ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 656, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ें५९६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः शरीरान्तरयुक्तमपि तुच्छात्मत्वेन त्यक्तव्यम् । तृतीयं तु विभिन्नकम- नीयशरीरसद्भावे सति ससंवादमपि काव्यवस्तु न त्यक्तव्यं कविना । न हि शरीरी शरीरिणान्येन सदृशोऽप्येक एवेति शक्यते वक्तुम् ॥१३॥ एतदेवोपपादयितुमुच्यते— आत्मनोऽन्यस्य सद्भावे पूर्वस्थित्यनुयाय्यपि । वस्तु भातितरां तन्व्याः शशिच्छायमिवाननम् ॥१४॥ समान अर्थात् अन्य का साम्य वाला अन्य शरीर से युक्त होकर भी तुच्छरूप होने के कारण त्याज्य है । परन्तु तीसरा विभिन्न प्रकार के कमनीय शरीर के सद्भाव होने पर संवाद युक्त होने पर भी कवि के द्वारा काव्यवस्तु त्याज्य नहीं है । शरीरी अन्य शरीर से सदृश भी होकर 'एक ही है' यह नहीं कहा जा सकता । इसी के उपपादनार्थ कहते हैं— अन्य आत्मा के सद्भाव में अन्य की पूर्व स्थिति का अनुसरण करने वाला भी वस्तु (काव्यार्थ) तन्वी के शशिच्छाय मुख की भांति अधिकतर शोभा देता है ॥ १४ ॥ लोचनम् मिति । न हि तेन किञ्चिदपूर्वमुत्प्रेक्षितं प्रतिबिम्बमप्येवमेव । एवं प्रकारं व्याख्याय द्वितीयं व्याचष्टे-तदनन्तरन्विति । द्वितीयमित्यर्थः । अन्येन साम्यं यस्य तत्तथा । तुच्छात्मेति । अनुकारे ह्यनुकार्यबुद्धिरेव चित्रपुस्तादाविव न तु सिन्दूरादिबुद्धिः स्फुरति, सापि च न चारुतायेति भावः ॥ १३ ॥ एतदेवेति तृतीयस्य रूपस्यात्याज्यत्वम् । आत्मनोऽन्यस्य सद्भावे पूर्वस्थित्यनुयाय्यपि । वस्तु भातितरान्तन्व्याश्शशिच्छायमिवाननम् ॥ इति कारिका खण्डीकृत्य वृत्तौ पठिता । केषुचित्पुस्तकेषु कारिका उस (नये कवि) ने कुछ अपूर्व की उत्प्रेक्षा नहीं की, प्रतिबिम्ब भी इसी प्रकार का होता है । इस प्रकार प्रथम प्रकार का व्याख्यान करके दूसरे का व्याख्यान करते हैं— उसके बाद का—। अर्थात् दूसरा । अन्य के साथ साम्य जिसका है वह उस प्रकार । तुच्छात्म—। भाव यह कि चित्रपुस्त आदि की भांति अनुकार में अनुकार्य की बुद्धि ही स्फुरित होती है न कि सिन्दूर आदि की बुद्धि । और वह भी चारुत्व के लिए नहीं होती ॥ १३ ॥ 'इसी के'—तृतीय रूप का यही अत्याज्यत्व है । (१४वीं) कारिका खण्ड करके