वक प्रवर्त्तमान—प्रवर्तमान भी किसी-किसी प्रकार क्षण भर रोक रखा है चुम्बन के अभिलाष को जिसने । अतएव पूरी तरह देखने के कारण ( आभोग से ) बार-बार नींद को विचार करके देखने से, चंचल हो गई, न कि सब प्रकार से चुम्बन से निवृत्त हो सकती है, यह अर्थ है। ऐसी