भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 637, कुल 680 में से

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पृष्ठ 637

चतुर्थ उद्योतः ५७७ ध्वन्यालोकः साक्षाच्छब्दवाच्यत्वेन । तस्मात्स्थितमेतत्—अङ्गिभूतरसाद्याश्रयेण काव्ये क्रियमाणे नवार्थलाभो भवति बन्धच्छाया च महती सम्पद्यत इति । अत एव च रसानुगुणार्थविशेषोपनिबन्धनमलङ्कारान्तरविरहेऽपि छायातिशययोगि लक्ष्ये दृश्यते । यथा— रूप से ही प्रकाशित किया जाता है न (कि) साक्षात् शब्द द्वारा वाच्य रूप से । अतः यह स्थिर हुआ—अङ्गिभूत रसादि के आश्रय से काव्य रचे जाने पर नये अर्थ का लाभ होता है और बन्ध की छाया (शोभा) अधिक (महती) होती है। और इसी लिए रस के अनुगुण (अनुरूप) अर्थ-विशेष का उपनिबन्ध अलङ्कारान्तर के अभाव में भी लक्ष्य (काव्य) में अतिशयशोभायुक्त देखा जाता है। जैसे— लोचनम् आशयः, अन्यथा हि क्रियाकारकसम्बन्धादौ ‘नारायणं नमस्कृत्ये’त्यादिशब्दा- र्थनिरूपणे च तथाविध एव तस्य भगवत आशय इत्यत्र किं प्रमाणमिति भावः । विदग्धविद्वद्ग्रहणेन काव्यनये शास्त्रनय इति चानुसृतम् । रसादिमय एतस्मिन् कविः स्यादवधानवानिति यदुक्तं, तदेव प्रसङ्गागतभारतसम्बन्धनि- रूपणानन्तरमुपसंहरति—तस्मात्स्थितमिति । अत इति । यत एवं स्थितमत एवेदमपि यल्लक्ष्ये दृश्यते, तदुपपन्नमन्यथा तदनुपपन्नमेव, न च तदनुपपन्नम्; चारुत्वेन प्रतीतेः । तस्याश्चैतदेव कारणं रसानुगुणार्थत्वमेवेत्याशयः । अलङ्कारा- न्तरेति । अन्तरशब्दो विशेषवाची। यदि वा दित्सिते उदाहरणे रसवदलङ्कारस्य विद्यमानत्वात्तदपेक्षयालङ्कारान्तरशब्दः । अर्थ में । जिस कारण यह लौकिक प्रसिद्धि अनादि है उस कारण भगवान् व्यास प्रभृतियों का भी यही अपने शब्द से न कथन में आशय है, अन्यथा क्योंकि क्रिया-कारक सम्बन्ध आदि में 'नारायण को नमस्कार करके' इत्यादि शब्द के निरूपण में उस प्रकार का ही उन भगवान् का आशय है, यहां क्या प्रमाण है ? यह भाव है । ‘विदग्ध' और 'विद्वान्' के ग्रहण से काव्यदृष्टि से शास्त्रदृष्टि से इसका अनुसरण किया है । 'रसादिरूप इसमें कवि सावधान हो' यह जो कहा है उसे ही प्रसंग से प्राप्त 'भारत' के सम्बन्ध में निरूपण के बाद उपसंहार करते हैं—अतः यह स्थित हुआ—। इस कारण—। जिस कारण इस प्रकार स्थिर हुआ इस कारण ही यह भी लक्ष्य में देखा जाता है, वह संगत (उपपन्न) है, अन्यथा अनुपपन्न ही है, किन्तु वह अनुपपन्न नहीं है, क्योंकि चारु रूप से प्रतीत होता है । अन्तर' शब्द विशेष का वाचक है । अथवा देने के लिए इच्छित उदाहरण में रसवदलङ्कार के विद्यमान होने के कारण उसकी अपेक्षा से ‘अलङ्कारान्तर’ शब्द है । ३७ ध्व०

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