भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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चतुर्थ उद्योतः ५८१ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः ध्वनेरित्थं गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य च समाश्रयात् । न काव्यार्थविरामोऽस्ति यदि स्यात्प्रतिभागुणः ॥६॥ 'ध्वनि के और गुणीभूतव्यङ्ग्य के इस प्रकार समाश्रय से काव्य के अर्थ का विराम नहीं है यदि प्रतिभा रूप गुण हो।' लोचनम् अत्र ह्याक्षेपेण विभावनया च ध्वन्यमानाभ्यां वाच्यमुपस्कृतमिति नवत्वं सत्यपि पुराणार्थयोगित्वे । तथाहि पुराणश्लोकः— क्षुत्तृष्णाकाममात्सर्यं मरणाच्च महद्भयम् । पञ्चैतानि विवर्धन्ते वार्धके विदुषामपि ॥ इति । व्यङ्ग्येन रसेन गुणीभूतेन वाच्योपस्कारेण नवत्वं यथा ममैव— जरा नेयं मूर्ध्नि ध्रुवमयमसो कालभुजगः क्रुधान्धः फूत्कारैः स्फुटगरलफेनान् प्रकिरति ॥ तदेनं संपश्यत्यथ च सुखितम्मन्यहृदयः शिवो पायन्नेच्छन् बत बत सुधीरः खलु जनः ॥ अत्राद्भुतेन व्यङ्ग्येन वाच्यमुपस्कृतं शान्तरसप्रतिपत्त्यङ्गत्वाच्चारु भवतीति नवत्वं सत्यप्यस्मिन् पुराणश्लोके— जराजीर्णशरीरस्य वैराग्यं यत्र जायते, तन्नूनं हृदये मृत्युर्दृढन्नास्तीति निश्चयः ॥ ५ ॥ चमकने वाले ये (तेरे बाल) क्यों नहीं थोड़ी (भी) विरक्ति के लिए (होते हैं) ! यहाँ ध्वनित होते हुए 'आक्षेप' से और 'विभावना' अलङ्कारों से वाच्य उपस्कृत हुआ है, यह नवत्व है, पुराने अर्थ का सम्बन्ध होने पर भी। जैसा कि पुराना श्लोक है— 'भूख, तृष्णा, काम, देखजरनी और मरने का बड़ा डर, पाँच ये विद्वानों के भी बूढ़ा होने पर बढ़ते हैं।' व्यङ्ग्य एवं गुणीभूत रस द्वारा वाच्य के उपस्कार से नवत्व, जैसे मेरा ही— 'सिर पर यह बुढ़ापा नहीं है, निश्चय ही यह कालरूपी सर्प (बैठा) है, (जो) क्रोध से अन्धा, फू-फू करके स्पष्ट ही विष के फेनों को उगल रहा है, तो इसे (आदमी) खूब देखता है और हृदय में सुखी मान लेता है, कल्याण के उपाय की इच्छा न करता हुआ मनुष्य हन्त-हन्त बड़ा धीर (बन बैठा है।' यहाँ व्यङ्ग्य अद्भुत द्वारा वाच्य उपस्कृत (होकर) शान्त रस के बोध का अङ्ग होने के कारण चारु हो जाता है, यह नवत्व है, इस पुराने श्लोक के होते हुए भी— 'बुढ़ापे से जर्जर शरीर वाले (व्यक्ति) के जो वैराग्य उत्पन्न नहीं होता, वह निश्चय ही (उसके) हृदय में 'मृत्यु दृढ़ (अवश्यम्भावी) नहीं है' ऐसा निश्चय हो चुका है।'