ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
५६८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कृते वरकथालापे कुमार्यः पुलकोद्गमैः । सूचयन्ति स्पृहामन्तर्लज्जयावनताननाः ॥ इत्यादिषु सत्सु अर्थशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य कविप्रौढो- क्तिनिर्मितशरीरत्वेन नवत्वम् । यथा—'सज्जेइ सुरहिमासो' इत्यादेः । सुरभिसमये प्रवृत्ते सहसा प्रादुर्भवन्ति रमणीयाः । रागवतामुत्कलिकाः सहैव सहकारकलिकाभिः ॥ इत्यादिषु सत्स्वप्यपूर्वत्वमेव । 'वरके सम्बन्ध में बातचीत की जाने पर रोमाञ्च के उद्गमों द्वारा भीतर की लज्जा से झुके हुए मुखों वाली क्वारियां अभिलाष को सूचित करती हैं।' इत्यादि श्लोकों के होने पर (भी)। अर्थ शक्ति से उत्पन्न अनुरणन रूप व्यङ्ग्य का, कवि की प्रौढोक्ति से निष्पन्नशरीर होने के कारण नवत्व है, जैसे— 'वसन्तमास सजाता है।' इत्यादि का। वसन्तमास के प्रवृत्त होने पर रागियों (प्रणयिजनों) की उत्कलिकाएं उत्कण्ठाएं) आमों की कलिकाओं के साथ ही प्रादुर्भूत हो जाती हैं। इत्यादि श्लोकों के होने पर भी अपूर्वत्व ही है। लोचनम् नेयम् । काव्यं मधुमांसस्थानीयम्, स्पृहां लज्जामिति, रागवतामुत्कलिका इति च । शब्दस्पृष्टेऽर्थे का हृद्यता । एतानि चोदाहरणानि वितत्य पूर्वमेव व्याख्यातानीति किं पुनरुक्त्या सत्यपि प्राक्तनकविस्पृष्टत्वे नूतनत्वं भवत्येवैतत्प्रकारानुग्रहादित्येतावति तात्पर्यं हि ग्रन्थस्याधिकन्नान्यत् । करिणीवैधव्यकरो मम पुत्रः एकेन काण्डेन विनि- 'स्पृहा', 'लज्जा' और 'राग वालों की उत्कलिका (उत्कण्ठा)' इस प्रकार शब्द द्वारा स्पष्ट अर्थ में क्या हृद्यता (मनोहरता) होगी ? इन उदाहरणों की विस्तार करके पहले ही व्याख्या हो चुकी है, पुन: कथन से क्या (लाभ) ? प्राचीन कवि द्वारा स्पृष्ट होने पर भी इस प्रकार के अनुग्रह से नूतनता होती ही है, इतने में ही ग्रन्थ का तात्पर्य है, दूसरा नहीं। 'हथिनी को विधवा बना देने वाला मेरा पुत्र एक बाण से गिरा देने में समर्थ है, मुई पतोहू ने ऐसा कर डाला जो किसी प्रकार ठीक नहीं। अतएव प्रस्तुत संस्करण में मैने इस श्लोक को कारिकाओं के क्रम में मोटे टाइप से छाप करके भी संख्या नहीं दी है, जिससे इसके सम्बन्ध में अध्ययन करने वालों की जिज्ञासा पढ़ते ही उत्पन्न हो।
चतुर्थ उद्योतः ५६९ ध्वन्यालोकः अर्थशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिमात्र- निष्पन्नशरीरत्वेन नवत्वम् । यथा—'वाणिअअ हत्थिदन्ता' इत्यादिगा- थार्थस्य । करिणीवेहव्वअरो मह पुत्तो एक्ककाण्डविणिवाइ । हअसोण्हाएँ तह कहो जह कण्डकरण्डअं वहइ ॥ [ करिणीवैधव्यकरो मम पुत्र एककाण्डविनिपाती । हतस्नुषया तथा कृतो यथा काण्डकरण्डकं वहति ॥ इतिच्छाया ] एवमादिष्वर्थेषु सत्स्वप्यनालीढतैव । यथा व्यङ्ग्यभेदसमाश्रयेण ध्वनेः काव्यार्थानां नवत्वमुत्पद्यते, तथा व्यञ्जकभेदसमाश्रयेणापि । तत्तु ग्रन्थविस्तरभयान्न लिख्यते, स्वयमेव सहृदयैरभ्यूह्यम् । अत्र च पुनःपुनरुक्तमपि सारतयेदमुच्यते— व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावेऽस्मिन्विविधे सम्भवत्यपि । रसादिमय एकस्मिन् कविः स्यादवधानवान् ॥ ५ ॥ अस्मिन्नर्थानन्त्यहेतौ व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावे विचित्रे शब्दानां सम्भव- अर्थशक्ति से उत्पन्न अनुरणन रूप व्यङ्ग्य का, कविनिबद्ध वक्ता की प्रौढोक्ति मात्र से निष्पन्नशरीर होने के कारण नवत्व है जैसे—'ओ व्यापारी, हाथी के दांत' इत्यादि गाथा के अर्थ का । इत्यादि अर्थों के होने पर भी अस्पृष्टत्व ( अनालीढत्व ) है ॥ ४ ॥ जैसे ध्वनि के व्यङ्ग्य भेद के समाश्रयण से काव्यार्थों का नवत्व उत्पन्न होता है, उसी प्रकार व्यञ्जक भेद के समाश्रयण से भी । किन्तु उसे ग्रन्थ के विस्तृत हो जाने के भय से नहीं लिखते हैं, स्वयं ही सहृदय लोग ऊह कर लेंगे । और यहाँ, बार-बार भी उक्त इसे सार रूप से यह कहते हैं— इस व्यङ्ग्य-व्यञ्जक भाव के बहुत प्रकार के सम्भव होने पर भी कवि रसादि रूप अर्थ में सावधान हो । अर्थ के आनन्त्य के हेतु, व्यङ्ग्य-व्यञ्जकभाव के विचित्र होने पर भी अपूर्व अर्थ के लोचनम् पातनसमर्थः हतस्नुषया तथा कृतो यथा काण्डकरण्डकं वहतीत्युत्तान एवाय- मर्थः, गाथार्थस्यानालीढतैवेति सम्बन्धः ॥ ४ ॥ है कि बाणों का करण्ड ( तरकस ) लिए रहता है । यह सीधा ही अर्थ है । सम्बन्ध यह कि गाथा के अर्थ का अस्पृष्टत्व ( अनालीढत्व है ) ॥ ४ ॥
५७० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः त्यपि कविरपूर्वार्थलाभार्थी रसादिमय एकस्मिन् व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावे यत्नादवदधीत । रसभावतदाभासरूपे हि व्यङ्ग्ये तद्व्यञ्जकेषु च यथा- निर्दिष्टेषु वर्णपदवाक्यरचनाप्रबन्धेष्ववहितमनसः कवेः सर्वमपूर्वं काव्यं सम्पद्यते । तथा च रामायणमहाभारतादिषु सङ्ग्रामादयः पुनःपुनर- भिहिता अपि नवनवाः प्रकाशन्ते । प्रबन्धे चाङ्गी रस एक एवोपनि- बध्यमानोऽर्थविशेषलाभं छायातिशयं च पुष्णाति । कस्मिन्निवेति चेत्—यथा रामायणे यथा वा महाभारते । रामायणे हि करुणो रसः स्वयमादिकविना सूत्रितः 'शोकः श्लोकत्वमागतः' इत्येवम्वादिना । निर्व्यूढश्च स एव सीतात्यन्तवियोगपर्यन्तमेव स्वप्रबन्धमुपरचयता । महाभारतेऽपि शास्त्रकाव्यरूपच्छायान्वयिनि वृष्णिपाण्डवविरसावसा- नवैमनस्यदायिनीं समाप्तिमुपनिबध्नता महामुनिना वैराग्यजननतात्पर्यं लाभ का इच्छुक कवि रसादिमय एक व्यङ्ग्य-व्यञ्जकभाव में यत्नपूर्वक ध्यान दे । क्योंकि रस, भाव, रसाभास, भावाभास रूप व्यङ्ग्य में और व्यञ्जकों में जैसे निर्देश किए गए वर्ण, पद, वाक्य, रचना और प्रबन्धों में अवधानयुक्त मन वाले कवि का पूरा काव्य अपूर्व ( नवीन ) बन जाता है । जैसा कि रामायण, महा- भारत आदि (काव्यों) में सङ्ग्राम आदि बार-बार कहे जाने पर भी नये-नये होकर प्रकाशित होते हैं । और प्रबन्ध ( काव्य ) में अङ्गी रस एक ही उपनिबध्यमान होकर अर्थविशेष के लाभ को और शोभातिशय को बढ़ाता है । किस प्रबन्ध के समान ? ऐसा ( पूछने ) पर तो—जैसे, रामायण में अथवा जैसे महाभारत में । जैसा कि रामायण में करुण रस को स्वयं आदिकवि (वाल्मीकि) ने सम्यक् प्रकार से निर्देश किया है, 'शोक ही श्लोकत्व को प्राप्त हो गया, इस प्रकार कहते हुए । और उन्होंने ही सीता के अत्यन्त वियोग तक अपने प्रबन्ध को बनाते हुए करुण रस का निर्वाह किया है । शास्त्र और काव्य की छाया से युक्त महाभारत में भी वृष्णियों (यादवों) और पाण्डवों के रसहीन अवसान में वैम- नस्य ( निर्वेद ) उत्पन्न कर देने वाली समाप्ति का उपनिबन्धन करते हुए महामुनि लोचनम् अत्यन्तग्रहणेन निरपेक्षभावतया विप्रलम्भाशङ्कां परिहरति । वृष्णीनां परस्परक्षयः, पाण्डवानामापि महापथक्लेशेनानुचिता विपत्तिः, कृष्णस्यापि 'अत्यन्त' के ग्रहण से, ( करुण रस के निरपेक्ष भाव ) होने के कारण विप्रलम्भ (शृङ्गार) की आशङ्का का परिहार करते हैं। वृष्णियों का परस्पर क्षय, पाण्डवों की
चतुर्थ उद्योतः ५७१ ध्वन्यालोकः प्राधान्येन स्वप्रबन्धस्य दर्शयता मोक्षलक्षणः पुरुषार्थः शान्तो रसश्च मुख्यतया विवक्षाविषयत्वेन सूचितः । एतच्चांशेन विवृतमेवान्यैर्व्या- ख्याविधायिभिः । स्वयमेव चैतदुद्गीर्णं तेनोदीर्णमहामोहमग्नमुज्जिहीर्षता लोकमतिविमलज्ञानालोकदायिना लोकनाथेन— यथा यथा विपर्येति लोकतन्त्रमसारवत् । तथा तथा विरागोऽत्र जायते नात्र संशयः ॥ (व्यास) ने वैराग्य के जनन रूप तात्पर्य को प्रधान रूप से अपने प्रबन्ध का दिखाते हुए, मोक्ष रूप मुख्यार्थ को और शान्त रस को मुख्यतः विवक्षा के विषय के रूप में सूचित किया है । और इसे अंश रूप से अन्य व्याख्याकारों ने स्पष्ट किया ही है । स्वयं ही उन्होंने भारी मोह में पड़े हुए संसार के उद्धार की इच्छा करते हुए, अत्यन्त निर्मल ज्ञान के प्रकाश को देने वाले, संसार के नाथ (स्वामी) उन्होंने इसे कहा है— जैसे-जैसे लोक-प्रपञ्च असार विपरीत रूप में प्रतीत होता जाता है, वैसे-वैसे यहाँ विराग उत्पन्न होता जाता है, इसमें सन्देह नहीं । लोचनम् व्याधाद्विध्वंस इति सर्वस्यापि विरसमेवावसानमिति । मुख्यतयेति । यद्यपि ‘धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे चे’त्युक्तं, तथापि चत्वारश्चकारा एवमाहुः— यद्यपि धर्मार्थकामानां सर्वस्वं तादृङनास्ति यदन्यत्र न विद्यते, तथापि पर्य- न्तविरसत्वमत्रैवावलोक्यताम् । मोक्षे तु यद्रूपं तस्य सारतात्रैव विचार्यतामिति । यथा यथेति । लोकैस्तन्त्यमाणं यत्नेन सम्पाद्यमानन्धर्मार्थकामतत्साधन- लक्षणं वस्तुभूततयाभिमतमपि । येन येनार्जनरक्षणक्षयादिना प्रकारेण । असा- रवत्तुच्छेन्द्रजालादिवत् । विपर्येति । प्रत्युत विपरीतं सम्पद्यते । आस्तान्तस्य स्वरूपचिन्तेत्यर्थः । तेन तेन प्रकारेण अत्र लोकतन्त्रे । विरागो जायत । इत्यनेन भी महापथ के क्लेश के कारण अनुचित विपत्ति, कृष्ण का भी बहेलिया से विनाश, इस प्रकार सभी का रसहीन ही अवसान है । मुख्य रूप से—। यद्यपि ‘और धर्म में, और अर्थ में, और काम में और मोक्ष में’ यह कहा है, तथापि चार (बार प्रयुक्त) ‘और’ ( ‘चकार’ ) इस प्रकार कहते हैं—यद्यपि धर्म, अर्थ और काम का प्रधान स्वरूप (सर्वस्व) उस प्रकार का नहीं है जो अन्यत्र नहीं है, तथापि परिणाम में विरसत्व को यहीं देखिए । मोक्ष में तो जो स्थिति है उसकी सारता (महत्त्व) यहीं विचारणीय है । जैसे-जैसे—। जैसे-जैसे लोगों द्वारा तन्यमाण यत्न से सम्पाद्यमान धर्म, अर्थ, काम और उनके साधन रूप वस्तु रूप में अभिमत भी । जिस-जिस अर्जन, रक्षण और क्षय (नाश) आदि प्रकार से । असार अर्थात् तुच्छ इन्द्रजाल आदि की भांति ।
५७२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इत्यादि बहुशः कथयता । ततश्च शान्तो रसो रसान्तरैर्मोक्षलक्षणः पुरुषार्थः पुरुषार्थान्तरैस्तदुपसर्जनत्वेनानुगम्यमानोऽङ्गित्वेन विवक्षा- विषय इति महाभारततात्पर्यं सुव्यक्तमेवावभासते । अङ्गाङ्गिभावश्च यथा रसानां तथा प्रतिपादितमेव । पारमार्थिकान्तस्तत्त्वानपेक्षया शरीरस्येवाङ्गभूतस्य रसस्य पुरुषा- र्थस्य च स्वप्राधान्येन चारुत्वमप्यविरुद्धम् । ननु महाभारते यावान्वि- वक्षाविषयः सोऽनुक्रमण्यां सर्व एवानुक्रान्तो न चैतत्तत्र दृश्यते, प्रत्युत सर्वपुरुषार्थप्रबोधहेतुत्वं सर्वरसगर्भत्वं च महाभारतस्य तस्मिन्नुद्देशे स्वशब्दनिवेदितत्वेन प्रतीयते । अत्रोच्यते—सत्यं शान्तस्यैव रसस्या- इत्यादि बहुत प्रकार से कहते हुए । और इसलिए शान्त रस दूसरे रसों से, मोक्ष रूप पुरुषार्थ दूसरे पुरुषार्थों से, उन्हें उपसर्जन कर देने के कारण अङ्गी होकर विवक्षा का विषय है, यह महाभारत का तात्पर्य बिलकुल साफ ही अवभासित होता है । अङ्गाङ्गिभाव जैसा कि रसों का होता है, उस प्रकार प्रतिपादित किया ही गया है । पारमार्थिक आभ्यन्तर तत्त्व ( आत्मा ) की अपेक्षा न करके शरीर की भाँति अङ्ग रूप रस का और पुरुषार्थ का अपने प्राधान्य से चारुत्व भी अविरुद्ध है । ( शङ्का ) महाभारत में तो जितना कुछ विवक्षा का विषय है वह अनुक्रमणी में सब कुछ ही अनुक्रान्त ( निर्दिष्ट ) है, किन्तु यह देखा जाता है, प्रत्युत सब पुरुषार्थों के ज्ञान का हेतुत्व और सर्वरसगर्भत्व महाभारत के उस उद्देश ( प्रकरण ) में अपने शब्द द्वारा निवेदित होने के रूप में प्रतीत होता है । ( समाधान ) यहाँ लोचनम् तत्त्वज्ञानोत्थितं निर्वेदं शान्तरसस्थायिनं सूचयता तस्यैव च सर्वैतरासारत्वप्र- तिपादनेन प्राधान्यमुक्तम् । ननु शृङ्गारवीरादिचमत्कारोऽपि तत्र भातीत्याशङ्क्याह—पारमार्थिकेति । भोगाभिनिवेशिनां लोकवासनाविष्टानामाङ्गभूतेऽपि रसे तथाभिमानः, यथा विपरीत रूप में हो जाता है—। इससे तत्त्वज्ञान से उत्पन्न, शान्त रस के स्थायी निर्वेद को सूचित करते हुए और उसीका ही सब दूसरों की असारता ( तुच्छता ) के प्रतिपादन से प्राधान्य कहा है । शृङ्गार, वीर आदि ( रसों ) का भी चमत्कार वहाँ प्रतीत होता है ? यह आशङ्का करके कहते हैं—पारमार्थिक—। भोग ( इन्द्रियजन्य सुख ) में अभिनिवेश रखने वालों
चतुर्थ उद्योतः ५७३ ध्वन्यालोकः ङ्गित्वं महाभारते मोक्षस्य च सर्वपुरुषार्थेभ्यः प्राधान्यमित्येतन्न स्व- शब्दाभिधेयत्वेनानुक्रमण्या दर्शितम्, दर्शितं तु व्यङ्ग्यत्वेन— ‘भगवान्वासुदेवश्च कीर्त्यतेऽत्र सनातनः’ इत्यस्मिन् वाक्ये । अनेन ह्ययमर्थो व्यङ्ग्यत्वेन विवक्षितो यदत्र महाभारते पाण्डवादिचरितं यत्कीर्त्यते तत्सर्वमवसानविरसमविद्याप्र- पञ्चरूपञ्च, परमार्थसत्यस्वरूपस्तु भगवान् वासुदेवोऽत्र कीर्त्यते । तस्मात्तस्मिन्नेव परमेश्वरे भगवति भवत भावितचेतसो, मा भूत विभू- तिषु निःसारासु रागिणो गुणेषु वा नयविनयपराक्रमादिष्वमीषु केवलेषु केषुचित्सर्वात्मना प्रतिनिधिविष्टधियः । तथा चाग्रे—पश्यत निःसारतां संसारस्येत्यमुमेवार्थं द्योतयन् स्फुटमेवावभासते व्यञ्जकशक्त्यनुगृहीतश्च यह कहते हैं—ठीक है, महाभारत में शान्त रस का ही अङ्गित्त्व और मोक्ष का सब पुरुषार्थों से प्राधान्य, यह अपने शब्द द्वारा अभिधेय रूप में अनुक्रमणी में नहीं दिखाया है, किन्तु व्यङ्ग्य के रूप में दिखाया है— ‘और सनातन भगवान् वासुदेव की यहाँ कीर्ति गाई गई है ।’ इस वाक्य में । इससे यह अर्थ व्यङ्ग्य रूप में विवक्षित है कि यहां महाभारत में पाण्डवादिचरित जो कीर्तित हैं वह सब अवसान में रसहीन और अविद्या के कारण प्रपंच रूप हैं, किन्तु परमार्थ-सत्यस्वरूप भगवान् वासुदेव की यहां कीर्ति गाई गई है । इसलिए उसी परमेश्वर भगवान् में भावभरे चित्त वाले बनो, सारहीन विभूतियों में रागयुक्त, अथवा नय, विनय, पराक्रम आदि इन केवल किन्हीं गुणों में सब प्रकार से अभि- निवेश प्राप्त बुद्धि से युक्त मत हो । और वैसे आगे—‘संसार की सारहीनता देखो ।’ इसी अर्थ को द्योतित करता हुआ स्पष्ट ही व्यञ्जकशक्ति से अनुगृहीत शब्द प्रतीत लोचनम् शरीरे प्रमातृत्वाभिमानः प्रमातुर्भोगायतनमात्रेऽपि । केवलेष्विति । परमेश्वरभ- क्त्युपकरणेषु तु न दोष इत्यर्थः । विभूतिषु रागिणो गुणेषु च निविष्टधियो मा भूतेति सम्बन्धः । अग्रे इति । अनुक्रमण्यनन्तरं यो भारतग्रन्थः तत्रेत्यर्थः । एवं संसार की वासना में आविष्ट ( लोगों ) का अङ्गरूप भी उस रस में उस प्रकार का अभिमान ( मान्यता ) होता है, जैसे भोग के आयतन मात्र शरीर में प्रमाता का प्रमातृत्व का अभिमान होता है । केवल—। अर्थात् किन्तु परमेश्वर की भक्ति के उपकरणों में तो दोष नहीं है । विभूतियों ( ऐश्वर्यों ) में रागयुक्त और गुणों में अभिनिवेश बुद्धि वाले मत बनो, यह सम्बन्ध है । आगे—। अर्थात् अनुक्रमणी के बाद जो भारत ग्रन्थ
५१४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः शब्दः । एवंविधमेवार्थं गर्भीकृतं सन्दर्शयन्तोऽनन्तरश्लोका लक्ष्यन्ते- 'स हि सत्यम्' इत्यादयः । अयं च निगूढरमणीयोऽर्थो महाभारतावसाने हरिवंशवर्णनेन समाप्तिं विदधता तेनैव कविवेधसा कृष्णद्वैपायनेन सम्यक्स्फुटीकृतः । अनेन चार्थेन संसारातीते तत्त्वान्तरे भक्त्यतिशयं प्रवर्तयता सकल एव सांसारिको व्यवहारः पूर्वपक्षीकृतो न्यक्षेण प्रकाशते । देवतातीर्थ- तपःप्रभृतीनां च प्रभावातिशयवर्णनं तस्यैव परब्रह्मणः प्राप्त्युपायत्वेन तद्विभूतित्वेनैव देवताविशेषाणामन्येषां च । पाण्डवादिचरितवर्णन- स्यापि वैराग्यजननतात्पर्याद्वैराग्यस्य च मोक्षमूलत्वान्मोक्षस्य च भगवत्प्राप्त्युपायत्वेन मुख्यतया गीतादिषु प्रदर्शितत्वात्परब्रह्मप्राप्त्यु- पायत्वमेव परम्परया । वासुदेवादिस्संज्ञाभिधेयत्वेन चापरिमितशक्त्या- होता है । बाद के श्लोक इसी प्रकार के गर्भीकृत अर्थ को सम्यक् निर्देश करते हुए मालूम पड़ते हैं—'क्योंकि वह सत्य है०' इत्यादि । और यह निगूढ़ एवं रमणीय अर्थ—महाभारत के अन्त में हरिवंशवर्णन से समाप्ति करते हुए उसी कविवेधा कृष्णद्वैपायन (व्यास) ने सम्यक् प्रकार से स्पष्ट कर दिया है । और इस अर्थ से अलौकिक तत्त्वान्तर में अधिक भक्ति को प्रवृत्त करते हुए सारा ही सांसारिक व्यवहार पूर्वपक्षीकृत होकर पूर्ण रूप से प्रकाशित है । और देवताओं, तीर्थों, तपों आदि का एवं उस (परब्रह्म) की विभूति के रूप में देवता विशेष और अन्य के अतिशय प्रभाव का वर्णन उसी पर ब्रह्म की प्राप्ति के उपाय के रूप में है । पाण्डव आदि के चरित के वर्णन का भी तात्पर्य वैराग्य का जनन होने से और वैराग्य का मूल मोक्ष के होने से, और मोक्ष का भगवान् की प्राप्ति के उपाय होने से मुख्य रूप से गीता आदि ग्रन्थों में प्रदर्शित होने के कारण परम्परया (पाण्डवादि चरित का वर्णन) परब्रह्म की प्राप्ति का उपाय ही है । और वासुदेव आदि संज्ञाओं द्वारा अभिधेय होने के कारण अपरिमित शक्ति का प्रतिष्ठान, पराऽपर लोचनम् ननु वसुदेवापत्यं वासुदेव इत्युच्यते, न परमेश्वरः परमात्मा महादेव इत्याश- ङ्कयाह—वासुदेवादिस्संज्ञाभिधेयत्वेनेति । है वहां वसुदेव का अपत्य (सन्तान) 'वासुदेव' कहा जाता है, न कि परमेश्वर, परमेश्वर, महादेव ?, यह आशङ्का करके कहते हैं—'वासुदेव' आदि संज्ञाओं द्वारा अभिधेय होने के कारण—।
चतुर्थ उद्योतः ५७५ ध्वन्यालोकः स्पदं परं ब्रह्म गीतादिप्रदेशान्तरेषु तदभिधानत्वेन लब्धप्रसिद्धि माथु- रप्रादुर्भावानुकृतसकलस्वरूपं विवक्षितं न तु माथुरप्रादुर्भावांश एव, सनातनशब्दविशेषितत्वात् । रामायणादिषु चानया सञ्ज्ञया भगवन्मू- र्त्यन्तरे व्यवहारदर्शनात् । निर्णीतश्चायमर्थः शब्दतत्त्वविद्भिरेव । ब्रह्म गीता आदि दूसरे स्थानों में उसी संज्ञा से उसके प्रसिद्ध होने के कारण, मथुरा में प्रादुर्भाव के अवसर में प्राप्त समग्र स्वरूप युक्त विवक्षित है न कि मथुरा में प्रादुर्भाव ( प्राप्त हुए कृष्ण ) का अंशमात्र ( विवक्षित है ); क्योंकि ( महाभारत के उपर्युक्त पद्यांश में ) 'सनातन' इस विशेषण रूप शब्द से विशेषित हैं । और रामायण आदि में इस संज्ञा से भगवान् की अन्य मूर्ति ( के विषय ) में व्यवहार देखा जाता है । और इस अर्थ का निर्णय शब्दतत्त्ववेत्ताओं ने ही किया है । लोचनम् बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वम्......। इत्यादौ अंशिरूपमेतत्संज्ञाभिधेयमिति निर्णीतं तात्पर्यम् । निर्णीतश्चेति । शब्दा हि नित्या एव सन्तोऽनन्तरं काकतालीयवशात्तथा सङ्केतिता इत्युक्तम्— 'ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्चे'त्यत्र । 'बहुत जन्मों के बाद ज्ञानी मुझे प्राप्त करता है । वासुदेव सब कुछ हैं—' ( गीता ७।१९ ) इत्यादि में 'अंशीरूप ( पर ब्रह्म ) इस संज्ञा का अभिधेय है' यह तात्पर्य निर्णय किया है । और निर्णय किया है—'ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च' इस ( पाणिनिसूत्र ) पर ( काशिकाकार ने ) कहा है कि शब्द नित्य ही होते हैं, बाद में काकतालीयवश उस प्रकार सङ्केतित हो जाते हैं ।^१ १ प्रश्न है कि जब 'वासुदेव' आदि संज्ञाएँ किसी समय मथुरा में प्रादुर्भूत वसुदेव के अपत्य रूप श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में प्रयुक्त हैं ऐसी स्थिति में अंशी परब्रह्म के अर्थ में उनके प्रयोग का कोई प्रामाणिक संकेत होना चाहिए । इसके समाधान में आनन्दवर्धन ने 'गीता' आदि में भी इस संज्ञा का अंशीभूत पारमार्थिक तत्त्व परब्रह्म में ही संकेत का निर्देश किया है— बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ ( गीता ७।१९ ) यहाँ 'वासुदेव सब कुछ है' यह कहते हुए 'वासुदेव' का अभिधेय परब्रह्म ही निर्णय किया है । जैसा कि आचार्य आनन्दवर्धन ने इस सम्बन्ध में शब्दतत्त्ववेत्ताओं का स्मरण किया है, लोचनकार ने काशिकाकार के वचन को उद्धृत किया है । उसका तात्पर्य यह है सभी शब्द नित्य होते हैं, किन्तु जब उनका किसी देश या काल से सम्बद्ध अनित्य वस्तु के लिए प्रयोग करते हैं तो उन्हें काकतालीयवश ( आकस्मिकता से, घटनावश ) उन अर्थों में सङ्केतित समझना चाहिए । प्रस्तुत में
५७६ | सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तदेवमनुक्रमणीनिर्दिष्टेन वाक्येन भगवद्व्यतिरेकिणः सर्वस्यान्य- स्यानित्यतां प्रकाशयता मोक्षलक्षण एवैकः परः पुरुषार्थः शास्त्रनये, काव्यनये च तृष्णाक्षयसुखपरिपोषलक्षणः शान्तो रसो महाभारतस्या- ङ्गित्त्वेन विवक्षित इति सुप्रतिपादितम् । अत्यन्तसारभूतत्वाच्चायमर्थो व्यङ्ग्यत्वेनैव दर्शितो न तु वाच्यत्वेन । सारभूतो ह्यर्थः स्वशब्दानभि- धेयत्वेन प्रकाशितः सुतरामेव शोभामावहति । प्रसिद्धिश्चेयमस्त्येव विदग्धविद्वत्परिषत्सु यदभिमततरं वस्तु व्यङ्ग्यत्वेन प्रकाश्यते न तो, इस प्रकार भगवान् के अतिरिक्त सबकी अनित्यता को प्रकाशित करते हुए अनुक्रमणी में निर्दिष्ट वाक्य से मोक्ष रूप ही एक अन्तिम पुरुषार्थ शास्त्रदृष्टि से (विवक्षित है) और काव्यदृष्टि से तृष्णा के क्षय से (उत्पन्न) सुख का परिपोष (वृद्धि) रूप शान्त रस महाभारत के अङ्गी के रूप में विवक्षित है, यह प्रतिपादन किया । और अत्यन्त सारभूत होने के कारण यह अर्थ व्यङ्ग्य रूप से ही दिखाया गया है, न कि वाच्य रूप से । क्योंकि सारभूत अर्थ अपने शब्द से अनभिधेय रूप से प्रकाशित (होकर) सुतरां ही शोभा प्राप्त करता है। और, विदग्धों, विद्वानों की परिषदों में यह प्रसिद्धि है ही कि अभिमततर (प्रियतर) वस्तु को व्यङ्ग्य लोचनम् शास्त्रनय इति । तत्रास्वादयोगाभावे पुरुषेणार्थ्यत इत्ययमेव व्यपदेशः सादरः, चमत्कारयोगे तु रसव्यपदेश इति भावः । एतच्च ग्रन्थकारेण तत्त्वा- लोके वितत्योक्तमिह त्वस्य न मुख्योऽवसर इति नास्माभिस्तद्दर्शितम् । सुतरामेवेति । यदुक्तं तत्र हेतुमाह—प्रसिद्धिश्चेति । चशब्दो यस्मदर्थे । यत इयं लौकिकी प्रसिद्धिरनादिस्ततो भगवद्व्यासप्रभृतीनामप्ययमेवास्वशब्दाभिधाने शास्त्रदृष्टि से—। भाव यह कि वहां आस्वाद के सम्बन्ध के अभाव में पुरुष द्वारा अर्थित होता है यही व्यपदेश आदरयुक्त है, चमत्कार के योग (सम्बन्ध) में तो रस का व्यपदेश है। और इसे ग्रन्थकार ने तत्त्वालोक में विस्तार करके कहा है यहां तो इसका मुख्य अवसर नहीं है अतः हमने नहीं दिखाया है। सुतरां ही—। यह जो कहा है वहाँ हेतु कहते हैं—और प्रसिद्धि है ही। 'और' ('च') शब्द 'जिस कारण' के 'वासुदेव' यह संज्ञा शब्द सनातन परब्रह्म का ही हमेशा से सूचक होता चला आ रहा था कि अकस्मात् मथुरा में प्रादुर्भूत अंशभूत वसुदेवपुत्र भगवान् कृष्ण के लिए भी प्रयुक्त होने लगा । इसी प्रकार महाभाष्य के टीकाकार 'कैयट' ने भी उपर्युक्त पाणिनि-सूत्र पर ही यह लिखा है— 'कथं पुनः नित्यानां शब्दानां अनित्यान्धकादिवंशाश्रयेणान्वाख्यानं युज्यते ? अत्र समाधिः । त्रिपुरुषानूकं नाम कुर्यादिति न्यायेनान्धकादिवंशा अपि नित्या एव । अथवाऽनित्योपाश्रयेणापि नित्यान्वाख्यानं दृश्यते । यथा शकाश्रयेण कालस्य ।'
चतुर्थ उद्योतः ५७७ ध्वन्यालोकः साक्षाच्छब्दवाच्यत्वेन । तस्मात्स्थितमेतत्—अङ्गिभूतरसाद्याश्रयेण काव्ये क्रियमाणे नवार्थलाभो भवति बन्धच्छाया च महती सम्पद्यत इति । अत एव च रसानुगुणार्थविशेषोपनिबन्धनमलङ्कारान्तरविरहेऽपि छायातिशययोगि लक्ष्ये दृश्यते । यथा— रूप से ही प्रकाशित किया जाता है न (कि) साक्षात् शब्द द्वारा वाच्य रूप से । अतः यह स्थिर हुआ—अङ्गिभूत रसादि के आश्रय से काव्य रचे जाने पर नये अर्थ का लाभ होता है और बन्ध की छाया (शोभा) अधिक (महती) होती है। और इसी लिए रस के अनुगुण (अनुरूप) अर्थ-विशेष का उपनिबन्ध अलङ्कारान्तर के अभाव में भी लक्ष्य (काव्य) में अतिशयशोभायुक्त देखा जाता है। जैसे— लोचनम् आशयः, अन्यथा हि क्रियाकारकसम्बन्धादौ ‘नारायणं नमस्कृत्ये’त्यादिशब्दा- र्थनिरूपणे च तथाविध एव तस्य भगवत आशय इत्यत्र किं प्रमाणमिति भावः । विदग्धविद्वद्ग्रहणेन काव्यनये शास्त्रनय इति चानुसृतम् । रसादिमय एतस्मिन् कविः स्यादवधानवानिति यदुक्तं, तदेव प्रसङ्गागतभारतसम्बन्धनि- रूपणानन्तरमुपसंहरति—तस्मात्स्थितमिति । अत इति । यत एवं स्थितमत एवेदमपि यल्लक्ष्ये दृश्यते, तदुपपन्नमन्यथा तदनुपपन्नमेव, न च तदनुपपन्नम्; चारुत्वेन प्रतीतेः । तस्याश्चैतदेव कारणं रसानुगुणार्थत्वमेवेत्याशयः । अलङ्कारा- न्तरेति । अन्तरशब्दो विशेषवाची। यदि वा दित्सिते उदाहरणे रसवदलङ्कारस्य विद्यमानत्वात्तदपेक्षयालङ्कारान्तरशब्दः । अर्थ में । जिस कारण यह लौकिक प्रसिद्धि अनादि है उस कारण भगवान् व्यास प्रभृतियों का भी यही अपने शब्द से न कथन में आशय है, अन्यथा क्योंकि क्रिया-कारक सम्बन्ध आदि में 'नारायण को नमस्कार करके' इत्यादि शब्द के निरूपण में उस प्रकार का ही उन भगवान् का आशय है, यहां क्या प्रमाण है ? यह भाव है । ‘विदग्ध' और 'विद्वान्' के ग्रहण से काव्यदृष्टि से शास्त्रदृष्टि से इसका अनुसरण किया है । 'रसादिरूप इसमें कवि सावधान हो' यह जो कहा है उसे ही प्रसंग से प्राप्त 'भारत' के सम्बन्ध में निरूपण के बाद उपसंहार करते हैं—अतः यह स्थित हुआ—। इस कारण—। जिस कारण इस प्रकार स्थिर हुआ इस कारण ही यह भी लक्ष्य में देखा जाता है, वह संगत (उपपन्न) है, अन्यथा अनुपपन्न ही है, किन्तु वह अनुपपन्न नहीं है, क्योंकि चारु रूप से प्रतीत होता है । अन्तर' शब्द विशेष का वाचक है । अथवा देने के लिए इच्छित उदाहरण में रसवदलङ्कार के विद्यमान होने के कारण उसकी अपेक्षा से ‘अलङ्कारान्तर’ शब्द है । ३७ ध्व०
५७८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः मुनिर्जयति योगीन्द्रो महात्मा कुम्भसम्भवः । येनैकचुलके दृष्टौ तौ दिव्यौ मत्स्यकच्छपौ ॥ इत्यादौ। अत्र ह्यद्भुतरसानुगुणमेकचुलके मत्स्यकच्छपदर्शनं छायातिशयं पुष्णाति। तत्र ह्येकचुलके सकलजलधिसन्निधानादपि दिव्यमत्स्यकच्छपदर्शनमक्षुण्णत्वादद्भुतरसानुगुणतरम्। क्षुण्णं हि वस्तु लोकप्रसिद्ध्याद्भुतमपि नाश्चर्यकारि भवति। न चाक्षुण्णं वस्तूप- निबध्यमानमद्भुतरसस्यैवानुगुणं यावद्रसान्तरस्यापि। तद्यथा— योगियों में श्रेष्ठ, महात्मा अगस्त्य (कुम्भसम्भव) मुनि की जय हो, जिन्होंने एक चुल्लू में उन दिव्य मत्स्य और कच्छप को देख लिया। इत्यादि में। यहां अद्भुत रस के अनुकूल एक चुल्लू में मत्स्य और कच्छप का दर्शन अधिक शोभातिशय को पोषण करता है। वहां एक चुल्लू में पूरे समुद्र के सन्निधान से भी दिव्य मत्स्य और कच्छप का दर्शन क्षुण्ण (अभ्यस्त) न होने के कारण अद्भुत रस के अधिक अनुकूल है। क्योंकि अभ्यस्त वस्तु लोक की प्रसिद्धि के कारण अद्भुत भी (होकर) आश्चर्यकारी नहीं होती। और अनभ्यस्त वस्तु का उपनिबन्धन केवल अद्भुत रस के ही अनुकूल नहीं होता बल्कि दूसरे रस के भी। वह जैसे— लोचनम् ननु मत्स्यकच्छपदर्शनात्प्रतीयमानं यदेकचुलके जलनिधिसन्निधानं ततो मुनेर्माहात्म्यप्रतिपत्तिरिति न रसानुगुणेनार्थेन च्छायापोषितेत्याशङ्क्याह— अत्र हीति। नन्वेवं प्रतीयमानं जलनिधिदर्शनमेवाद्भुतानुगुणं भवतीति रसानुगुणोऽत्र वाच्योऽर्थ इत्यस्मिन्नंशे कथमिदमुदाहरणमित्याशङ्क्याह—तत्रे- ति। क्षुण्णं हीति। पुनः पुनर्वर्णननिरूपणादिना यत्पिष्टपिष्टत्वादतिनिर्भिन्नस्व- रूपमित्यर्थः। बहुतरलक्ष्यव्यापकञ्चैतदिति दर्शयति—न चेत्यादिना। रथ्या- मत्स्य और कच्छप के दर्शन से प्रतीयमान जो एक चुल्लू में जलराशि का सन्निधान है उससे मुनि के माहात्म्य का ज्ञान होता है, न कि रस के अनुकूल अर्थ से शोभा (छाया) पोषित है, यह आशङ्का करके कहते हैं—यहां—। इस प्रकार प्रतीयमान जलराशि का दर्शन ही अद्भुत (रस) के अनुकूल हो, (इस प्रकार) 'रस के अनुकूल यहां वाच्य अर्थ है' इस अंश में, कैसे यह उदाहरण है? यह आशङ्का करके कहते हैं—वहां।—क्योंकि अभ्यस्त—। अर्थात् बार-बार वर्णन (और) निरूपण आदि द्वारा जो पिष्ट-पिष्ट हो जाने से अत्यन्त निर्भिन्न-स्वरूप है। और यह बहुत लक्ष्यों में व्यापक है, यह दिखाते हैं—और अनभ्यस्त इत्यादि से। रथ्या-
चतुर्थ उद्योतः ५७९ ध्वन्यालोकः सिज्जइ रोमञ्चिज्जइ वेवइ रत्थातुलग्गपडिलग्गो । सोपासो अज्ज वि सुहअ जेणासि बोलीणो ॥ एतद्गाथार्थाद्भाव्यमानाद्या रसप्रतीतिर्भवति, सा त्वां स्पृष्ट्वा स्विद्य- ति रोमाञ्चते वेपते इत्येवंविधादर्थात्प्रतीयमानान्मनागपि नो जायते । तदेवं ध्वनिप्रभेदसमाश्रयेण यथा काव्यार्थानां नवत्वं जायते तथा प्रतिपादितम् । गुणीभूतव्यङ्ग्यस्यापि त्रिभेदव्यङ्ग्यापेक्षया ये प्रकारा- 'हे सुभग, वह पार्श्वभाग, जो गली में (मेरी सखी का) तुमसे अनजाने में छू गया था और तुम चले गए थे, आज भी स्वेद, रोमाञ्च और कम्प से युक्त हो रहा है ।' इस गाथा के भावित होते हुए अर्थ से जो रस की प्रतीति होती है वह 'तुम्हें देखकर पसीज जाती है, रोमाञ्चित हो जाती है, कांपने लगती है' इस प्रकार के प्रतीत हुए अर्थ से, थोड़ी भी नहीं उत्पन्न होती है । तो इस प्रकार ध्वनि-प्रभेद के समाश्रयण से जैसे काव्य के अर्थों का नवत्व हो जाता है उस प्रकार प्रतिपादन किया । गुणीभूतव्यङ्ग्य के भी तीन भेद वाले व्यङ्ग्य की लोचनम् यान्तुलाग्रेण काकतालीयेन प्रतिलग्नस्साम्मुख्येन स पार्श्वोऽद्यापि सुभग तस्या येनास्यतिक्रान्तः । रसप्रतीतिरिति । परस्परहेतुकशृङ्गारप्रतीतिः । अस्यार्थस्य रसानुगुणत्वं व्यतिरेकद्वारेण द्रढयति—सा त्वामित्यादिना । 'ध्वनेर्यस्सगुणीभूतव्यङ्ग्यस्याध्वा प्रदर्शित' इत्युद्योतारम्भे यः श्लोकः तत्र ध्वनेरध्वना कवीनां प्रतिभागुणोऽनन्तो भवतीत्येष भागो व्याख्यात इत्युपसंहरति—तदेवमित्यादिना । सगुणीभूतव्य- ङ्ग्यस्येत्यमुं भागं व्याचष्टे—गुणीभूतेत्यादिना । त्रिप्रभेदो वस्त्वलङ्काररसात्मना यो व्यङ्ग्यः तस्य यापेक्षा वाच्ये गुणीभावः तयेत्यर्थः । तत्र सर्वे ये ध्वनिभेदा- ( गली ) में तुलाग्र ( काकतालीय ) से छू गया हुआ, सामने से वह पार्श्व आज भी हे सुभग उसका जिससे तुम चले गए थे । रस की प्रतीति—। परस्पर हेतु वाले शृङ्गार की प्रतीति । इस अर्थ का रसानुकूलत्व व्यतिरेक द्वारा दृढ़ करते हैं—वह तुझे० इत्यादि से । 'गुणीभूत व्यङ्ग्य के सहित ध्वनि का जो मार्ग दिखाया गया है ।' यह उद्योत के आरम्भ में जो श्लोक है उसमें ध्वनि के मार्ग से कवियों का प्रतिभागुण अनन्त हो जाता है, यह भाग व्याख्यान किया, इसे उपसंहार करते हैं— तो इस प्रकार० इत्यादि से । 'गुणीभूतव्यङ्ग्य के सहित' इस भाग का व्याख्यान करते हैं—गुणीभूत० इत्यादि से । अर्थात् तीन प्रभेदों वाला वस्तु, अलङ्कार और रस के रूप में जो व्यङ्ग्य है उसकी जो अपेक्षा अर्थात् वाच्य में गुणीभाव उससे ।
५८० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः स्तत्समाश्नयेणापि काव्यवस्तूनां नवत्वं भवत्येव । तच्चातिविस्तारका- रीति नोदाहृतं सहृदयैः स्वयमुत्प्रेक्षणीयम् ॥ ५ ॥ अपेक्षा से जो प्रकार हैं उनके समाश्रयण से भी काव्य की वस्तुओं का नवत्व हो ही जाता है। वह तो ज्यादा विस्तार करेगा इसलिए उदाहृत नहीं किया, सहृदय लोग स्वयं उत्प्रेक्षा कर लें ॥ ५ ॥ लोचनम् स्तेषां गुणीभावादानन्त्यमिति तदाह—अतिविस्तारेति । स्वयमिति । तत्र वस्तुना व्यंग्येन गुणीभूतेन नवत्वं सत्यपि पुराणार्थस्पर्शे यथा ममैव— भअविहलरक्खणैकमल्लसरणागआणअत्थाण । खणमत्तं विण दिण्णा विस्सामकहेत्ति जुत्तमिणम् ॥ अत्र त्वमनवरतमर्थांस्त्यजसीति औदार्यलक्षणं वस्तु ध्वन्यमानं वाच्यस्यो- पस्कारकं नवत्वन्ददाति, सत्यपि पुराणकविस्पृष्टेऽर्थे । तथाहि पुराणी गाथा— चाइअणकरपम्पपरसञ्चारणखे अनिस्ससहससरीरा । अत्था किवणघरत्था सथ्नापथ्थास्ववंतीव ॥ अलङ्कारेण व्यङ्ग्येन वाच्योपस्कारे नवत्वं यथा ममैव— वसन्तमत्तालिपरम्परोपमाः कचास्तवासन् किल रागवृद्धये । श्मशानभूभागपरागभासुराः कथन्तदेतेन मनागिवरक्तये ॥ वहां सब जो ध्वनि के भेद हैं उनके गुणीभाव से आनन्त्य है, उसे कहते हैं—अत्यन्त विस्तार—। स्वयं—। वहां, गुणीभूत व्यङ्ग्य वस्तु से नवत्व, पुराने अर्थ का स्पर्श होने पर भी, जैसे मेरा ही— ‘भय से व्याकुल हो, रक्षा करने में एक ही मल्ल ( तुम्हारी ) शरण में आए हुए अर्थों ( धनों ) को क्षणमात्र भी ( तुमने ) विश्राम नहीं दिया, यह ठीक है ?’ यहां ‘तुम हमेशा अर्थों को त्याग देते हो’ यह औदार्य रूप ध्वन्यमान वस्तु वाच्य का उपस्कारक होकर नवत्व अर्पित करता है, पुराने कवि द्वारा स्पृष्ट अर्थ के होने पर भी । जैसी कि पुरानी गाथा है— ‘त्यागिजनों के हाथों की परम्परा में सञ्चार करने के खेद से थके-मांदे शरीर वाले अर्थ ( धन ) कृपण के घर में स्थित ( होने से ) स्वस्थ अवस्था वाले ( होकर ) शयन करते हैं ।’ व्यङ्ग्य अलङ्कार द्वारा वाच्य का उपस्कार होने पर नवत्व, जैसे—मेरा ही, । ( पहले ) बसन्त के मतवाले भौरों के समूह की उपमा वाले तेरे बाल राग ( लाली-प्रेम ) की वृद्धि के लिए थे, ( अब ) श्मशान के भूभाग की धूल की भांति
चतुर्थ उद्योतः ५८१ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः ध्वनेरित्थं गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य च समाश्रयात् । न काव्यार्थविरामोऽस्ति यदि स्यात्प्रतिभागुणः ॥६॥ 'ध्वनि के और गुणीभूतव्यङ्ग्य के इस प्रकार समाश्रय से काव्य के अर्थ का विराम नहीं है यदि प्रतिभा रूप गुण हो।' लोचनम् अत्र ह्याक्षेपेण विभावनया च ध्वन्यमानाभ्यां वाच्यमुपस्कृतमिति नवत्वं सत्यपि पुराणार्थयोगित्वे । तथाहि पुराणश्लोकः— क्षुत्तृष्णाकाममात्सर्यं मरणाच्च महद्भयम् । पञ्चैतानि विवर्धन्ते वार्धके विदुषामपि ॥ इति । व्यङ्ग्येन रसेन गुणीभूतेन वाच्योपस्कारेण नवत्वं यथा ममैव— जरा नेयं मूर्ध्नि ध्रुवमयमसो कालभुजगः क्रुधान्धः फूत्कारैः स्फुटगरलफेनान् प्रकिरति ॥ तदेनं संपश्यत्यथ च सुखितम्मन्यहृदयः शिवो पायन्नेच्छन् बत बत सुधीरः खलु जनः ॥ अत्राद्भुतेन व्यङ्ग्येन वाच्यमुपस्कृतं शान्तरसप्रतिपत्त्यङ्गत्वाच्चारु भवतीति नवत्वं सत्यप्यस्मिन् पुराणश्लोके— जराजीर्णशरीरस्य वैराग्यं यत्र जायते, तन्नूनं हृदये मृत्युर्दृढन्नास्तीति निश्चयः ॥ ५ ॥ चमकने वाले ये (तेरे बाल) क्यों नहीं थोड़ी (भी) विरक्ति के लिए (होते हैं) ! यहाँ ध्वनित होते हुए 'आक्षेप' से और 'विभावना' अलङ्कारों से वाच्य उपस्कृत हुआ है, यह नवत्व है, पुराने अर्थ का सम्बन्ध होने पर भी। जैसा कि पुराना श्लोक है— 'भूख, तृष्णा, काम, देखजरनी और मरने का बड़ा डर, पाँच ये विद्वानों के भी बूढ़ा होने पर बढ़ते हैं।' व्यङ्ग्य एवं गुणीभूत रस द्वारा वाच्य के उपस्कार से नवत्व, जैसे मेरा ही— 'सिर पर यह बुढ़ापा नहीं है, निश्चय ही यह कालरूपी सर्प (बैठा) है, (जो) क्रोध से अन्धा, फू-फू करके स्पष्ट ही विष के फेनों को उगल रहा है, तो इसे (आदमी) खूब देखता है और हृदय में सुखी मान लेता है, कल्याण के उपाय की इच्छा न करता हुआ मनुष्य हन्त-हन्त बड़ा धीर (बन बैठा है।' यहाँ व्यङ्ग्य अद्भुत द्वारा वाच्य उपस्कृत (होकर) शान्त रस के बोध का अङ्ग होने के कारण चारु हो जाता है, यह नवत्व है, इस पुराने श्लोक के होते हुए भी— 'बुढ़ापे से जर्जर शरीर वाले (व्यक्ति) के जो वैराग्य उत्पन्न नहीं होता, वह निश्चय ही (उसके) हृदय में 'मृत्यु दृढ़ (अवश्यम्भावी) नहीं है' ऐसा निश्चय हो चुका है।'
५८२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सत्स्वपि पुरातनकविप्रबन्धेषु यदि स्यात्प्रतिभागुणः, तस्मिंस्त्व- सति न किञ्चिदेव कवेर्वस्त्वस्ति । बन्धच्छायाप्यर्थद्वयानुरूपशब्द- सन्निवेशोऽर्थप्रतिभानाभावे कथमुपपद्यते । अनपेक्षितार्थविशेषाक्षररचनैव बन्धच्छायेति नेदं नेदीयः सहृदयानाम् । एवं हि सत्यर्थानपेक्षचतुर- मधुरवचनरचनायामपि काव्यव्यपदेशः प्रवर्तेत । शब्दार्थयोः साहित्येन पुराने कवियों के प्रबन्धों के होने पर भी, यदि प्रतिभा रूप गुण हो; उसके न होने पर कवि के लिए कोई वस्तु नहीं है । दोनों अर्थों (ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य) के अनुरूप शब्द का संनिवेश रूप बन्धच्छाया भी अर्थ के प्रतिभान के अभाव में कैसे बन (सकती) है ? अर्थ की अपेक्षा न करके अक्षररचना ही बन्धच्छाया है, यह सहृदयों के नेदीयस् (निकटतर) नहीं है । क्योंकि ऐसा होने पर अर्थ की अपेक्षा न रखने वाले चतुर (और) मधुर वचन की रचना में भी काव्य का व्यवहार चल पड़ेगा । शब्द और अर्थ के साहित्य से काव्यत्व के होने पर कैसे उस प्रकार के विषय में लोचनम् सत्स्वपीत्यादि कारिकाया उपस्कारः । त्रीन् पादान् स्पष्टान्मत्वा तुर्यं पादं व्याख्यातुं पठति—यदीति । विद्यमानो ह्यसौ प्रतिभागुण उक्तरीत्या भूयान् भवति, न त्वत्यन्तासन्नेवेत्यर्थः । तस्मिन्निति । अनन्तीभूते प्रतिभागुणे । न किञ्चिदेवेति । सर्वं हि पुराणकविनैव स्पृष्टमिति किमिदानीं वर्ण्यं, यत्र कवेर्व- र्णनाव्यापारस्स्यात् । ननु यद्यपि वर्ण्यमपूर्वन्नास्ति, तथाप्युक्तिपरिपकगुम्फ- घटनाद्यपरपर्यायबन्धच्छाया नवनवा भविष्यति । यन्निवेशने काव्यातन्तराणां संरम्भ इत्याशङ्क्याह—बन्धच्छायापीति । अर्थद्वयं गुणीभूतव्यंग्यं प्रधानभूतं व्यंग्यं च । नेदीय इति । निकटतरं हृदयाननुप्रवेशि न भवतीत्यर्थः । अत्र हेतु- माह—एवं हि सतीति । चतुरत्वं समाससङ्घटना । मधुरत्वमपारुष्यम् । होने पर भी—। यह कारिका का उपस्कार (प्रतिपादन) है ! तीन पादों को स्पष्ट मान कर चौथे पाद का व्याख्यान करने के लिए पढ़ते हैं—यदि—। अर्थात् क्योंकि विद्यमान वह प्रतिभा रूप गुण उक्त रीति से बहुत हो जाता है, न कि अत्यन्त न विद्यमान ही । उसके—। अनन्त प्रतिभारूप गुण के । नहीं कोई ही—। सब तो पुराने कवि ने ही स्पर्शकर लिया तो अब वर्णनीय क्या है ? जहां कवि का वर्णना- व्यापार हो ? यद्यपि वर्णनीय अपूर्व नहीं है, तथापि उक्ति के परिपाक के गूंथने की घटना, दूसरे शब्द में छाया, नई-नई हो जायगी । जिसके निवेशन में दूसरे काव्यों का संरम्भ (उपक्रम) है, यह आशङ्का करके कहते हैं—बन्धच्छाया भी—। दो अर्थ गुणीभूतव्यङ्ग्य और प्रधानभूत व्यङ्ग्य । नेदीयस्—। निकटतर, अर्थात् हृदय में प्रवेश कर जाने वाला, नहीं होता है । यहां हेतु कहते हैं—क्योंकि ऐसा होने पर—।
चतुर्थ उद्योतः ५८३ ध्वन्यालोकः काव्यत्वे कथं तथाविधे विषये काव्यव्यवस्थेति चेत्—परोपनिबद्धार्थ- विरचने यथा तत्काव्यत्वव्यवहारस्तथा तथाविधानां काव्यसन्द- र्भाणाम् ॥ ६ ॥ न चार्थानन्त्यं व्यङ्ग्यार्थापेक्षयैव यावद्वाच्यार्थापेक्षयापीति प्रतिपादयितुमुच्यते— अवस्थादेशकालादिविशेषैरपि जायते । आनन्त्यमेव वाच्यस्य शुद्धस्यापि स्वभावतः ॥ ७ ॥ शुद्धस्यानपेक्षितव्यङ्ग्यस्यापि वाच्यस्यानन्त्यमेव जायते स्वभा- काव्य की व्यवस्था (होगी?)। (इस पर कहते हैं कि) दूसरे द्वारा उपनिबद्ध अर्थ के बनाने में जैसे वह काव्य का व्यवहार (है) वैसे उस प्रकार (अर्थ की अपेक्षा न रखने वाले) काव्यसन्दर्भों का ॥ ६ ॥ न केवल अर्थ का आनन्त्य, व्यङ्ग्य अर्थ की अपेक्षा से ही है वरन् वाच्य अर्थ की अपेक्षा से भी है—यह प्रतिपादन करने के लिए कहते हैं— अवस्था, देश, काल आदि के विशेषों (भेदों) से भी स्वभाव से शुद्ध भी वाच्य का आनन्त्य ही होता है। शुद्ध (अर्थात्) व्यङ्ग्य की अपेक्षा न रखने वाले भी वाच्य का आनन्त्य ही लोचनम् तथाविधानामिति । अपूर्वबन्धच्छायायुक्तानामपि परोपनिबद्धार्थनिबन्धने पर- कृतकाव्यत्वव्यवहार एव स्यादित्यर्थस्यापूर्वत्वमाश्रयणीयम् । कवनीयं काव्यं तस्य भावः काव्यत्वं, न त्वयं भावप्रत्ययान्तात् भावप्रत्यय इति शङ्कितव्यम् । प्रतिपादयितुमिति । प्रसङ्गादिति शेषः । यदि वा वाच्यन्तावद्द्विविधव्यङ्ग्यो- पयोगि तदेव चेदनन्तं तद्बलादेव व्यंग्यानन्त्यं भवतीत्यभिप्रायेणेदं प्रकृत- मेवोच्यते । शुद्धस्येति । व्यंग्यविषयो यो व्यापारः तत्स्पर्शं विनाप्यानन्त्यं चतुरत्व (अर्थात्) समास की संघटना। मधुरत्व (अर्थात्) पारुष्य का अभाव। उस प्रकार के—। अपूर्व (जो पहले न हो) बन्धच्छाया से युक्त (काव्य-सन्दर्भों) के भी दूसरे (कवि द्वारा) उपनिबद्ध अर्थ के निबन्धन में दूसरे (कवि) द्वारा बनाया गया काव्य का व्यवहार ही होगा, अतः अर्थ के अपूर्वत्व का आश्रयण करना चाहिए। कवनीय (वर्णनीय) काव्य, उसका भाव काव्यत्व, न कि यह भाव-प्रत्ययान्त (काव्य शब्द) से भाव-प्रत्यय हुआ है, यह शङ्का करनी चाहिए। प्रतिपादन करने के लिए—। प्रसङ्ग से—यह शेष है। अथवा वाच्य दो प्रकार के व्यङ्ग्य का उपयोगी है, वही अनन्त है तो उसके बल से ही व्यङ्ग्य का आनन्त्य हो जाता है—इस अभिप्राय से यह प्रकृत ही कहा गया है। शुद्ध वाच्य का—।
५८४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
वतः । स्वभावो ह्ययं वाच्यानां चेतनानामचेतनानां च यदवस्थाभेदा- देशभेदात्कालभेदात्स्वालक्षण्यभेदाच्चानन्तता भवति । तैश्च तथाव्यव- स्थितैः सद्भिः प्रसिद्धानकस्वभावानुसारणरूपया स्वभावोक्त्यापि ताव- दुपनिबध्यमानैरनिरवधिः काव्यार्थः सम्पद्यते । तथा ह्यवस्थाभेदान्नवत्वं यथा—भगवती पार्वती कुमारसम्भवे 'सर्वोपमाद्रव्यसमुच्चयेन' इत्या- दिभिरुक्तिभिः प्रथममेव परिसमापितरूपवर्णनापि पुनर्भगवतः शम्भो- र्लोचनगोचरमायान्ती 'वसन्तपुष्पाभरणं वहन्ती' मन्मथोपकरणभूतेन भङ्ग्यन्तरेणोपवर्णिता । सैव च पुनर्नवोद्वाहसमये प्रसाध्यमाना 'तां प्राङ्मुखीं तत्र निवेश्य तन्वीम्' इत्याद्युक्तिभिर्नवेनैव प्रकारेण निरूपि- स्वभावतः उत्पन्न होता है। क्योंकि यह चेतनों और अचेतनों का स्वभाव ही है कि अवस्था के भेद से, देश के भेद से, काल के भेद से और स्वालक्षण्य ( स्वरूप ) के भेद से अनन्तता होती है। और उनके उस प्रकार व्यवस्थित होने से प्रसिद्ध अनेक स्वभावों के अनुसरण रूप वाली स्वभावोक्ति से भी उपनिबध्यमान ( वाच्यार्थों से ) अवधिशून्य काव्यार्थ सम्पन्न होता है। अवस्था के भेद से नवत्व, जैसे—भगवती पार्वती 'कुमार-सम्भव' में 'समस्त उपमाद्रव्य के समूह से०' इत्यादि उक्तियों द्वारा पहले ही परिसमाप्त रूप के वर्णन से युक्त होकर भी पुनः भगवान् शिव के लोचन- गोचर होती हुई 'बसन्त के पुष्पों का आभरण धारण करती हुई' मन को मथन करने वाले ( कामदेव ) के उपकरण ( सामग्री ) हुए दूसरे प्रकार से उपवर्णित हैं। और वही फिर नये विवाह के समय में प्रसाधित होती हुई ( भगवती पार्वती ) का
लोचनम्
स्वरूपमात्रेणैव पश्चात्तु तथा स्वरूपेणानन्तं सव्यङ्ग्यं व्यक्तीति भावः । न तु सर्वथा तत्र व्यङ्ग्यं नास्तीति मन्तव्यमात्मभूततद्रूपाभावे काव्यव्यवहारहानेः; तथा चोदाहरणेषु रसध्वनेस्सद्भावोऽस्त्येव । आदिग्रहणं व्याचष्टे—स्वालक्ष- ण्यति । स्वरूपेत्यर्थः । यथा रूपस्पर्शयोस्तीव्रैकावस्थयोरेकद्रव्यनिष्ठयोरेक कालयोश्च । भाव यह कि व्यङ्ग्य-विषयक जो व्यापार है उसके स्पर्श के बिना भी आनन्त्य स्वरूप मात्र से ही है, पीछे तो इस प्रकार स्वरूप से अनन्त होता हुआ व्यङ्ग्य को व्यक्त करता है। न कि सब प्रकार से वहां व्यङ्ग्य नहीं है यह मानना चाहिए क्योंकि आत्मा रूप उस ( व्यङ्ग्यरूप ) के अभाव में काव्य के व्यवहार की हानि होगी। और जैसा कि उदाहरणों में रसध्वनि का सद्भाव है ही। आदि के ग्रहण का व्याख्यान करते हैं—स्वालक्षण्य—। स्वरूप' यह अर्थ है। जैसे, तीव्र एक अवस्था वाले, एक द्रव्य में रहने वाले और एक काल में उत्पन्न रूप और स्पर्श का ।
चतुर्थ उद्योतः ५८५ ध्वन्यालोकः तरूपसौष्ठवा । न च ते तस्य कवेरेकत्रैवासकृत्कृता वर्णनप्रकारा अपुन- रुक्तत्वेन वा नवनवार्थनिर्भरत्वेन वा प्रतिभासन्ते । दर्शितमेव चैतद्वि- षमबाणलीलायाम्— ण अ ताण घडइ ओही ण अ ते दीसन्ति कह वि पुनरुत्ता । जे विब्भमा पिआणं अत्था वा सुकइवाणीणम् ॥ अयमपरश्चावस्थाभेदप्रकारो यदचेतनानां सर्वेषां चेतनं द्वितीयं रूपमभिमानित्वप्रसिद्धं हिमवद्गङ्गादीनाम् । तच्चोचितचेतनविषयस्वरूप- ‘उस कृश शरीर वाली को पूर्व की ओर मुँह करके बैठाकर’ इत्यादि उक्तियों से नये ही प्रकार से रूप के सौष्ठव का निरूपण है । उस कवि के, एक जगह ही वार- बार किए गए वे वर्णन-प्रकार फिर नहीं कहे गए (अपुनरुक्त) रूप से अथवा नये नये अर्थों से भरे (नवनवार्थनिर्भर) रूप से प्रतिभासित नहीं होते हैं । इसे ‘विषम- बाणलीला’ में दिखाया ही है— ‘जो प्रियाओं के विभाव (हाव-भाव) अथवा सुकवि की वाणियों के अर्थ हैं उनकी अवधि (समाप्ति) नहीं होती है, किसी प्रकार वे पुनरुक्त नहीं प्रतीत होते हैं।’ और यह दूसरा अवस्थाभेद का प्रकार है जो हिमवान् और गङ्गा आदि समस्त अचेतनों का चेतन दूसरा रूप अभिमानी रूप से प्रसिद्ध है । और वह उचित चेतन- सम्बन्धी स्वरूप की योजना से उपनिबध्यमान होकर अन्य हो जाता है । जैसे, लोचनम् न च तेषां घटतेऽवधिः, न च ते दृश्यन्ते कथमपि पुनरुक्ताः । ये विभ्रमाः प्रियाणामर्था वा सुकविवाणीनाम् ॥ चकाराभ्यामतिविस्मयस्सूच्यते । कथमपीति । प्रयत्नेनापि विचार्यमाणं पौनरुक्त्यं न लभ्यमिति यावत् । प्रियाणामिति । बहुवल्लभो हि सुभगो राधाव- ल्लभप्रायस्तास्ताः कामिनीः परिभोगसुभगमुपभुञ्जानोऽपि न विभ्रमपौनरुक्त्यं पश्यति तदा । एतदेव प्रियात्वमुच्यते, यदाह— दो चकारों (‘और’ के प्रयोगों) से अत्यन्त विस्मय सूचित होता है । किसी प्रकार—। प्रयत्न से भी विचार किया जाय (तो भी) पौनरुक्त्य नहीं मिलेगा, यह भाव है । प्रियाओं का—। बहुत वल्लभाओं वाला सुभग (नायक) राधा के प्रिय (कृष्ण) के सदृश, उन उन कामिनियों का परिभोग के सुभग प्रकार से उपभोग करता हुआ भी विभ्रम के पौनरुक्त्य को तब नहीं देखता । यही ‘प्रियात्व’ कहा जाता है, जो कहा है—
५८६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः योजनयोपनिबध्यमानमन्यदेव सम्पद्यते । यथा कुमारसम्भवे एव पर्वतस्वरूपस्य हिमवतो वर्णनं, पुनः सप्तर्षिप्रयोक्तिषु चेतनतत्स्वरूपा- पेक्षया प्रदर्शितं तदपूर्वमेव प्रतिभाति । प्रसिद्धश्चायं सत्कवीनां मार्गः । इदं च प्रस्थानं कविव्युत्पत्तये विषमबाणलीलायां सप्रपञ्चं दर्शितम् । चेतनानां च बाल्याद्यवस्थाभिरन्यत्वं सत्कवीनां प्रसिद्धमेव । चेतना- नामवस्थाभेदेऽप्यवान्तरावस्थाभेदान्नानात्वम् । यथा कुमारीणां कुसुम- शरभिन्नहृदयानामन्यासां च । तत्रापि विनीतानामविनीतानां च । अचेतनानां च भावानामारम्भाद्यवस्थाभेदभिन्नानामेकैकशः स्वरूपमुप- निबध्यमानमानन्त्यमेवोपयाति । यथा— हंसानां निनदेषु यैः कवलितैरासज्यते कूजता- 'कुमारसम्भव' में ही पर्वत स्वरूप हिमवान् का वर्णन है, फिर सप्तर्षियों की प्रिय उक्तियों में चेतन उसके स्वरूप की अपेक्षा से दिखाया गया है, वह अपूर्व ही मालूम पड़ता है । और यह सत्कवियों का मार्ग प्रसिद्ध है । और यह प्रस्थान कवियों की व्युत्पत्ति के लिए 'विषमबाणलीला' में प्रपञ्च के साथ दिखाया है । और चेतनों का बाल्य आदि अवस्थाओं से अन्य होना सत्कवियों के प्रसिद्ध ही है । चेतनों का अवस्थाभेद में भी अवान्तर अवस्थाभेद से नानात्व है, जैसे कामदेव के बाणों से बिंधे हृदय वाली कुमारियों का, और दूसरी (नायिकाओं) का । वहाँ भी विनीतों का और अविनीतों का । और आरम्भ आदि अवस्थाओं के भेद से भिन्न अचेतन भावों का एक-एक करके स्वरूप उपनिबध्यमान होकर आनन्त्य को ही प्राप्त करता है । जैसे— 'कूंजते हुए हंसों की आवाजों में जो कोई दूसरा कसैले कंठ में लोटने से घर- लोचनम् क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयताया इति । प्रियाणामिति चासंसारं प्रवृद्धरूपो योऽयं कान्तानां विभ्रमविशेषः स नवनव एव दृश्यते । न ह्यसावग्निचयनादिवदन्यतशिक्षितः, येन तत्सादृश्या- त्पुनरुक्ततां गच्छेत् । अपि तु निसर्गोद्भिद्यमानमदनाङ्कुरविकासमात्रान्तदिति 'क्षण-क्षण में जो नवत्व प्राप्त करता है रमणीयता का वही रूप है।' प्रियाओं का—। संसार के अस्तित्व से लेकर प्रवाहित होता हुआ जो यह कान्ताओं का विभ्रम विशेष है वह नया-नया ही दिखाता है । न कि वह 'अग्निचयनादि' (यज्ञक्रियाओं) की तरह अन्य से सीखा गया है, जिससे उसके समान होने से पुनरुक्तता को प्राप्त करता । अपि तु यह स्वभाव से उकसते हुए मदनाङ्कुर का विकासमात्र है, इसलिए
चतुर्थ उद्योतः ५८७ ध्वन्यालोकः मन्यः कोऽपि कपायकण्ठलुठनादाघर्घरो विश्रमः । ते सम्प्रत्यकठोरवारणवधूदन्ताङ्कुरस्पर्धिनो निर्याताः कमलाकरेषु बिसिनीकन्दाग्रिमग्रन्थयः ॥ एवमन्यत्रापि दिशानयानुसर्तव्यम् । देशभेदान्नानात्वमचेतनानां तावत् । यथा वायूनां नानादिग्देश- चारिणामन्येषामपि सलिलकुसुमादीनां प्रसिद्धमेव । चेतनानामपि मानुषपशुपक्षिप्रभृतीनां ग्रामारण्यसलिलादिसमेधितानां परस्परं महा- न्विशेषः समुपलक्ष्यत एव । स च विविच्य यथायथमुपनिबध्यमान- स्तथैवानन्त्यमायाति । तथा हि—मानुषाणामेव तावद्दिग्देशादि- भिन्नानां ये व्यवहारव्यापारादिषु विचित्रा विशेषास्तेषां केनान्तः शक्यते गन्तुम्, विशेषतो योषिताम् । उपनिबध्यते च तत्सर्वमेव सुकविभिर्यथाप्रतिभम् । घराहट के रूप में विश्रम को आसक्त कर देती हैं वे इस समय कोमल हाथी की पत्नी के दन्तांकुर के साथ स्पर्धा करने वाली कमलिनी के कन्द के अगले हिस्से की गांठें कमलाकरों ( सरोवरों ) में निकल पड़ीं ।' इस प्रकार अन्यत्र भी इस दिशा से अनुसरण करना चाहिए । अचेतनों का देश के भेद से तावत् नानात्व । जैसे, नाना दिशाओं, देशों में विचरण करनेवाली हवाओं का, अन्य भी जल, फूल आदि का नानात्व प्रसिद्ध ही है । ग्राम, जंगल, जल आदि में बढ़े हुए चेतन मनुष्य, पशु, पक्षी प्रभृतियों का परस्पर महान् विशेष समुपलक्षित होता ही है । और वह विवेचन करके ठीक-ठीक उपनिबध्यमान होकर उसी प्रकार आनन्त्य को प्राप्त करता है । जैसा कि—दिशा और देश आदि से भिन्न मनुष्यों के ही जो व्यवहार और व्यापार आदि में विचित्र विशेष ( भेद ) हैं उनका किसके द्वारा पार पाया जा सकता है ? विशेष रूप से स्त्रियों के । और उन सबको ही सुकवि लोग प्रतिभा के अनुसार उपनिबद्ध करते हैं । लोचनम् नवनवत्वम् । तद्भूतपरकीयशिक्षानपेक्षनिजप्रतिभागुणनिष्यन्दभूतः काव्यार्थ इति भावः । तावदिति । उत्तरकालन्तु व्यंग्यस्पर्शनेन विचित्रतां परां भजतान्नाम, नवनवत्व है । भाव यह कि उस प्रकार दूसरे द्वारा शिक्षा की अपेक्षा न करके अपनी प्रतिभा के गुण का निष्यन्द काव्यार्थ है । तब तक—। बाद में तो व्यङ्ग्य के स्पर्श से उत्कृष्ट विचित्रता को प्राप्त कर ले ।