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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 649

भवसामान्यं सर्वप्रतिपत्तृसाधारणं परिमितत्वात्पुरातनानामेव गोचरी- भूतम्, तस्याविषयत्वानुपपत्तेः । अतएव स प्रकारविशेषो यैरद्यतनै- रभिनवत्वेन प्रतीयते तेषामभिमानमात्रमेव भणितिकृतं वैचित्र्यमात्रम- त्रास्तीति । तत्रोच्यते—यत्तूक्तं सामान्यमात्राश्रयेण काव्यप्रवृत्तिस्तस्य च परिमितत्वेन प्रागेव गोचरीकृतत्वान्नास्ति नवत्वं काव्यवस्तूनामिति, तदयुक्तम्; यतो यदि सामान्यमात्रमाश्रित्य काव्यं प्रवर्तते किङ्कृत- स्तर्हि महाकविनिबध्यमानानां काव्यार्थानामतिशयः । वाल्मीकिव्य- तिरिक्तस्यान्यस्य कविव्यपदेश एव वा सामान्यव्यतिरिक्तस्या- न्यस्य काव्यार्थस्याभावात् , सामान्यस्य चादिकविनैव प्रदर्शित त्वात् । उक्तिवैचित्र्यान्नैष दोष इति चेत्—किमिदमुक्तिवैचित्र्यम् ? के योग्य (वस्तु) के अनुभव का सामान्य सब जानकारों के लिए साधारण, (और) परिमित होने के कारण प्राचीन कवियों का ही विषय किया हुआ है क्योंकि उसका अविषयत्व उपपन्न नहीं है । अतएव वह प्रकार विशेष को जिन आज के लोगों ने अभिनव रूप से समझा है उन्हें अभिमानमात्र ही है । भणिति द्वारा किया हुआ वैचित्र्य मात्र यहाँ है । वहाँ कहते हैं—जो कि कहा है सामान्य मात्र के आश्रयण से काव्य की प्रवृत्ति होती है और उस (सामान्य मात्र) के परिचित होने के कारण पहले ही विषय कर लिए जाने से काव्य वस्तुओं का नवत्व नहीं है यह, वह ठीक नहीं; क्योंकि यदि सामान्य मात्र का आश्रयण करके काव्य प्रवृत्त होता है तो किसके द्वारा महाकवियों द्वारा बनाए गये काव्यार्थों का अतिशय (वैचित्र्य) होगा? अथवा, वाल्मीकि को छोड़ कर दूसरे का 'कवि' व्यपदेश (नाम) ही (किसके द्वारा किया गया होगा ?) (जब कि) सामान्य को छोड़कर दूसरे भाप्यार्थ का अभाव है, क्योंकि आदि कवि के

लोचनम्

शब्दात्सङ्केतितं प्राहुर्व्यवहाराय स स्मृतः । तदा स्वलक्षणं नास्ति सङ्केतस्तेन तत्र नः ।। इत्यादियुक्तिभिस्सामान्यमेव स्पृश्यते । किमिति । असंवेद्यमानमर्थपौन- रुक्त्यं कथं प्राकरणिकैरङ्गीकार्यमिति भावः । तमेव प्रकटयति—न चेदिति । शब्द-संकेतित (अर्थ) को कहते हैं, व्यवहार के लिए वह माना गया है, तब स्वरूप (स्वलक्षण) नहीं होता, उस (स्वलक्षण) से वहाँ हमें संकेत (होता है)। इत्यादि युक्तियों से सामान्य ही स्पष्ट होता है । क्या—। नहीं जाना जाता हुआ (असंवेद्यमान) अर्थ का पौनरुक्त्य कैसे प्राकरणिकों द्वारा स्वीकार्य होगा यह भाव