भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 655, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 655

चतुर्थ उद्योतः ५९५ ध्वन्यालोकः संवादो हि काव्यार्थस्योच्यते यदन्येन काव्यवस्तुना सादृश्यम् । तत्पुनः शरीरिणां प्रतिबिम्बवदालेखयाकारवत्तुल्यदेहिवच्च त्रिधा व्यवस्थितम् । किञ्चिद्धि काव्यवस्तु वस्त्वन्तरस्य शरीरिणः प्रतिबिम्बकल्पम् , अन्यदालेख्यप्रख्यम् , अन्यत्तुल्येन शरीरिणा सदृशम् । तत्र पूर्वमनन्यात्म तुच्छात्म तदनन्तरम् । तृतीयं तु प्रसिद्धात्म नान्यसाम्यं त्यजेत्कविः ॥१३॥ तत्र पूर्वं प्रतिबिम्बकल्पं काव्यवस्तु परिहर्तव्यं सुमतिना । यत- स्तदनन्यात्म तात्त्विकशरीरशून्यम् । तदनन्तरमालेख्यप्रख्यमन्यसाम्यं ( वह ) काव्यार्थ का संवाद कहलाता है जो कि अन्य काव्य वस्तु के साथ सादृश्य है । फिर वह ( सादृश्य ) शरीरियों के प्रतिबिम्ब की भांति, आलेख्य के आकार की भांति और तुल्य शरीरी की भांति तीन प्रकार से व्यवस्थित है । क्योंकि कुछ काव्यवस्तु शरीरी अन्य वस्तु का प्रतिबिम्ब समान होता है, अन्य आलेख्य समान होता है और अन्य तुल्य शरीरी के सदृश होता है । उनमें पहला अनन्यात्म रूप होता है, उसके बाद का तुच्छात्म होता है, किन्तु तीसरा प्रसिद्धात्म होता है, कवि अन्य के साम्य का त्याग न करे ॥ १३ ॥ उनमें पहला प्रतिबिम्ब समान काव्यवस्तु सुमति के लिए त्याज्य है । क्योंकि वह अनन्यरूप अर्थात् तात्त्विक शरीर से शून्य होता है । उसके बाद का आलेख्य- लोचनम् यच्छब्दः प्रतिवाक्यं द्रष्टव्य इति दर्शितम् । शरीरिण इति । पूर्वमेव प्रतिलब्ध- स्वरूपतया प्रधानभूतस्येत्यर्थः ॥ १२ ॥ तत्र पूर्वमनन्यात्म तुच्छात्म तदनन्तरम् । तृतीयन्तु प्रसिद्धात्म नान्यसाम्यन्त्यजेत्कविः ॥ इति कारिका । अनन्यः पूर्वोपनिबन्धकाव्यादात्मा स्वभावो यस्य तदन- न्यात्म येन रूपेण भाति तत्प्राक्कविस्पृष्टमेव, यथा येन रूपेण प्रतिबिम्बं भाति, तेन रूपेण बिम्बमेवैतत् । स्वयन्तु तत्कीदृशमित्यत्राह—तात्त्विकशरीरशून्य- वस्तु ) का—। अर्थात् पहले ही स्वरूप प्राप्त कर लेने का कारण प्रधानभूत का ॥१२॥ ( १३वीं ) कारिका । नहीं अन्य है पूर्व हुए उपनिबन्धन वाले काव्य से आत्मा ( रूप ) स्वभाव जिसका वह अनन्यात्म है, जिस रूप से प्रतीत होता है वह पहले कवि द्वारा स्पृष्ट ही हुआ है, जैसे जिस रूप से प्रतिबिम्ब प्रतीत होता है उस रूप से यह बिम्ब ही है । किन्तु वह स्वयं कैसा है इस पर कहा है—तात्त्विक शरीर से शून्य—।