भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 654, कुल 680 में से

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पृष्ठ 654

५९४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सती पुनरिदानीं परिक्षीणा परपदार्थनिर्माणशक्तिरिति न शक्यतेऽभि- धातुम् । तद्वदेवेयं काव्यस्थितिरनन्ताभिः कविमतिभिरुपभुक्तापि नेदा- नीं परिहीयते, प्रत्युत नवनवाभिव्युत्पत्तिभिः परिवर्धते । इत्थं स्थितेऽपि— संवादास्तु भवन्त्येव बाहुल्येन सुमेधसाम् । स्थितं ह्येतत् संवादिन्य एव मेधाविनां बुद्धयः । किन्तु— नैकरूपतया सर्वे ते मन्तव्या विपश्चिता ॥ ११ ॥ कथमिति चेत्— संवादो ह्यन्यसादृश्यं तत्पुनः प्रतिबिम्बवत् । आलेख्याकारवत्तुल्यदेहिवच्च शरीरिणाम् ॥ १२ ॥ आविर्भूत करती है, फिर अब पदार्थों के निर्माण की शक्ति परिक्षीण हो चुकी ऐसा नहीं कहा जा सकता, उसी प्रकार यह काव्यस्थिति अनन्त कविबुद्धियों द्वारा भी होकर इस समय समाप्त नहीं है, बल्कि नई-नई व्युत्पत्तियों से बढ़ती जाती है । इस प्रकार स्थित होने पर भी— बहुततया सुमेधा जनों के संवाद हो ही जाते हैं । क्योंकि यह माना जाता है कि मेधावी लोगों की बुद्धियाँ संवादिनी होती हैं । किन्तु— विद्वान को उन सबको एक रूप से नहीं मानना चाहिए ॥ ११ ॥ यदि कहो कैसे ? ( तो कहते हैं )— संवाद अन्य का सादृश्य होता है, वह फिर शरीरियों के प्रतिबिम्ब की भांति, चित्र के आकार की भांति और तुल्य शरीरी की भांति रहता है ॥ १२ ॥ लोचनम् संवादा इति कारिकाया अर्धं, नैकरूपतयेति द्वितीयम् ॥ ११ ॥ किमियं राजाज्ञेत्यभिप्रायेणाशङ्कते—कथमिति चेदिति । अत्रोत्तरम्— संवादो ह्यन्यसादृश्यन्तत्पुनः प्रतिबिम्बवत् । आलेख्याकारवत्तुल्यदेहिवच्च शरीरिणाम् ॥ इत्यनया कारिकया । एषा खण्डीकृत्य वृत्तौ व्याख्याता । शरीरिणामित्य- 'बहुततया' यह कारिका का अर्धभाग है; 'विद्वान् को' यह दूसरा भाग है ॥ ११ ॥ क्या यह राजाज्ञा है ! इस अभिप्राय से आशङ्का करते हैं—कैसे—। यहाँ उत्तर इस (११वीं) कारिका से है । इसे वृत्ति में खण्ड करके व्याख्यान किया है । और 'शरीरियों के' यह शब्द प्रति वाक्य में देखना चाहिए यह दिखाया है । शरीरी ( अन्य

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