ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished680 पृष्ठ
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६०४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
वाक्यप्रमाणपदवेदिगुरुः प्रबन्ध-
सेवारसो व्यरचयद्ध्वनि वस्तुवृत्तिमू ॥
सज्जनान् कविरसौ न याचते ह्लादनाय शशभृत्किमर्थितः ।
नैव निन्दति खलान्मुहुर्मुहुर्धिक्कृतोऽपि न हि शीतलोऽनलः ॥
वस्तुतशिवमये हृदि स्फुटं सर्वतशिवमयं विराजते ।
नाशिवं कचन कस्यचिद्वचस्तेन वशिवमयी दशा भवेत् ॥
इति महामाहेश्वराभिनवगुप्तविरचिते काव्यालोकलोचने
चतुर्थ उद्योतः ।
मति से संस्कृत बुद्धिलेश वाले, वाक्य ( मीमांसा ), प्रमाण ( न्याय ) और पद
( व्याकरण ) को जानने वालों में श्रेष्ठ, प्रबन्ध सेवा में रस लेने वाले ( अभिनवगुप्त ने )
( ध्वनि के ) मार्ग में ( लोचन रूप ) वस्तु वृत्ति की रचना की ।
यह कवि सज्जनों से ( अपने ग्रन्थ के अवलोकनार्थ ) याचना नहीं करता, क्या
प्रसन्न करने के लिए चन्द्रमा से प्रार्थना की जाती है ? और ( यह कवि ) खलों की
बार-बार निन्दा नहीं करता, ( क्योंकि खल जनों द्वारा ) तिरस्कार का पात्र बनकर भी
अग्नि शीतल नहीं होता ।
वास्तव में शिवमम हृदय में सर्वत्र स्पष्ट रूप से शिवमम तत्त्व विराजमान है कहीं
किसी का वचन अशिव नहीं है इसलिए आप लोगों की स्थिति शिवमयी हो ।
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा विरचित काव्यालोक लोचन में
चतुर्थ उद्योत समाप्त हुआ ।
समाप्तोऽयं ग्रन्थः ।