ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कालभेदाच्च नानात्वम् । यथर्तुभेदाद्दिग्व्योमसलिलादीनामचेतना- नाम् । चेतनानां चौत्सुक्यादयः कालविशेषाश्रयिणः प्रसिद्धा एव । स्वालक्षण्यप्रभेदाच्च सकलजगद्गतानां वस्तूनां विनिबन्धनं प्रसिद्धमेव । तच्च यथावस्थितमपि तावदुपनिबध्यमानमनन्ततामेव काव्यार्थ- स्यापादयति । अत्र केचिदाचक्षीरन्—यथा सामान्यात्मना वस्तूनि वाच्यतां प्रतिपद्यन्ते न विशेषात्मना ; तानि हि स्वयमनुभूतानां सुखादीनां तन्निमित्तानां च स्वरूपमन्यत्रारोपयद्भिः स्वपरानुभूतरूपसामान्य- मात्राश्रयेणोपनिबध्यन्ते कविभिः । न हि तैरतीतमनागतं वर्तमानञ्च परिचितादिस्वलक्षणं योगिभिरिव प्रत्यक्षीक्रियते ; तच्चानुभाव्यानु- और काल के भेद से नानात्व । जैसे, ऋतु के भेद से दिशा, आकाश और सलिल आदि अचेतनों का । और चेतनों के औत्सुक्य आदि ( भेद ) कालविशेष का आश्रयण करने वाले प्रसिद्ध ही हैं । और स्वालक्षण्य ( स्वरूप ) के प्रभेद से समस्त संसार की वस्तुओं का विनिबन्धन प्रसिद्ध ही है । और वह जैसा है उस प्रकार भी अवस्थित होकर उपनिबद्ध होता हुआ काव्य के अर्थ को आनन्त्य प्राप्त कराता है । यहाँ कुछ लोग ( अगर ) कहें—जैसे सामान्य रूप से वस्तुएँ वाच्यभाव को प्राप्त होती हैं, न कि विशेष रूप से; क्योंकि वे स्वयं अनुभव किए गए सुख आदि के और उनके निमित्तों ( कारणों ) के स्वरूप को अन्यत्र आरोपित करते हुए कवियों द्वारा अपने और पराये के द्वारा अनुभूत रूप सामान्य मात्र के आश्रयण से उपनिबद्ध किए जाते हैं । न कि वे ( कवि ) अतीत, अनागत और वर्तमान परिचित आदि स्वलक्षण (स्वरूप) को योगियों की भांति प्रत्यक्ष करते हैं; बल्कि वह अनुभव के लोचनम् तावति तु स्वभावेनैव सा विचित्रतेति तावच्छब्दस्याभिप्रायः । तन्निमित्ताना- ञ्चेति । ऋतुमाल्यादीनाम् । स्वेति । स्वानुभूतपरानुभूतानां यत्सामान्यं तदेव विशेषान्तररहितन्तन्मात्रं तस्याश्रयेण । न हि तैरिति कविभिः । एतच्चात्यन्ता- संभावनार्थमुक्तम् । प्रत्यक्षदर्शनेऽपि हि— तब तक तो स्वभाव से ही वह विचित्रता होती है यह 'तब तक' शब्द का अभिप्राय है । उनके निमित्तों का—। ऋतु, माल्य आदि का । अपने अनुभूतों का दूसरों के अनुभूतों का जो सामान्य वही विशेषान्तर से रहित ( होकर ) तन्मात्र है, उस तन्मात्र के आश्रयण से । न कि उनसे अर्थात् कवियों से । इसे अत्यन्त असम्भावन के लिए कहा है । प्रत्यक्ष देखने में भी—