भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 636

५७६ | सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तदेवमनुक्रमणीनिर्दिष्टेन वाक्येन भगवद्व्यतिरेकिणः सर्वस्यान्य- स्यानित्यतां प्रकाशयता मोक्षलक्षण एवैकः परः पुरुषार्थः शास्त्रनये, काव्यनये च तृष्णाक्षयसुखपरिपोषलक्षणः शान्तो रसो महाभारतस्या- ङ्गित्त्वेन विवक्षित इति सुप्रतिपादितम् । अत्यन्तसारभूतत्वाच्चायमर्थो व्यङ्ग्यत्वेनैव दर्शितो न तु वाच्यत्वेन । सारभूतो ह्यर्थः स्वशब्दानभि- धेयत्वेन प्रकाशितः सुतरामेव शोभामावहति । प्रसिद्धिश्चेयमस्त्येव विदग्धविद्वत्परिषत्सु यदभिमततरं वस्तु व्यङ्ग्यत्वेन प्रकाश्यते न तो, इस प्रकार भगवान् के अतिरिक्त सबकी अनित्यता को प्रकाशित करते हुए अनुक्रमणी में निर्दिष्ट वाक्य से मोक्ष रूप ही एक अन्तिम पुरुषार्थ शास्त्रदृष्टि से (विवक्षित है) और काव्यदृष्टि से तृष्णा के क्षय से (उत्पन्न) सुख का परिपोष (वृद्धि) रूप शान्त रस महाभारत के अङ्गी के रूप में विवक्षित है, यह प्रतिपादन किया । और अत्यन्त सारभूत होने के कारण यह अर्थ व्यङ्ग्य रूप से ही दिखाया गया है, न कि वाच्य रूप से । क्योंकि सारभूत अर्थ अपने शब्द से अनभिधेय रूप से प्रकाशित (होकर) सुतरां ही शोभा प्राप्त करता है। और, विदग्धों, विद्वानों की परिषदों में यह प्रसिद्धि है ही कि अभिमततर (प्रियतर) वस्तु को व्यङ्ग्य लोचनम् शास्त्रनय इति । तत्रास्वादयोगाभावे पुरुषेणार्थ्यत इत्ययमेव व्यपदेशः सादरः, चमत्कारयोगे तु रसव्यपदेश इति भावः । एतच्च ग्रन्थकारेण तत्त्वा- लोके वितत्योक्तमिह त्वस्य न मुख्योऽवसर इति नास्माभिस्तद्दर्शितम् । सुतरामेवेति । यदुक्तं तत्र हेतुमाह—प्रसिद्धिश्चेति । चशब्दो यस्मदर्थे । यत इयं लौकिकी प्रसिद्धिरनादिस्ततो भगवद्व्यासप्रभृतीनामप्ययमेवास्वशब्दाभिधाने शास्त्रदृष्टि से—। भाव यह कि वहां आस्वाद के सम्बन्ध के अभाव में पुरुष द्वारा अर्थित होता है यही व्यपदेश आदरयुक्त है, चमत्कार के योग (सम्बन्ध) में तो रस का व्यपदेश है। और इसे ग्रन्थकार ने तत्त्वालोक में विस्तार करके कहा है यहां तो इसका मुख्य अवसर नहीं है अतः हमने नहीं दिखाया है। सुतरां ही—। यह जो कहा है वहाँ हेतु कहते हैं—और प्रसिद्धि है ही। 'और' ('च') शब्द 'जिस कारण' के 'वासुदेव' यह संज्ञा शब्द सनातन परब्रह्म का ही हमेशा से सूचक होता चला आ रहा था कि अकस्मात् मथुरा में प्रादुर्भूत अंशभूत वसुदेवपुत्र भगवान् कृष्ण के लिए भी प्रयुक्त होने लगा । इसी प्रकार महाभाष्य के टीकाकार 'कैयट' ने भी उपर्युक्त पाणिनि-सूत्र पर ही यह लिखा है— 'कथं पुनः नित्यानां शब्दानां अनित्यान्धकादिवंशाश्रयेणान्वाख्यानं युज्यते ? अत्र समाधिः । त्रिपुरुषानूकं नाम कुर्यादिति न्यायेनान्धकादिवंशा अपि नित्या एव । अथवाऽनित्योपाश्रयेणापि नित्यान्वाख्यानं दृश्यते । यथा शकाश्रयेण कालस्य ।'