ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 639, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ उद्योतः ५७९ ध्वन्यालोकः सिज्जइ रोमञ्चिज्जइ वेवइ रत्थातुलग्गपडिलग्गो । सोपासो अज्ज वि सुहअ जेणासि बोलीणो ॥ एतद्गाथार्थाद्भाव्यमानाद्या रसप्रतीतिर्भवति, सा त्वां स्पृष्ट्वा स्विद्य- ति रोमाञ्चते वेपते इत्येवंविधादर्थात्प्रतीयमानान्मनागपि नो जायते । तदेवं ध्वनिप्रभेदसमाश्रयेण यथा काव्यार्थानां नवत्वं जायते तथा प्रतिपादितम् । गुणीभूतव्यङ्ग्यस्यापि त्रिभेदव्यङ्ग्यापेक्षया ये प्रकारा- 'हे सुभग, वह पार्श्वभाग, जो गली में (मेरी सखी का) तुमसे अनजाने में छू गया था और तुम चले गए थे, आज भी स्वेद, रोमाञ्च और कम्प से युक्त हो रहा है ।' इस गाथा के भावित होते हुए अर्थ से जो रस की प्रतीति होती है वह 'तुम्हें देखकर पसीज जाती है, रोमाञ्चित हो जाती है, कांपने लगती है' इस प्रकार के प्रतीत हुए अर्थ से, थोड़ी भी नहीं उत्पन्न होती है । तो इस प्रकार ध्वनि-प्रभेद के समाश्रयण से जैसे काव्य के अर्थों का नवत्व हो जाता है उस प्रकार प्रतिपादन किया । गुणीभूतव्यङ्ग्य के भी तीन भेद वाले व्यङ्ग्य की लोचनम् यान्तुलाग्रेण काकतालीयेन प्रतिलग्नस्साम्मुख्येन स पार्श्वोऽद्यापि सुभग तस्या येनास्यतिक्रान्तः । रसप्रतीतिरिति । परस्परहेतुकशृङ्गारप्रतीतिः । अस्यार्थस्य रसानुगुणत्वं व्यतिरेकद्वारेण द्रढयति—सा त्वामित्यादिना । 'ध्वनेर्यस्सगुणीभूतव्यङ्ग्यस्याध्वा प्रदर्शित' इत्युद्योतारम्भे यः श्लोकः तत्र ध्वनेरध्वना कवीनां प्रतिभागुणोऽनन्तो भवतीत्येष भागो व्याख्यात इत्युपसंहरति—तदेवमित्यादिना । सगुणीभूतव्य- ङ्ग्यस्येत्यमुं भागं व्याचष्टे—गुणीभूतेत्यादिना । त्रिप्रभेदो वस्त्वलङ्काररसात्मना यो व्यङ्ग्यः तस्य यापेक्षा वाच्ये गुणीभावः तयेत्यर्थः । तत्र सर्वे ये ध्वनिभेदा- ( गली ) में तुलाग्र ( काकतालीय ) से छू गया हुआ, सामने से वह पार्श्व आज भी हे सुभग उसका जिससे तुम चले गए थे । रस की प्रतीति—। परस्पर हेतु वाले शृङ्गार की प्रतीति । इस अर्थ का रसानुकूलत्व व्यतिरेक द्वारा दृढ़ करते हैं—वह तुझे० इत्यादि से । 'गुणीभूत व्यङ्ग्य के सहित ध्वनि का जो मार्ग दिखाया गया है ।' यह उद्योत के आरम्भ में जो श्लोक है उसमें ध्वनि के मार्ग से कवियों का प्रतिभागुण अनन्त हो जाता है, यह भाग व्याख्यान किया, इसे उपसंहार करते हैं— तो इस प्रकार० इत्यादि से । 'गुणीभूतव्यङ्ग्य के सहित' इस भाग का व्याख्यान करते हैं—गुणीभूत० इत्यादि से । अर्थात् तीन प्रभेदों वाला वस्तु, अलङ्कार और रस के रूप में जो व्यङ्ग्य है उसकी जो अपेक्षा अर्थात् वाच्य में गुणीभाव उससे ।