ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५९० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः उक्तिर्हि वाच्यविशेषप्रतिपादि वचनम् । तद्वैचित्र्ये कथं न वाच्यवै- चित्र्यम् । वाच्यवाचकयोरविनाभावेन प्रवृत्तेः । वाच्यानां च काव्ये- प्रतिभासमानानां यद्रूपं तत्तु ग्राह्यविशेषाभेदेनैव प्रतीयते । तेनो- क्तिवैचित्र्यवादिना वाच्यवैचित्र्यमनिच्छताप्यवश्यमेवाभ्युपगन्तव्यम् । तदयमत्र सङ्क्षेपः— द्वारा सामान्य प्रदर्शित किया जा चुका है। उक्तिवैचित्र्य के कारण यह दोष नहीं है यह (कहें) तो (प्रश्न उठता है) कि यह उक्तिवैचित्र्य क्या है? उक्ति वाच्यविशेष के प्रतिपादन करने वाले वचन को कहते हैं, उसके वैचित्र्य में कैसे नहीं वाच्य का वैचित्र्य होगा? क्योंकि वाच्य और वाचक की अविनाभाव से प्रवृत्ति होती है। और प्रतिभासमान वाच्यों का काव्य में जो रूप है वह तो ग्राह्य विशेष के अभेद से ही प्रतीत होता है। उससे उक्तिवैचित्र्यवादी को वाच्य के वैचित्र्य की इच्छा न रखते हुए भी अवश्य ही मानना चाहिए। तो यह यहाँ संक्षेप है— लोचनम् उक्तिर्हीति । पर्यायमात्रतैव यद्युक्तिविशेषस्तत्पर्यायान्तरैरविकलं तदर्थोपनिबन्धे अपौनरुक्त्याभिमानो न भवति । तस्माद्विशिष्टवाच्यप्रतिपादकेनैवोक्तेर्विशेष इति भावः । ग्राह्यविशेषेति । ग्राह्यः प्रत्यक्षादिप्रमाणैर्यो विशेषः तस्य यः अभेदः । तेनायमर्थः—पदानान्तावत्सामान्ये वा तद्वति वाऽपोहे वा यत्र कुत्रापि वस्तुनि समयः, किमनेन वादान्तरेण ? वाक्यात्तद्विशेषः प्रतीयत इति कस्यात्र वादिनो विमतिः । अन्विताभिधानतद्विपर्ययसंसर्गभेदादिवाक्यार्थपक्षेषु सर्वत्र विशेषस्याप्रत्याख्येयत्वात् । उक्तिवैचित्र्यञ्च न पर्यायमात्रकृतमित्युक्तम् । अन्यत्तु है। उसी को प्रकट करते हैं—नहीं—। उक्ति—। दूसरे शब्द (पर्याय) के द्वारा निर्देश ही यदि उक्ति विशेष है तो पर्यायान्तरों से अविकल (रूप में) उस अर्थ के उपनिबन्ध होने पर अपौनरुक्त्य का अभिमान नहीं होगा। भाव यह कि इसलिए विशिष्ट वाच्य के प्रतिपादक से ही उक्ति का विशेष है। ग्राह्यविशेष—। ग्राह्य प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से जो विशेष उसका जो अभेद। उससे यह अर्थ है—पदों का सामान्य (जाति) में (मीमांसक मतानुसार) अथवा तद्वान् (न्यायमतानुसार) में अथवा अपोह (बौद्धमतानुसार) में जहाँ कहीं भी वस्तु में समय (संकेत) है, इस दूसरे वाद के उपस्थित करने से क्या लाभ? वाक्य से उस (वस्तु) का विशेष प्रतीत होता है, यहाँ किस वादी का वैमत्य है? क्योंकि अन्विता- भिधान और उसके विपर्यय (अभिहितान्वयवाद) के संसर्गभेद आदि के वाक्यार्थ पक्षों में सर्वत्र विशेष का प्रत्याख्यान नहीं किया जा सकता। यह कह चुके हैं कि उक्ति- वैचित्र्य पर्यायमात्र से नहीं होता है। और अन्य जो है वह प्रत्युत हमारे पक्ष का