भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 663

चतुर्थ उद्योतः ६०३ लोचनम् तस्यायं श्लोकप्रबन्धस्तस्मादादरणीयमेतदिति लोकः प्रवर्त्तमानो दृश्यते । लोकश्चावश्यं प्रवर्त्तनीयः तच्छास्त्रोदितप्रयोजनसम्पत्तये । तदनुग्राह्यश्रोतृजन- प्रवर्त्तनाङ्गत्वाद् ग्रन्थकाराः स्वनामनिबन्धनं कुर्वन्ति, तदभिप्रायेणाह—आनन्द- वर्धन इति । प्रथितशब्देनैतदेव प्रथितं यन्नु तदेव नामश्रवणं केषाञ्चिन्निवृत्तिं करोति, तन्मात्सर्यविजृम्भितं नात्र गणनीयम् , निश्श्रेयसप्रयोजनादेव हि श्रुता- त्कोऽपि रागान्धो यदि निवर्तते किमेतावता प्रयोजनमप्रयोजनमप्यवश्यं वक्त- व्यमेव स्यात् । तस्मादर्थिनां प्रवृत्त्यङ्गन्नाम प्रसिद्धम् । स्फुटीकृतार्थवैचित्र्यबहिःप्रसरदायिनीम् ॥ तुर्यां शक्तिमहं वन्दे प्रत्यक्षार्थनिदर्शिनीम् ॥ आनन्दवर्धनविवेकविकाशिकाव्या- लोकार्थतत्त्वघटनादनुमेयसारम् । यत्प्रोन्मिषत्सकलसद्विषयप्रकाशि- व्यापारयताभिनवगुप्तविलोचनं तत् ॥ श्रीसिद्धिचेलचरणाम्भोजपरागपूत- भट्टेन्दुराजमतिसंस्कृतबुद्धिलेशः । देखा जाता है उसका यह श्लोकप्रबन्ध है इसलिए यह आदरणीय है इस प्रकार लोग प्रवृत्त होते हुए देखे जाते हैं। और लोगों को उस शास्त्र में उक्त प्रयोजन की सम्प्राप्ति के लिए अवश्य प्रवृत्त करना चाहिए; इसलिए अनुग्राह्य श्रोताजनों के प्रवर्त्तन के अङ्ग होने के कारण ग्रन्थकार अपने नाम का निबन्धन करते हैं, उस अभिप्राय से कहते हैं—आनन्द-वर्धन—। 'प्रथित' शब्द से यही प्रकाशित किया है कि जो कि वही नाम श्रवण कुछ जनों को ( प्रवृत्त करने के बजाय ) निवृत्त करता है, वह मात्सर्य से विजृम्भित होने के कारण गणनीय नहीं है, क्योंकि यदि कोई रागान्ध व्यक्ति निःश्रेयस रूप प्रयोजन को सुनकर ही निवृत्त हो जाता है तो इससे क्या, प्रयोजन से अथवा अप्रयोजन, अवश्य ही कहना चाहिए । इसलिए नाम अर्थिजनों की प्रवृत्ति का अङ्ग है । स्पष्ट किए हुए अर्थ-वैचित्र्य को बाहर प्रसार देने वाली, प्रत्यक्ष अर्थ का निदर्शन करने वाली तुर्या ( वैखरी ) शक्ति की मैं वन्दना करता हूँ । आनन्दवर्धन के विवेक से प्रकाशित काव्यालोक के अर्थतत्त्वों को लगाने से अनुमेय रूप सार वाला जो ( सहृदयों के हृदय में ) प्रकाशमान सारे सद्विषयों को प्रकाशित करने वाला है वह अभिनवगुप्त का विशिष्ट 'लोचन' व्यापारित हुआ । श्रीसिद्धिचेल ( नामक गुरु ) के चरणकमल के पराग से पवित्र भट्ट इन्दुराज की