ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 621, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ उद्योतः ५६१ ध्वन्यालोकः नितम्बालसगामिन्यः कामिन्यः कस्य न प्रियाः ॥ इत्येवमादिषु श्लोकेषु सत्स्वपि तिरस्कृतवाच्यध्वनिसमाश्रयेणा- पूर्वत्वमेव प्रतिभासते । तथा— यः प्रथमः प्रथमः स तु तथाहि हतहस्तिबहुलपललाशी । श्वापदगणेषु सिंहः सिंहः केनाधरीक्रियते ॥ इत्यस्य, स्वतेजःक्रीतमहिमा केनान्येनातिशय्यते । महद्भिरपि मातङ्गैः सिंहः किमभिभूयते ॥ आवाज वाली, नितम्ब ( के भार से ) अलसा कर चलने वाली कामिनियां किसे प्रिय नहीं हैं ? इत्यादि श्लोकों के ( पहले से ) होने पर भी तिरस्कृत वाच्यध्वनि के समाश्रयण से अपूर्वत्व ( नवत्व ) ही प्रतिभासित होता है । इसी प्रकार— जो पहला है वह तो पहला है, जैसा कि मारे गए हाथी के पर्याप्त मांस को खाने वाला, जंगली जानवरों में सिंह किससे नीचा किया जाता है ? इसका, अपने पराक्रम से खरीदा हुआ बड़प्पन किस दूसरे द्वारा दबाया जाता है ? बड़े भी हाथियों से सिंह क्या अभिभूत होता है ? लोचनम् मेव भासत इति दूरेण सम्बन्धः । सर्वत्रैवास्य नवत्वमिति सङ्गतिः । द्वितीयः प्रथमशब्दोऽर्थान्तरेऽनपाकरणीयप्रधानत्वासाधारणत्वादिव्यङ्ग्यधर्मा- न्तरे संक्रान्तं स्वार्थं व्यनक्ति । एवं सिंहशब्दोऽपि वीरत्वानपेक्षत्वविस्मयनी- यत्वादौ व्यंग्यधर्मान्तरे सङ्क्रान्तं स्वार्थं ध्वनति । ( नवत्व ) ही भासित होता है' यह दूसरे से सम्बन्ध ( अन्वय ) है । सब जगह ही इसका नवत्व ( अपूर्वत्व ) है, यह सङ्गति है । दूसरा 'पहला' शब्द ( अन्वित न होने के कारण ) दूसरे अर्थ में 'जिसकी प्रधानता निराकरण के योग्य नहीं है ( अनपाकर- णीय प्रधानत्व )' ( और ) असाधारणत्व आदि रूप व्यङ्ग्य धर्मान्तर में सङ्क्रान्त अपने अर्थ ( स्वार्थ ) को व्यंजित करता है । इसी प्रकार—'सिंह' शब्द भी वीरत्व, अनपेक्षत्व ( दूसरे की अपेक्षा न करना ), विस्मयनीयत्व आदि व्यङ्ग्य धर्मान्तर में सङ्क्रान्त अपने अर्थ ( स्वार्थ ) को ध्वनित करता है । ३६ ध्व०