ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः मुनिर्जयति योगीन्द्रो महात्मा कुम्भसम्भवः । येनैकचुलके दृष्टौ तौ दिव्यौ मत्स्यकच्छपौ ॥ इत्यादौ। अत्र ह्यद्भुतरसानुगुणमेकचुलके मत्स्यकच्छपदर्शनं छायातिशयं पुष्णाति। तत्र ह्येकचुलके सकलजलधिसन्निधानादपि दिव्यमत्स्यकच्छपदर्शनमक्षुण्णत्वादद्भुतरसानुगुणतरम्। क्षुण्णं हि वस्तु लोकप्रसिद्ध्याद्भुतमपि नाश्चर्यकारि भवति। न चाक्षुण्णं वस्तूप- निबध्यमानमद्भुतरसस्यैवानुगुणं यावद्रसान्तरस्यापि। तद्यथा— योगियों में श्रेष्ठ, महात्मा अगस्त्य (कुम्भसम्भव) मुनि की जय हो, जिन्होंने एक चुल्लू में उन दिव्य मत्स्य और कच्छप को देख लिया। इत्यादि में। यहां अद्भुत रस के अनुकूल एक चुल्लू में मत्स्य और कच्छप का दर्शन अधिक शोभातिशय को पोषण करता है। वहां एक चुल्लू में पूरे समुद्र के सन्निधान से भी दिव्य मत्स्य और कच्छप का दर्शन क्षुण्ण (अभ्यस्त) न होने के कारण अद्भुत रस के अधिक अनुकूल है। क्योंकि अभ्यस्त वस्तु लोक की प्रसिद्धि के कारण अद्भुत भी (होकर) आश्चर्यकारी नहीं होती। और अनभ्यस्त वस्तु का उपनिबन्धन केवल अद्भुत रस के ही अनुकूल नहीं होता बल्कि दूसरे रस के भी। वह जैसे— लोचनम् ननु मत्स्यकच्छपदर्शनात्प्रतीयमानं यदेकचुलके जलनिधिसन्निधानं ततो मुनेर्माहात्म्यप्रतिपत्तिरिति न रसानुगुणेनार्थेन च्छायापोषितेत्याशङ्क्याह— अत्र हीति। नन्वेवं प्रतीयमानं जलनिधिदर्शनमेवाद्भुतानुगुणं भवतीति रसानुगुणोऽत्र वाच्योऽर्थ इत्यस्मिन्नंशे कथमिदमुदाहरणमित्याशङ्क्याह—तत्रे- ति। क्षुण्णं हीति। पुनः पुनर्वर्णननिरूपणादिना यत्पिष्टपिष्टत्वादतिनिर्भिन्नस्व- रूपमित्यर्थः। बहुतरलक्ष्यव्यापकञ्चैतदिति दर्शयति—न चेत्यादिना। रथ्या- मत्स्य और कच्छप के दर्शन से प्रतीयमान जो एक चुल्लू में जलराशि का सन्निधान है उससे मुनि के माहात्म्य का ज्ञान होता है, न कि रस के अनुकूल अर्थ से शोभा (छाया) पोषित है, यह आशङ्का करके कहते हैं—यहां—। इस प्रकार प्रतीयमान जलराशि का दर्शन ही अद्भुत (रस) के अनुकूल हो, (इस प्रकार) 'रस के अनुकूल यहां वाच्य अर्थ है' इस अंश में, कैसे यह उदाहरण है? यह आशङ्का करके कहते हैं—वहां।—क्योंकि अभ्यस्त—। अर्थात् बार-बार वर्णन (और) निरूपण आदि द्वारा जो पिष्ट-पिष्ट हो जाने से अत्यन्त निर्भिन्न-स्वरूप है। और यह बहुत लक्ष्यों में व्यापक है, यह दिखाते हैं—और अनभ्यस्त इत्यादि से। रथ्या-