ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कृते वरकथालापे कुमार्यः पुलकोद्गमैः । सूचयन्ति स्पृहामन्तर्लज्जयावनताननाः ॥ इत्यादिषु सत्सु अर्थशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य कविप्रौढो- क्तिनिर्मितशरीरत्वेन नवत्वम् । यथा—'सज्जेइ सुरहिमासो' इत्यादेः । सुरभिसमये प्रवृत्ते सहसा प्रादुर्भवन्ति रमणीयाः । रागवतामुत्कलिकाः सहैव सहकारकलिकाभिः ॥ इत्यादिषु सत्स्वप्यपूर्वत्वमेव । 'वरके सम्बन्ध में बातचीत की जाने पर रोमाञ्च के उद्गमों द्वारा भीतर की लज्जा से झुके हुए मुखों वाली क्वारियां अभिलाष को सूचित करती हैं।' इत्यादि श्लोकों के होने पर (भी)। अर्थ शक्ति से उत्पन्न अनुरणन रूप व्यङ्ग्य का, कवि की प्रौढोक्ति से निष्पन्नशरीर होने के कारण नवत्व है, जैसे— 'वसन्तमास सजाता है।' इत्यादि का। वसन्तमास के प्रवृत्त होने पर रागियों (प्रणयिजनों) की उत्कलिकाएं उत्कण्ठाएं) आमों की कलिकाओं के साथ ही प्रादुर्भूत हो जाती हैं। इत्यादि श्लोकों के होने पर भी अपूर्वत्व ही है। लोचनम् नेयम् । काव्यं मधुमांसस्थानीयम्, स्पृहां लज्जामिति, रागवतामुत्कलिका इति च । शब्दस्पृष्टेऽर्थे का हृद्यता । एतानि चोदाहरणानि वितत्य पूर्वमेव व्याख्यातानीति किं पुनरुक्त्या सत्यपि प्राक्तनकविस्पृष्टत्वे नूतनत्वं भवत्येवैतत्प्रकारानुग्रहादित्येतावति तात्पर्यं हि ग्रन्थस्याधिकन्नान्यत् । करिणीवैधव्यकरो मम पुत्रः एकेन काण्डेन विनि- 'स्पृहा', 'लज्जा' और 'राग वालों की उत्कलिका (उत्कण्ठा)' इस प्रकार शब्द द्वारा स्पष्ट अर्थ में क्या हृद्यता (मनोहरता) होगी ? इन उदाहरणों की विस्तार करके पहले ही व्याख्या हो चुकी है, पुन: कथन से क्या (लाभ) ? प्राचीन कवि द्वारा स्पृष्ट होने पर भी इस प्रकार के अनुग्रह से नूतनता होती ही है, इतने में ही ग्रन्थ का तात्पर्य है, दूसरा नहीं। 'हथिनी को विधवा बना देने वाला मेरा पुत्र एक बाण से गिरा देने में समर्थ है, मुई पतोहू ने ऐसा कर डाला जो किसी प्रकार ठीक नहीं। अतएव प्रस्तुत संस्करण में मैने इस श्लोक को कारिकाओं के क्रम में मोटे टाइप से छाप करके भी संख्या नहीं दी है, जिससे इसके सम्बन्ध में अध्ययन करने वालों की जिज्ञासा पढ़ते ही उत्पन्न हो।