ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः स्तत्समाश्नयेणापि काव्यवस्तूनां नवत्वं भवत्येव । तच्चातिविस्तारका- रीति नोदाहृतं सहृदयैः स्वयमुत्प्रेक्षणीयम् ॥ ५ ॥ अपेक्षा से जो प्रकार हैं उनके समाश्रयण से भी काव्य की वस्तुओं का नवत्व हो ही जाता है। वह तो ज्यादा विस्तार करेगा इसलिए उदाहृत नहीं किया, सहृदय लोग स्वयं उत्प्रेक्षा कर लें ॥ ५ ॥ लोचनम् स्तेषां गुणीभावादानन्त्यमिति तदाह—अतिविस्तारेति । स्वयमिति । तत्र वस्तुना व्यंग्येन गुणीभूतेन नवत्वं सत्यपि पुराणार्थस्पर्शे यथा ममैव— भअविहलरक्खणैकमल्लसरणागआणअत्थाण । खणमत्तं विण दिण्णा विस्सामकहेत्ति जुत्तमिणम् ॥ अत्र त्वमनवरतमर्थांस्त्यजसीति औदार्यलक्षणं वस्तु ध्वन्यमानं वाच्यस्यो- पस्कारकं नवत्वन्ददाति, सत्यपि पुराणकविस्पृष्टेऽर्थे । तथाहि पुराणी गाथा— चाइअणकरपम्पपरसञ्चारणखे अनिस्ससहससरीरा । अत्था किवणघरत्था सथ्नापथ्थास्ववंतीव ॥ अलङ्कारेण व्यङ्ग्येन वाच्योपस्कारे नवत्वं यथा ममैव— वसन्तमत्तालिपरम्परोपमाः कचास्तवासन् किल रागवृद्धये । श्मशानभूभागपरागभासुराः कथन्तदेतेन मनागिवरक्तये ॥ वहां सब जो ध्वनि के भेद हैं उनके गुणीभाव से आनन्त्य है, उसे कहते हैं—अत्यन्त विस्तार—। स्वयं—। वहां, गुणीभूत व्यङ्ग्य वस्तु से नवत्व, पुराने अर्थ का स्पर्श होने पर भी, जैसे मेरा ही— ‘भय से व्याकुल हो, रक्षा करने में एक ही मल्ल ( तुम्हारी ) शरण में आए हुए अर्थों ( धनों ) को क्षणमात्र भी ( तुमने ) विश्राम नहीं दिया, यह ठीक है ?’ यहां ‘तुम हमेशा अर्थों को त्याग देते हो’ यह औदार्य रूप ध्वन्यमान वस्तु वाच्य का उपस्कारक होकर नवत्व अर्पित करता है, पुराने कवि द्वारा स्पृष्ट अर्थ के होने पर भी । जैसी कि पुरानी गाथा है— ‘त्यागिजनों के हाथों की परम्परा में सञ्चार करने के खेद से थके-मांदे शरीर वाले अर्थ ( धन ) कृपण के घर में स्थित ( होने से ) स्वस्थ अवस्था वाले ( होकर ) शयन करते हैं ।’ व्यङ्ग्य अलङ्कार द्वारा वाच्य का उपस्कार होने पर नवत्व, जैसे—मेरा ही, । ( पहले ) बसन्त के मतवाले भौरों के समूह की उपमा वाले तेरे बाल राग ( लाली-प्रेम ) की वृद्धि के लिए थे, ( अब ) श्मशान के भूभाग की धूल की भांति