ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished680 पृष्ठ
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चतुर्थ उद्योतः ५९३
ध्वन्यालोकः
यत्प्रदर्शितं प्राक्
भूम्नैव दृश्यते लक्ष्ये-
न तच्छक्यमपोहितुम् ।
-तत्तु भाति रसाश्रयात् ॥ ८ ॥
तदिदमत्र सङ्क्षेपेणाभिधीयते सत्कवीनामुपदेशाय—
रसभावादिसम्बद्धा यद्यौचित्यानुसारिणी ।
अन्वीयते वस्तुगतिर्देशकालादिभेदिनी ॥ ९ ॥
तत्का गणना कवीनामन्येषां परिमितशक्तीनाम् ।
वाचस्पतिसहस्राणां सहस्रैरपि यत्नतः ।
निबद्धा सा क्षयं नैति प्रकृतिर्जगतामिव ॥ १० ॥
यथा हि जगत्प्रकृतिरतीतकल्पपरम्पराविर्भूतविचित्रवस्तुप्रपञ्चा
है—लक्ष्य में बहुतायत से देखा जाता है—उसका निराकरण नहीं किया जा
सकता है—वह तो रस के आश्रय से शोभा देता है ॥ ८ ॥
तो यहाँ यह सत्कवियों के उपदेश के लिए संक्षेप से कहते हैं—
यदि रस, भाव आदि से सम्बद्ध, औचित्य का अनुसरण करने वाली, देश, काल
आदि की भेद वाली वस्तुगति का अनुगमन करते हैं ॥ ९ ॥
तो अन्य परिमित शक्ति वाले कवियों की क्या गणना ?
हजारों हजार वाचस्पतियों द्वारा भी यत्नपूर्वक निबद्ध वह जगत् की प्रकृति की
भांति क्षीण नहीं हो सकती ॥ १० ॥
जिस प्रकार जगत् की प्रकृति अतीत कल्पों की परम्परा से विचित्र वस्तुप्रपञ्च को
लोचनम्
इति कारिका । अन्यस्तु ग्रन्थो मध्योपस्कारः ॥ ८ ॥
अत्र तु पादत्रयस्यार्थमनूद्य चतुर्थपादार्थोऽपूर्वतयाभिधीयते । तदित्यादि
शक्तीनामित्यन्तं कारिकयोर्मध्योपस्कारः । द्वितीयकारिकायास्तुर्यं पादं व्याचष्टे-
यथाहिति ॥ ९-१० ॥
कारिका के अतिरिक्त ग्रन्थ बीच का उपस्कार है ॥ ८ ॥
यहाँ तीन पादों का अर्थ अनुवाद करके चतुर्थ पाद का अर्थ अपूर्व रूप से अभिहित
किया गया है । 'तो' से लेकर 'गणना' तक का ग्रन्थ दोनों कारिकाओं के बीच का
उपस्कार है । दूसरी कारिका के चतुर्थ पाद की व्याख्या करते हैं—जैसे—॥ ९-१० ॥
३८ ध्व०