ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ उद्योतः ५७३ ध्वन्यालोकः ङ्गित्वं महाभारते मोक्षस्य च सर्वपुरुषार्थेभ्यः प्राधान्यमित्येतन्न स्व- शब्दाभिधेयत्वेनानुक्रमण्या दर्शितम्, दर्शितं तु व्यङ्ग्यत्वेन— ‘भगवान्वासुदेवश्च कीर्त्यतेऽत्र सनातनः’ इत्यस्मिन् वाक्ये । अनेन ह्ययमर्थो व्यङ्ग्यत्वेन विवक्षितो यदत्र महाभारते पाण्डवादिचरितं यत्कीर्त्यते तत्सर्वमवसानविरसमविद्याप्र- पञ्चरूपञ्च, परमार्थसत्यस्वरूपस्तु भगवान् वासुदेवोऽत्र कीर्त्यते । तस्मात्तस्मिन्नेव परमेश्वरे भगवति भवत भावितचेतसो, मा भूत विभू- तिषु निःसारासु रागिणो गुणेषु वा नयविनयपराक्रमादिष्वमीषु केवलेषु केषुचित्सर्वात्मना प्रतिनिधिविष्टधियः । तथा चाग्रे—पश्यत निःसारतां संसारस्येत्यमुमेवार्थं द्योतयन् स्फुटमेवावभासते व्यञ्जकशक्त्यनुगृहीतश्च यह कहते हैं—ठीक है, महाभारत में शान्त रस का ही अङ्गित्त्व और मोक्ष का सब पुरुषार्थों से प्राधान्य, यह अपने शब्द द्वारा अभिधेय रूप में अनुक्रमणी में नहीं दिखाया है, किन्तु व्यङ्ग्य के रूप में दिखाया है— ‘और सनातन भगवान् वासुदेव की यहाँ कीर्ति गाई गई है ।’ इस वाक्य में । इससे यह अर्थ व्यङ्ग्य रूप में विवक्षित है कि यहां महाभारत में पाण्डवादिचरित जो कीर्तित हैं वह सब अवसान में रसहीन और अविद्या के कारण प्रपंच रूप हैं, किन्तु परमार्थ-सत्यस्वरूप भगवान् वासुदेव की यहां कीर्ति गाई गई है । इसलिए उसी परमेश्वर भगवान् में भावभरे चित्त वाले बनो, सारहीन विभूतियों में रागयुक्त, अथवा नय, विनय, पराक्रम आदि इन केवल किन्हीं गुणों में सब प्रकार से अभि- निवेश प्राप्त बुद्धि से युक्त मत हो । और वैसे आगे—‘संसार की सारहीनता देखो ।’ इसी अर्थ को द्योतित करता हुआ स्पष्ट ही व्यञ्जकशक्ति से अनुगृहीत शब्द प्रतीत लोचनम् शरीरे प्रमातृत्वाभिमानः प्रमातुर्भोगायतनमात्रेऽपि । केवलेष्विति । परमेश्वरभ- क्त्युपकरणेषु तु न दोष इत्यर्थः । विभूतिषु रागिणो गुणेषु च निविष्टधियो मा भूतेति सम्बन्धः । अग्रे इति । अनुक्रमण्यनन्तरं यो भारतग्रन्थः तत्रेत्यर्थः । एवं संसार की वासना में आविष्ट ( लोगों ) का अङ्गरूप भी उस रस में उस प्रकार का अभिमान ( मान्यता ) होता है, जैसे भोग के आयतन मात्र शरीर में प्रमाता का प्रमातृत्व का अभिमान होता है । केवल—। अर्थात् किन्तु परमेश्वर की भक्ति के उपकरणों में तो दोष नहीं है । विभूतियों ( ऐश्वर्यों ) में रागयुक्त और गुणों में अभिनिवेश बुद्धि वाले मत बनो, यह सम्बन्ध है । आगे—। अर्थात् अनुक्रमणी के बाद जो भारत ग्रन्थ