भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 631, कुल 680 में से

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पृष्ठ 631

चतुर्थ उद्योतः ५७१ ध्वन्यालोकः प्राधान्येन स्वप्रबन्धस्य दर्शयता मोक्षलक्षणः पुरुषार्थः शान्तो रसश्च मुख्यतया विवक्षाविषयत्वेन सूचितः । एतच्चांशेन विवृतमेवान्यैर्व्या- ख्याविधायिभिः । स्वयमेव चैतदुद्गीर्णं तेनोदीर्णमहामोहमग्नमुज्जिहीर्षता लोकमतिविमलज्ञानालोकदायिना लोकनाथेन— यथा यथा विपर्येति लोकतन्त्रमसारवत् । तथा तथा विरागोऽत्र जायते नात्र संशयः ॥ (व्यास) ने वैराग्य के जनन रूप तात्पर्य को प्रधान रूप से अपने प्रबन्ध का दिखाते हुए, मोक्ष रूप मुख्यार्थ को और शान्त रस को मुख्यतः विवक्षा के विषय के रूप में सूचित किया है । और इसे अंश रूप से अन्य व्याख्याकारों ने स्पष्ट किया ही है । स्वयं ही उन्होंने भारी मोह में पड़े हुए संसार के उद्धार की इच्छा करते हुए, अत्यन्त निर्मल ज्ञान के प्रकाश को देने वाले, संसार के नाथ (स्वामी) उन्होंने इसे कहा है— जैसे-जैसे लोक-प्रपञ्च असार विपरीत रूप में प्रतीत होता जाता है, वैसे-वैसे यहाँ विराग उत्पन्न होता जाता है, इसमें सन्देह नहीं । लोचनम् व्याधाद्विध्वंस इति सर्वस्यापि विरसमेवावसानमिति । मुख्यतयेति । यद्यपि ‘धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे चे’त्युक्तं, तथापि चत्वारश्चकारा एवमाहुः— यद्यपि धर्मार्थकामानां सर्वस्वं तादृङनास्ति यदन्यत्र न विद्यते, तथापि पर्य- न्तविरसत्वमत्रैवावलोक्यताम् । मोक्षे तु यद्रूपं तस्य सारतात्रैव विचार्यतामिति । यथा यथेति । लोकैस्तन्त्यमाणं यत्नेन सम्पाद्यमानन्धर्मार्थकामतत्साधन- लक्षणं वस्तुभूततयाभिमतमपि । येन येनार्जनरक्षणक्षयादिना प्रकारेण । असा- रवत्तुच्छेन्द्रजालादिवत् । विपर्येति । प्रत्युत विपरीतं सम्पद्यते । आस्तान्तस्य स्वरूपचिन्तेत्यर्थः । तेन तेन प्रकारेण अत्र लोकतन्त्रे । विरागो जायत । इत्यनेन भी महापथ के क्लेश के कारण अनुचित विपत्ति, कृष्ण का भी बहेलिया से विनाश, इस प्रकार सभी का रसहीन ही अवसान है । मुख्य रूप से—। यद्यपि ‘और धर्म में, और अर्थ में, और काम में और मोक्ष में’ यह कहा है, तथापि चार (बार प्रयुक्त) ‘और’ ( ‘चकार’ ) इस प्रकार कहते हैं—यद्यपि धर्म, अर्थ और काम का प्रधान स्वरूप (सर्वस्व) उस प्रकार का नहीं है जो अन्यत्र नहीं है, तथापि परिणाम में विरसत्व को यहीं देखिए । मोक्ष में तो जो स्थिति है उसकी सारता (महत्त्व) यहीं विचारणीय है । जैसे-जैसे—। जैसे-जैसे लोगों द्वारा तन्यमाण यत्न से सम्पाद्यमान धर्म, अर्थ, काम और उनके साधन रूप वस्तु रूप में अभिमत भी । जिस-जिस अर्जन, रक्षण और क्षय (नाश) आदि प्रकार से । असार अर्थात् तुच्छ इन्द्रजाल आदि की भांति ।