ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
५९६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः शरीरान्तरयुक्तमपि तुच्छात्मत्वेन त्यक्तव्यम् । तृतीयं तु विभिन्नकम- नीयशरीरसद्भावे सति ससंवादमपि काव्यवस्तु न त्यक्तव्यं कविना । न हि शरीरी शरीरिणान्येन सदृशोऽप्येक एवेति शक्यते वक्तुम् ॥१३॥ एतदेवोपपादयितुमुच्यते— आत्मनोऽन्यस्य सद्भावे पूर्वस्थित्यनुयाय्यपि । वस्तु भातितरां तन्व्याः शशिच्छायमिवाननम् ॥१४॥ समान अर्थात् अन्य का साम्य वाला अन्य शरीर से युक्त होकर भी तुच्छरूप होने के कारण त्याज्य है । परन्तु तीसरा विभिन्न प्रकार के कमनीय शरीर के सद्भाव होने पर संवाद युक्त होने पर भी कवि के द्वारा काव्यवस्तु त्याज्य नहीं है । शरीरी अन्य शरीर से सदृश भी होकर 'एक ही है' यह नहीं कहा जा सकता । इसी के उपपादनार्थ कहते हैं— अन्य आत्मा के सद्भाव में अन्य की पूर्व स्थिति का अनुसरण करने वाला भी वस्तु (काव्यार्थ) तन्वी के शशिच्छाय मुख की भांति अधिकतर शोभा देता है ॥ १४ ॥ लोचनम् मिति । न हि तेन किञ्चिदपूर्वमुत्प्रेक्षितं प्रतिबिम्बमप्येवमेव । एवं प्रकारं व्याख्याय द्वितीयं व्याचष्टे-तदनन्तरन्विति । द्वितीयमित्यर्थः । अन्येन साम्यं यस्य तत्तथा । तुच्छात्मेति । अनुकारे ह्यनुकार्यबुद्धिरेव चित्रपुस्तादाविव न तु सिन्दूरादिबुद्धिः स्फुरति, सापि च न चारुतायेति भावः ॥ १३ ॥ एतदेवेति तृतीयस्य रूपस्यात्याज्यत्वम् । आत्मनोऽन्यस्य सद्भावे पूर्वस्थित्यनुयाय्यपि । वस्तु भातितरान्तन्व्याश्शशिच्छायमिवाननम् ॥ इति कारिका खण्डीकृत्य वृत्तौ पठिता । केषुचित्पुस्तकेषु कारिका उस (नये कवि) ने कुछ अपूर्व की उत्प्रेक्षा नहीं की, प्रतिबिम्ब भी इसी प्रकार का होता है । इस प्रकार प्रथम प्रकार का व्याख्यान करके दूसरे का व्याख्यान करते हैं— उसके बाद का—। अर्थात् दूसरा । अन्य के साथ साम्य जिसका है वह उस प्रकार । तुच्छात्म—। भाव यह कि चित्रपुस्त आदि की भांति अनुकार में अनुकार्य की बुद्धि ही स्फुरित होती है न कि सिन्दूर आदि की बुद्धि । और वह भी चारुत्व के लिए नहीं होती ॥ १३ ॥ 'इसी के'—तृतीय रूप का यही अत्याज्यत्व है । (१४वीं) कारिका खण्ड करके
चतुर्थ उद्योतः ५९७ ध्वन्यालोकः तत्त्वस्य सारभूतस्यात्मनः सद्भावेऽन्यस्य पूर्वस्थित्यनुयाय्यपि वस्तु भातितराम् । पुराणरमणीयच्छायानुगृहीतं हि वस्तु शरीरवत्परां शोभां पुष्यति । न तु पुनरुक्तत्वेनावभासते । तन्व्याः शशिच्छायमि- वाननम् । एवं तावत्ससंवादानां समुदायरूपाणां वाक्यार्थानां विभक्ताः सी- मानः । पदार्थरूपाणां च वस्त्वन्तरसदृशानां काव्यवस्तूनां नास्त्येव दोष इति प्रतिपादयितुमुच्यते— अक्षरादिरचनेव योज्यते यत्र वस्तुरचना पुरातनी । नूतने स्फुरति काव्यवस्तुनि व्यक्तमेव खलु सा न दुष्यति ॥ १५॥ तत्त्व अर्थात् सारभूत आत्मा के सद्भाव में अन्य की पूर्व स्थिति का अनुसरण करने वाला भी वस्तु अधिकतर शोभा देता है । पुरानी रमणीय छाया से अनुगृहीत वस्तु शरीर की भांति अधिक शोभा को बढ़ाती है । न कि पुनरुक्त रूप से अवभासित होती है । तन्वी के शशिच्छाय मुख की भांति । इस प्रकार ससंवाद समुदायरूप वाक्यार्थों की सीमाएँ विभक्त हैं । और पदार्थरूप वस्त्वन्तरसदृश काव्यवस्तुओं का दोष नहीं है यह प्रतिपादनार्थ कहते हैं— अक्षरादि की रचना की भांति जहाँ पुरानी वस्तुरचना की जाती है, नूतन काव्यवस्तु के स्फुरित होने पर स्पष्ट ही वह दूषित नहीं होती है ॥ १५ ॥ लोचनम् अखण्डीकृता एव दृश्यन्ते । आत्मन इत्यस्य शब्दस्य पूर्वपठिताभ्यामेव तत्त्वस्य सारभूतस्येति च पदाभ्यामर्थो निरूपितः ॥ १४ ॥ ससंवादानामिति पाठः । संवादानामिति तु पाठे वाक्यार्थरूपाणां समुदा- यानां ये संवादाः तेषामिति वैयधिकरण्येन संगतिः । वस्तुशब्देन एको वा द्वौ वा त्रयो वा चतुरादयो वा पदानामर्थाः । तानि त्विति । अक्षराणि च पदानि च । तान्येवेति । तेनैव रूपेण युक्तानि मनागप्यन्यरूपतामनागतानीत्यर्थः । वृत्ति में पढ़ी है । किन्हीं पुस्तकों में कारिकाएँ अखण्डीकृत ही देखी जाती हैं । 'आत्मा' इस शब्द के पहले ही पठित 'तत्त्व' और 'सारभूत' इन पदों से अर्थ-निरूपण किया है ॥ १४ ॥ 'ससंवाद' यह पाठ है । 'संवाद' इस पाठ में तो 'वाक्यार्थरूप समुदायों के जो संवाद हैं उनकी' यह वैयधिकरण्य से संगति होगी । 'वस्तु' शब्द से एक अथवा दो अथवा तीन अथवा चार आदि पदार्थ ( विवक्षित हैं ) । वे—। अक्षर और पद । वे ही—। उसी रूप से युक्त अर्थात् थोड़ी भी अन्य रूपता को न प्राप्त हुई । इस प्रकार
५९८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः न हि वाचस्पतिनाप्यक्षराणि पदानि वा कानिचिदपूर्वाणि घट- यितुं शक्यन्ते। तानि तु तान्येवोपनिबद्धानि न काव्यादिषु नवतां विरुध्यन्ति। तथैव पदार्थरूपाणि श्लेषादिमयान्यर्थतत्त्वानि। तस्मात्- यदपि तदपि रम्यं यत्र लोकस्य किञ्चित्- स्फुरितमिदमितीयं बुद्धिरभ्युज्जिहीते। स्फुरणेयं काचिदिति सहृदयानां चमत्कृतिरुत्पद्यते। वाचस्पति भी कुछ अपूर्व अक्षरों अथवा पदों को बना नहीं सकते। वे तो वे ही उपनिबद्ध होकर काव्य आदि में नवीनता का विरोध नहीं करते। उसी प्रकार पदार्थ रूप श्लेषादिभव अर्थतत्त्व भी। इसलिए जहाँ लोगों की 'यह नई सूझ (स्फुरण) है' यह बुद्धि उत्पन्न होती है वह जो भी हैं 'रम्य' (कहलाता) है। यह कोई (अपूर्व) स्फुरण है यह सहृदयों के चमत्कार उत्पन्न होता है। लोचनम् एवमक्षरादिरचनैवेति दृष्टान्तभागं व्याख्याय दार्ष्टान्तिके योजयति-तथैवेति। श्लेषादिमयानीति। श्लेषादिस्वभावानीत्यर्थः। सद्वृत्ततेजस्विगुणद्विजादयो हि शब्दाः पूर्वपूर्वैंरपि कविसहस्रैः श्लेषच्छायया निबध्यन्ते, निबद्धाश्चन्द्रादयश्चो पमानत्वेन। तथैव पदार्थरूपाणीत्यत्र नापूर्वाणि घटयितुं शक्यन्ते इत्यादि विरुध्यन्तीत्येवमन्तं प्राक्तनं वाक्यमभिसन्धानीयम्॥ १५॥ 'लोकस्ये'ति व्याचष्टे-सहृदयानामिति। चमत्कृतिरिति। आस्वादप्रधाना बुद्धिरित्यर्थः। 'अभ्युज्जिहीत' इति व्याचष्टे-उत्पद्यत इति। उदेतीत्यर्थः। बुद्धेरेवाकारं दर्शयति-स्फुरणेयं काचिदिति। यदपि तदपि रम्यं यत्र लोकस्य किञ्चित् स्फुरितमिदमितीयं बुद्धिरभ्युज्जिहीते। 'अक्षर आदि की रचना की भांति' इस दृष्टान्त भाग की व्याख्या करके दार्ष्टान्तिक में लगाते हैं-उसी प्रकार-। श्लेषादिमय-। अर्थात् श्लेष आदि के स्वभाव वाले। 'सद्वृत्त' 'तेजस्वी' 'गुण' 'द्विज' आदि शब्दों को पहले के हजारों कवियों ने श्लेष की छाया से निबन्धन किया है, और चन्द्र आदि को उपमान रूप से निबन्धन किया है। उसी प्रकार 'पदार्थ रूप' इसमें 'अपूर्व की घटना नहीं की जा सकती 'विरोध नहीं करते' इत्यादि पूर्व वाक्यों को लगा लेना चाहिए। 'लोगों की' इसकी व्याख्या करते हैं-सहृदयों के-। चमत्कार-। अर्थात् आस्वाद प्रधान बुद्धि। ('अभ्युज्जिहीते') इसकी व्याख्या करते हैं-उत्पन्न होता है-। अर्थात्
चतुर्थ उद्योतः ५९९ ध्वन्यालोकः अनुगतमपि पूर्वच्छायया वस्तु तादृक् सुकविरुपनिबध्नन्निन्द्यतां नोपयाति ॥ १६ ॥ तदनुगतमपि पूर्वच्छायया वस्तु तादृक् तादृशं सुकविर्विवक्षितव्य- ङ्ग्यवाच्यार्थसमर्पणसमर्थशब्दरचनारूपया बन्धच्छाययोपनिबध्नन्निन्द्यतां नैव याति । तदित्थं स्थितम्— प्रतायन्तां वाचो निमितविविधार्थामृतरसा न सादः कर्तव्यः कविभिरनवद्ये स्वविषये । सन्ति नवाः काव्यार्थाः परोपनिबद्धार्थविरचने न कश्चित्कवेर्गुण इति भावयित्वा । परस्वादानेच्छाविरतमनसो वस्तु सुकवेः पूर्व की छाया से अनुगत भी वस्तु को उस प्रकार सुकवि उपनिबन्धन करता हुआ निन्दा का पात्र नहीं बनता ॥ १६ ॥ वह पूर्व की छाया से अनुगत भी वस्तु को उस प्रकार सुकवि विवक्षितव्यङ्ग्य और वाच्य अर्थ के समर्पण में समर्थ शब्द की रचना रूप बन्धच्छाया से उपनिबन्धन करता हुआ सुकवि निन्दा का पात्र नहीं बनता । तो ऐसा ठहरा— (कवि लोग) अमृत रस के तुल्य विविध अर्थोंवाली वाणियों का प्रसार करें, कवियों को अनवद्य अपने विषय के प्रति विषाद् नहीं करना चाहिए । नये अर्थ हैं, दूसरे द्वारा उपनिबद्ध अर्थ की रचना में कवि का कोई गुण नहीं यह सोच कर । दूसरे के स्व (विषय) के ग्रहण से विरत मन वाले सुकवि के यह सरस्वती लोचनम् अनुगतमपि पूर्वच्छायया वस्तु तादृक् सुकविरुपनिबध्नन्निन्द्यतां नोपयाति ॥ इति कारिका खण्डीकृत्य पठिता ॥ १६ ॥ स्वविषय इति । स्वयन्तात्कालिकत्वेनास्फुरित इत्यर्थः । परस्वादानेच्छेत्यादि- द्वितीयं श्लोकार्धं पूर्वोपस्कारेण सह पठति—परस्वादानेच्छाविरतमनसो वस्तु उदित होता है । बुद्धि का ही आकार दिखाते हैं—‘कोई (अपूर्व) स्फुरण’—। (१६वीं) कारिका को खण्ड करके पढ़ा है । अपने विषय के प्रति—। अर्थात् स्वयं तात्कालिक रूप से स्फुरित न हुए । ‘परस्वादानेच्छा’ इत्यादि द्वितीय श्लोकार्ध को पहले उपस्कार के साथ पढ़ते हैं—
६०० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सरस्वत्येवैषा घटयति यथेष्टं भगवती ॥ १७ ॥ परस्वादानेच्छाविरतमनसः सुकवेः सरस्वत्येषा भगवती यथेष्टं घटयति वस्तु । येषां सुकवीनां प्राक्तनपुण्याभ्यासपरिपाकवशेन प्रवृत्तिस्तेषां परोपरचितार्थपरिग्रहनिःस्पृहाणां स्वव्यापारो न क्वचिदु- पयुज्यते । सैव भगवती सरस्वती स्वयमभिमतमर्थमाविर्भावयति । एतदेव हि महाकवित्वं महाकवीनामित्योम् । इत्यक्लिष्टरसाश्रयोचितगुणालङ्कारशोभाभृतो भगवती ही यथेष्ट वस्तु को घटित करती है ॥ १७ ॥ दूसरे के स्व ( विषय ) के ग्रहण से विरत मन वाले सुकवि के यह भगवती सरस्वती यथेष्ट वस्तु घटित कर देती है। जिन सुकवियों की प्रवृत्ति पूर्व जन्म के पुण्य और अभ्यास के परिपाक के कारण होती है। दूसरों द्वारा रचित अर्थ के ग्रहण में निःस्पृह सुकवियों को अपना व्यापार कहीं नहीं करना पड़ता । वही भगवती स्वयं अभिमत अर्थ को आविर्भूत करती है। यही महाकवियों का महाकवित्व है। ओम्। इस प्रकार अक्लिष्ट, रसके आश्रय से उचित गुण और अलङ्कार की शोभा वाले लोचनम् सुकवेरिति तृतीयः पादः । कुतः खल्वपूर्वमानयामीत्याशयेन निरुद्योगः परोप- निबद्धवस्तूपजीवको वा स्यादित्याशङ्क्याह—सरस्वत्येवेति । कारिकायां सुकवेरिति जातावेकवचनमित्यभिप्रायेण व्याचष्टे—सुकवीनामिति । एतदेव स्पष्टयति—प्राक्तनेत्यादि न तेषामित्यन्तेन । आविर्भावयतीति । नूतनमेव सृजतीत्यर्थः ॥ १७ ॥ इतीति । कारिकातद्वृत्तिनिरूपणप्रकारेणेत्यर्थः । अक्लिष्टा रसाश्रयेण उचिता ये गुणालङ्कारास्ततो या शोभा तां बिभर्ति काव्यम् । उद्यानमध्यक्लिष्टः 'परस्वादानेच्छाविरतमनसो वस्तु सुकवेः' यह तृतीय पाद है। 'अपूर्व (वस्तु) को कहाँ से लाऊँ ?' इस आशय से निरुद्योग होकर दूसरों द्वारा उपनिबद्ध वस्तु का उपजीवक होगा, यह आशङ्का करके कहते हैं—सरस्वती—। कारिका में 'सुकवि' यह जाति में एकवचन है, इस अभिप्राय से व्याख्या करते हैं—सुकवियों की। इसे ही स्पष्ट करते हैं—पूर्वजन्म से लेकर उन (सुकवियों) को तक द्वारा। आविर्भूत करता है—अर्थात् नूतन ही सृजन करता है ॥ १७ ॥ इस प्रकार—। अर्थात् कारिका और उसकी वृत्ति के निरूपण के प्रकार से। अक्लिष्ट, रस के आश्रय से उचित जो गुण-अलङ्कार उससे जो शोभा उसे धारण करता है काव्य । उद्यान भी अक्लिष्ट, कालोचित सेकादिकृत जो रस उसका आश्रय अर्थात् तत्कृत
चतुर्थ उद्योतः ६०१ ध्वन्यालोकः यस्माद्वस्तु समीहितं सुकृतिभिः सर्वं समासाद्यते । काव्याख्येऽखिलसौख्यधाम्नि विबुधोद्याने ध्वनिदर्शितः सोऽयं कल्पतरूपमानमहिमा भोग्योऽस्तु भव्यात्मनाम् ॥ जिस ( काव्य नामक उद्यान ) से सुकृती लोग समस्त सभी वस्तु को प्राप्त करते हैं, अखिल सौख्य के धाम काव्य नामक विबुधोद्यान में कल्पतरु की भांति महिमा वाला वह यह ध्वनि दिखाया गया भाग्यशाली लोगों का भोग्य बने । लोचनम् कालोचितो यो रसः सेकादिकृतः तदाश्रयस्तत्कृतो यो गुणानां सौकुमार्य- च्छायावत्वसौगन्ध्यप्रभृतीनामलङ्कारः पर्याप्ताकारणं तेन च या शोभा तां बिभ्रति । यस्मादिति काव्याख्यादुद्यानात् । सर्वं समीहितमिति । व्युत्पत्ति- कीर्तिप्रीतिलक्षणमित्यर्थः । एतच्च पूर्वमेव वितत्योक्तमिति श्लोकार्थमात्रं व्याख्यातम् । सुकृतिभिरिति । ये कष्टोपदेशेनापि विना तथाविधफलभाजः तैरित्यर्थः । अखिलसौख्यधाम्नीति । अखिलं दुःखलेशेनाप्यननुविद्धं यत्सौख्यं तस्य धाम्नि एकायतन इत्यर्थः । सर्वथा प्रियं सर्वथा च हितं दुर्लभं जगतीति भावः । विबुधोद्यानं नन्दनम् । सुकृतीनां कृतज्योतिष्टोमादीनामेव समीहिता- सादननिमित्तम् । विबुधाश्च काव्यतत्त्वविदः । दर्शित इति । स्थित एव सन् प्रकाशितः, अप्रकाशितस्य हि कथं भोग्यत्वम् । कल्पतरुणा उपमानं यस्य तादृङ्महिमा यस्येति बहुव्रीहिगर्भो बहुव्रीहिः । सर्वसमीहितप्राप्तिर्हि काव्ये तदेकायत्ता । एतच्चोक्तं विस्तरतः ॥ जो सौकुमार्य, छायावत्त्व, सौगन्ध्य प्रभृति गुणों का ( जो ) अलङ्कार अर्थात् पर्याप्तता का कारण उससे जो शोभा उसे धारण करता है । जिससे अर्थात् काव्य नामक उद्यान से । समस्त समीहित - । अर्थात् व्युत्पत्ति, कीर्ति, प्रीति रूप । यह सब पहले ही विस्तार करके कह चुके हैं इसलिए श्लोक अर्थमात्र का व्याख्यान किया है । सुकृती लोग - । अर्थात् जो कष्टकर उपदेश के बिना भी उस प्रकार के फल प्राप्त कर चुके हैं वे । अखिल सौख्य के धाम- । अर्थात् अखिल, दुःखलेश से भी जो अननुविद्ध सौख्य है उसके धाम अर्थात् एक आयतन । भाव यह कि जगत् में सर्वथा प्रिय और सर्वथा हित दुर्लभ है । विबुधोद्यान अर्थात् नन्दन । सुकृती अर्थात् ज्योतिष्टोम आदि किए हुए लोगों का ही समीहित के आसादन का निमित्त । और विबुध अर्थात् काव्यतत्त्वविद् लोग । दिखाया गया है- । स्थित होता हुआ ही प्रकाशित है, क्योंकि अप्रकाशित भोग्य कैसे हो सकता है ? कल्पतरु से उपमान है जिसका, उस प्रकार की महिमा है जिसकी यह बहुव्रीहिगर्भ बहुव्रीहि है । काव्य में सभी समीहितों की प्राप्ति एकमात्र उस ( ध्वनि ) के अधीन है । और इसे विस्तारपूर्वक कह चुके हैं ।
६०२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सत्काव्यतत्त्वनयवर्त्मचिरप्रसुप्त- कल्पं मनस्सु परिपक्वधियां यदासीत् । तद्व्याकरोत्सहृदयोदयलाभहेतो- रानन्दवर्धन इति प्रथिताभिधानः ॥ इति श्रीराजानकानन्दवर्धनाचार्यविरचिते ध्वन्यालोके चतुर्थ उद्योतः । सत्काव्य के तत्त्व का नीतिमार्ग जो परिपक्व बुद्धि वालों के मन में चिरप्रसुप्तकल्प था उसे 'आनन्दवर्धन' इस प्रथित अभिधान वाले ने सहृदयजनों के उदयलाभ के लिए व्याख्यान किया । श्रीराजानक आनन्दवर्धनाचार्य विरचित ध्वन्यालोक में चतुर्थ उद्योत समाप्त हुआ । लोचनम् सत्काव्यतत्त्वनयवर्त्म चिरप्रसुप्त- कल्पं मनस्सु परिपक्वधियां यदासीत् । तद्व्याकरोत्सहृदयोदयलाभहेतोः इति सम्बन्धाभिधेयप्रयोजनोपसंहारः । इह बाहुल्येन लोको लोकप्रसिद्ध्या सम्भावनाप्रत्ययबलेन प्रवर्तते । स च सम्भावनाप्रत्ययो नामश्रवणवशात्प्रसि- द्धान्यतदीयसमाचारकवित्वविद्वत्तादिसमनुस्मरणेन भवति । तथाहि—भर्तृह- रिणेदं कृतम्—यस्यायमौदार्यमहिमा यस्यास्मिञ्छास्त्रे एवंविधस्सारो दृश्यते ( अन्तिम श्लोक के तीन पादों में ) ( ध्वनित्वरूप और इस ग्रन्थ का प्रतिपाद्य- प्रतिपादक भाव ) सम्बन्ध, अभिधेय ( ध्वनिस्वरूप ) और प्रयोजन ( ध्वनिस्वरूप के ज्ञान से प्रीति ) का उपसंहार है । यहाँ लोग बहुततया लोकप्रसिद्धि द्वारा सम्भावना- प्रत्यय के बल से ( अर्थात् लोगों में ख्याति देखकर गौरव की भावना के बल से ) प्रवृत्त होते हैं । और सम्भावनाप्रत्यय नाम सुनने के कारण उसके अन्य प्रसिद्ध समाचार, कवित्व और विद्वत्ता आदि के सम्यक् अनुसरण से होता है । जैसा कि—'भर्तृहरि ने इसे रचा है', जिसकी यह औदार्यमहिमा है, जिसके इस शास्त्र में इस प्रकार का सार
चतुर्थ उद्योतः ६०३ लोचनम् तस्यायं श्लोकप्रबन्धस्तस्मादादरणीयमेतदिति लोकः प्रवर्त्तमानो दृश्यते । लोकश्चावश्यं प्रवर्त्तनीयः तच्छास्त्रोदितप्रयोजनसम्पत्तये । तदनुग्राह्यश्रोतृजन- प्रवर्त्तनाङ्गत्वाद् ग्रन्थकाराः स्वनामनिबन्धनं कुर्वन्ति, तदभिप्रायेणाह—आनन्द- वर्धन इति । प्रथितशब्देनैतदेव प्रथितं यन्नु तदेव नामश्रवणं केषाञ्चिन्निवृत्तिं करोति, तन्मात्सर्यविजृम्भितं नात्र गणनीयम् , निश्श्रेयसप्रयोजनादेव हि श्रुता- त्कोऽपि रागान्धो यदि निवर्तते किमेतावता प्रयोजनमप्रयोजनमप्यवश्यं वक्त- व्यमेव स्यात् । तस्मादर्थिनां प्रवृत्त्यङ्गन्नाम प्रसिद्धम् । स्फुटीकृतार्थवैचित्र्यबहिःप्रसरदायिनीम् ॥ तुर्यां शक्तिमहं वन्दे प्रत्यक्षार्थनिदर्शिनीम् ॥ आनन्दवर्धनविवेकविकाशिकाव्या- लोकार्थतत्त्वघटनादनुमेयसारम् । यत्प्रोन्मिषत्सकलसद्विषयप्रकाशि- व्यापारयताभिनवगुप्तविलोचनं तत् ॥ श्रीसिद्धिचेलचरणाम्भोजपरागपूत- भट्टेन्दुराजमतिसंस्कृतबुद्धिलेशः । देखा जाता है उसका यह श्लोकप्रबन्ध है इसलिए यह आदरणीय है इस प्रकार लोग प्रवृत्त होते हुए देखे जाते हैं। और लोगों को उस शास्त्र में उक्त प्रयोजन की सम्प्राप्ति के लिए अवश्य प्रवृत्त करना चाहिए; इसलिए अनुग्राह्य श्रोताजनों के प्रवर्त्तन के अङ्ग होने के कारण ग्रन्थकार अपने नाम का निबन्धन करते हैं, उस अभिप्राय से कहते हैं—आनन्द-वर्धन—। 'प्रथित' शब्द से यही प्रकाशित किया है कि जो कि वही नाम श्रवण कुछ जनों को ( प्रवृत्त करने के बजाय ) निवृत्त करता है, वह मात्सर्य से विजृम्भित होने के कारण गणनीय नहीं है, क्योंकि यदि कोई रागान्ध व्यक्ति निःश्रेयस रूप प्रयोजन को सुनकर ही निवृत्त हो जाता है तो इससे क्या, प्रयोजन से अथवा अप्रयोजन, अवश्य ही कहना चाहिए । इसलिए नाम अर्थिजनों की प्रवृत्ति का अङ्ग है । स्पष्ट किए हुए अर्थ-वैचित्र्य को बाहर प्रसार देने वाली, प्रत्यक्ष अर्थ का निदर्शन करने वाली तुर्या ( वैखरी ) शक्ति की मैं वन्दना करता हूँ । आनन्दवर्धन के विवेक से प्रकाशित काव्यालोक के अर्थतत्त्वों को लगाने से अनुमेय रूप सार वाला जो ( सहृदयों के हृदय में ) प्रकाशमान सारे सद्विषयों को प्रकाशित करने वाला है वह अभिनवगुप्त का विशिष्ट 'लोचन' व्यापारित हुआ । श्रीसिद्धिचेल ( नामक गुरु ) के चरणकमल के पराग से पवित्र भट्ट इन्दुराज की
६०४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
वाक्यप्रमाणपदवेदिगुरुः प्रबन्ध-
सेवारसो व्यरचयद्ध्वनि वस्तुवृत्तिमू ॥
सज्जनान् कविरसौ न याचते ह्लादनाय शशभृत्किमर्थितः ।
नैव निन्दति खलान्मुहुर्मुहुर्धिक्कृतोऽपि न हि शीतलोऽनलः ॥
वस्तुतशिवमये हृदि स्फुटं सर्वतशिवमयं विराजते ।
नाशिवं कचन कस्यचिद्वचस्तेन वशिवमयी दशा भवेत् ॥
इति महामाहेश्वराभिनवगुप्तविरचिते काव्यालोकलोचने
चतुर्थ उद्योतः ।
मति से संस्कृत बुद्धिलेश वाले, वाक्य ( मीमांसा ), प्रमाण ( न्याय ) और पद
( व्याकरण ) को जानने वालों में श्रेष्ठ, प्रबन्ध सेवा में रस लेने वाले ( अभिनवगुप्त ने )
( ध्वनि के ) मार्ग में ( लोचन रूप ) वस्तु वृत्ति की रचना की ।
यह कवि सज्जनों से ( अपने ग्रन्थ के अवलोकनार्थ ) याचना नहीं करता, क्या
प्रसन्न करने के लिए चन्द्रमा से प्रार्थना की जाती है ? और ( यह कवि ) खलों की
बार-बार निन्दा नहीं करता, ( क्योंकि खल जनों द्वारा ) तिरस्कार का पात्र बनकर भी
अग्नि शीतल नहीं होता ।
वास्तव में शिवमम हृदय में सर्वत्र स्पष्ट रूप से शिवमम तत्त्व विराजमान है कहीं
किसी का वचन अशिव नहीं है इसलिए आप लोगों की स्थिति शिवमयी हो ।
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा विरचित काव्यालोक लोचन में
चतुर्थ उद्योत समाप्त हुआ ।
समाप्तोऽयं ग्रन्थः ।
परिशिष्ट ध्वनिकारिकार्धसूची
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अ
अकाण्ड एव विच्छित्तिः — ३९६ अङ्गाश्रितास्त्वलङ्काराः — २१६ अक्षरादिरचनेव योज्यते — ५९७ अतिव्याप्तेरथाव्याप्तेः — १५० अतो ऽन्यतमेनापि — ५५८ अनुगतमपि पूर्वच्छायया — ५९९ अनुस्वानोपमव्यङ्ग्यः — २७८ अनुस्वानोपमात्मापि — ३७६ अनेनानन्त्यमायाति — ५५७ अपृथग्यत्ननिर्वर्त्यः — २३१ अर्थशक्तेरलङ्कारः — २७८ अर्थशक्त्युद्भवस्त्वन्यः — २६७ अर्थान्तरगतिः काका — ५०८ अर्थान्तरे संक्रमितं — १७४ अर्थोऽपि द्विविधो ज्ञेयः — २७४ अलङ्कारान्तरव्यङ्ग्य० — ३०१ अलङ्कारान्तरस्यापि — २८० अलंकृतीनां शक्तावपि — ३६० अलोकसामान्यमभिव्यनक्ति — ९२ अवधानातिशयवान् — ४३७ अवस्थादिविभिन्नानां — ५९२ अवस्थादेशकालादि — ५८३ अविरोधी विरोधी वा — ४२० अविवक्षितवाच्यस्य — ३१२ अव्युत्पत्तेरशक्तेर्वा — ३०७ अशक्नुवद्भिर्व्याकर्तुं — ५५१ असंलक्ष्यक्रमोद्योतः — १८३ असमासा समासेन — ३३७ अस्फुटस्फुरितं काव्य० — ५११
आ
आक्षिप्त एवालङ्कारः — २५१ आत्मनोऽन्यस्य सद्भावे — ५९६ आनन्त्यमेव वाच्यस्य — ५८३ आलेख्याकारवत्तुल्य० — ५९४ आलोकार्थो यथा दीप० — ९८
इ
इतिवृत्तवशायातां — ३६० इत्युक्तलक्षणो यः — ५५१
उ
उक्त्यन्तरेणाशक्यं यत् — १५५ उत्प्रेक्ष्याप्यन्तराभीष्ट० — ३६० उद्दीपनप्रशमने — ”
ए
एकाश्रयत्वे निर्दोषः — ४२९ एको रसोऽङ्गीकर्तव्यः — ४१५ एतद्द्वयोक्तमौचित्यं — ३५७ एवं ध्वनेः प्रभेदाः प्र० — ५५०
औ
औचित्यवान् यस्ता एताः — ४४३
क
कस्यचिद् ध्वनिभेदस्य — १६७ कार्यमेकं यथा व्यापि — ४४७ काले च ग्रहणत्यागौ — २३७ काव्यप्रभेदाश्रयतः — ३५२ काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति बुधैः — ८ काव्यस्यात्मा स एवार्थः — ८६ काव्ये उभे ततोऽन्यत् — ५२५
६०६ ध्वन्यालोकः पृष्ठ । पृष्ठ काव्ये तस्मिन्नलङ्कारः २०१ । ध्वनेरस्य प्रबन्धेपु ३७६ कृत्तद्धितसमासैश्च ३७९ । ध्वनेरात्माङ्गिभावेन १८३ क्रमेण प्रतिभात्यात्मा २५० । ध्वनेरित्थं गुणीभूत० ५८० क्रौञ्चद्वन्द्ववियोगोत्थः ८६ । ध्वनेर्यः सगुणीभूत० ५५७ ग । ध्वन्यात्मन्येव शृङ्गारे २२५ गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती ३३७ । ध्वन्यात्मभूते शृङ्गारे २३०, २३५ च । न चारुत्वोत्कर्षतो व्यङ्ग्यः ३०२ । न काव्यार्थविरामोऽस्ति ५८० चित्रं शब्दार्थभेदेन ५२५ । न तु केवलया शास्त्र० ३६० त । निबद्धा सा क्षयं नैति ५९३ त एव तु निवेश्यन्ते ३२८ । निर्व्यूढावपि चाङ्गत्वे २३७ तत्परत्वं न वाच्यस्य २८० । निवर्तन्ते हि रसयोः ४३५ तत्र किञ्चिच्छब्दचित्रं ५२५ । नूतने स्फुरति काव्यवस्तुनि ५९७ तत्र पूर्वमनन्यात्म ५९५ । नैकरूपतया सर्वे ५९४ तत्र वाच्यः प्रसिद्धो यः ४६ । नोपहन्त्यङ्गितां सोऽस्य ४१६ तथा दीर्घसमासेति ३३७ । प तथा रसस्यापि विधौ ४१७ । परस्वादानेच्छाविरतमनसः ५९९ तदन्यस्यानुरणन० ३१२ । परिपोषं गतस्यापि ३९६ तदा तं दीपयन्त्येव ३२८ । परिपोषं न नेतव्यः ४२० तदुपायतया तद्वत् ९८ । प्रकारोऽन्यो गुणीभूत० ४९२ तद्वत्सचेतसां सोऽर्थः १०२ । प्रकारोऽयं गुणीभूत० ५१४ तद्विरुद्धरसस्पर्शः ४३७ । प्रतायन्तां वाचो निमित० ५९९ तद्व्यक्तिहेतू शब्दार्थौ २१९ । प्रतीयमानं पुनरन्यदेव ४७ तन्मयं काव्यमाश्रित्य २१७ । प्रतीयमानच्छायैषा ५०६ तमर्थमवलम्बन्ते २१६ । प्रधानगुणभावाभ्यां ५२५ तस्याङ्गानां प्रभेदा ये २२७ । प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे २०१ तृतीयं तु प्रसिद्धात्म ५९५ । प्रबन्धस्य रसादीनां ३६० तेऽलङ्काराः परां छायां ३०० । प्रबन्धे मुक्तके वापि ३९५ तेषामानन्त्यमन्योन्य० २२७ । प्रसन्नगम्भीरपदाः ४१६ द । प्रसिद्धेऽपि प्रबन्धानां ४१५ दिङ्मात्रं तूच्यते येन २२९ । प्रायेणैव परां छायां ४९७ दृष्टपूर्वा अपि ह्यर्थाः ५६७ । प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्न० २७४ ध : । ब धत्ते रसादितात्पर्यं० ५१४ । बहुधा व्याकृतः सोऽन्यैः ४६ ध्रुवं ध्वन्यङ्गता तासां ३०१ । बाध्यानामङ्गभावं वा ४०२ । बुद्धिरासादितालोका २२९ । बुद्धौ तत्त्वार्थदर्शिन्यां १०२
ध्वनिकारिकार्ध-सूची ६०७ पृष्ठ पृष्ठ भ रसादिमय एकस्मिन् ५६९ भक्त्या विभर्ति नैकत्वं १४९ रसादिविषयीनेतत् ४४१ भवेत्तस्मिन् प्रनादो हि ४३७ रसाद्यनुगुणत्वेन ४४३ भूम्नैव दृश्यते लक्ष्ये ५९३ रसान् तन्नियमे हेतुः ३३७, ३४७ रसान्तरव्यवधिना ४२९ म रसान्तरसमावेशः ४१६ माधुर्यमार्द्रता याति २१८ रसान्तरान्तरितयोः ४३५ मिथोऽप्यनन्ततां प्राप्तः ५६४ रूढा ये विषयेऽन्यत्र १५६ मुख्यां वृत्तिं परित्यज्य १५७ रूपकादिरलङ्कार० २३५, २३७, २७८ मुख्या महाकविगिरां ५०६ रौद्रादयो रसा दीप्त्या २१९ य ल यत्तत्प्रसिद्धावयवातिरिक्तं ४७ लक्षणेऽन्यैः कृता चास्य १६९ यतः कार्यः सुमतिना ३९५ लावण्याद्याः प्रयुक्तास्ते १५६ यत्नतः प्रत्यभिज्ञेयौ ९७ यत्र प्रतीयमानोऽर्थः ३०३ व यत्र व्यङ्ग्यान्वये वाच्य० ४९२ वस्तु भातितरां तन्व्याः ५९६ यत्रार्थः शब्दो वा तमर्थ० १०२ वाक्ये सङ्घटनायां च ३२७ यत्राविष्क्रियते स्वोक्त्या २७२ वाचकत्वाश्रयेणैव १५९ यथा पदार्थद्वारेण ९९ वाचस्पतिसहस्राणां ५९३ यथा व्यापारनिष्पत्तौ १०१ वाच्यप्रतीयमानाख्यौ ४३ यदपि तदपि रम्यं यत्र ५९८ वाच्यवाचकचारुत्व० १८९ यदुद्दिश्य फलं तत्र १५७ वाच्यस्याङ्गतया वापि ३०३ यद्व्यङ्ग्यस्याङ्गिभूतस्य ३०९ वाच्यानां वाचकानाञ्च ४४१ यस्तात्पर्येण वस्त्वन्यत् २६७ वाच्यार्थपूर्विका तद्वत् ९९ यस्त्वलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यः ३२७ वाच्यालङ्कारवर्गोऽयं ४९७ यस्मिन्ननुक्तः शब्देन २५१ वाणी नवत्वमायाति ५५८ युक्त्याऽनयाऽनुसर्तव्यः ५६४ विज्ञायेत्थं रसादीनां ४४० ये च तेषु प्रकारोऽयं ४९६ विधिः कथाशरीरस्य ३५९ योऽर्थः सहृदयश्लाघ्यः ४३ विनेयानुन्मुखीकर्तुं ४३७ विभावभावानुभाव० ३५९ र विरुद्धैकाश्रयो यस्तु ४२७ रचनाविषयापेक्षं ३५८ विरोधमविरोधञ्च ४३६ रसभावतदाभास० १८४ विरोधिनः स्युः शृङ्गारे ३२८ रसभावादिसम्बद्धा ५९३ विरोधिरससम्बन्धि० ३९६ रसबन्धोक्तमौचित्यं ३५८ विवक्षा तत्परत्वेन २३६ रसस्यार्थवविश्रान्तेः ३६० विवक्षिताभिधेयस्य १८३ रसस्य स्याद् विरोधाय ३९६ विवक्षिते रसे लब्ध० ४०२ रसाक्षिप्ततया यस्य २३१ विशेषतस्तु शृङ्गारे ४३६ रसादिपरता यत्र १८९
६०८ ध्वन्यालोकः पृष्ठ | पृष्ठ विषयं सुकविः काव्यं ४४० | श्रुतिदुष्टादयो दोषा २२५ विषयाश्रयमप्यन्यद् ३५२ | स विस्तरेणान्वितस्यापि ३९६ | संख्यातुं दिङ्मात्रं ५५० वृत्तयोऽपि प्रकाशन्ते ५५२ | संवादास्तु भवन्त्येव ५९४ वेद्यते स तु काव्यार्थ९ ९४ | संवादात्यन्तसादृश्यं ” व्यङ्ग्यः काव्यविशेषः स १०२ | सगुणीभूतव्यङ्ग्यैः सालङ्कारैः ५३३ व्यङ्ग्यव्यञ्जकभेदेऽस्मिन् ५६९ | सङ्करसंसृष्टिभ्यां पुनः ” व्यज्यन्ते वस्तुमात्रेण ३०१ | सत्काव्यं कर्तुं वा ज्ञातुं ५५१ व्यञ्जकत्वैकमूलस्य १५९ | सन्धिसन्ध्यङ्गघटनं ३६० श | स प्रसादो गुणो ज्ञेयः २२४ शक्तावपि प्रमादित्वं २३० | समर्पकत्वं काव्यस्य २२४ शब्दतत्त्वाश्रयाः काश्चित् ५५२ | सरस्वती स्वादु तदर्थवस्तु ९२ शब्दस्य स च न ज्ञेयः ३०७ | सर्वत्र गद्यबन्धेऽपि ३५८ शब्दार्थशक्तिमूलत्वात् २५० | सर्वे नवा इवाभान्ति ५६७ शब्दार्थशक्त्याक्षिप्तोऽपि २७१ | सर्वेष्वेव प्रभेदेषु २३० शब्दार्थशासनज्ञान० ९४ | स विभिन्नाश्रयः कार्यः ४२७ शब्दो व्यञ्जकतां बिभ्रत् १५५ | स सर्वो गम्यमानत्वं २७८, ३०९ शरीरीकरणं येषां ३०० | सा व्यङ्ग्यस्य गुणीभावे ५०८ शषौ सरेफसंयोगः ३२८ | सुप्तिङ््वचनसम्बन्धैः ३७९ शृङ्गारस्याङ्गिनो यत्नात् २३० | सोऽर्थस्तद्व्यक्तिसामर्थ्य० ९७ शृङ्गार एव मधुरः २१७ | स्वसामर्थ्यवशेनैव १०१ शृङ्गारे विप्रलम्भाख्ये २१८ | स्वेच्छाकेसरिणः ३
(हस्तलिखित टिप्पणी / Handwritten note:) Acharya Bhushan 17-2-1973. (G. Nagar), 11.A.M.
वृत्तिग्रन्थ-पद्यसूची
| पृष्ठ | पृष्ठ | ||
|---|---|---|---|
| अ | उद्दामोत्कलिकां [ रत्नावली, २।४ ] | २४० | |
| अङ्कुरितः पल्लवितः | २९५ | उन्नतः प्रोल्लसद्धारः | २५९ |
| अज्जाएं पहारो गवलद्वाए | १५३ | उपोढरागेण विलोलतारकं [ पाणिनि ] | १०९ |
| अणत्त वच्च बालअ | ३८५ | उप्पहजाआएं असोहिणीएं | ५२४ |
| अतहट्ठिठए वि तहसण्ठिइए | ५६५ | ए | |
| अतिक्रान्तमुखाः कालाः [ ०महपिंन्यास ] | ३८३ | एकत्तो रुअइ पिआ | ४२२ |
| अत्ता एत्थ णिमज्जइ [ गाथा० ७।६७ ] | ७१ | एमेअ जणो तिस्सा | ३१६ |
| अनध्यवसितावगाहनं [ धर्मकीर्ति ] | ५२१ | एवं वादिनि देवर्षौ [ कुमारसं० ६।८४ ] | २६८, ५१३, ५६७ |
| अनवरतनयनजललव | ३४० | एहि गच्छ पतोत्तिट्ट [ व्यास ] | ४०८ |
| अनाख्येयांशभासित्वं | ५५६ | क | |
| अनिष्टस्य श्रुतिर्यद्वत् [ परिकर-श्लोक ] | ३२६ | कण्ठाच्छित्त्वाक्षमालवलय | ४२२ |
| अनुरागवती सन्ध्या | ११४, ४९४ | कथाशरीरसमुत्पाद्य [ परिकरश्लोक ] | ३६६ |
| अनौचित्यादृते नान्यत् [ आनन्दवर्धन ] | ३६२ | कपोले पत्राली करतलनिरोधेन | २३२ |
| अपारे काव्यसंसारे [ आनन्दवर्धन ] | ५३० | कमलाअराणं मलिआ | ३०४ |
| अमी से दृश्यन्ते ननु [ आनन्दवर्धन ] | ५२२ | करिणीवेहव्वअरो मह | ५६९ |
| अम्बा शेतेऽत्र वृद्धा | २७३ | कर्ता द्यूतच्छलानां [ वेणीसंहार ५।२६ ] | ५३७ |
| अयं स रशनोत्कर्षी [महा०, स्त्री, २४।१९] | ४१३ | कस्त्वं भोः कथयामि | ५२३ |
| अयमेकपदे तया वियोगः [विक्रमो० ४।३] | ३८५ | कः सन्नद्धे विरहविधुरां [ मेघदूत ] | ३१३ |
| अवसर रोउं चिअ | ३८५ | कस्स व ण होइ रोसो | ७६ |
| अव्युत्पत्तिकृतो दोषः [ परिकर-श्लोक ] | ३४६ | काव्याध्वनि ध्वनिः | ५३३ |
| अहिणअपओअरसिएसु | ५४९ | किमिव हि मधुराणां [अ० शाकु० १।१७] | ३१४ |
| अहो वनासि स्पृहणीयवीर्यः | ३८८ | किं हास्येन न मे प्रयास्यसि | २०३ |
| आ | कुविआओ पसन्नाओ | १५२ | |
| आक्रन्दाः स्तनितैर्विलोचन | २४६ | कृतककुपितैः [ रामाभ्युदय ] | ३३३ |
| आम असइओ ओरम | ५०९ | कृते वरकथालापे | ५६८ |
| आहूतोऽपि सहायैः [ मालवरुद्र ] | ११७ | कोपात्कोमल [ अमरुकशतक, ९ ] | २४७, ४०६ |
| इ | क्रामन्त्यः क्षतकोमलाङ्गुली | ४१४ | |
| इत्यक्लिष्टरसाश्रयोचित० [ आनन्दवर्धन ] | ६०० | ककार्यं शशलक्ष्मणः [ विक्रमो०, ४ ] | ४०५ |
| इत्यलक्ष्यक्रम्रा एव सन्तः | ४४६ | क्षिप्तो हस्तावलग्नः प्रसभ | २०६, ४०७ |
| ई | ख | ||
| ईसाकलुसस्स वि तुह | २९३ | खं येऽत्युज्ज्वलयन्ति [ आनन्दवर्धन ] | २६६ |
| उ | खणपाहुणिआ देअर | ५३५ | |
| उच्छिणसु पडिअ कुसुमं | ३०६ | ग | |
| उत्कम्पिनी भयपरि० [ तापसवत्सराज ] | ३३० | गअणं च मत्तमेहं | १८१ |
| ३६ ध्व० |
६१० ध्वन्यालोकः पृष्ठ | पृष्ठ च | न चक्राभिघातप्रसभाशयैव २३८ | नानाभङ्गिभ्रमद्भूः ५६३ चञ्चद्भुजभ्रमितचण्डगदा [ वेणीसं० ] २२१ | निद्राकैतविनः प्रियस्य ५६२ चन्दनासक्तभुजग २९१ | नीवाराः शुकगर्भ [ शाकु०, १।१४ ] ३८६ चन्दमऊएहि णिसा णलिनी २८१ | नीरसस्तु प्रबन्धो ४०१ चमहिअमाणसकञ्चण २५६ | नो कल्पापायवायोदय [ सूर्यशतक ] २४४ चलापाङ्गां दृष्टिं [ शाकु०, १।२५ ] २३७ | न्यक्कारो ह्ययमेव मे ३८०, ५१६, ५३६ चुग्विज्जइ असहुत्तं १५२ | प चूअङ्कुरावअंसं छणमपि [ हरिविजय ] ३२१ | पत्युः शिरश्चन्द्रकला [ कुमारसम्भव ] ५१२ ज | पदानां स्मारकत्वेऽपि [ परिकरश्लोक ] ३२६ जाएज्ज वणुद्देसे खुज्ज [ गाथास० ३।१० ] २९० | परार्थे यः पीडां [ भ० श० ५६ ] १५४, ५२२ ण | परिम्लानं पीनः [ रत्ना०, २।२२ ] १५१ ण अ ताण घडइ ओही ५८५ | पूर्वे विशृङ्खल ४०१ त | प्रभामहत्या शिखयेव दीपः [ कुमार०, ] ५०३ तं ताण सिरिसहो [ विषमबाणलीला ] २८७ | प्रभ्रश्यत्तुयुरीयत्विषि ३८७ तद्गेहं नतभित्ति मन्दिरमिदं ३९० | प्रातुं धनैरर्थिजनस्य ३२० तन्वी मेघजलाईपल्लवतया [ विक्रमो० ] २१३ | प्राप्तश्रीरेष कस्मात्पुन २८३ तमर्थमवलम्बन्ते ये ३४१ | प्रायच्छत्तोच्चैः कुसुमानि ५१२ तरङ्गभ्रूभङ्गा [ विक्रमो० ] २१२, ५६३ | भ तत्त्या विनाऽपि हारेण २५३ | भगवान् वासुदेवश्च ५७३ तां प्राङ्मुखीं तत्र [ कुमारसं० ] ५८४-५ | भम धम्मिअ वीसत्थो [ गाथास० २।७६ ] ५२ ताला जाअन्ति गुणा [ विषमबाणलीला ] १७८ | भावानचेतनानपि चेतन ५३० तालैः शिञ्जलया [ मेघदूत, उ० १६ ] १८४ | भूरेणुदिग्धान्नवपारिजात ४३५ तेषां गोपवधूविलाससुहृदां २१४, ५३९ | भ्रमिमरतिमलसहदयतां २५५, ४०६ त्रासाकुलः परिपतन् [ शिशुपा० ५।२६ ] २९३ | म द | मनुष्यवृत्त्या समुपाचरन्तं ३८७ दत्तानन्दाः प्रजानां समुचित २६२ | मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरित ३४० दन्तक्षतानि करजैश्च ५४७ | मह मह इत्ति भणन्तउ ५९२ दीर्धीकुर्वन् पटु मदकलं [ मेघदूत ] ५४४ | मा पन्थं रुन्धीओ अवेहि ३८४ दुराराथा राधा सुभग ५१५ | मुख्या व्यापार ४०१ दृष्ट्या केशव गोपरागहृतया २५७ | मुनिर्जयति योगीन्द्रः ५७८ दे आ पसिअ णिवत्तसु ७४ | मुहुरङ्गुलिसंवृताधरोष्ठं [ शाकु०, १।२८ ] ३८६ देव्वाएत्तम्मि फले किं २८८ | य ध | यः प्रथमः प्रथमः ५६१ धरणीधारणाय त्वं शेष [ हर्षचरित ] ५६७ | यच्च कामसुखं लोके ४३१ | यया यथा विपर्यैति ५७१
वृत्तिग्रन्थ-पद्यसूची ६११ पृष्ठ | पृष्ठ यदङ्गनाहितमतिः [ सुभाषितावली, २७१ ] ३८८ | वृत्तेऽस्मिन् महाप्रलये धरणी [ हर्षचरित ] ३२१ यस्मिन्नस्ति न वस्तु [ मनोरथ कवि ] २९ | व्रीडायोगान्नतवदनया ३३१, यस्मिन् रसो वा भावो [ आनन्दवर्धन ] ५३२ | श या निशा सर्वभूतानां [ भगवद्गीता ] ३१७ | शिखरिणि क्व नु नाम कियत् १४६ या व्यापारवती रसान् ५४१ | शून्यं वासगृहं विलोक्य [ अमरु० ] ५६३ ये जीवन्ति न मान्ति ये स्म ३८८ | शेषो हिमगिरिस्त्वं [ भामह ३।२८ ] ५६७ येन ध्वस्तमनोभवेन [ चन्द्रक कवि ] २५२ | शृङ्गारी चेत् कविः काव्ये ५३० यो यः शस्त्रं [ वेणीसं० ३।३२ ] श्यामास्वङ्गं चकितहरिणी० [मेघदू० उ०४१] २४८ २२२, ३४०, ३४७, ३५१ | श्लाघ्याशेषतनु सुदर्शनकरः [आनन्दवर्धन] २५४ र | स रक्तस्त्वं नवपल्लवैरहमपि २४१ | सङ्केतकालमनसं २७०,४९५ रम्या इति प्राप्तवतीः [ शिशुपा० ३।५३ ] २९४ | सज्जेइ सुरहिमासो २७५,५६८ रत्रिसङ्क्रान्त [रामा० अ० का० १६।१३] १८० | सत्काव्यतत्त्वनयवर्त्म [ आनन्दवर्धन ] ६०२ रसभावादिविषय ५२८ | सत्यं मनोरमा रामाः ४४० रसादिषु विवक्षा तु ५२८ | सन्ति सिद्धरसप्रख्या ३६७ राजानमपि सेवन्ते ५१७ | सप्तैताः समिधः श्रियः [ व्यास ] ३१३ रामेण प्रियजीवितेन तु [ उत्तर० ] ३१४ | समविसम णिविसेसा ३८९ ल | सर्वैकशरणमक्ष्यं [ आनन्दवर्धन ] २६६ लच्छी दुहिदा जामाडओ ४९७ | सर्वोपमाद्रव्यसमुच्चयेन [ कुमा० ] ५८४ लावण्यकान्तिपरिपूरित [ आनन्दवर्धन ] १८४ | स वक्तुमखिलान् शक्तः २८७ लावण्यद्रविणव्ययो न गणितः ५१८ | सविभ्रमस्मितोद्भेदाः ५६० लावण्यसिन्धुरपरैव हि ४९३ | सशोणितैः क्रव्यभुजां ४३५ व | स हरिनाम्ना देवः स हरिः २४२ वच्च मह विअण एककेइ ७३ | साअरविइण्णजोव्वणहत्था० २७६ वत्से मा गा विषादं २७२ | सिज्जइ रोमञ्चिज्जइ ५७५ वाणिअअ हत्थिदन्ता ३२३, ५६९ | सिहिपिच्छकण्णऊरा ३२४ वाणीरकुडङ्गोड्डीण ३०५ | सुरभिसमये प्रवृत्ते ५६८ वाल्मीकिव्यतिरिक्तस्य ५९१ | सुवर्णपुष्पां पृथिवीं १८४, वाल्मीकिव्यासमुख्याश्च ४०२ | सैषा सर्वैव वक्रोक्तिः ४९९ विच्छित्तिशोभिनैकेन [ परिकरश्लोक ] ३२७ | स्निग्धश्यामल्लित्त १७५,५३६ विमतिविषयो य आसीत् ४९२ | स्मरनवनदीपूरेण ३३५ विमानपर्यङ्कतले निषण्णाः ४३५ | स्मितं किञ्चिन्मुग्धं तरल ५५९ विसमइमो काण वि ३१९ | स्वतेजःक्रीतमहिमा ५६१ विस्रम्भोत्था मन्मथा ५०७ | ह वीराणं रमइ घुसिण २८६ | हंसानां निनदेषु यैः ५८६ | हिअअट्ठाविअमण्णुं २८९
'लोचन' में उद्धृत उदाहरणपद्यों एवं वाक्यों की सूची पृष्ठ पृष्ठ अ उपज्ञोपक्रमं [ पा० सू० २।४।२१ ] १३८ अग्निहोत्रं जुहुयात् [ मे० उ०, ६। ३६ ] १६५ उपमानाक्षेपः [ वा० सू० ४।३।२७ ] ११३ अधिकारादपेतस्य [ भामहः ३।२९ ] १२६ उपमानेन तत्त्वं च [ उद्भट, ६।२ ] २७९ अन्यत्र संज्ञाविधौ प्रत्यय [ परिभा. ] ५०४ उपादायापि ये हेयाः [ न्याय० ] १६४ अपह्नुतिरभीष्टस्य [ भामह, ३।२१ ] ११६ उतेयुषामपि दिवं [ भामह, १।६ ] ४१ अपूर्वं यद्वस्तु प्रथयति [ मङ्गल ] १ उप्पह जाया ५४० अभिधेयाविनाभूतप्रतीतिः [ श्लो० वा० ] १६१ ऋ अभिधेयेन सामीप्यात् ३१ ऋष्यन्धककृष्णिणिकुरुभ्यः [ पा. सू. ४।१।११४ ] ५७५ अमुं कनकवर्णाभं [ महा० शा० १५३।१४] ३७८ ए अयं मन्दद्युतिर्भास्वान् [ भामह, ३। ३४ ] ५०३ एकदेशस्य विगमे [ भामह ३।२३ ] ११६ अयं स राजा उदयणो त्ति [ वासव० ] ३७३ एकस्मिन् शयने पराङ्मुखतया [अमरु०,८३] ८० अलं स्थित्वा श्मशानेऽस्मिन् एकाकिनो यदवला तरुणी [ रुद्रट ] १३४ [ महाभा० शा० १५२। ११ ] ३७८ एतत्तस्य मुखात् कियत्कमलिनी १२८ अल्पं निर्मितमाकाशं ४९९ एवमयं पुरुषो वेद [ शा० भा०, पृ० ४, पं. ५, अल्पीयसाऽपि यत्नेन [ भर्तृहरि ] १४० चौ० सं० ] ४७९ अवज्ञयाऽप्यवच्छाद्य [ ऐतिहासिक ] १२० ऐ अहं त्वा यदि नेक्ष्ये [ भामह, २। ६९ ] ११२ ऐन्द्रं धनुः पाण्डुपयोधरेण [ पाणिनि ] ११३ अहमित्यभिनयविशेषेण [ भट्टनायक ] ७२ ओ अहो संसारनैर्घृण्यं ११७ ओसुरु सुम्हि आई १८५ आ क आगर्भादाविमर्शात् [ नाट्यशा० ] ४१८ कक लौल्ये [ धातुपाठ ] ५०८ आदिमध्यान्तविषयं [ भामह० २। २५ ] ११५ कथमपि कृतप्रत्यापत्तौ [ अमरुक ] ३५५ आदित्योऽयं स्थितो मूढा कर्पूर इव दग्धोऽपि [ वालरा० ३।६१ ] ११६ [ महाभा० शा० १५३।१३ ] ३७८ कवेः प्रयत्नान्नेतृणां [ नाट्यशा० ] ४२३ आनन्दवर्धनविवेक ६०३ कवेरन्तर्गतं भावं [ नाट्यशा० ] ९४, आप्तवादाविसंवाद [ श्लो० वा० १।२।७ ] ४८८ कस्यचिद् ध्वनिभेदस्य [ ध्वन्या० १।२९ ] ३३, आसीन्नाथ पितामही तव १३४ कस्स वा ण होइ रोसो [ स० श०, ८८६ ] ३०६ आसूत्रितानां भेदानां ५५६ काव्यं तु जातु जायेत [ भामह, १।५ ] ९६ इ काव्यशोभायाः कर्तारः ४३९ इतिवृत्तं हि नाट्यस्य [ नाट्यशास्त्र ] ४४३ काव्यार्थान् भावयति [ नाट्यशा० ७।६९ ] ५३० इन्दीरवद्युति यदा बिभृयात् [ भट्टेन्दुराज ] ३९३ काव्यालोके प्रथां ५५६ इवशब्दयोगाद् गौणतापि [ भट्टनायक ] १८१ काव्ये रसयिता सर्वः [ भट्टनायक ] ४० उ किं वृत्तान्तैः परगृहगतैः [ मातङ्गदिवाकर ] १३३ उक्त्यन्तरेणाशक्यं यत् १७७ कीर्ति स्वर्गफलामाहुः ४१ उपक्षेपः परिकरः [ नाट्यशा० २१।३९ ] ३७० कुरङ्गीवाक्षाणि ५०७
लोचनोद्धृत गद्य-पद्यों की सूची ६१३
पृष्ठ पृष्ठ कुरुवक कुचाघात ४१२ तत्सहोक्त्युपमाहेतु० [ भामह, ३।१७ ] २४२ कृच्छ्रेणोयुगं व्यतीत्य [ रत्नावली, २।१० ] १८८ तद्वक्त्रेन्दुविलोकनेन दिवसः [ ता० व० ] ३७४ कृतककुपितैर्बाष्पाम्भोभिः [ रामाभ्युदय ] ३३४ तद्वत् सचेतसां सोऽर्थः [ ध्वन्या० १।१२ ] ६४ कृत्यपञ्चकनिर्वाह ५५७ तथाभूते तस्मिन् [ तापसवत्सराज ] ३७५ केलीकन्दलितस्य विश्रम [ अभिनवगुप्त ] २९८ तया स पूतश्च विभूषितश्च ५०३ कैशिकी श्लक्ष्णनेपथ्या [ नाट्यशा० ] ५५३ तव शतपत्रपत्रमृदुतान्न्र [ देवीस्तोत्र ] २१० काकार्य शशलक्ष्मणः क्व च [ विक्रमो० ? ] १८६ तस्य प्रशान्तवाहिता [ योगसू० ३।१० ] ४३२ क्रिययैव तदर्थस्य [ भामह, ३।३३ ] ५०२ तस्यास्तन्मुखमस्ति सौम्य ११३ क्रोधोऽपि देवस्य वरेण ६९ तस्याः पाणिरयं तु [ उद्भटा० ] २७९ कोपात्कोमललोल ४२३ तान्यक्षराणि हृदये किमपि १७१ क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैति [ माघ० ५।१७ ] ५८६ तासामनादित्वमाशिषो [योगसू० ४।९।१०] १९८ क्षुत्तृष्णाकाममात्सर्य [ पुराणश्लोक ] ५८१ तिष्ठेत्कोपोवशात्प्रभाव [ विक्रमो०, ४।२ ] १८४ ख तीर्थे तोयव्यतिकर [ रघु० ८। ] खले वाली यूपः ५०४ तुद्रीशालातुर ५०४ ग तुल्योदयावसानत्वात् [ भामह, ३। ४८ ] १२४ गद्यपद्यमयी चम्पूः [ दण्डी ] ३२४ तेऽलङ्काराः परां छायां [ ध्वन्या०, २।२८ ] २७९ गम्भीरोऽहं न मे कृत्यं २७१ तैस्तैरप्युपयाचितैरूपनतः [ उत्पलपाद ] ९७ गुणः कृतार्तमसंस्कारः [ नाट्यशा० ] ४१७ त्वत्सम्प्राप्तिविलोभितेन [ तापसव० ६. ] ३७५ गृहेष्वध्वसु वा नाम्नं [ भामह, ३।९ ] १२० त्वां चन्द्रचूडं सहसा स्पृशन्ती [ अभिनवगुप्त ] ४३८ गोला कच्छकुडङ्गे ५३२ त्वामालिख्य प्रणकुपितां [ मे० दू० ] ३५६ गोप्यैवं गदितः सलेशं द च दयितया ग्रथिता स्रगियं [ अभिनवगुप्त ] २२९ चलापाङ्गां दृष्टिं स्पृशसि [ शाकु० १।२५ ] ५४० दर्शं यजेत ५११ चाइअणकरपरम्पर. [ पुराणी गाथा ] ५८० दानवीरं धर्मवीरं [ नाट्यशा० ] ४३३ चित्तवृत्तिप्रसरप्रसङ्ख्यान ४३० दूराकर्षणमोहमन्त्र इव [ उत्तर० ] १८७ चूर्णपादैः प्रसन्नैः [ नाट्यशा० ] ३५९ देवडिति लुणाहि पलुत्र १५६ छ देवीस्वीकृतमानसस्य [ ता० व० रा० ] ३७५ छिद्रान्वेषी महान्स्तब्धः २२५ द्विर्वचनेऽचि [ पा० सू० १।१।५९ ] ५०४ ज ध जराजीर्णशरीरस्य ५८१ धर्मार्थकाममोक्षेषु [ भामह० १।२ ] ४१ जरा नेयं मूर्ध्नि ध्रुवमयं [ अभिनवगुप्त ] ५८१ धर्मे चार्थे च कामे च ५७१ ज्योत्स्नापूरप्रसरधवले २८४ धृतिः क्षमा दया शौचं [ या० स्मृ० ] ३१३ ढ ध्वनिर्मामापरो योऽपि [ भट्टनायक ] ४० ढुण्ढुल्लन्तो मरिहिसि २९६ न त नखं नखाग्रेण विघट्टयन्ती ९२ तच्च रसदाननिवृत्तये [ भामह, ३।९ ] १२० न चेह जीवितः [ महा० शा० १५३।१२ ] ३७८ तच्छिद्रेषु प्रत्यया ४३२
६१४ ध्वन्यालोकः पृष्ठ | पृष्ठ न सामयिकत्वाच्छब्दार्थ [ न्यायसू० ] ४८२ | मुख्यां वृत्तिं परित्यज्य [ ध्वन्या०, १।२० ] ६०, नातिनिर्वहणैषिता [ नाट्यशा० ] ५४० | य नायकस्य कवेः श्रोतुः [ भट्टतौत ] ९३ | यं सर्वशैलाः परिकल्प्य [ कुमा०, १।२ ] ९३ निःश्वासान्ध इवादर्शः ३१२, | यः कालागुरुपत्रभङ्ग [ भट्टेन्दुराज ] २९७ निरूढा लक्षणाः काश्चित १५५ | यः संयोगवियोगाभ्यां [ भर्तृहरि ] १३९ निर्वाणभूयिष्ठमथास्य [ कुमार० ] २६९ | यत्पदानि त्यजन्त्येव [ नाट्यशा० ] ५२९ नेयं विरोति भृङ्गाली [ भामह, ३.२२ ] ११६ | यत्रार्थः शब्दो वा तं [ ध्वन्या०, १।१३ ] १९९, नोपादानं विरुद्धस्य ४१० | यत्रोक्तो गम्यतेऽन्योऽर्थः [ भामह, २।७९ ] १०९ | यदयमनुभावयति [ नाट्यशास्त्र ] १६३ प | यदि नामास्य कायस्य १४ परस्परोपकारेण १२५ | यद्वामाभिनिवेशित्वं [ ना० २४।१९९ ] ३०३ पर्यायोक्तं यदन्येन [ भामह, ३।८ ] ११८ | यद्विश्रम्य विलोकितेषु [ भट्टेन्दुराज ] ८२,४९८ पहिअसामाइएसु ५५० | यस्य विकारः प्रभवन्नप्रति [ रुद्रट ] १३४ पाण्डुक्षामं वक्त्रं हृदयं [ मा० माध० ? ] ४०६ | याते गोत्रविपर्यये श्रुतिपथं [ विक्रमो० ] १८४ पुरुषार्थहेतुकमिदं [ सांख्योक्ति ] ४३० | याते द्वारवतीं तदा मधुरिपौ ८३ प्रकरणनाटकयोगात् [ नाट्यशा० २०।६० ] ३६४ | यावत्पूर्णो न चैतेन [ हृदयदर्पण ] ८८ प्रतिग्रहीतुं प्रणयिप्रियत्वात् [कुमा०, १।६६ ]२६९ | युद्धे प्रतिष्ठा परमाऽर्जुनस्य ४२ प्रतिषेध इवेष्टस्य [ भामह, २।६८ ] ११२ | ये यान्त्यभ्युदये प्रीतिं १२९ प्रत्ययैरनुपाख्येयैः [ भर्तृहरि ] १४० | यो यः शस्त्रं विभर्ति [वेणी०, ३।३२ ] २१८,३४४ प्रत्याख्यानरूपः कृतं ३१४ | योऽर्थो हृदयसंवादी [ भट्टनायक ] ४० ब | र बहूनां जन्मनामन्ते [ गीता ] ५७५ | रसान्तरसमावेशः [ ध्वन्या० ३।२२ ] ४२७ बहूनां समवेतानां ४२६ | रसेऽङ्गत्वं तस्मादेषां [ ध्वन्या० ] २३२ भ | रागस्यास्पदमित्यवैमि [ नागानन्द. १।५ ] भम धम्मिअ [ गा० स० २। ७६ ] | राजहंसैरवीज्यन्त ४९७ भ्रअविहलरक्खणेक ५८० | राम इव दशरथोऽभूत् [ रुद्रट ] १२२ भावव्रात हठाज्जनस्य [ अभिनवगुप्त ] १३१ | रौद्रस्य चैव यत्कर्म [नाट्यशा० ] ४१२,४१९ भिन्नरुचिर्हि लोकः [ रघु०, ६।३० ] ७० | ल भो भोः किं किमकाण्ड एव [अभिनवगुप्त] ११२ | लक्षणहेत्वोः [ पा० सू० ३।२।१२६ ] ३४४ म | लङ्घिअगअणा फल ५३१ मणिः शाणोल्लीढः समरविजयी ११५ | लीलादाढा शुच्यूद्धृता [ महावी० ] ३७७ मध्नामि कौरवशतं समरे [वेणी०, १।१५] ५११ | लोकोत्तरे हि गाम्भीर्ये २१ मदो जनयति प्रीतिं [ भामह०, २।२७ ] १२२ | व मनुष्यवृत्त्या समुपाचरन्तं ३८७ | वक्राभिधेयशब्दोक्तिः [भामह, १।३६] २८,४९९ मा निषाद प्रतिष्ठां त्वं [ रा० वा० ] ८८ | वसन्तमत्तालिपरम्परोपमाः [ अभिनवगुप्त ] ५८१ मा भवन्तमललः पवनो वा २९६ | वस्तुतः शिवमये हृदि ६०३ मिअवह्णिडअरो रोणिइकुंसो ३७७ | वाक्यार्थमितये तेषां [श्लोकवा०, १।१।७ ] ४५६
लोचनोद्धृत गद्य-पद्यों की सूची ६१५
**[बायाँ स्तम्भ]**
पृष्ठ
वागङ्गसत्त्वोपेतान् [ नाट्यशा०, ७।१ ] ३४८
वाग्धेनुर्दुग्ध एतं हि [ भट्टनायक ] ९३
वाग्विकल्पानामानन्त्यात् [ध्वन्या०, ] २७
वाच्यः प्रसिद्धः [ ध्वन्या० १।३ ] ४६
वासुदेवः सर्वम् ५७५
विन्ध्यो वर्धितवान् ५०४
विभावभावानुभाव [ नाट्यशा० ] ४४१
विभावानुभावव्यभिचारि० [ नाट्यशा० ] १६३
विभावो विज्ञानार्थः लोके [ नाट्यशा० ] १६३
विरुद्धालङ्क्रियोल्लेखे [ भट्टोद्भट ] १२३
विशेष्यं नाभिधा गच्छेत् ५३
विषमकाण्डकुटुम्बक ३०८
विषयत्वमनापन्नैः [ नाट्यशास्त्र० ] ४५४
वीतरागजन्मादर्शनात् [ न्यायसू०, ३।१ ] ४३२
वीरस्य चैव यत्कर्म [ नाट्यशा० ] ४१९
वीराणां रमते घुसृणारुणे २८६
वृत्तयः काव्यमातृकाः [ नाट्यशास्त्र ] ४४२, ५५३
**श**
शत्रुच्छेददृढेच्छस्य ११८
शब्दप्राधान्यमाश्रित्य [ भट्टनायक ] ८९
शब्दस्योर्ध्वमभिव्यक्तेः [ भर्तृहरि ] १४०
शब्दाः सङ्केतितं प्राहुः ५८९
शब्दानामभिधानमभिधाव्यापारः [ भामहविवरण ] ३४
शब्दार्थवत्त्वैर्लङ्काराः [ भामहविवरण ] १२४
शब्दार्थशासनज्ञान २९५,
शब्दश्छन्दोभिधानार्थाः [ भामह, १।९ ] ३४
शशिवदनासितसरसिज [ अभिनवगुप्त ] १२३
शीतांशोरमृतच्छटा यदि [ अभिनवगुप्त ] २४९
शृङ्गार एव परमः [ ध्वन्या०, २।७ ] ३४५
शृङ्गारश्च तैः प्रसभं [ नाट्यशा० ] ४१९
शृङ्गाराद्धि भवेद्धास्यः [ नाट्यशास्त्र ] ८०
शृङ्गारानुकृतिर्या तु [ नाट्यशास्त्र ] १८७
श्रव्यं नातिसमस्तार्थशब्दं [ भामह, २।२३ ] २१८
श्रीसिद्धिचेलचरणाम्ब [ अभिनवगुप्त ] ६०३
श्रुतिलिङ्गादिप्रमाणषट्कस्य [ जै० सू० ३।३।१४ का अर्थानुवाद ] ६५
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**[दायाँ स्तम्भ]**
**स** पृष्ठ
स एव वीतरागश्चेत् ३४९
एकस्त्रीणि जयति ११६
सग्गं अपारिज्जाअं [ सेतुबन्ध ] १३०
सज्जनान् कविरसौ ६०३
सत्यं मनोरमा रामाः ३२२
स पाते वो यस्य हुतावशेषाः २११
समर्पकत्वं काव्यस्य [ ध्वन्या०, २।१० ] ३५१
समस्तगुणसम्पदः समं [ अभिनवगुप्त ] २१०
समाधिरन्यधर्मस्य १५१
संसाध्ये फलयोगे तु [ नाट्यशा०, २१।७,९ ] ३७०
समुद्रः कुण्डिका ५०४
समुत्थिते धनुर्ध्वनौ [ अर्जुनचरित ] ४२८
सरस्वती स्वादु तदर्थवस्तु [ ध्वन्या०, १।६ ] १०३
सरूपव्यञ्जनन्यासं [ उद्भटका० १।८ ] २०
सर्वक्षितिभृतां नाथ दृष्टा [ विक्रमो० ] ३८९
सर्वत्र ज्वलितेषु वेश्मसु [ ता० व० ३ ] ३७५
सर्वत्र तर्हि काव्यव्यवहारः [ हृदयदर्पण ] ९०
सादृश्यालक्षणा वक्रोक्तिः [ वा० सू०, ४।३।८ ] ३४
स्त्रियो नरपतिर्हितः ३५८
स्थाध्वोरिच [ पा० सू०, १।२।१७ ] ५०४
स्थितमिति यथा शय्यां [ रामाभ्युदय ] ३६७
स्थैर्येणोत्तममध्यम [ नाट्यशा०, ७।६३ ] ३६५
स्फुटीकृतार्थवैचित्र्य ६०३
स्मरनवनदीपूरेणोढाः [ अमरु०, १०४ ] ३३५
स्मरामि स्मरसंहार [ अभिनवगुप्त ] ३११
स्वश्रितपक्ष्मकवाटं [ स्वप्नवा० ] ३७६
स्वल्पमात्रं समुत्सृष्टं बहुधा [ नाट्यशास्त्र ] ४१८
स्ववं स्वं निमित्तमासाद्य [ नाट्यशा० ] ४३१
स्वादुकव्यरसोन्मिश्रं [ भामह, ५।३ ] ४४२
**ह**
हरस्तु किञ्चित्परिवृत्तधैर्यः [ कु० सं० ] २६९
हसन्नेत्रार्पिताकूतं ५०९
हाहाहेति संरम्भाथोंऽयं [ हृदयदर्पण ] १७९
हिअअललिआ ५३१
हेलाऽपि कस्यचिदचिन्त्यफल० २९८
होइ ण गुणाणुराओ १२५
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