ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
चतुर्थ उद्योतः ५८१ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः ध्वनेरित्थं गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य च समाश्रयात् । न काव्यार्थविरामोऽस्ति यदि स्यात्प्रतिभागुणः ॥६॥ 'ध्वनि के और गुणीभूतव्यङ्ग्य के इस प्रकार समाश्रय से काव्य के अर्थ का विराम नहीं है यदि प्रतिभा रूप गुण हो।' लोचनम् अत्र ह्याक्षेपेण विभावनया च ध्वन्यमानाभ्यां वाच्यमुपस्कृतमिति नवत्वं सत्यपि पुराणार्थयोगित्वे । तथाहि पुराणश्लोकः— क्षुत्तृष्णाकाममात्सर्यं मरणाच्च महद्भयम् । पञ्चैतानि विवर्धन्ते वार्धके विदुषामपि ॥ इति । व्यङ्ग्येन रसेन गुणीभूतेन वाच्योपस्कारेण नवत्वं यथा ममैव— जरा नेयं मूर्ध्नि ध्रुवमयमसो कालभुजगः क्रुधान्धः फूत्कारैः स्फुटगरलफेनान् प्रकिरति ॥ तदेनं संपश्यत्यथ च सुखितम्मन्यहृदयः शिवो पायन्नेच्छन् बत बत सुधीरः खलु जनः ॥ अत्राद्भुतेन व्यङ्ग्येन वाच्यमुपस्कृतं शान्तरसप्रतिपत्त्यङ्गत्वाच्चारु भवतीति नवत्वं सत्यप्यस्मिन् पुराणश्लोके— जराजीर्णशरीरस्य वैराग्यं यत्र जायते, तन्नूनं हृदये मृत्युर्दृढन्नास्तीति निश्चयः ॥ ५ ॥ चमकने वाले ये (तेरे बाल) क्यों नहीं थोड़ी (भी) विरक्ति के लिए (होते हैं) ! यहाँ ध्वनित होते हुए 'आक्षेप' से और 'विभावना' अलङ्कारों से वाच्य उपस्कृत हुआ है, यह नवत्व है, पुराने अर्थ का सम्बन्ध होने पर भी। जैसा कि पुराना श्लोक है— 'भूख, तृष्णा, काम, देखजरनी और मरने का बड़ा डर, पाँच ये विद्वानों के भी बूढ़ा होने पर बढ़ते हैं।' व्यङ्ग्य एवं गुणीभूत रस द्वारा वाच्य के उपस्कार से नवत्व, जैसे मेरा ही— 'सिर पर यह बुढ़ापा नहीं है, निश्चय ही यह कालरूपी सर्प (बैठा) है, (जो) क्रोध से अन्धा, फू-फू करके स्पष्ट ही विष के फेनों को उगल रहा है, तो इसे (आदमी) खूब देखता है और हृदय में सुखी मान लेता है, कल्याण के उपाय की इच्छा न करता हुआ मनुष्य हन्त-हन्त बड़ा धीर (बन बैठा है।' यहाँ व्यङ्ग्य अद्भुत द्वारा वाच्य उपस्कृत (होकर) शान्त रस के बोध का अङ्ग होने के कारण चारु हो जाता है, यह नवत्व है, इस पुराने श्लोक के होते हुए भी— 'बुढ़ापे से जर्जर शरीर वाले (व्यक्ति) के जो वैराग्य उत्पन्न नहीं होता, वह निश्चय ही (उसके) हृदय में 'मृत्यु दृढ़ (अवश्यम्भावी) नहीं है' ऐसा निश्चय हो चुका है।'
५८२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सत्स्वपि पुरातनकविप्रबन्धेषु यदि स्यात्प्रतिभागुणः, तस्मिंस्त्व- सति न किञ्चिदेव कवेर्वस्त्वस्ति । बन्धच्छायाप्यर्थद्वयानुरूपशब्द- सन्निवेशोऽर्थप्रतिभानाभावे कथमुपपद्यते । अनपेक्षितार्थविशेषाक्षररचनैव बन्धच्छायेति नेदं नेदीयः सहृदयानाम् । एवं हि सत्यर्थानपेक्षचतुर- मधुरवचनरचनायामपि काव्यव्यपदेशः प्रवर्तेत । शब्दार्थयोः साहित्येन पुराने कवियों के प्रबन्धों के होने पर भी, यदि प्रतिभा रूप गुण हो; उसके न होने पर कवि के लिए कोई वस्तु नहीं है । दोनों अर्थों (ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य) के अनुरूप शब्द का संनिवेश रूप बन्धच्छाया भी अर्थ के प्रतिभान के अभाव में कैसे बन (सकती) है ? अर्थ की अपेक्षा न करके अक्षररचना ही बन्धच्छाया है, यह सहृदयों के नेदीयस् (निकटतर) नहीं है । क्योंकि ऐसा होने पर अर्थ की अपेक्षा न रखने वाले चतुर (और) मधुर वचन की रचना में भी काव्य का व्यवहार चल पड़ेगा । शब्द और अर्थ के साहित्य से काव्यत्व के होने पर कैसे उस प्रकार के विषय में लोचनम् सत्स्वपीत्यादि कारिकाया उपस्कारः । त्रीन् पादान् स्पष्टान्मत्वा तुर्यं पादं व्याख्यातुं पठति—यदीति । विद्यमानो ह्यसौ प्रतिभागुण उक्तरीत्या भूयान् भवति, न त्वत्यन्तासन्नेवेत्यर्थः । तस्मिन्निति । अनन्तीभूते प्रतिभागुणे । न किञ्चिदेवेति । सर्वं हि पुराणकविनैव स्पृष्टमिति किमिदानीं वर्ण्यं, यत्र कवेर्व- र्णनाव्यापारस्स्यात् । ननु यद्यपि वर्ण्यमपूर्वन्नास्ति, तथाप्युक्तिपरिपकगुम्फ- घटनाद्यपरपर्यायबन्धच्छाया नवनवा भविष्यति । यन्निवेशने काव्यातन्तराणां संरम्भ इत्याशङ्क्याह—बन्धच्छायापीति । अर्थद्वयं गुणीभूतव्यंग्यं प्रधानभूतं व्यंग्यं च । नेदीय इति । निकटतरं हृदयाननुप्रवेशि न भवतीत्यर्थः । अत्र हेतु- माह—एवं हि सतीति । चतुरत्वं समाससङ्घटना । मधुरत्वमपारुष्यम् । होने पर भी—। यह कारिका का उपस्कार (प्रतिपादन) है ! तीन पादों को स्पष्ट मान कर चौथे पाद का व्याख्यान करने के लिए पढ़ते हैं—यदि—। अर्थात् क्योंकि विद्यमान वह प्रतिभा रूप गुण उक्त रीति से बहुत हो जाता है, न कि अत्यन्त न विद्यमान ही । उसके—। अनन्त प्रतिभारूप गुण के । नहीं कोई ही—। सब तो पुराने कवि ने ही स्पर्शकर लिया तो अब वर्णनीय क्या है ? जहां कवि का वर्णना- व्यापार हो ? यद्यपि वर्णनीय अपूर्व नहीं है, तथापि उक्ति के परिपाक के गूंथने की घटना, दूसरे शब्द में छाया, नई-नई हो जायगी । जिसके निवेशन में दूसरे काव्यों का संरम्भ (उपक्रम) है, यह आशङ्का करके कहते हैं—बन्धच्छाया भी—। दो अर्थ गुणीभूतव्यङ्ग्य और प्रधानभूत व्यङ्ग्य । नेदीयस्—। निकटतर, अर्थात् हृदय में प्रवेश कर जाने वाला, नहीं होता है । यहां हेतु कहते हैं—क्योंकि ऐसा होने पर—।
चतुर्थ उद्योतः ५८३ ध्वन्यालोकः काव्यत्वे कथं तथाविधे विषये काव्यव्यवस्थेति चेत्—परोपनिबद्धार्थ- विरचने यथा तत्काव्यत्वव्यवहारस्तथा तथाविधानां काव्यसन्द- र्भाणाम् ॥ ६ ॥ न चार्थानन्त्यं व्यङ्ग्यार्थापेक्षयैव यावद्वाच्यार्थापेक्षयापीति प्रतिपादयितुमुच्यते— अवस्थादेशकालादिविशेषैरपि जायते । आनन्त्यमेव वाच्यस्य शुद्धस्यापि स्वभावतः ॥ ७ ॥ शुद्धस्यानपेक्षितव्यङ्ग्यस्यापि वाच्यस्यानन्त्यमेव जायते स्वभा- काव्य की व्यवस्था (होगी?)। (इस पर कहते हैं कि) दूसरे द्वारा उपनिबद्ध अर्थ के बनाने में जैसे वह काव्य का व्यवहार (है) वैसे उस प्रकार (अर्थ की अपेक्षा न रखने वाले) काव्यसन्दर्भों का ॥ ६ ॥ न केवल अर्थ का आनन्त्य, व्यङ्ग्य अर्थ की अपेक्षा से ही है वरन् वाच्य अर्थ की अपेक्षा से भी है—यह प्रतिपादन करने के लिए कहते हैं— अवस्था, देश, काल आदि के विशेषों (भेदों) से भी स्वभाव से शुद्ध भी वाच्य का आनन्त्य ही होता है। शुद्ध (अर्थात्) व्यङ्ग्य की अपेक्षा न रखने वाले भी वाच्य का आनन्त्य ही लोचनम् तथाविधानामिति । अपूर्वबन्धच्छायायुक्तानामपि परोपनिबद्धार्थनिबन्धने पर- कृतकाव्यत्वव्यवहार एव स्यादित्यर्थस्यापूर्वत्वमाश्रयणीयम् । कवनीयं काव्यं तस्य भावः काव्यत्वं, न त्वयं भावप्रत्ययान्तात् भावप्रत्यय इति शङ्कितव्यम् । प्रतिपादयितुमिति । प्रसङ्गादिति शेषः । यदि वा वाच्यन्तावद्द्विविधव्यङ्ग्यो- पयोगि तदेव चेदनन्तं तद्बलादेव व्यंग्यानन्त्यं भवतीत्यभिप्रायेणेदं प्रकृत- मेवोच्यते । शुद्धस्येति । व्यंग्यविषयो यो व्यापारः तत्स्पर्शं विनाप्यानन्त्यं चतुरत्व (अर्थात्) समास की संघटना। मधुरत्व (अर्थात्) पारुष्य का अभाव। उस प्रकार के—। अपूर्व (जो पहले न हो) बन्धच्छाया से युक्त (काव्य-सन्दर्भों) के भी दूसरे (कवि द्वारा) उपनिबद्ध अर्थ के निबन्धन में दूसरे (कवि) द्वारा बनाया गया काव्य का व्यवहार ही होगा, अतः अर्थ के अपूर्वत्व का आश्रयण करना चाहिए। कवनीय (वर्णनीय) काव्य, उसका भाव काव्यत्व, न कि यह भाव-प्रत्ययान्त (काव्य शब्द) से भाव-प्रत्यय हुआ है, यह शङ्का करनी चाहिए। प्रतिपादन करने के लिए—। प्रसङ्ग से—यह शेष है। अथवा वाच्य दो प्रकार के व्यङ्ग्य का उपयोगी है, वही अनन्त है तो उसके बल से ही व्यङ्ग्य का आनन्त्य हो जाता है—इस अभिप्राय से यह प्रकृत ही कहा गया है। शुद्ध वाच्य का—।
५८४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
वतः । स्वभावो ह्ययं वाच्यानां चेतनानामचेतनानां च यदवस्थाभेदा- देशभेदात्कालभेदात्स्वालक्षण्यभेदाच्चानन्तता भवति । तैश्च तथाव्यव- स्थितैः सद्भिः प्रसिद्धानकस्वभावानुसारणरूपया स्वभावोक्त्यापि ताव- दुपनिबध्यमानैरनिरवधिः काव्यार्थः सम्पद्यते । तथा ह्यवस्थाभेदान्नवत्वं यथा—भगवती पार्वती कुमारसम्भवे 'सर्वोपमाद्रव्यसमुच्चयेन' इत्या- दिभिरुक्तिभिः प्रथममेव परिसमापितरूपवर्णनापि पुनर्भगवतः शम्भो- र्लोचनगोचरमायान्ती 'वसन्तपुष्पाभरणं वहन्ती' मन्मथोपकरणभूतेन भङ्ग्यन्तरेणोपवर्णिता । सैव च पुनर्नवोद्वाहसमये प्रसाध्यमाना 'तां प्राङ्मुखीं तत्र निवेश्य तन्वीम्' इत्याद्युक्तिभिर्नवेनैव प्रकारेण निरूपि- स्वभावतः उत्पन्न होता है। क्योंकि यह चेतनों और अचेतनों का स्वभाव ही है कि अवस्था के भेद से, देश के भेद से, काल के भेद से और स्वालक्षण्य ( स्वरूप ) के भेद से अनन्तता होती है। और उनके उस प्रकार व्यवस्थित होने से प्रसिद्ध अनेक स्वभावों के अनुसरण रूप वाली स्वभावोक्ति से भी उपनिबध्यमान ( वाच्यार्थों से ) अवधिशून्य काव्यार्थ सम्पन्न होता है। अवस्था के भेद से नवत्व, जैसे—भगवती पार्वती 'कुमार-सम्भव' में 'समस्त उपमाद्रव्य के समूह से०' इत्यादि उक्तियों द्वारा पहले ही परिसमाप्त रूप के वर्णन से युक्त होकर भी पुनः भगवान् शिव के लोचन- गोचर होती हुई 'बसन्त के पुष्पों का आभरण धारण करती हुई' मन को मथन करने वाले ( कामदेव ) के उपकरण ( सामग्री ) हुए दूसरे प्रकार से उपवर्णित हैं। और वही फिर नये विवाह के समय में प्रसाधित होती हुई ( भगवती पार्वती ) का
लोचनम्
स्वरूपमात्रेणैव पश्चात्तु तथा स्वरूपेणानन्तं सव्यङ्ग्यं व्यक्तीति भावः । न तु सर्वथा तत्र व्यङ्ग्यं नास्तीति मन्तव्यमात्मभूततद्रूपाभावे काव्यव्यवहारहानेः; तथा चोदाहरणेषु रसध्वनेस्सद्भावोऽस्त्येव । आदिग्रहणं व्याचष्टे—स्वालक्ष- ण्यति । स्वरूपेत्यर्थः । यथा रूपस्पर्शयोस्तीव्रैकावस्थयोरेकद्रव्यनिष्ठयोरेक कालयोश्च । भाव यह कि व्यङ्ग्य-विषयक जो व्यापार है उसके स्पर्श के बिना भी आनन्त्य स्वरूप मात्र से ही है, पीछे तो इस प्रकार स्वरूप से अनन्त होता हुआ व्यङ्ग्य को व्यक्त करता है। न कि सब प्रकार से वहां व्यङ्ग्य नहीं है यह मानना चाहिए क्योंकि आत्मा रूप उस ( व्यङ्ग्यरूप ) के अभाव में काव्य के व्यवहार की हानि होगी। और जैसा कि उदाहरणों में रसध्वनि का सद्भाव है ही। आदि के ग्रहण का व्याख्यान करते हैं—स्वालक्षण्य—। स्वरूप' यह अर्थ है। जैसे, तीव्र एक अवस्था वाले, एक द्रव्य में रहने वाले और एक काल में उत्पन्न रूप और स्पर्श का ।
चतुर्थ उद्योतः ५८५ ध्वन्यालोकः तरूपसौष्ठवा । न च ते तस्य कवेरेकत्रैवासकृत्कृता वर्णनप्रकारा अपुन- रुक्तत्वेन वा नवनवार्थनिर्भरत्वेन वा प्रतिभासन्ते । दर्शितमेव चैतद्वि- षमबाणलीलायाम्— ण अ ताण घडइ ओही ण अ ते दीसन्ति कह वि पुनरुत्ता । जे विब्भमा पिआणं अत्था वा सुकइवाणीणम् ॥ अयमपरश्चावस्थाभेदप्रकारो यदचेतनानां सर्वेषां चेतनं द्वितीयं रूपमभिमानित्वप्रसिद्धं हिमवद्गङ्गादीनाम् । तच्चोचितचेतनविषयस्वरूप- ‘उस कृश शरीर वाली को पूर्व की ओर मुँह करके बैठाकर’ इत्यादि उक्तियों से नये ही प्रकार से रूप के सौष्ठव का निरूपण है । उस कवि के, एक जगह ही वार- बार किए गए वे वर्णन-प्रकार फिर नहीं कहे गए (अपुनरुक्त) रूप से अथवा नये नये अर्थों से भरे (नवनवार्थनिर्भर) रूप से प्रतिभासित नहीं होते हैं । इसे ‘विषम- बाणलीला’ में दिखाया ही है— ‘जो प्रियाओं के विभाव (हाव-भाव) अथवा सुकवि की वाणियों के अर्थ हैं उनकी अवधि (समाप्ति) नहीं होती है, किसी प्रकार वे पुनरुक्त नहीं प्रतीत होते हैं।’ और यह दूसरा अवस्थाभेद का प्रकार है जो हिमवान् और गङ्गा आदि समस्त अचेतनों का चेतन दूसरा रूप अभिमानी रूप से प्रसिद्ध है । और वह उचित चेतन- सम्बन्धी स्वरूप की योजना से उपनिबध्यमान होकर अन्य हो जाता है । जैसे, लोचनम् न च तेषां घटतेऽवधिः, न च ते दृश्यन्ते कथमपि पुनरुक्ताः । ये विभ्रमाः प्रियाणामर्था वा सुकविवाणीनाम् ॥ चकाराभ्यामतिविस्मयस्सूच्यते । कथमपीति । प्रयत्नेनापि विचार्यमाणं पौनरुक्त्यं न लभ्यमिति यावत् । प्रियाणामिति । बहुवल्लभो हि सुभगो राधाव- ल्लभप्रायस्तास्ताः कामिनीः परिभोगसुभगमुपभुञ्जानोऽपि न विभ्रमपौनरुक्त्यं पश्यति तदा । एतदेव प्रियात्वमुच्यते, यदाह— दो चकारों (‘और’ के प्रयोगों) से अत्यन्त विस्मय सूचित होता है । किसी प्रकार—। प्रयत्न से भी विचार किया जाय (तो भी) पौनरुक्त्य नहीं मिलेगा, यह भाव है । प्रियाओं का—। बहुत वल्लभाओं वाला सुभग (नायक) राधा के प्रिय (कृष्ण) के सदृश, उन उन कामिनियों का परिभोग के सुभग प्रकार से उपभोग करता हुआ भी विभ्रम के पौनरुक्त्य को तब नहीं देखता । यही ‘प्रियात्व’ कहा जाता है, जो कहा है—
५८६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः योजनयोपनिबध्यमानमन्यदेव सम्पद्यते । यथा कुमारसम्भवे एव पर्वतस्वरूपस्य हिमवतो वर्णनं, पुनः सप्तर्षिप्रयोक्तिषु चेतनतत्स्वरूपा- पेक्षया प्रदर्शितं तदपूर्वमेव प्रतिभाति । प्रसिद्धश्चायं सत्कवीनां मार्गः । इदं च प्रस्थानं कविव्युत्पत्तये विषमबाणलीलायां सप्रपञ्चं दर्शितम् । चेतनानां च बाल्याद्यवस्थाभिरन्यत्वं सत्कवीनां प्रसिद्धमेव । चेतना- नामवस्थाभेदेऽप्यवान्तरावस्थाभेदान्नानात्वम् । यथा कुमारीणां कुसुम- शरभिन्नहृदयानामन्यासां च । तत्रापि विनीतानामविनीतानां च । अचेतनानां च भावानामारम्भाद्यवस्थाभेदभिन्नानामेकैकशः स्वरूपमुप- निबध्यमानमानन्त्यमेवोपयाति । यथा— हंसानां निनदेषु यैः कवलितैरासज्यते कूजता- 'कुमारसम्भव' में ही पर्वत स्वरूप हिमवान् का वर्णन है, फिर सप्तर्षियों की प्रिय उक्तियों में चेतन उसके स्वरूप की अपेक्षा से दिखाया गया है, वह अपूर्व ही मालूम पड़ता है । और यह सत्कवियों का मार्ग प्रसिद्ध है । और यह प्रस्थान कवियों की व्युत्पत्ति के लिए 'विषमबाणलीला' में प्रपञ्च के साथ दिखाया है । और चेतनों का बाल्य आदि अवस्थाओं से अन्य होना सत्कवियों के प्रसिद्ध ही है । चेतनों का अवस्थाभेद में भी अवान्तर अवस्थाभेद से नानात्व है, जैसे कामदेव के बाणों से बिंधे हृदय वाली कुमारियों का, और दूसरी (नायिकाओं) का । वहाँ भी विनीतों का और अविनीतों का । और आरम्भ आदि अवस्थाओं के भेद से भिन्न अचेतन भावों का एक-एक करके स्वरूप उपनिबध्यमान होकर आनन्त्य को ही प्राप्त करता है । जैसे— 'कूंजते हुए हंसों की आवाजों में जो कोई दूसरा कसैले कंठ में लोटने से घर- लोचनम् क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयताया इति । प्रियाणामिति चासंसारं प्रवृद्धरूपो योऽयं कान्तानां विभ्रमविशेषः स नवनव एव दृश्यते । न ह्यसावग्निचयनादिवदन्यतशिक्षितः, येन तत्सादृश्या- त्पुनरुक्ततां गच्छेत् । अपि तु निसर्गोद्भिद्यमानमदनाङ्कुरविकासमात्रान्तदिति 'क्षण-क्षण में जो नवत्व प्राप्त करता है रमणीयता का वही रूप है।' प्रियाओं का—। संसार के अस्तित्व से लेकर प्रवाहित होता हुआ जो यह कान्ताओं का विभ्रम विशेष है वह नया-नया ही दिखाता है । न कि वह 'अग्निचयनादि' (यज्ञक्रियाओं) की तरह अन्य से सीखा गया है, जिससे उसके समान होने से पुनरुक्तता को प्राप्त करता । अपि तु यह स्वभाव से उकसते हुए मदनाङ्कुर का विकासमात्र है, इसलिए
चतुर्थ उद्योतः ५८७ ध्वन्यालोकः मन्यः कोऽपि कपायकण्ठलुठनादाघर्घरो विश्रमः । ते सम्प्रत्यकठोरवारणवधूदन्ताङ्कुरस्पर्धिनो निर्याताः कमलाकरेषु बिसिनीकन्दाग्रिमग्रन्थयः ॥ एवमन्यत्रापि दिशानयानुसर्तव्यम् । देशभेदान्नानात्वमचेतनानां तावत् । यथा वायूनां नानादिग्देश- चारिणामन्येषामपि सलिलकुसुमादीनां प्रसिद्धमेव । चेतनानामपि मानुषपशुपक्षिप्रभृतीनां ग्रामारण्यसलिलादिसमेधितानां परस्परं महा- न्विशेषः समुपलक्ष्यत एव । स च विविच्य यथायथमुपनिबध्यमान- स्तथैवानन्त्यमायाति । तथा हि—मानुषाणामेव तावद्दिग्देशादि- भिन्नानां ये व्यवहारव्यापारादिषु विचित्रा विशेषास्तेषां केनान्तः शक्यते गन्तुम्, विशेषतो योषिताम् । उपनिबध्यते च तत्सर्वमेव सुकविभिर्यथाप्रतिभम् । घराहट के रूप में विश्रम को आसक्त कर देती हैं वे इस समय कोमल हाथी की पत्नी के दन्तांकुर के साथ स्पर्धा करने वाली कमलिनी के कन्द के अगले हिस्से की गांठें कमलाकरों ( सरोवरों ) में निकल पड़ीं ।' इस प्रकार अन्यत्र भी इस दिशा से अनुसरण करना चाहिए । अचेतनों का देश के भेद से तावत् नानात्व । जैसे, नाना दिशाओं, देशों में विचरण करनेवाली हवाओं का, अन्य भी जल, फूल आदि का नानात्व प्रसिद्ध ही है । ग्राम, जंगल, जल आदि में बढ़े हुए चेतन मनुष्य, पशु, पक्षी प्रभृतियों का परस्पर महान् विशेष समुपलक्षित होता ही है । और वह विवेचन करके ठीक-ठीक उपनिबध्यमान होकर उसी प्रकार आनन्त्य को प्राप्त करता है । जैसा कि—दिशा और देश आदि से भिन्न मनुष्यों के ही जो व्यवहार और व्यापार आदि में विचित्र विशेष ( भेद ) हैं उनका किसके द्वारा पार पाया जा सकता है ? विशेष रूप से स्त्रियों के । और उन सबको ही सुकवि लोग प्रतिभा के अनुसार उपनिबद्ध करते हैं । लोचनम् नवनवत्वम् । तद्भूतपरकीयशिक्षानपेक्षनिजप्रतिभागुणनिष्यन्दभूतः काव्यार्थ इति भावः । तावदिति । उत्तरकालन्तु व्यंग्यस्पर्शनेन विचित्रतां परां भजतान्नाम, नवनवत्व है । भाव यह कि उस प्रकार दूसरे द्वारा शिक्षा की अपेक्षा न करके अपनी प्रतिभा के गुण का निष्यन्द काव्यार्थ है । तब तक—। बाद में तो व्यङ्ग्य के स्पर्श से उत्कृष्ट विचित्रता को प्राप्त कर ले ।
५८८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कालभेदाच्च नानात्वम् । यथर्तुभेदाद्दिग्व्योमसलिलादीनामचेतना- नाम् । चेतनानां चौत्सुक्यादयः कालविशेषाश्रयिणः प्रसिद्धा एव । स्वालक्षण्यप्रभेदाच्च सकलजगद्गतानां वस्तूनां विनिबन्धनं प्रसिद्धमेव । तच्च यथावस्थितमपि तावदुपनिबध्यमानमनन्ततामेव काव्यार्थ- स्यापादयति । अत्र केचिदाचक्षीरन्—यथा सामान्यात्मना वस्तूनि वाच्यतां प्रतिपद्यन्ते न विशेषात्मना ; तानि हि स्वयमनुभूतानां सुखादीनां तन्निमित्तानां च स्वरूपमन्यत्रारोपयद्भिः स्वपरानुभूतरूपसामान्य- मात्राश्रयेणोपनिबध्यन्ते कविभिः । न हि तैरतीतमनागतं वर्तमानञ्च परिचितादिस्वलक्षणं योगिभिरिव प्रत्यक्षीक्रियते ; तच्चानुभाव्यानु- और काल के भेद से नानात्व । जैसे, ऋतु के भेद से दिशा, आकाश और सलिल आदि अचेतनों का । और चेतनों के औत्सुक्य आदि ( भेद ) कालविशेष का आश्रयण करने वाले प्रसिद्ध ही हैं । और स्वालक्षण्य ( स्वरूप ) के प्रभेद से समस्त संसार की वस्तुओं का विनिबन्धन प्रसिद्ध ही है । और वह जैसा है उस प्रकार भी अवस्थित होकर उपनिबद्ध होता हुआ काव्य के अर्थ को आनन्त्य प्राप्त कराता है । यहाँ कुछ लोग ( अगर ) कहें—जैसे सामान्य रूप से वस्तुएँ वाच्यभाव को प्राप्त होती हैं, न कि विशेष रूप से; क्योंकि वे स्वयं अनुभव किए गए सुख आदि के और उनके निमित्तों ( कारणों ) के स्वरूप को अन्यत्र आरोपित करते हुए कवियों द्वारा अपने और पराये के द्वारा अनुभूत रूप सामान्य मात्र के आश्रयण से उपनिबद्ध किए जाते हैं । न कि वे ( कवि ) अतीत, अनागत और वर्तमान परिचित आदि स्वलक्षण (स्वरूप) को योगियों की भांति प्रत्यक्ष करते हैं; बल्कि वह अनुभव के लोचनम् तावति तु स्वभावेनैव सा विचित्रतेति तावच्छब्दस्याभिप्रायः । तन्निमित्ताना- ञ्चेति । ऋतुमाल्यादीनाम् । स्वेति । स्वानुभूतपरानुभूतानां यत्सामान्यं तदेव विशेषान्तररहितन्तन्मात्रं तस्याश्रयेण । न हि तैरिति कविभिः । एतच्चात्यन्ता- संभावनार्थमुक्तम् । प्रत्यक्षदर्शनेऽपि हि— तब तक तो स्वभाव से ही वह विचित्रता होती है यह 'तब तक' शब्द का अभिप्राय है । उनके निमित्तों का—। ऋतु, माल्य आदि का । अपने अनुभूतों का दूसरों के अनुभूतों का जो सामान्य वही विशेषान्तर से रहित ( होकर ) तन्मात्र है, उस तन्मात्र के आश्रयण से । न कि उनसे अर्थात् कवियों से । इसे अत्यन्त असम्भावन के लिए कहा है । प्रत्यक्ष देखने में भी—
भवसामान्यं सर्वप्रतिपत्तृसाधारणं परिमितत्वात्पुरातनानामेव गोचरी- भूतम्, तस्याविषयत्वानुपपत्तेः । अतएव स प्रकारविशेषो यैरद्यतनै- रभिनवत्वेन प्रतीयते तेषामभिमानमात्रमेव भणितिकृतं वैचित्र्यमात्रम- त्रास्तीति । तत्रोच्यते—यत्तूक्तं सामान्यमात्राश्रयेण काव्यप्रवृत्तिस्तस्य च परिमितत्वेन प्रागेव गोचरीकृतत्वान्नास्ति नवत्वं काव्यवस्तूनामिति, तदयुक्तम्; यतो यदि सामान्यमात्रमाश्रित्य काव्यं प्रवर्तते किङ्कृत- स्तर्हि महाकविनिबध्यमानानां काव्यार्थानामतिशयः । वाल्मीकिव्य- तिरिक्तस्यान्यस्य कविव्यपदेश एव वा सामान्यव्यतिरिक्तस्या- न्यस्य काव्यार्थस्याभावात् , सामान्यस्य चादिकविनैव प्रदर्शित त्वात् । उक्तिवैचित्र्यान्नैष दोष इति चेत्—किमिदमुक्तिवैचित्र्यम् ? के योग्य (वस्तु) के अनुभव का सामान्य सब जानकारों के लिए साधारण, (और) परिमित होने के कारण प्राचीन कवियों का ही विषय किया हुआ है क्योंकि उसका अविषयत्व उपपन्न नहीं है । अतएव वह प्रकार विशेष को जिन आज के लोगों ने अभिनव रूप से समझा है उन्हें अभिमानमात्र ही है । भणिति द्वारा किया हुआ वैचित्र्य मात्र यहाँ है । वहाँ कहते हैं—जो कि कहा है सामान्य मात्र के आश्रयण से काव्य की प्रवृत्ति होती है और उस (सामान्य मात्र) के परिचित होने के कारण पहले ही विषय कर लिए जाने से काव्य वस्तुओं का नवत्व नहीं है यह, वह ठीक नहीं; क्योंकि यदि सामान्य मात्र का आश्रयण करके काव्य प्रवृत्त होता है तो किसके द्वारा महाकवियों द्वारा बनाए गये काव्यार्थों का अतिशय (वैचित्र्य) होगा? अथवा, वाल्मीकि को छोड़ कर दूसरे का 'कवि' व्यपदेश (नाम) ही (किसके द्वारा किया गया होगा ?) (जब कि) सामान्य को छोड़कर दूसरे भाप्यार्थ का अभाव है, क्योंकि आदि कवि के
लोचनम्
शब्दात्सङ्केतितं प्राहुर्व्यवहाराय स स्मृतः । तदा स्वलक्षणं नास्ति सङ्केतस्तेन तत्र नः ।। इत्यादियुक्तिभिस्सामान्यमेव स्पृश्यते । किमिति । असंवेद्यमानमर्थपौन- रुक्त्यं कथं प्राकरणिकैरङ्गीकार्यमिति भावः । तमेव प्रकटयति—न चेदिति । शब्द-संकेतित (अर्थ) को कहते हैं, व्यवहार के लिए वह माना गया है, तब स्वरूप (स्वलक्षण) नहीं होता, उस (स्वलक्षण) से वहाँ हमें संकेत (होता है)। इत्यादि युक्तियों से सामान्य ही स्पष्ट होता है । क्या—। नहीं जाना जाता हुआ (असंवेद्यमान) अर्थ का पौनरुक्त्य कैसे प्राकरणिकों द्वारा स्वीकार्य होगा यह भाव
५९० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः उक्तिर्हि वाच्यविशेषप्रतिपादि वचनम् । तद्वैचित्र्ये कथं न वाच्यवै- चित्र्यम् । वाच्यवाचकयोरविनाभावेन प्रवृत्तेः । वाच्यानां च काव्ये- प्रतिभासमानानां यद्रूपं तत्तु ग्राह्यविशेषाभेदेनैव प्रतीयते । तेनो- क्तिवैचित्र्यवादिना वाच्यवैचित्र्यमनिच्छताप्यवश्यमेवाभ्युपगन्तव्यम् । तदयमत्र सङ्क्षेपः— द्वारा सामान्य प्रदर्शित किया जा चुका है। उक्तिवैचित्र्य के कारण यह दोष नहीं है यह (कहें) तो (प्रश्न उठता है) कि यह उक्तिवैचित्र्य क्या है? उक्ति वाच्यविशेष के प्रतिपादन करने वाले वचन को कहते हैं, उसके वैचित्र्य में कैसे नहीं वाच्य का वैचित्र्य होगा? क्योंकि वाच्य और वाचक की अविनाभाव से प्रवृत्ति होती है। और प्रतिभासमान वाच्यों का काव्य में जो रूप है वह तो ग्राह्य विशेष के अभेद से ही प्रतीत होता है। उससे उक्तिवैचित्र्यवादी को वाच्य के वैचित्र्य की इच्छा न रखते हुए भी अवश्य ही मानना चाहिए। तो यह यहाँ संक्षेप है— लोचनम् उक्तिर्हीति । पर्यायमात्रतैव यद्युक्तिविशेषस्तत्पर्यायान्तरैरविकलं तदर्थोपनिबन्धे अपौनरुक्त्याभिमानो न भवति । तस्माद्विशिष्टवाच्यप्रतिपादकेनैवोक्तेर्विशेष इति भावः । ग्राह्यविशेषेति । ग्राह्यः प्रत्यक्षादिप्रमाणैर्यो विशेषः तस्य यः अभेदः । तेनायमर्थः—पदानान्तावत्सामान्ये वा तद्वति वाऽपोहे वा यत्र कुत्रापि वस्तुनि समयः, किमनेन वादान्तरेण ? वाक्यात्तद्विशेषः प्रतीयत इति कस्यात्र वादिनो विमतिः । अन्विताभिधानतद्विपर्ययसंसर्गभेदादिवाक्यार्थपक्षेषु सर्वत्र विशेषस्याप्रत्याख्येयत्वात् । उक्तिवैचित्र्यञ्च न पर्यायमात्रकृतमित्युक्तम् । अन्यत्तु है। उसी को प्रकट करते हैं—नहीं—। उक्ति—। दूसरे शब्द (पर्याय) के द्वारा निर्देश ही यदि उक्ति विशेष है तो पर्यायान्तरों से अविकल (रूप में) उस अर्थ के उपनिबन्ध होने पर अपौनरुक्त्य का अभिमान नहीं होगा। भाव यह कि इसलिए विशिष्ट वाच्य के प्रतिपादक से ही उक्ति का विशेष है। ग्राह्यविशेष—। ग्राह्य प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से जो विशेष उसका जो अभेद। उससे यह अर्थ है—पदों का सामान्य (जाति) में (मीमांसक मतानुसार) अथवा तद्वान् (न्यायमतानुसार) में अथवा अपोह (बौद्धमतानुसार) में जहाँ कहीं भी वस्तु में समय (संकेत) है, इस दूसरे वाद के उपस्थित करने से क्या लाभ? वाक्य से उस (वस्तु) का विशेष प्रतीत होता है, यहाँ किस वादी का वैमत्य है? क्योंकि अन्विता- भिधान और उसके विपर्यय (अभिहितान्वयवाद) के संसर्गभेद आदि के वाक्यार्थ पक्षों में सर्वत्र विशेष का प्रत्याख्यान नहीं किया जा सकता। यह कह चुके हैं कि उक्ति- वैचित्र्य पर्यायमात्र से नहीं होता है। और अन्य जो है वह प्रत्युत हमारे पक्ष का
चतुर्थ उद्योतः ५९१ ध्वन्यालोकः वाल्मीकिव्यतिरिक्तस्य यद्येकस्यापि कस्यचित् । इष्यते प्रतिभाऽर्थेषु तत्तदानन्त्यमक्षयम् ॥ किञ्च, उक्तिवैचित्र्यं यत्काव्यनवत्वे निबन्धनमुच्यते तदस्मत्पक्षा- नुगुणमेव । यतो यावानयं काव्यार्थानन्त्यभेदहेतुः प्रकारः प्राग्दर्शितः स सर्व एव पुनरुक्तिवैचित्र्याद्द्विगुणतामापद्यते । यश्चायमुपमाश्लेषादि- रलङ्कारवर्गः प्रसिद्धः स भणितिवैचित्र्यादुपनिबध्यमानः स्वयमेवानव- धिर्धत्ते पुनः शतशाखताम् । भणितिश्च स्वभाषाभेदेन व्यवस्थिता सती वाल्मीकि को छोड़ कर यदि किसी एक (कवि) की प्रतिभा अर्थों में मान ली जाती है तो वह नहीं क्षय होने वाला आनन्त्य है । और भी, उक्तिवैचित्र्य को जो काव्य के नवत्व में निबन्धन (प्रयोजक) कहते हैं, वह हमारे पक्ष के अनुकूल ही है । क्योंकि जितना यह काव्य के अर्थ के आनन्त्य- भेद को करने वाला प्रकार पहले दिखाया गया है वह सब ही फिर उक्तिवैचित्र्य के कारण दुगुना बन जायगा । और जो यह उपमा, श्लेष आदि अलंकार-वर्ग प्रसिद्ध है वह भणितिवैचित्र्य से उपनिबद्ध किया जाता हुआ स्वयं ही अवधिरहित (होकर) लोचनम् यत्तत्प्रत्युतास्माकं पक्षसाधकमित्याह—किञ्चेति । पुनरिति । भूय इत्यर्थः । उपमा हि निभ, प्रतिम, च्छल, प्रतिबिम्ब, प्रतिच्छाय, तुल्य, सदृशाभासादि- भिर्विचित्राभिरुक्तिभिर्विचित्रीभवत्येव । वस्तुत एतासामुक्तीनामर्थवैचित्र्यस्य विद्यमानत्वात् । नियमेन भानयोगाद्धि निभशब्दः, तदनुकारतया तु प्रतिम- शब्द इत्येवं सर्वत्र वाच्यं केवलं बालोपयोगि काव्यटीकापरिशीलनदौरात्म्या- देषु पर्यायत्वभ्रम इति भावः । एवमर्थानन्त्यमलङ्कारानन्त्यञ्च भणितिवैचित्र्या- द्भवति । अन्यथापि च तत्ततो भवतीति दर्शयति—भणितिश्चेति । प्रतिनिय- ताया भाषाया गोचरो वाच्यो योऽर्थस्तत्कृतं यद्वैचित्र्यं तन्निबन्धनं निमित्तं साधक है, यह कहते हैं—और भी—। फिर—। अर्थात् भूयः, फिर से । उपमा निभ, प्रतिम, छल, प्रतिबिम्ब, प्रतिच्छाय, तुल्य, सदृश, आभास आदि विचित्र उक्तियों से विचित्र हो जाती ही है । क्योंकि वस्तुतः इन उक्तियों में अर्थ का वैचित्र्य विद्यमान रहती ही है । भाव यह कि नियमतः कान के योग से 'निभ' शब्द है, उसके अनुभार रूप से प्रतिम शब्द है इस प्रकार यह सर्वत्र कहा जा सकता है, केवल बालोपयोगी काव्य की टीका के परिशीलन की दुष्टता से पर्यायत्व का भ्रम हो गया है । इस प्रकार भणिति के वैचित्र्य से अर्थों का आनन्त्य और अलङ्कारों का आनन्त्य होता है । अन्यथा भी वह उस कारण हो जाता है यह दिखाते हैं—और भणिति—। प्रतिनियत भाषा का गोचर वाच्य जो अर्थ है तत्कृत जो वैचित्र्य वह निबन्धन अर्थात् निमित्त है जिसका,
५९२ सलोचन-ध्वन्यालोकः 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः प्रतिनियतभाषागोचरार्थवैचित्र्यनिबन्धनं पुनरपरं काव्यार्थानामान- न्त्यमापादयति । यथा ममैव— महमह इत्ति भणन्तउ वज्जदि कालो जणस्स । तोइ ण देउ जणद्दण गोअरी भोदि मणसो ॥ ७ ॥ इत्थं यथा यथा निरूप्यते तथा तथा न लभ्यतेऽन्तः काव्यार्था- नाम् । इदं तूच्यते— अवस्थादिविभिन्नानां वाच्यानां विनिबन्धनम् । फिर सैकड़ों शाखाओं में परिवर्तित हो जायगा । और भणिति अपनी भाषा के भेद से व्यवस्थित होती हुई प्रतिनियत भाषा में रहने वाले अर्थवैचित्र्य के निबन्धन रूप काव्यार्थों का आनन्त्य फिर भी उत्पन्न कर देती है । जैसे मेरा ही— 'मेरा' 'मेरा' की रट लगाते हुए व्यक्ति का समय बीत जाता है, तथापि देव जनार्दन मन के गोचर नहीं होते । इस प्रकार जैसे-जैसे निरूपण करते हैं वैसे-वैसे काव्यार्थों का अन्त मालूम नहीं पड़ता । परन्तु यह कहते हैं— अवस्था आदि से विभिन्न वाच्यों का निबन्धन—जो पहले प्रदर्शित हो चुका लोचनम् यस्य, अलङ्काराणां काव्यार्थानाञ्चानन्त्यस्य । तत्कर्मभूतं भणितिवैचित्र्यं कर्तृभूतमापादयतीति सम्बन्धः । कर्मणो विशेषणच्छलेन हेतुदर्शितः । मम मम इति भणतो व्रजति कालो जनस्य । तथापि न देवो जनार्दनो गोचरो भवति मनसः ॥ मधुमथन इति यः अनवरतं भणति, तस्य कथन्न देवो मनोगोचरो भवती- तिविरोधालङ्कारच्छाया । सैन्धवभाषया महमह इत्यनया भणित्या समुन्मे- षिता ॥ ७ ॥ अवस्थादिविभिन्नानां वाच्यानां विनिबन्धनम् । भूम्नैव दृश्यते लक्ष्ये तत्तु भाति रसाश्रयात् ॥ अलङ्कारों और काव्यार्थों के आनन्त्य का । वह कर्मभूत भणितिवैचित्र्य कर्तृभूत होकर उत्पन्न करता है, यह सम्बन्ध है । कर्म के विशेषण के व्याज से हेतु दिखा दिया है । 'मधुमथन' यह शब्द जो निरन्तर कहता रहता है, देवता क्यों नहीं उसके मनोगोचर होते हैं, यह विरोध अलङ्कार की छाया है । 'महमह' इस सैन्धव भाषा की उक्ति से वह (विरोधच्छाया) समुन्मेषित हुई है ॥ ७ ॥
चतुर्थ उद्योतः ५९३
ध्वन्यालोकः
यत्प्रदर्शितं प्राक्
भूम्नैव दृश्यते लक्ष्ये-
न तच्छक्यमपोहितुम् ।
-तत्तु भाति रसाश्रयात् ॥ ८ ॥
तदिदमत्र सङ्क्षेपेणाभिधीयते सत्कवीनामुपदेशाय—
रसभावादिसम्बद्धा यद्यौचित्यानुसारिणी ।
अन्वीयते वस्तुगतिर्देशकालादिभेदिनी ॥ ९ ॥
तत्का गणना कवीनामन्येषां परिमितशक्तीनाम् ।
वाचस्पतिसहस्राणां सहस्रैरपि यत्नतः ।
निबद्धा सा क्षयं नैति प्रकृतिर्जगतामिव ॥ १० ॥
यथा हि जगत्प्रकृतिरतीतकल्पपरम्पराविर्भूतविचित्रवस्तुप्रपञ्चा
है—लक्ष्य में बहुतायत से देखा जाता है—उसका निराकरण नहीं किया जा
सकता है—वह तो रस के आश्रय से शोभा देता है ॥ ८ ॥
तो यहाँ यह सत्कवियों के उपदेश के लिए संक्षेप से कहते हैं—
यदि रस, भाव आदि से सम्बद्ध, औचित्य का अनुसरण करने वाली, देश, काल
आदि की भेद वाली वस्तुगति का अनुगमन करते हैं ॥ ९ ॥
तो अन्य परिमित शक्ति वाले कवियों की क्या गणना ?
हजारों हजार वाचस्पतियों द्वारा भी यत्नपूर्वक निबद्ध वह जगत् की प्रकृति की
भांति क्षीण नहीं हो सकती ॥ १० ॥
जिस प्रकार जगत् की प्रकृति अतीत कल्पों की परम्परा से विचित्र वस्तुप्रपञ्च को
लोचनम्
इति कारिका । अन्यस्तु ग्रन्थो मध्योपस्कारः ॥ ८ ॥
अत्र तु पादत्रयस्यार्थमनूद्य चतुर्थपादार्थोऽपूर्वतयाभिधीयते । तदित्यादि
शक्तीनामित्यन्तं कारिकयोर्मध्योपस्कारः । द्वितीयकारिकायास्तुर्यं पादं व्याचष्टे-
यथाहिति ॥ ९-१० ॥
कारिका के अतिरिक्त ग्रन्थ बीच का उपस्कार है ॥ ८ ॥
यहाँ तीन पादों का अर्थ अनुवाद करके चतुर्थ पाद का अर्थ अपूर्व रूप से अभिहित
किया गया है । 'तो' से लेकर 'गणना' तक का ग्रन्थ दोनों कारिकाओं के बीच का
उपस्कार है । दूसरी कारिका के चतुर्थ पाद की व्याख्या करते हैं—जैसे—॥ ९-१० ॥
३८ ध्व०
५९४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सती पुनरिदानीं परिक्षीणा परपदार्थनिर्माणशक्तिरिति न शक्यतेऽभि- धातुम् । तद्वदेवेयं काव्यस्थितिरनन्ताभिः कविमतिभिरुपभुक्तापि नेदा- नीं परिहीयते, प्रत्युत नवनवाभिव्युत्पत्तिभिः परिवर्धते । इत्थं स्थितेऽपि— संवादास्तु भवन्त्येव बाहुल्येन सुमेधसाम् । स्थितं ह्येतत् संवादिन्य एव मेधाविनां बुद्धयः । किन्तु— नैकरूपतया सर्वे ते मन्तव्या विपश्चिता ॥ ११ ॥ कथमिति चेत्— संवादो ह्यन्यसादृश्यं तत्पुनः प्रतिबिम्बवत् । आलेख्याकारवत्तुल्यदेहिवच्च शरीरिणाम् ॥ १२ ॥ आविर्भूत करती है, फिर अब पदार्थों के निर्माण की शक्ति परिक्षीण हो चुकी ऐसा नहीं कहा जा सकता, उसी प्रकार यह काव्यस्थिति अनन्त कविबुद्धियों द्वारा भी होकर इस समय समाप्त नहीं है, बल्कि नई-नई व्युत्पत्तियों से बढ़ती जाती है । इस प्रकार स्थित होने पर भी— बहुततया सुमेधा जनों के संवाद हो ही जाते हैं । क्योंकि यह माना जाता है कि मेधावी लोगों की बुद्धियाँ संवादिनी होती हैं । किन्तु— विद्वान को उन सबको एक रूप से नहीं मानना चाहिए ॥ ११ ॥ यदि कहो कैसे ? ( तो कहते हैं )— संवाद अन्य का सादृश्य होता है, वह फिर शरीरियों के प्रतिबिम्ब की भांति, चित्र के आकार की भांति और तुल्य शरीरी की भांति रहता है ॥ १२ ॥ लोचनम् संवादा इति कारिकाया अर्धं, नैकरूपतयेति द्वितीयम् ॥ ११ ॥ किमियं राजाज्ञेत्यभिप्रायेणाशङ्कते—कथमिति चेदिति । अत्रोत्तरम्— संवादो ह्यन्यसादृश्यन्तत्पुनः प्रतिबिम्बवत् । आलेख्याकारवत्तुल्यदेहिवच्च शरीरिणाम् ॥ इत्यनया कारिकया । एषा खण्डीकृत्य वृत्तौ व्याख्याता । शरीरिणामित्य- 'बहुततया' यह कारिका का अर्धभाग है; 'विद्वान् को' यह दूसरा भाग है ॥ ११ ॥ क्या यह राजाज्ञा है ! इस अभिप्राय से आशङ्का करते हैं—कैसे—। यहाँ उत्तर इस (११वीं) कारिका से है । इसे वृत्ति में खण्ड करके व्याख्यान किया है । और 'शरीरियों के' यह शब्द प्रति वाक्य में देखना चाहिए यह दिखाया है । शरीरी ( अन्य
चतुर्थ उद्योतः ५९५ ध्वन्यालोकः संवादो हि काव्यार्थस्योच्यते यदन्येन काव्यवस्तुना सादृश्यम् । तत्पुनः शरीरिणां प्रतिबिम्बवदालेखयाकारवत्तुल्यदेहिवच्च त्रिधा व्यवस्थितम् । किञ्चिद्धि काव्यवस्तु वस्त्वन्तरस्य शरीरिणः प्रतिबिम्बकल्पम् , अन्यदालेख्यप्रख्यम् , अन्यत्तुल्येन शरीरिणा सदृशम् । तत्र पूर्वमनन्यात्म तुच्छात्म तदनन्तरम् । तृतीयं तु प्रसिद्धात्म नान्यसाम्यं त्यजेत्कविः ॥१३॥ तत्र पूर्वं प्रतिबिम्बकल्पं काव्यवस्तु परिहर्तव्यं सुमतिना । यत- स्तदनन्यात्म तात्त्विकशरीरशून्यम् । तदनन्तरमालेख्यप्रख्यमन्यसाम्यं ( वह ) काव्यार्थ का संवाद कहलाता है जो कि अन्य काव्य वस्तु के साथ सादृश्य है । फिर वह ( सादृश्य ) शरीरियों के प्रतिबिम्ब की भांति, आलेख्य के आकार की भांति और तुल्य शरीरी की भांति तीन प्रकार से व्यवस्थित है । क्योंकि कुछ काव्यवस्तु शरीरी अन्य वस्तु का प्रतिबिम्ब समान होता है, अन्य आलेख्य समान होता है और अन्य तुल्य शरीरी के सदृश होता है । उनमें पहला अनन्यात्म रूप होता है, उसके बाद का तुच्छात्म होता है, किन्तु तीसरा प्रसिद्धात्म होता है, कवि अन्य के साम्य का त्याग न करे ॥ १३ ॥ उनमें पहला प्रतिबिम्ब समान काव्यवस्तु सुमति के लिए त्याज्य है । क्योंकि वह अनन्यरूप अर्थात् तात्त्विक शरीर से शून्य होता है । उसके बाद का आलेख्य- लोचनम् यच्छब्दः प्रतिवाक्यं द्रष्टव्य इति दर्शितम् । शरीरिण इति । पूर्वमेव प्रतिलब्ध- स्वरूपतया प्रधानभूतस्येत्यर्थः ॥ १२ ॥ तत्र पूर्वमनन्यात्म तुच्छात्म तदनन्तरम् । तृतीयन्तु प्रसिद्धात्म नान्यसाम्यन्त्यजेत्कविः ॥ इति कारिका । अनन्यः पूर्वोपनिबन्धकाव्यादात्मा स्वभावो यस्य तदन- न्यात्म येन रूपेण भाति तत्प्राक्कविस्पृष्टमेव, यथा येन रूपेण प्रतिबिम्बं भाति, तेन रूपेण बिम्बमेवैतत् । स्वयन्तु तत्कीदृशमित्यत्राह—तात्त्विकशरीरशून्य- वस्तु ) का—। अर्थात् पहले ही स्वरूप प्राप्त कर लेने का कारण प्रधानभूत का ॥१२॥ ( १३वीं ) कारिका । नहीं अन्य है पूर्व हुए उपनिबन्धन वाले काव्य से आत्मा ( रूप ) स्वभाव जिसका वह अनन्यात्म है, जिस रूप से प्रतीत होता है वह पहले कवि द्वारा स्पृष्ट ही हुआ है, जैसे जिस रूप से प्रतिबिम्ब प्रतीत होता है उस रूप से यह बिम्ब ही है । किन्तु वह स्वयं कैसा है इस पर कहा है—तात्त्विक शरीर से शून्य—।
५९६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः शरीरान्तरयुक्तमपि तुच्छात्मत्वेन त्यक्तव्यम् । तृतीयं तु विभिन्नकम- नीयशरीरसद्भावे सति ससंवादमपि काव्यवस्तु न त्यक्तव्यं कविना । न हि शरीरी शरीरिणान्येन सदृशोऽप्येक एवेति शक्यते वक्तुम् ॥१३॥ एतदेवोपपादयितुमुच्यते— आत्मनोऽन्यस्य सद्भावे पूर्वस्थित्यनुयाय्यपि । वस्तु भातितरां तन्व्याः शशिच्छायमिवाननम् ॥१४॥ समान अर्थात् अन्य का साम्य वाला अन्य शरीर से युक्त होकर भी तुच्छरूप होने के कारण त्याज्य है । परन्तु तीसरा विभिन्न प्रकार के कमनीय शरीर के सद्भाव होने पर संवाद युक्त होने पर भी कवि के द्वारा काव्यवस्तु त्याज्य नहीं है । शरीरी अन्य शरीर से सदृश भी होकर 'एक ही है' यह नहीं कहा जा सकता । इसी के उपपादनार्थ कहते हैं— अन्य आत्मा के सद्भाव में अन्य की पूर्व स्थिति का अनुसरण करने वाला भी वस्तु (काव्यार्थ) तन्वी के शशिच्छाय मुख की भांति अधिकतर शोभा देता है ॥ १४ ॥ लोचनम् मिति । न हि तेन किञ्चिदपूर्वमुत्प्रेक्षितं प्रतिबिम्बमप्येवमेव । एवं प्रकारं व्याख्याय द्वितीयं व्याचष्टे-तदनन्तरन्विति । द्वितीयमित्यर्थः । अन्येन साम्यं यस्य तत्तथा । तुच्छात्मेति । अनुकारे ह्यनुकार्यबुद्धिरेव चित्रपुस्तादाविव न तु सिन्दूरादिबुद्धिः स्फुरति, सापि च न चारुतायेति भावः ॥ १३ ॥ एतदेवेति तृतीयस्य रूपस्यात्याज्यत्वम् । आत्मनोऽन्यस्य सद्भावे पूर्वस्थित्यनुयाय्यपि । वस्तु भातितरान्तन्व्याश्शशिच्छायमिवाननम् ॥ इति कारिका खण्डीकृत्य वृत्तौ पठिता । केषुचित्पुस्तकेषु कारिका उस (नये कवि) ने कुछ अपूर्व की उत्प्रेक्षा नहीं की, प्रतिबिम्ब भी इसी प्रकार का होता है । इस प्रकार प्रथम प्रकार का व्याख्यान करके दूसरे का व्याख्यान करते हैं— उसके बाद का—। अर्थात् दूसरा । अन्य के साथ साम्य जिसका है वह उस प्रकार । तुच्छात्म—। भाव यह कि चित्रपुस्त आदि की भांति अनुकार में अनुकार्य की बुद्धि ही स्फुरित होती है न कि सिन्दूर आदि की बुद्धि । और वह भी चारुत्व के लिए नहीं होती ॥ १३ ॥ 'इसी के'—तृतीय रूप का यही अत्याज्यत्व है । (१४वीं) कारिका खण्ड करके
चतुर्थ उद्योतः ५९७ ध्वन्यालोकः तत्त्वस्य सारभूतस्यात्मनः सद्भावेऽन्यस्य पूर्वस्थित्यनुयाय्यपि वस्तु भातितराम् । पुराणरमणीयच्छायानुगृहीतं हि वस्तु शरीरवत्परां शोभां पुष्यति । न तु पुनरुक्तत्वेनावभासते । तन्व्याः शशिच्छायमि- वाननम् । एवं तावत्ससंवादानां समुदायरूपाणां वाक्यार्थानां विभक्ताः सी- मानः । पदार्थरूपाणां च वस्त्वन्तरसदृशानां काव्यवस्तूनां नास्त्येव दोष इति प्रतिपादयितुमुच्यते— अक्षरादिरचनेव योज्यते यत्र वस्तुरचना पुरातनी । नूतने स्फुरति काव्यवस्तुनि व्यक्तमेव खलु सा न दुष्यति ॥ १५॥ तत्त्व अर्थात् सारभूत आत्मा के सद्भाव में अन्य की पूर्व स्थिति का अनुसरण करने वाला भी वस्तु अधिकतर शोभा देता है । पुरानी रमणीय छाया से अनुगृहीत वस्तु शरीर की भांति अधिक शोभा को बढ़ाती है । न कि पुनरुक्त रूप से अवभासित होती है । तन्वी के शशिच्छाय मुख की भांति । इस प्रकार ससंवाद समुदायरूप वाक्यार्थों की सीमाएँ विभक्त हैं । और पदार्थरूप वस्त्वन्तरसदृश काव्यवस्तुओं का दोष नहीं है यह प्रतिपादनार्थ कहते हैं— अक्षरादि की रचना की भांति जहाँ पुरानी वस्तुरचना की जाती है, नूतन काव्यवस्तु के स्फुरित होने पर स्पष्ट ही वह दूषित नहीं होती है ॥ १५ ॥ लोचनम् अखण्डीकृता एव दृश्यन्ते । आत्मन इत्यस्य शब्दस्य पूर्वपठिताभ्यामेव तत्त्वस्य सारभूतस्येति च पदाभ्यामर्थो निरूपितः ॥ १४ ॥ ससंवादानामिति पाठः । संवादानामिति तु पाठे वाक्यार्थरूपाणां समुदा- यानां ये संवादाः तेषामिति वैयधिकरण्येन संगतिः । वस्तुशब्देन एको वा द्वौ वा त्रयो वा चतुरादयो वा पदानामर्थाः । तानि त्विति । अक्षराणि च पदानि च । तान्येवेति । तेनैव रूपेण युक्तानि मनागप्यन्यरूपतामनागतानीत्यर्थः । वृत्ति में पढ़ी है । किन्हीं पुस्तकों में कारिकाएँ अखण्डीकृत ही देखी जाती हैं । 'आत्मा' इस शब्द के पहले ही पठित 'तत्त्व' और 'सारभूत' इन पदों से अर्थ-निरूपण किया है ॥ १४ ॥ 'ससंवाद' यह पाठ है । 'संवाद' इस पाठ में तो 'वाक्यार्थरूप समुदायों के जो संवाद हैं उनकी' यह वैयधिकरण्य से संगति होगी । 'वस्तु' शब्द से एक अथवा दो अथवा तीन अथवा चार आदि पदार्थ ( विवक्षित हैं ) । वे—। अक्षर और पद । वे ही—। उसी रूप से युक्त अर्थात् थोड़ी भी अन्य रूपता को न प्राप्त हुई । इस प्रकार
५९८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः न हि वाचस्पतिनाप्यक्षराणि पदानि वा कानिचिदपूर्वाणि घट- यितुं शक्यन्ते। तानि तु तान्येवोपनिबद्धानि न काव्यादिषु नवतां विरुध्यन्ति। तथैव पदार्थरूपाणि श्लेषादिमयान्यर्थतत्त्वानि। तस्मात्- यदपि तदपि रम्यं यत्र लोकस्य किञ्चित्- स्फुरितमिदमितीयं बुद्धिरभ्युज्जिहीते। स्फुरणेयं काचिदिति सहृदयानां चमत्कृतिरुत्पद्यते। वाचस्पति भी कुछ अपूर्व अक्षरों अथवा पदों को बना नहीं सकते। वे तो वे ही उपनिबद्ध होकर काव्य आदि में नवीनता का विरोध नहीं करते। उसी प्रकार पदार्थ रूप श्लेषादिभव अर्थतत्त्व भी। इसलिए जहाँ लोगों की 'यह नई सूझ (स्फुरण) है' यह बुद्धि उत्पन्न होती है वह जो भी हैं 'रम्य' (कहलाता) है। यह कोई (अपूर्व) स्फुरण है यह सहृदयों के चमत्कार उत्पन्न होता है। लोचनम् एवमक्षरादिरचनैवेति दृष्टान्तभागं व्याख्याय दार्ष्टान्तिके योजयति-तथैवेति। श्लेषादिमयानीति। श्लेषादिस्वभावानीत्यर्थः। सद्वृत्ततेजस्विगुणद्विजादयो हि शब्दाः पूर्वपूर्वैंरपि कविसहस्रैः श्लेषच्छायया निबध्यन्ते, निबद्धाश्चन्द्रादयश्चो पमानत्वेन। तथैव पदार्थरूपाणीत्यत्र नापूर्वाणि घटयितुं शक्यन्ते इत्यादि विरुध्यन्तीत्येवमन्तं प्राक्तनं वाक्यमभिसन्धानीयम्॥ १५॥ 'लोकस्ये'ति व्याचष्टे-सहृदयानामिति। चमत्कृतिरिति। आस्वादप्रधाना बुद्धिरित्यर्थः। 'अभ्युज्जिहीत' इति व्याचष्टे-उत्पद्यत इति। उदेतीत्यर्थः। बुद्धेरेवाकारं दर्शयति-स्फुरणेयं काचिदिति। यदपि तदपि रम्यं यत्र लोकस्य किञ्चित् स्फुरितमिदमितीयं बुद्धिरभ्युज्जिहीते। 'अक्षर आदि की रचना की भांति' इस दृष्टान्त भाग की व्याख्या करके दार्ष्टान्तिक में लगाते हैं-उसी प्रकार-। श्लेषादिमय-। अर्थात् श्लेष आदि के स्वभाव वाले। 'सद्वृत्त' 'तेजस्वी' 'गुण' 'द्विज' आदि शब्दों को पहले के हजारों कवियों ने श्लेष की छाया से निबन्धन किया है, और चन्द्र आदि को उपमान रूप से निबन्धन किया है। उसी प्रकार 'पदार्थ रूप' इसमें 'अपूर्व की घटना नहीं की जा सकती 'विरोध नहीं करते' इत्यादि पूर्व वाक्यों को लगा लेना चाहिए। 'लोगों की' इसकी व्याख्या करते हैं-सहृदयों के-। चमत्कार-। अर्थात् आस्वाद प्रधान बुद्धि। ('अभ्युज्जिहीते') इसकी व्याख्या करते हैं-उत्पन्न होता है-। अर्थात्
चतुर्थ उद्योतः ५९९ ध्वन्यालोकः अनुगतमपि पूर्वच्छायया वस्तु तादृक् सुकविरुपनिबध्नन्निन्द्यतां नोपयाति ॥ १६ ॥ तदनुगतमपि पूर्वच्छायया वस्तु तादृक् तादृशं सुकविर्विवक्षितव्य- ङ्ग्यवाच्यार्थसमर्पणसमर्थशब्दरचनारूपया बन्धच्छाययोपनिबध्नन्निन्द्यतां नैव याति । तदित्थं स्थितम्— प्रतायन्तां वाचो निमितविविधार्थामृतरसा न सादः कर्तव्यः कविभिरनवद्ये स्वविषये । सन्ति नवाः काव्यार्थाः परोपनिबद्धार्थविरचने न कश्चित्कवेर्गुण इति भावयित्वा । परस्वादानेच्छाविरतमनसो वस्तु सुकवेः पूर्व की छाया से अनुगत भी वस्तु को उस प्रकार सुकवि उपनिबन्धन करता हुआ निन्दा का पात्र नहीं बनता ॥ १६ ॥ वह पूर्व की छाया से अनुगत भी वस्तु को उस प्रकार सुकवि विवक्षितव्यङ्ग्य और वाच्य अर्थ के समर्पण में समर्थ शब्द की रचना रूप बन्धच्छाया से उपनिबन्धन करता हुआ सुकवि निन्दा का पात्र नहीं बनता । तो ऐसा ठहरा— (कवि लोग) अमृत रस के तुल्य विविध अर्थोंवाली वाणियों का प्रसार करें, कवियों को अनवद्य अपने विषय के प्रति विषाद् नहीं करना चाहिए । नये अर्थ हैं, दूसरे द्वारा उपनिबद्ध अर्थ की रचना में कवि का कोई गुण नहीं यह सोच कर । दूसरे के स्व (विषय) के ग्रहण से विरत मन वाले सुकवि के यह सरस्वती लोचनम् अनुगतमपि पूर्वच्छायया वस्तु तादृक् सुकविरुपनिबध्नन्निन्द्यतां नोपयाति ॥ इति कारिका खण्डीकृत्य पठिता ॥ १६ ॥ स्वविषय इति । स्वयन्तात्कालिकत्वेनास्फुरित इत्यर्थः । परस्वादानेच्छेत्यादि- द्वितीयं श्लोकार्धं पूर्वोपस्कारेण सह पठति—परस्वादानेच्छाविरतमनसो वस्तु उदित होता है । बुद्धि का ही आकार दिखाते हैं—‘कोई (अपूर्व) स्फुरण’—। (१६वीं) कारिका को खण्ड करके पढ़ा है । अपने विषय के प्रति—। अर्थात् स्वयं तात्कालिक रूप से स्फुरित न हुए । ‘परस्वादानेच्छा’ इत्यादि द्वितीय श्लोकार्ध को पहले उपस्कार के साथ पढ़ते हैं—
६०० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सरस्वत्येवैषा घटयति यथेष्टं भगवती ॥ १७ ॥ परस्वादानेच्छाविरतमनसः सुकवेः सरस्वत्येषा भगवती यथेष्टं घटयति वस्तु । येषां सुकवीनां प्राक्तनपुण्याभ्यासपरिपाकवशेन प्रवृत्तिस्तेषां परोपरचितार्थपरिग्रहनिःस्पृहाणां स्वव्यापारो न क्वचिदु- पयुज्यते । सैव भगवती सरस्वती स्वयमभिमतमर्थमाविर्भावयति । एतदेव हि महाकवित्वं महाकवीनामित्योम् । इत्यक्लिष्टरसाश्रयोचितगुणालङ्कारशोभाभृतो भगवती ही यथेष्ट वस्तु को घटित करती है ॥ १७ ॥ दूसरे के स्व ( विषय ) के ग्रहण से विरत मन वाले सुकवि के यह भगवती सरस्वती यथेष्ट वस्तु घटित कर देती है। जिन सुकवियों की प्रवृत्ति पूर्व जन्म के पुण्य और अभ्यास के परिपाक के कारण होती है। दूसरों द्वारा रचित अर्थ के ग्रहण में निःस्पृह सुकवियों को अपना व्यापार कहीं नहीं करना पड़ता । वही भगवती स्वयं अभिमत अर्थ को आविर्भूत करती है। यही महाकवियों का महाकवित्व है। ओम्। इस प्रकार अक्लिष्ट, रसके आश्रय से उचित गुण और अलङ्कार की शोभा वाले लोचनम् सुकवेरिति तृतीयः पादः । कुतः खल्वपूर्वमानयामीत्याशयेन निरुद्योगः परोप- निबद्धवस्तूपजीवको वा स्यादित्याशङ्क्याह—सरस्वत्येवेति । कारिकायां सुकवेरिति जातावेकवचनमित्यभिप्रायेण व्याचष्टे—सुकवीनामिति । एतदेव स्पष्टयति—प्राक्तनेत्यादि न तेषामित्यन्तेन । आविर्भावयतीति । नूतनमेव सृजतीत्यर्थः ॥ १७ ॥ इतीति । कारिकातद्वृत्तिनिरूपणप्रकारेणेत्यर्थः । अक्लिष्टा रसाश्रयेण उचिता ये गुणालङ्कारास्ततो या शोभा तां बिभर्ति काव्यम् । उद्यानमध्यक्लिष्टः 'परस्वादानेच्छाविरतमनसो वस्तु सुकवेः' यह तृतीय पाद है। 'अपूर्व (वस्तु) को कहाँ से लाऊँ ?' इस आशय से निरुद्योग होकर दूसरों द्वारा उपनिबद्ध वस्तु का उपजीवक होगा, यह आशङ्का करके कहते हैं—सरस्वती—। कारिका में 'सुकवि' यह जाति में एकवचन है, इस अभिप्राय से व्याख्या करते हैं—सुकवियों की। इसे ही स्पष्ट करते हैं—पूर्वजन्म से लेकर उन (सुकवियों) को तक द्वारा। आविर्भूत करता है—अर्थात् नूतन ही सृजन करता है ॥ १७ ॥ इस प्रकार—। अर्थात् कारिका और उसकी वृत्ति के निरूपण के प्रकार से। अक्लिष्ट, रस के आश्रय से उचित जो गुण-अलङ्कार उससे जो शोभा उसे धारण करता है काव्य । उद्यान भी अक्लिष्ट, कालोचित सेकादिकृत जो रस उसका आश्रय अर्थात् तत्कृत