भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 632, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 632

५७२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इत्यादि बहुशः कथयता । ततश्च शान्तो रसो रसान्तरैर्मोक्षलक्षणः पुरुषार्थः पुरुषार्थान्तरैस्तदुपसर्जनत्वेनानुगम्यमानोऽङ्गित्वेन विवक्षा- विषय इति महाभारततात्पर्यं सुव्यक्तमेवावभासते । अङ्गाङ्गिभावश्च यथा रसानां तथा प्रतिपादितमेव । पारमार्थिकान्तस्तत्त्वानपेक्षया शरीरस्येवाङ्गभूतस्य रसस्य पुरुषा- र्थस्य च स्वप्राधान्येन चारुत्वमप्यविरुद्धम् । ननु महाभारते यावान्वि- वक्षाविषयः सोऽनुक्रमण्यां सर्व एवानुक्रान्तो न चैतत्तत्र दृश्यते, प्रत्युत सर्वपुरुषार्थप्रबोधहेतुत्वं सर्वरसगर्भत्वं च महाभारतस्य तस्मिन्नुद्देशे स्वशब्दनिवेदितत्वेन प्रतीयते । अत्रोच्यते—सत्यं शान्तस्यैव रसस्या- इत्यादि बहुत प्रकार से कहते हुए । और इसलिए शान्त रस दूसरे रसों से, मोक्ष रूप पुरुषार्थ दूसरे पुरुषार्थों से, उन्हें उपसर्जन कर देने के कारण अङ्गी होकर विवक्षा का विषय है, यह महाभारत का तात्पर्य बिलकुल साफ ही अवभासित होता है । अङ्गाङ्गिभाव जैसा कि रसों का होता है, उस प्रकार प्रतिपादित किया ही गया है । पारमार्थिक आभ्यन्तर तत्त्व ( आत्मा ) की अपेक्षा न करके शरीर की भाँति अङ्ग रूप रस का और पुरुषार्थ का अपने प्राधान्य से चारुत्व भी अविरुद्ध है । ( शङ्का ) महाभारत में तो जितना कुछ विवक्षा का विषय है वह अनुक्रमणी में सब कुछ ही अनुक्रान्त ( निर्दिष्ट ) है, किन्तु यह देखा जाता है, प्रत्युत सब पुरुषार्थों के ज्ञान का हेतुत्व और सर्वरसगर्भत्व महाभारत के उस उद्देश ( प्रकरण ) में अपने शब्द द्वारा निवेदित होने के रूप में प्रतीत होता है । ( समाधान ) यहाँ लोचनम् तत्त्वज्ञानोत्थितं निर्वेदं शान्तरसस्थायिनं सूचयता तस्यैव च सर्वैतरासारत्वप्र- तिपादनेन प्राधान्यमुक्तम् । ननु शृङ्गारवीरादिचमत्कारोऽपि तत्र भातीत्याशङ्क्याह—पारमार्थिकेति । भोगाभिनिवेशिनां लोकवासनाविष्टानामाङ्गभूतेऽपि रसे तथाभिमानः, यथा विपरीत रूप में हो जाता है—। इससे तत्त्वज्ञान से उत्पन्न, शान्त रस के स्थायी निर्वेद को सूचित करते हुए और उसीका ही सब दूसरों की असारता ( तुच्छता ) के प्रतिपादन से प्राधान्य कहा है । शृङ्गार, वीर आदि ( रसों ) का भी चमत्कार वहाँ प्रतीत होता है ? यह आशङ्का करके कहते हैं—पारमार्थिक—। भोग ( इन्द्रियजन्य सुख ) में अभिनिवेश रखने वालों