भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 657, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 657

चतुर्थ उद्योतः ५९७ ध्वन्यालोकः तत्त्वस्य सारभूतस्यात्मनः सद्भावेऽन्यस्य पूर्वस्थित्यनुयाय्यपि वस्तु भातितराम् । पुराणरमणीयच्छायानुगृहीतं हि वस्तु शरीरवत्परां शोभां पुष्यति । न तु पुनरुक्तत्वेनावभासते । तन्व्याः शशिच्छायमि- वाननम् । एवं तावत्ससंवादानां समुदायरूपाणां वाक्यार्थानां विभक्ताः सी- मानः । पदार्थरूपाणां च वस्त्वन्तरसदृशानां काव्यवस्तूनां नास्त्येव दोष इति प्रतिपादयितुमुच्यते— अक्षरादिरचनेव योज्यते यत्र वस्तुरचना पुरातनी । नूतने स्फुरति काव्यवस्तुनि व्यक्तमेव खलु सा न दुष्यति ॥ १५॥ तत्त्व अर्थात् सारभूत आत्मा के सद्भाव में अन्य की पूर्व स्थिति का अनुसरण करने वाला भी वस्तु अधिकतर शोभा देता है । पुरानी रमणीय छाया से अनुगृहीत वस्तु शरीर की भांति अधिक शोभा को बढ़ाती है । न कि पुनरुक्त रूप से अवभासित होती है । तन्वी के शशिच्छाय मुख की भांति । इस प्रकार ससंवाद समुदायरूप वाक्यार्थों की सीमाएँ विभक्त हैं । और पदार्थरूप वस्त्वन्तरसदृश काव्यवस्तुओं का दोष नहीं है यह प्रतिपादनार्थ कहते हैं— अक्षरादि की रचना की भांति जहाँ पुरानी वस्तुरचना की जाती है, नूतन काव्यवस्तु के स्फुरित होने पर स्पष्ट ही वह दूषित नहीं होती है ॥ १५ ॥ लोचनम् अखण्डीकृता एव दृश्यन्ते । आत्मन इत्यस्य शब्दस्य पूर्वपठिताभ्यामेव तत्त्वस्य सारभूतस्येति च पदाभ्यामर्थो निरूपितः ॥ १४ ॥ ससंवादानामिति पाठः । संवादानामिति तु पाठे वाक्यार्थरूपाणां समुदा- यानां ये संवादाः तेषामिति वैयधिकरण्येन संगतिः । वस्तुशब्देन एको वा द्वौ वा त्रयो वा चतुरादयो वा पदानामर्थाः । तानि त्विति । अक्षराणि च पदानि च । तान्येवेति । तेनैव रूपेण युक्तानि मनागप्यन्यरूपतामनागतानीत्यर्थः । वृत्ति में पढ़ी है । किन्हीं पुस्तकों में कारिकाएँ अखण्डीकृत ही देखी जाती हैं । 'आत्मा' इस शब्द के पहले ही पठित 'तत्त्व' और 'सारभूत' इन पदों से अर्थ-निरूपण किया है ॥ १४ ॥ 'ससंवाद' यह पाठ है । 'संवाद' इस पाठ में तो 'वाक्यार्थरूप समुदायों के जो संवाद हैं उनकी' यह वैयधिकरण्य से संगति होगी । 'वस्तु' शब्द से एक अथवा दो अथवा तीन अथवा चार आदि पदार्थ ( विवक्षित हैं ) । वे—। अक्षर और पद । वे ही—। उसी रूप से युक्त अर्थात् थोड़ी भी अन्य रूपता को न प्राप्त हुई । इस प्रकार

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 657, कुल 680 में से · BharatKosha